सीमा पर देश की रखवाली, गांव में सैलाब की मार; ‘फौजियों का गांव’ रतन टोला मदद को तरसा

बी के झा

NSK news Ind

पटना/मनेर, 5 सितंबर

जिन घरों के बेटे देश की सीमाओं पर खड़े होकर भारत की हिफाजत कर रहे हैं, उन्हीं जवानों का अपना गांव आज गंगा की बाढ़ के सामने बेबस खड़ा है। बिहार के मनेर का रतन टोला, जिसे इलाके में ‘फौजियों का गांव’ कहा जाता है, इन दिनों बाढ़ की भीषण त्रासदी झेल रहा है।गंगा का जलस्तर बढ़ने के साथ बाढ़ का पानी गांव में घुस गया है। सड़कें और रास्ते जलमग्न हैं। गांव का मुख्य इलाकों से संपर्क लगभग टूट गया है।

रोजमर्रा की जरूरत का सामान जुटाने के लिए ग्रामीणों को पानी के बीच से होकर गुजरना पड़ रहा है।विडंबना यह है कि जिन परिवारों के सदस्य सीमा पर रहकर देश की सुरक्षा करते हैं, उनके परिवार आज अपने ही गांव में बुनियादी राहत के लिए सरकारी मदद की राह देख रहे हैं।

गांव डूबा, मगर राहत की नाव नहीं पहुंची

ग्रामीणों का आरोप है कि गांव में बाढ़ का पानी घुसने के बावजूद प्रशासन की ओर से अब तक नाव उपलब्ध नहीं कराई गई है। राहत सामग्री की पर्याप्त व्यवस्था नहीं हुई और पशुओं के चारे का भी संकट गहराता जा रहा है।गांव की गलियां और संपर्क मार्ग पानी में डूब चुके हैं। ऐसे में बुजुर्गों, महिलाओं और बच्चों के लिए आवागमन बेहद मुश्किल हो गया है।जरूरत का सामान लेने के लिए लोगों को खुद पानी में उतरकर बाहर जाना पड़ रहा है।

बाढ़ केवल रास्ते नहीं डुबोती—

जब राहत देर से पहुंचे तो वह लोगों का भरोसा भी डुबोने लगती है।खेतों में पानी, किसानों की मेहनत पर फिरा पानी रतन टोला के किसानों के लिए बाढ़ अपने साथ दोहरी मार लेकर आई है। खेतों में खड़ी फसलें पानी में डूब गई हैं। महीनों की मेहनत और खेती में लगाया गया पैसा बर्बाद होने की आशंका है।लेकिन किसानों की चिंता सिर्फ फसल तक सीमित नहीं है।

पशुपालकों के सामने मवेशियों को खिलाने के लिए चारे का गंभीर संकट खड़ा हो गया है। चारा पानी में डूब चुका है और पशुओं को बचाए रखना ग्रामीणों के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।ऐसे में बाढ़ का पानी उतरने के बाद भी ग्रामीणों की मुश्किलें तुरंत खत्म होने वाली नहीं हैं। फसल का नुकसान, पशुओं का चारा और रोजमर्रा की जरूरतें आने वाले दिनों में भी संकट बनी रह सकती हैं।

‘हमारे बेटे सीमा पर हैं, यहां हमारी सुध लेने वाला कौन?

’बाढ़ पीड़ित ग्रामीणों की पीड़ा का सबसे मार्मिक पहलू यही है।ग्रामीणों का कहना है कि रतन टोला के बड़ी संख्या में परिवारों के बेटे और सदस्य सेना में हैं तथा देश की सीमाओं पर ड्यूटी कर रहे हैं। परिवारों को उम्मीद थी कि आपदा की इस घड़ी में प्रशासन उनकी स्थिति को गंभीरता से लेते हुए तत्काल राहत पहुंचाएगा।लेकिन ग्रामीणों के मुताबिक अभी तक गांव में पर्याप्त सरकारी सहायता नहीं पहुंची है।एक तरफ जवान सीमाओं पर देश के लिए मोर्चा संभाले हुए हैं और दूसरी तरफ उनके परिवार बाढ़ के बीच अपने गांव में राहत की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

क्या इससे ज्यादा विडंबनापूर्ण तस्वीर किसी गांव की हो सकती है?

सांसद-विधायक पर ग्रामीणों के सवाल

रतन टोला के ग्रामीणों ने स्थानीय जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर भी सवाल उठाए हैं।ग्रामीणों का आरोप है कि स्थानीय सांसद और विधायक अब तक गांव का जायजा लेने नहीं पहुंचे हैं। उनका कहना है कि जब गांव बाढ़ में डूब रहा है और लोगों को नाव तक उपलब्ध नहीं है, तब जनप्रतिनिधियों की मौजूदगी और प्रशासन पर दबाव बनाने की जरूरत सबसे ज्यादा है।

हालांकि यह ग्रामीणों का आरोप है और संबंधित सांसद-विधायक का पक्ष सामने आने पर उसे भी खबर में शामिल किया जाना चाहिए।लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि केवल चुनाव के समय मतदाता के दरवाजे तक पहुंचने के लिए नहीं होते। प्राकृतिक आपदा के समय उनकी सक्रियता ही जनता के बीच उनकी जवाबदेही की असली परीक्षा होती है।

मुखिया ने मांगी तत्काल राहत

रतन टोला के मुखिया मैनेजर राय तथा बाढ़ पीड़ित धीरज कुमार और संतोष कुमार ने सरकार और प्रशासन से तत्काल राहत पहुंचाने की अपील की है।ग्रामीणों की मांग है कि गांव में तुरंत नाव उपलब्ध कराई जाए, राहत सामग्री पहुंचाई जाए और पशुओं के लिए पर्याप्त चारे की व्यवस्था की जाए।उनका कहना है कि गंगा का पानी लगातार बढ़ रहा है। यदि समय रहते राहत नहीं पहुंची तो स्थिति और गंभीर हो सकती है।

वीडियो में कैद गांव की बेबसी

रतन टोला के हालात का वीडियो भी सामने आया है, जिसमें गांव के रास्तों और आसपास के इलाकों में बाढ़ का पानी फैला दिखाई दे रहा है। पानी के बीच आवागमन करते ग्रामीण इस बात की गवाही दे रहे हैं कि कागजों पर दर्ज राहत और जमीन पर मौजूद राहत के बीच कितना बड़ा अंतर हो सकता है।

वीडियो महज बाढ़ का दृश्य नहीं है।यह उस व्यवस्था के सामने खड़ा सवाल है, जिसके पास आपदा प्रबंधन की योजनाएं तो हैं, लेकिन क्या उन योजनाओं की नाव समय पर गांव तक पहुंचती है?

फौजियों के गांव को सिर्फ सहानुभूति नहीं, सहायता चाहिए

रतन टोला की कहानी को सिर्फ ‘बाढ़ में डूबे गांव’ की खबर मान लेना आसान होगा। लेकिन इस गांव की पहचान इसे एक अलग सवाल में बदल देती है।जिन परिवारों के जवान सीमा पर खड़े होकर देश की सुरक्षा करते हैं, क्या आपदा के समय उनके गांव तक सरकार की राहत सबसे पहले नहीं पहुंचनी चाहिए?

बेशक हर बाढ़ प्रभावित गांव राहत का हकदार है और सरकारी सहायता किसी गांव की पहचान देखकर नहीं मिलनी चाहिए। लेकिन रतन टोला की स्थिति यह याद जरूर दिलाती है कि देश की रक्षा करने वाले जवानों के पीछे खड़े उनके परिवार भी इसी देश की जिम्मेदारी हैं।

आज उन्हें भाषण नहीं चाहिए।

उन्हें आश्वासन नहीं चाहिए।

उन्हें राजनीतिक तस्वीरें नहीं चाहिए।

उन्हें चाहिए—एक नाव, थोड़ा चारा, राहत सामग्री और यह भरोसा कि संकट की घड़ी में सरकार उनके साथ खड़ी है।सीमा पर जवानों की निगाह देश पर है;

अब देश की निगाह रतन टोला पर है।

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