बी के झा
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पटना, 11 सितंबर
बिहार में सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का चेहरा अगर गांव और प्रखंड स्तर पर तलाशना हो तो प्रखंड कल्याण पदाधिकारी यानी BWO महत्वपूर्ण कड़ी हैं।
लेकिन विडंबना देखिए—जिन अधिकारियों के कंधों पर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति समाज के कल्याण की बड़ी जिम्मेदारी है, उनमें से बड़ी संख्या के पास खुद बैठने के लिए अपना कमरा तक नहीं है।
यह कहानी केवल एक सरकारी पद की सुविधाओं की नहीं,
बल्कि उस प्रशासनिक व्यवस्था का आईना है जहां नीतियां राजधानी से बनती हैं,
आदेश जिलों तक पहुंचते हैं,
लेकिन उन्हें जमीन पर उतारने वाला अधिकारी कई बार खुद व्यवस्था का सहारा खोजता दिखाई देता है।
2007 में कल्याण विभाग के विभाजन के बाद अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति कल्याण विभाग अलग अस्तित्व में आया। लेकिन करीब 19 वर्ष गुजरने के बाद भी प्रखंड स्तर पर काम करने वाले कल्याण पदाधिकारियों के लिए बुनियादी कार्यालयी ढांचा पूरी तरह विकसित नहीं हो सका।
534 प्रखंड, लेकिन स्थायी ठिकाना नहीं
राज्य में कुल 534 प्रखंड हैं।
प्रखंड कल्याण पदाधिकारी के 517 पद स्वीकृत हैं।
इनमें 138 अधिकारी दो वर्षीय प्रशिक्षण में हैं, जबकि 17 पद रिक्त बताए गए हैं। शेष प्रखंडों में काम कर रहे करीब 362 पदाधिकारी रोजमर्रा के प्रशासनिक काम के साथ संसाधनों की कमी से भी जूझ रहे हैं।
प्रखंड कार्यालयों में BDO, प्रखंड पंचायतीराज पदाधिकारी और दूसरे अधिकारियों के लिए अलग-अलग कार्यालय कक्ष हैं। लेकिन कल्याण पदाधिकारी को कई जगह दूसरे अधिकारियों के कमरे में बैठकर काम चलाना पड़ता है।
यानी जिस अधिकारी से सरकार अपेक्षा करती है कि वह समाज के सबसे वंचित तबकों तक योजनाओं का लाभ पहुंचाए, उसी अधिकारी के लिए सरकारी तंत्र में एक स्थायी कुर्सी और कमरा तक सुनिश्चित नहीं है।
‘दूसरों के कमरे में कितनी देर बैठ सकते हैं?’
किशनगंज में तैनात कल्याण पदाधिकारी नमिता की परेशानी इस व्यवस्था की जमीनी तस्वीर सामने रखती है। उनके मुताबिक महिला पदाधिकारियों के लिए स्थिति और मुश्किल हो जाती है। कई बार बैठक के दौरान BDO के कार्यालय का इस्तेमाल करने या दूसरे अधिकारियों के कमरे में बैठने की मजबूरी सामने आती है।यह स्थिति केवल असुविधा का विषय नहीं है। सवाल यह है कि क्या ऐसी परिस्थितियों में कोई अधिकारी अपने विभागीय कार्यों को उसी गरिमा और स्वतंत्रता के साथ कर सकता है, जिसकी उससे अपेक्षा की जाती है?
कल्याण पदाधिकारी को दलित बस्तियों में अगलगी की घटनाओं से लेकर विकास मित्रों के काम की निगरानी और विभिन्न योजनाओं के क्रियान्वयन तक कई जिम्मेदारियां निभानी होती हैं। इसके बावजूद उन्हें अतिरिक्त साधन या पर्याप्त लॉजिस्टिक सहायता नहीं मिलना प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
BWO की जिम्मेदारी छोटी नहीं, लेकिन संसाधन बेहद सीमित
प्रखंड कल्याण पदाधिकारी केवल फाइलों पर हस्ताक्षर करने वाला अधिकारी नहीं है। उसके जिम्मे एससी-एसटी समाज से जुड़ी कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां हैं।
एससी-एसटी कल्याणकारी योजनाओं का प्रखंड स्तर पर क्रियान्वयन
एससी-एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत पीड़ितों को मुआवजा दिलाने में सहायता
विकास मित्रों के काम का नियंत्रण और मूल्यांकन
दूसरे राज्यों के कॉलेजों में पढ़ने वाले छात्रों की छात्रवृत्ति की जांच
एससी-एसटी से जुड़े मामलों की जांच और रिपोर्ट
एससी-एसटी आवासीय विद्यालयों एवं छात्रावासों की व्यवस्था से संबंधित जिम्मेदारी, इन जिम्मेदारियों को देखते हुए यह सवाल और गंभीर हो जाता है कि क्या बिना पर्याप्त स्टाफ, वाहन, कार्यालय और अन्य संसाधनों के इन कामों की प्रभावी निगरानी संभव है?
BPSC से चयन, लेकिन नौकरी में बुनियादी सुविधाओं का संकट
प्रखंड कल्याण पदाधिकारी की नियुक्ति बिहार लोक सेवा आयोग की परीक्षा के जरिए होती है। यानी इन पदों पर आने वाले अधिकारी राज्य की प्रतियोगी चयन प्रक्रिया से गुजरकर आते हैं।
विडंबना यह है कि BPSC जैसी कठिन परीक्षा पास कर सरकारी सेवा में आने वाले अधिकारी को पद संभालने के बाद कई जगह अपना कार्यालय तक नसीब नहीं होता।
बिहार अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति कल्याण सेवा संवर्ग में कुल 632 स्वीकृत पद बताए गए हैं, जबकि करीब 450 अधिकारी कार्यरत हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, 388 कल्याण पदाधिकारियों के खिलाफ विभिन्न मामलों में कार्रवाई संचालित होने की बात भी सामने आई है और 20 जिला कल्याण अधिकारियों को कार्रवाई पूरी किए बिना पदावनत कर BWO बनाए जाने का दावा किया गया है।इन प्रशासनिक आंकड़ों की स्वतंत्र विभागीय पुष्टि और पूरी प्रक्रिया का स्पष्ट रिकॉर्ड सार्वजनिक होना भी जरूरी है,
क्योंकि यह सेवा संवर्ग की कार्यप्रणाली और अधिकारियों के मनोबल दोनों से जुड़ा विषय है।
मंत्री ने माना—समस्या है, जल्द समाधान का भरोसा
एससी-एसटी कल्याण मंत्री लखेंद्र कुमार रौशन ने पदाधिकारियों की कठिनाइयों से अवगत होने की बात कही है। उनका कहना है कि विकास मित्र और प्रखंड कल्याण पदाधिकारियों ने मिलकर योजनाओं को जमीनी स्तर तक पहुंचाने में भूमिका निभाई है और उनकी समस्याओं का समाधान जल्द किया जाएगा।अब सवाल यह है कि ‘जल्द’ का मतलब कितना समय है?
क्योंकि जिन अधिकारियों से वर्षों से काम लिया जा रहा है, उनके लिए बुनियादी कार्यालयी ढांचा अब भी अधूरा क्यों है?
राजनीतिक विश्लेषकों की नजर में यह सिर्फ ‘दफ्तर’ का मुद्दा नहीं
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, बिहार में दलित और आदिवासी कल्याण की राजनीति केवल चुनावी घोषणाओं तक सीमित नहीं रह सकती। सरकार यदि इन समुदायों तक योजनाओं का वास्तविक लाभ पहुंचाना चाहती है तो प्रखंड स्तर के प्रशासनिक ढांचे को मजबूत करना होगा।किसी भी सरकार की नीतियों की सफलता का वास्तविक परीक्षण राजधानी के वातानुकूलित कार्यालयों में नहीं, बल्कि गांव और प्रखंड स्तर पर होता है।
यदि वहां अधिकारी ही संसाधनविहीन है तो योजना और लाभार्थी के बीच की दूरी बनी रह सकती है।
शिक्षाविदों की चिंता: प्रशासनिक ढांचा मजबूत किए बिना सामाजिक न्याय अधूरा
शिक्षाविदों के नजरिए से देखें तो सामाजिक न्याय केवल छात्रवृत्ति, आवासीय विद्यालय या मुआवजे की योजनाओं का नाम नहीं है। इन योजनाओं को लागू करने के लिए सक्षम और जवाबदेह प्रशासनिक व्यवस्था भी उतनी ही जरूरी है।अगर प्रखंड स्तर के अधिकारी लगातार कार्यालय, स्टाफ और परिवहन जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी से जूझते रहेंगे तो उनके काम का मूल्यांकन केवल लक्ष्य पूरे हुए या नहीं, इस आधार पर करना भी उचित नहीं होगा।
कानूनविदों के लिए बड़ा सवाल—जवाबदेही के साथ संसाधन भी जरूरी
कानूनविदों की दृष्टि से भी मामला महत्वपूर्ण है। एससी-एसटी अत्याचार निवारण कानून के तहत पीड़ितों को मुआवजा और प्रशासनिक सहायता दिलाने में स्थानीय स्तर के अधिकारियों की भूमिका होती है। ऐसे मामलों में समयबद्ध कार्रवाई बेहद महत्वपूर्ण होती है।इसलिए व्यवस्था को यह सुनिश्चित करना होगा कि जिस अधिकारी से वैधानिक और प्रशासनिक जिम्मेदारी निभाने की अपेक्षा की जा रही है, उसे आवश्यक संसाधन भी उपलब्ध कराए जाएं।
जवाबदेही और संसाधन—दोनों एक साथ चलने चाहिए।
समाजसेवी संगठनों के लिए भी बड़ा सवाल
दलित और आदिवासी अधिकारों पर काम करने वाली सामाजिक संस्थाओं के लिए यह मुद्दा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सरकारी योजनाओं का अंतिम लाभार्थी वही व्यक्ति है जो अक्सर प्रशासनिक व्यवस्था तक आसानी से नहीं पहुंच पाता।यदि प्रखंड स्तर का कल्याण तंत्र कमजोर होगा तो सबसे अधिक असर उन्हीं परिवारों पर पड़ेगा जिन्हें सरकार की सहायता की सबसे ज्यादा जरूरत है।
विपक्ष के लिए भी सरकार को घेरने का मौका
विपक्षी दलों के लिए यह मामला सरकार पर सवाल उठाने का स्वाभाविक आधार बन सकता है। खासकर तब, जब सरकार सामाजिक न्याय और वंचित वर्गों के कल्याण को अपनी प्राथमिकताओं में गिनाती है।हालांकि, इस रिपोर्ट के आधार पर किसी विपक्षी दल की विशिष्ट प्रतिक्रिया उपलब्ध नहीं है। इसलिए राजनीतिक दलों के नाम पर काल्पनिक बयान जोड़ना पत्रकारिता की विश्वसनीयता के खिलाफ होगा। लेकिन यदि विपक्ष इस मुद्दे को उठाता है तो असली सवाल यही होना चाहिए—क्या सरकार ने कल्याण योजनाओं के लिए पर्याप्त बजट के साथ उतना ही मजबूत प्रशासनिक ढांचा भी तैयार किया है?
NSK का सवाल: दूसरों के लिए कल्याण, खुद के लिए इंतजार क्यों?
बिहार के प्रखंड कल्याण पदाधिकारियों की स्थिति व्यवस्था के उस विरोधाभास को सामने लाती है, जहां अधिकारी से परिणाम मांगा जाता है, लेकिन परिणाम देने के लिए जरूरी साधन उपलब्ध कराने में वर्षों लग जाते हैं।
जिस अधिकारी को दलित बस्ती में आग लगने पर पहुंचना है, उसके पास वाहन नहीं।
जिसे योजनाओं की निगरानी करनी है, उसके पास अपना कमरा नहीं।
जिसे विकास मित्रों के काम का मूल्यांकन करना है, उसके पास पर्याप्त सहयोगी तंत्र नहीं। और फिर भी उससे अपेक्षा है कि वह सरकार की कल्याणकारी योजनाओं को अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाए।
यह केवल BWO की परेशानी नहीं है। यह उस प्रशासनिक दर्शन पर सवाल है जिसमें कल्याण का लक्ष्य तो बड़ा रखा जाता है, लेकिन उसे जमीन पर पहुंचाने वाले तंत्र को उतनी गंभीरता नहीं मिलती।
मंत्री ने समाधान का भरोसा दिया है। अब जरूरत भरोसे को आदेश में, आदेश को बजट में और बजट को हर प्रखंड में एक सम्मानजनक कार्यालय, पर्याप्त स्टाफ और जरूरी संसाधनों में बदलने की है।
क्योंकि सामाजिक न्याय की असली परीक्षा भाषणों में नहीं, उस अधिकारी की मेज पर होती है जो अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति की शिकायत सुनता है।
