बिहार में अफसरों की बड़ी सर्जरी: 37 पुलिस अधिकारियों के तबादले से उठे सवाल, तेजस्वी ने सरकार पर लगाया उगाही का आरोप

बी के झा

NSK news Ind

पटना, 7 सितंबर

बिहार में प्रशासनिक और पुलिस महकमे में एक बार फिर बड़ा फेरबदल हुआ है। राज्य सरकार ने रविवार को एक एसपी, आठ एएसपी और 28 डीएसपी समेत बिहार पुलिस सेवा के 37 अधिकारियों का तबादला कर दिया। गृह विभाग की अधिसूचना के मुताबिक कई अधिकारियों को आर्थिक अपराध इकाई, निगरानी अन्वेषण ब्यूरो, विशेष शाखा, साइबर क्राइम, एसटीएफ, रेल और यातायात जैसे महत्वपूर्ण पदों पर भेजा गया है।

तबादलों की इस सूची को सरकार प्रशासनिक दक्षता और कानून-व्यवस्था को मजबूत करने की कवायद बता सकती है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसे लेकर सवाल भी उठने लगे हैं—

क्या लगातार अधिकारियों के तबादले से बिहार की कानून-व्यवस्था सुधरेगी या प्रशासनिक व्यवस्था में स्थायित्व की कमी और बढ़ेगी?

निगरानी और EOU में भेजे गए कई अधिकारीआरा सदर के एसडीपीओ-1 राजकुमार साह को निगरानी अन्वेषण ब्यूरो में एसपी की जिम्मेदारी दी गई है।

मधेपुरा सदर के एसडीपीओ प्रवेंद्र कुमार भारती को आर्थिक अपराध इकाई में एएसपी बनाया गया है।

दाऊदनगर के एसडीपीओ अशोक कुमार दास को निगरानी अन्वेषण ब्यूरो भेजा गया है।

सीवान सदर के एसडीपीओ-1 अजय कुमार सिंह और सीवान के एएसपी संजय कुमार झा को विशेष शाखा में एएसपी की जिम्मेदारी मिली है।

समस्तीपुर सदर के एसडीपीओ-1 संजय कुमार पांडेय को बी-सैप-1 पटना तथा त्रिवेणीगंज के एसडीपीओ विभाष कुमार को बी-सैप-7 कटिहार भेजा गया है।

साइबर क्राइम पर सरकार का फोकस

इस फेरबदल में साइबर अपराध पर विशेष जोर दिखाई देता है। मुंगेर, किशनगंज, सारण और लखीसराय में नए साइबर क्राइम डीएसपी तैनात किए गए हैं।

फुलवारीशरीफ के दीपक कुमार को सारण,

जबकि बेतिया सदर के एसडीपीओ रजनीश कांत प्रियदर्शी को लखीसराय में साइबर क्राइम डीएसपी की जिम्मेदारी दी गई है।

मुकेश कुमार ठाकुर को मुंगेर

और अविनाश कुमार को किशनगंज में साइबर क्राइम की जिम्मेदारी दी गई है।

साथ ही सीवान, रोहतास और अरवल में नए ट्रैफिक डीएसपी तथा जमालपुर और समस्तीपुर में नए रेल डीएसपी की तैनाती की गई है।

STF, विशेष शाखा और रेल में भी बदलाव

सुनील कुमार पांडेय को विशेष सुरक्षा दल, पटना में डीएसपी बनाया गया है।

संजय कुमार जायसवाल को एसटीएफ की जिम्मेदारी दी गई है।

एम. आदिल बेलाल को समस्तीपुर का रेल डीएसपी

और आलोक कुमार को जमालपुर का रेल डीएसपी बनाया गया है।

यानी सरकार ने एक ही फेरबदल में पुलिस की कई महत्वपूर्ण इकाइयों की कमान नए अधिकारियों को सौंप दी है।

पुलिस के साथ प्रशासनिक मशीनरी भी बदली

पुलिस अधिकारियों के तबादले के साथ ही सरकार ने प्रशासनिक स्तर पर भी फेरबदल किया है। दो आईएएस और आठ बिहार प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों को नई जिम्मेदारी दी गई है। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक राजस्व पर्षद के सचिव कुमार मंगलम को ग्रामीण कार्य विभाग में अपर सचिव बनाया गया है,

जबकि मधेपुरा के उप विकास आयुक्त अनिल बसाक को पथ निर्माण विभाग में संयुक्त सचिव की जिम्मेदारी दी गई है।भविष्य निधि निदेशालय के सहायक निदेशक गौतम कुमार को समस्तीपुर का नगर आयुक्त बनाया गया है।

भागलपुर के अपर समाहर्ता दिनेश राम को योजना पर्षद में संयुक्त सचिव

और अरुण कुमार को मधेपुरा का उप विकास आयुक्त बनाया गया है।

इसके अलावा सरफराज नवाज,

शशि कुमार,

शशि भूषण शशि,

चंद्रशेखर कुमारन

और तनुजा श्री समेत कई बिहार प्रशासनिक सेवा अधिकारियों की भी नई जगह तैनाती की गई है।

सवाल सिर्फ तबादले का नहीं, नतीजे का है

प्रशासनिक व्यवस्था में तबादला एक सामान्य प्रक्रिया है। किसी अधिकारी को नई जिम्मेदारी देना, विभागीय जरूरत के मुताबिक अधिकारियों की तैनाती करना या संवेदनशील इकाइयों में अनुभवी अधिकारियों को भेजना सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है।लेकिन लोकतंत्र में असली कसौटी आदेश नहीं, नतीजा होता है।अगर साइबर क्राइम डीएसपी बदलने के बाद साइबर ठगी कम होती है, अगर ट्रैफिक डीएसपी बदलने के बाद यातायात व्यवस्था बेहतर होती है, अगर निगरानी और EOU में नई तैनाती के बाद भ्रष्टाचार और आर्थिक अपराधों पर कार्रवाई तेज होती है, तो इस प्रशासनिक सर्जरी को परिणामकारी माना जाएगा।

लेकिन अगर कुछ महीनों बाद फिर अधिकारियों की नई सूची जारी हो जाती है और जमीनी तस्वीर वही रहती है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर समस्या अधिकारियों में है या व्यवस्था के संचालन में?

राजनीतिक विश्लेषण: ट्रांसफर से ज्यादा महत्वपूर्ण है ‘टेन्योर’

प्रशासनिक विशेषज्ञों के नजरिए से देखें तो किसी भी अधिकारी को पर्याप्त समय दिए बिना बार-बार बदलने से संस्थागत निरंतरता प्रभावित हो सकती है। पुलिसिंग में तो यह सवाल और महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि अपराध नियंत्रण के लिए स्थानीय नेटवर्क, अपराधियों की पहचान, खुफिया तंत्र और थाना स्तर की कार्यप्रणाली को समझने में समय लगता है।दूसरी ओर सरकार का तर्क यह हो सकता है कि संवेदनशील पदों पर समय-समय पर बदलाव से जवाबदेही बढ़ती है और अधिकारियों पर किसी एक स्थानीय नेटवर्क का प्रभाव बनने की संभावना कम होती है।

यानी बहस का केंद्र “तबादला हुआ या नहीं” नहीं, बल्कि यह होना चाहिए कि “तबादले के बाद कानून-व्यवस्था में कितना बदलाव आया?

“”तेजस्वी यादव का सरकार पर गंभीर हमला“”

इस पूरे फेरबदल को लेकर आरजेडी नेता और नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि अधिकारियों को बड़े पैमाने पर इधर से उधर करने के पीछे प्रशासनिक सुधार से ज्यादा उगाही का उद्देश्य है।

तेजस्वी ने सवाल उठाया कि पहले भी बड़े पैमाने पर पुलिस अधिकारियों और आईएएस अधिकारियों के तबादले किए गए, लेकिन क्या उससे बिहार की कानून-व्यवस्था में सुधार हुआ?

उनका दावा है कि ऐसा नहीं हुआ और राज्य में भ्रष्टाचार तथा अपराध की स्थिति गंभीर बनी हुई है।उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि आने वाले वर्षों में कई राज्यों में चुनाव होने हैं और बिहार से गरीब जनता तथा अधिकारियों से कथित तौर पर पैसा जुटाकर केंद्रीय नेतृत्व तक पहुंचाने के उद्देश्य से तबादले किए जा रहे हैं।

हालांकि ये तेजस्वी यादव और विपक्ष के राजनीतिक आरोप हैं। इनके समर्थन में कोई स्वतंत्र प्रमाण सार्वजनिक रूप से सामने आया है, ऐसा इस रिपोर्ट के लिए उपलब्ध स्रोतों से स्थापित नहीं होता। इसलिए इन आरोपों की सत्यता का अंतिम निर्धारण स्वतंत्र जांच या संबंधित साक्ष्यों से ही संभव है।

विपक्ष का आरोप बनाम सरकार की प्रशासनिक दलील

यही वह बिंदु है जहां बिहार की राजनीति में असली टकराव दिखाई देता है।

विपक्ष का सवाल:अधिकारी बदलने से अपराध कैसे रुकेगा?

अगर व्यवस्था में खामी है तो जिम्मेदारी तय क्यों नहीं होती?

सरकार का संभावित पक्ष: तबादले प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा हैं और नई जिम्मेदारियों के जरिए पुलिसिंग, साइबर अपराध, आर्थिक अपराध, यातायात तथा निगरानी तंत्र को अधिक प्रभावी बनाया जा रहा है।दोनों दावों के बीच फैसला अंततः जनता के अनुभव और अपराध के आंकड़ों से होना चाहिए।

कानूनविदों की नजर में असली कसौटी

कानूनी दृष्टि से सरकार को अधिकारियों के तबादले और पदस्थापन का प्रशासनिक अधिकार प्राप्त है, लेकिन किसी भी प्रशासनिक कार्रवाई की वैधता और औचित्य का मूल्यांकन स्थापित सेवा नियमों, प्रक्रिया और परिस्थितियों के आधार पर किया जा सकता है।इसलिए किसी तबादले को महज राजनीतिक बदले की कार्रवाई या भ्रष्टाचार की व्यवस्था कहना पर्याप्त नहीं है। इसके लिए ठोस तथ्य, आदेशों की परिस्थितियां, अधिकारी के कार्यकाल और बाद के परिणाम जैसे पहलुओं की जांच जरूरी होगी।यही वजह है कि राजनीतिक आरोपों को खबर में दर्ज करना और उन्हें तथ्य के रूप में स्थापित करना—दो अलग बातें हैं।

शिक्षाविदों और समाजसेवी संगठनों के लिए भी बड़ा सवाल

प्रशासनिक बदलाव का प्रभाव सिर्फ पुलिस मुख्यालय या सचिवालय तक सीमित नहीं रहता। इसका सीधा असर आम नागरिक पर पड़ता है।साइबर अपराध से परेशान युवा, ट्रैफिक जाम में फंसा आम आदमी, आर्थिक अपराध का शिकार कारोबारी, थाने में न्याय की उम्मीद लेकर पहुंचने वाला पीड़ित और अपराध से भयभीत परिवार—इन सभी के लिए अधिकारी का नाम नहीं, व्यवस्था का व्यवहार मायने रखता है।

सामाजिक संगठनों और नागरिक समूहों के लिए इसलिए मांग यह होनी चाहिए कि सरकार सिर्फ तबादलों की सूची जारी न करे, बल्कि कुछ महीनों बाद यह भी बताए कि इन नई तैनातियों के बाद अपराध नियंत्रण,

साइबर अपराध,

आर्थिक अपराध,

यातायात और पुलिसिंग में क्या ठोस सुधार आया।

बिहार की जनता पूछ रही है—अगली सूची कब?

बिहार में पिछले कुछ समय से लगातार प्रशासनिक और पुलिस स्तर पर फेरबदल देखने को मिल रहे हैं। 4 सितंबर को भी 10 आईपीएस अधिकारियों के तबादले की खबर सामने आई थी, जिसमें कई युवा अधिकारियों को एसडीपीओ जैसी जिम्मेदारियां दी गई थीं।अब 37 पुलिस अधिकारियों और कई प्रशासनिक अधिकारियों की नई तैनाती ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—

क्या बिहार में यह प्रशासनिक पुनर्गठन किसी दीर्घकालिक पुलिसिंग मॉडल की शुरुआत है, या फिर तबादलों की एक और कड़ी?

इस सवाल का जवाब आने वाले महीनों में अपराध के आंकड़े, पुलिस की कार्यप्रणाली और जनता के अनुभव देंगे।फिलहाल सरकार के सामने चुनौती सिर्फ नए अधिकारियों को नई कुर्सी देना नहीं है।चुनौती यह साबित करने की है कि नई कुर्सियों पर बैठे नए अधिकारी बिहार की पुरानी समस्याओं को सचमुच बदल पाएंगे।

NSK News India का विश्लेषण

बिहार में प्रशासनिक फेरबदल को केवल राजनीतिक चश्मे से देखना भी उचित नहीं होगा और सरकार के हर फैसले को प्रशासनिक सुधार मान लेना भी।

लोकतंत्र में सरकार को अधिकारियों की तैनाती का अधिकार है, विपक्ष को सवाल पूछने का अधिकार है और जनता को परिणाम मांगने का अधिकार है।

इसलिए अब निगाहें तबादला सूची पर नहीं, उसके बाद बदलने वाली जमीन पर होनी चाहिए।

क्योंकि बिहार को अधिकारियों की नई सूची से ज्यादा सुरक्षित सड़कें, बेहतर पुलिसिंग, तेज न्याय और अपराध से मुक्त माहौल चाहिए।

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