बी के झा
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पटना, 10 सितंबर
बिहार की राजनीति में शराबबंदी एक बार फिर सिर्फ सामाजिक सुधार का मुद्दा नहीं, बल्कि सत्ता बनाम विपक्ष की राजनीतिक बहस का बड़ा केंद्र बनती दिखाई दे रही है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने साफ कर दिया है कि बिहार में पूर्ण शराबबंदी आगे भी जारी रहेगी और इस फैसले से किसी भी कीमत पर समझौता नहीं किया जाएगा।
मुख्यमंत्री के मुताबिक शराबबंदी के कारण राज्य को सालाना करीब 20 हजार करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान हो रहा है, लेकिन महिलाओं के सम्मान से जुड़े इस फैसले को सरकार आर्थिक नुकसान के तराजू पर नहीं तौलेगी।मुख्यमंत्री ने एक समाचार एजेंसी के साथ बातचीत में कहा कि तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने महिलाओं के आग्रह पर बिहार में शराबबंदी लागू की थी और यह फैसला अब भी सामाजिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
यानी सरकार का संदेश साफ है—राजस्व जाए तो जाए, लेकिन शराबबंदी नहीं जाएगी।
लेकिन यहीं से बिहार की राजनीति में सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है—अगर सरकार हर साल 20 हजार करोड़ रुपये के संभावित राजस्व को छोड़ रही है, तो क्या शराबबंदी से पैदा हुए सामाजिक लाभ और आर्थिक नुकसान का कोई स्वतंत्र मूल्यांकन हुआ है?
और इससे भी बड़ा सवाल—जिस शराब की बिक्री कानूनन बंद है, वह आखिर बिहार के गांवों, कस्बों और शहरों तक लगातार पहुंच कैसे रही है?
‘महिला सम्मान’ बनाम ‘जमीनी हकीकत’
सरकार शराबबंदी को महिलाओं के सम्मान और परिवारों की सुरक्षा से जोड़ रही है। राजनीतिक विश्लेषकों के एक वर्ग का मानना है कि शराबबंदी का मूल उद्देश्य सामाजिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण था। शराब की लत से परिवारों पर पड़ने वाला आर्थिक बोझ, घरेलू हिंसा और महिलाओं की असुरक्षा जैसे मुद्दे इस फैसले के पीछे बड़ी वजह रहे हैं।लेकिन शिक्षाविदों और सामाजिक क्षेत्र से जुड़े लोगों के बीच यह सवाल भी उठता रहा है कि किसी कानून की सफलता सिर्फ इस बात से तय नहीं होती कि वह कागज पर कितना कठोर है, बल्कि इस बात से भी होती है कि जमीन पर उसका पालन कितना प्रभावी है।
बिहार में शराबबंदी लागू होने के बावजूद अवैध शराब, तस्करी और चोरी-छिपे शराब बिक्री की खबरें लगातार सामने आती रही हैं। यही वजह है कि विपक्ष सरकार से पूछ रहा है कि यदि शराबबंदी इतनी प्रभावी है तो अवैध शराब का नेटवर्क लगातार क्यों दिखाई देता है?
तेजस्वी समेत विपक्ष का सरकार पर हमला
मुख्यमंत्री के बयान पर विपक्ष ने सरकार को घेरने का मौका हाथ से नहीं जाने दिया। आरजेडी नेता तेजस्वी यादव समेत विपक्षी नेताओं का तर्क है कि शराबबंदी के कारण सरकारी राजस्व को होने वाले नुकसान की चर्चा तो लगातार होती है, लेकिन अवैध शराब के कारोबार से जुड़े भ्रष्टाचार और कथित वसूली के सवालों पर सरकार चुप रहती है।विपक्ष का आरोप है कि शराबबंदी ने एक समानांतर अवैध अर्थव्यवस्था को जन्म दिया है, जिसमें शराब माफिया, बिचौलियों और भ्रष्ट तंत्र की भूमिका पर गंभीर सवाल उठते हैं।
विपक्ष यह भी सवाल उठा रहा है कि यदि सरकारी खजाने को हजारों करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है, तो अवैध कारोबार पर लगाम लगाने के लिए सरकार की रणनीति क्या है और अब तक उसका परिणाम क्या निकला?
हालांकि इन आरोपों को राजनीतिक आरोपों के रूप में ही देखा जाना चाहिए। इनके समर्थन में ठोस प्रमाण या किसी विशेष अधिकारी अथवा नेता के खिलाफ स्थापित तथ्य होने पर ही उन्हें तथ्यात्मक निष्कर्ष माना जा सकता है।
कानूनविदों की नजर में असली परीक्षा ‘क्रियान्वयन
‘कानूनविदों के दृष्टिकोण से शराबबंदी का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष कानून का निष्पक्ष और समान रूप से क्रियान्वयन है। यदि प्रतिबंधित वस्तु का अवैध कारोबार बड़े स्तर पर चलता रहे और कार्रवाई मुख्य रूप से छोटे उपभोक्ताओं या गरीब तबके तक सीमित रह जाए, तो कानून की प्रभावशीलता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।यहीं बिहार सरकार के सामने सबसे कठिन चुनौती है—
क्या शराबबंदी का कानून शराब के बड़े नेटवर्क तक पहुंच रहा है या उसका सबसे ज्यादा असर अंतिम छोर पर खड़े गरीब और मजदूर व्यक्ति पर पड़ रहा है?
समाजसेवी संगठनों के बीच भी यही बहस है। एक पक्ष मानता है कि शराबबंदी ने अनेक परिवारों को शराब की लत से बचाया है।
दूसरा पक्ष कहता है कि प्रतिबंध के कारण अवैध शराब का बाजार बढ़ा और जहरीली शराब जैसी त्रासदियों का खतरा पैदा हुआ। इसलिए सरकार को सिर्फ ‘शराबबंदी जारी रहेगी’ कहने के बजाय यह भी बताना होगा कि इस नीति के सामाजिक और आर्थिक परिणामों को मापने का उसका वैज्ञानिक तरीका क्या है।
गरीब परिवारों पर असर का सवाल
बिहार के ग्रामीण इलाकों में शराबबंदी का प्रभाव एक जैसा नहीं रहा है। कई परिवारों के लिए शराब की उपलब्धता कम होना राहत का कारण बना, तो दूसरी तरफ अवैध शराब की कीमत, तस्करी और पुलिस कार्रवाई ने गरीब परिवारों के सामने नई परेशानियां भी खड़ी की हैं।यही कारण है कि शराबबंदी पर बहस को केवल ‘शराब चाहिए या नहीं चाहिए’ तक सीमित करना समस्या को बहुत छोटा कर देता है।
असली सवाल है—
क्या बिहार ऐसा मॉडल बना सकता है जिसमें शराबबंदी के सामाजिक उद्देश्य भी कायम रहें और अवैध कारोबार, भ्रष्टाचार तथा जहरीली शराब के खतरे पर भी प्रभावी नियंत्रण हो?
20 हजार करोड़ का आंकड़ा बना राजनीतिक हथियार
मुख्यमंत्री ने जिस 20 हजार करोड़ रुपये के सालाना राजस्व नुकसान का जिक्र किया है, वह आंकड़ा अब राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया है। सरकार इसे महिलाओं के सम्मान के लिए दी गई आर्थिक कीमत बता रही है, जबकि विपक्ष इसे राज्य की कमजोर होती राजस्व क्षमता से जोड़ रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक सरकार के लिए चुनौती यह है कि वह जनता को यह समझाए कि शराबबंदी से होने वाला सामाजिक लाभ 20 हजार करोड़ रुपये के राजस्व नुकसान से कहीं बड़ा है। इसके लिए केवल राजनीतिक बयान पर्याप्त नहीं होंगे। सरकार को अपराध, घरेलू हिंसा, परिवारों की बचत, स्वास्थ्य और सामाजिक प्रभाव से जुड़े आंकड़े भी सार्वजनिक करने होंगे।
बाढ़ से लेकर पलायन तक CM ने रखी सरकार की तस्वीर
मुख्यमंत्री ने बातचीत के दौरान बिहार की बाढ़ और पलायन पर भी सरकार की रणनीति बताई। उनका कहना है कि नेपाल से आने वाली कोसी और गंडक जैसी नदियों के कारण बिहार में बाढ़ की गंभीर समस्या बनी रहती है। हाईलेवल डैम के निर्माण को लेकर डीपीआर पर सहमति बनने की बात भी उन्होंने कही।वर्तमान बाढ़ की स्थिति को लेकर मुख्यमंत्री ने दावा किया कि राहत एवं बचाव कार्य युद्ध स्तर पर चल रहा है। नदियों के भीतरी इलाकों में रहने वाले करीब 20 हजार लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया है और सामुदायिक रसोई के जरिए भोजन उपलब्ध कराया जा रहा है।
पलायन के मुद्दे पर मुख्यमंत्री ने बड़ा दावा करते हुए कहा कि 2030 से पहले बिहार से पलायन रोक दिया जाएगा। उनके मुताबिक तब तक शिक्षा से लेकर रोजगार तक बेहतर व्यवस्था तैयार कर दी जाएगी।अब इस दावे की सबसे बड़ी परीक्षा रोजगार के वास्तविक अवसर होंगे।
बिहार के युवाओं के लिए सवाल सिर्फ यह नहीं है कि सरकार कितने रोजगार देने का लक्ष्य तय करती है, बल्कि यह है कि क्या राज्य में ऐसे स्थायी और सम्मानजनक रोजगार पैदा होंगे जिनके लिए युवाओं को दिल्ली, मुंबई, पंजाब, गुजरात या दूसरे राज्यों की ओर न जाना पड़े।
नीतीश को बताया पितातुल्य, BJP के नेतृत्व पर बोले—फैसला शीर्ष नेतृत्व करेगा
राजनीतिक सवालों पर मुख्यमंत्री ने नीतीश कुमार के साथ अपने पुराने संबंधों का जिक्र करते हुए कहा कि वह करीब 30 वर्षों से उनके साथ काम कर रहे हैं और नीतीश कुमार उनके लिए पितातुल्य हैं। वहीं भाजपा में नेतृत्व को लेकर पूछे गए सवाल पर सम्राट चौधरी ने कहा कि पार्टी का नेता कौन होगा, यह शीर्ष नेतृत्व तय करता है और यह भाजपा का आंतरिक मामला है।
यह बयान ऐसे समय में महत्वपूर्ण माना जा रहा है जब बिहार की राजनीति में सत्ता के नेतृत्व और भविष्य की राजनीतिक दिशा को लेकर लगातार अटकलें लगती रहती हैं।
फरक्का बराज पर केंद्र के सामने बिहार की मांग
मुख्यमंत्री ने फरक्का बराज को लेकर भी बिहार की चिंता सामने रखी। उनका कहना है कि फरक्का बराज के कारण गंगा में गाद जमा होने की समस्या बढ़ी है और इससे नदी के प्रवाह एवं चौड़ाई पर असर पड़ा है।उन्होंने अलग-अलग स्थानों पर गंगा की चौड़ाई का उल्लेख करते हुए कहा कि
बक्सर के पास यह करीब चार किलोमीटर,
पटना में 11 किलोमीटर,
बेगूसराय में 17 किलोमीटर
और भागलपुर में 26 किलोमीटर तक हो जाती है।
फरक्का जल संधि को लेकर बिहार सरकार की मांग है कि राज्य को पीने, खेती और उद्योग के लिए आवश्यकता के अनुसार पानी लेने का अधिकार मिलना चाहिए। मुख्यमंत्री के मुताबिक इस विषय पर केंद्र सरकार से बातचीत की गई है।
अब असली सवाल सरकार से
शराबबंदी पर मुख्यमंत्री का संदेश राजनीतिक रूप से स्पष्ट है— 20 हजार करोड़ का राजस्व नुकसान भी स्वीकार, लेकिन शराबबंदी से पीछे हटना मंजूर नहीं।लेकिन बिहार की जनता के सामने इससे आगे के सवाल भी हैं।
क्या शराबबंदी से महिलाओं की सुरक्षा और परिवारों की आर्थिक स्थिति में मापने योग्य सुधार हुआ?
क्या अवैध शराब के कारोबार की कमर वास्तव में टूटी?
क्या बड़े शराब तस्करों और नेटवर्क के खिलाफ उतनी ही कठोर कार्रवाई हुई जितनी छोटे लोगों के खिलाफ?
क्या शराबबंदी से जुड़े आर्थिक नुकसान और सामाजिक लाभ का स्वतंत्र अध्ययन सरकार सार्वजनिक करेगी?
और सबसे महत्वपूर्ण —- क्या ‘महिला सम्मान’ के नाम पर लागू शराबबंदी को ऐसा प्रभावी माँडल बनाया जा सकता है जिसमें ना सरकारी राजस्व का नुक़सान बेकार जाए, ना गरीब परिवार अवैध शराब के जाल में फंसे और न कानून भ्रष्टाचार का जरिया बनने पाए ?
यही वह बिंदु है जहां बिहार की शराबबंदी सिर्फ एक राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि शासन की विश्वसनीयता की परीक्षा बन जाती है।
