बी के झा
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प्रयागराज/बरेली, 8 सितंबर
बरेली हिंसा मामले में मौलाना तौकीर रजा खान को इलाहाबाद हाईकोर्ट से बड़ा झटका लगा है। हाईकोर्ट ने सोमवार को उनकी जमानत याचिका खारिज कर दी। न्यायमूर्ति आशुतोष श्रीवास्तव की एकल पीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान कथित ‘सर तन से जुदा’ नारे को लेकर बेहद कड़ी टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि इस नारे की तुलना धार्मिक आस्था से जुड़े नारों से नहीं की जा सकती।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि ‘नारा-ए-तकबीर, अल्लाहु-अकबर’, ‘जय श्री राम’, ‘हर हर महादेव’ या ‘जो बोले सो निहाल, सत श्री अकाल’ जैसे नारे धार्मिक आस्था और सम्मान की अभिव्यक्ति हैं, जबकि ‘सर तन से जुदा’ जैसा नारा कानून के अधिकार तथा भारत की संप्रभुता और अखंडता को चुनौती देने वाला है।
‘सर तन से जुदा’ नारा क्यों बना अदालत की टिप्पणी का केंद्र?
अदालत ने कथित नारे ‘गुस्ताख-ए-नबी की एक ही सजा, सर तन से जुदा’ को लेकर कहा कि इसे सामान्य धार्मिक उद्घोष या आस्था के नारे के समान नहीं माना जा सकता। कोर्ट के मुताबिक, इस तरह का नारा लोगों को हिंसक या सशस्त्र विद्रोह के लिए उकसाने वाला प्रभाव पैदा कर सकता है और कानून के तहत इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
अदालत की यह टिप्पणी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि मामला केवल एक नारे तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके बाद हुई घटनाओं और कानून-व्यवस्था की स्थिति को भी जमानत के सवाल पर अदालत ने ध्यान में रखा।
तौकीर रजा की अपील पर कोर्ट ने क्यों नहीं दी राहत?
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत के सामने अभियोजन पक्ष ने बरेली में हुई घटनाओं और मौलाना तौकीर रजा की भूमिका से जुड़े आरोपों का उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि तौकीर रजा की ओर से लोगों को इस तरह एकत्र होने के लिए बुलाए जाने और उसके बाद हुई घटनाओं को देखते हुए इस स्तर पर उन्हें जमानत देना उचित नहीं है।हाईकोर्ट ने इसी आधार पर उनकी जमानत याचिका खारिज कर दी। उनके साथ डॉक्टर नफीस की जमानत याचिका भी अदालत ने खारिज कर दी।
26 सितंबर 2025 को बरेली में क्या हुआ था?
बरेली में 26 सितंबर 2025 को हिंसा की घटना सामने आई थी। अभियोजन के मुताबिक, बड़ी संख्या में लोग एकत्र हुए थे और बाद में स्थिति तनावपूर्ण हो गई। पुलिस के साथ टकराव, पथराव और पेट्रोल बम फेंके जाने जैसी घटनाओं के आरोप भी सामने आए थे।इसी मामले में मौलाना तौकीर रजा खान को प्रमुख आरोपी बनाया गया है।
अभियोजन पक्ष का आरोप है कि उनके आह्वान के बाद भीड़ जुटी और इसके बाद हिंसक घटनाएं हुईं।हालांकि, मामले में अंतिम दोषसिद्धि अभी न्यायिक प्रक्रिया का विषय है और आरोपों पर अंतिम फैसला अदालत में मुकदमे के दौरान होगा।
हाईकोर्ट की टिप्पणी ने खींचा ध्यान
इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट की सबसे अहम टिप्पणी धार्मिक नारों और हिंसा के आह्वान के बीच अंतर को लेकर रही। अदालत ने कहा कि ऐसे नारों को केवल धार्मिक अभिव्यक्ति मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, यदि उनका स्वरूप कानून-व्यवस्था और देश की संप्रभुता के लिए चुनौती पैदा करता हो।
फिलहाल तौकीर रजा को हाईकोर्ट से जमानत नहीं मिली है। मामले में आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।
