बी के झा
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संभल (उत्तर प्रदेश) , 23 अगस्त
कभी दंगाइयों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का चेहरा रहे IPS कृष्ण कुमार (केके) बिश्नोई शनिवार को विदाई समारोह में भावनाओं के आगे खुद को रोक नहीं सके। संभल पुलिस लाइन में आयोजित समारोह में जैसे ही उन्होंने 24 नवंबर 2024 की संभल हिंसा और पुलिस बल के संघर्ष को याद किया, उनकी आंखें भर आईं।
पास बैठे जिलाधिकारी IAS अंकित खंडेलवाल ने तुरंत उन्हें पानी पिलाया, लेकिन यह दृश्य देखकर स्वयं डीएम भी भावुक हो गए।करीब 1 वर्ष 11 महीने तक संभल के पुलिस अधीक्षक रहे केके बिश्नोई का तबादला अब बिजनौर के पुलिस कप्तान के रूप में हुआ है।
“यह मेरी नहीं, पूरी संभल पुलिस की जीत थी”
अपने संबोधन में बिश्नोई ने कहा कि संभल हिंसा पर नियंत्रण किसी एक अधिकारी का नहीं, बल्कि पूरी पुलिस टीम के साहस, अनुशासन और समर्पण का परिणाम था। उन्होंने थाना प्रभारियों से लेकर जवानों तक सभी का आभार व्यक्त किया।विदाई के अंतिम क्षणों में उन्होंने मशहूर शेर पढ़ा—
“जहां रहेगा वहीं रौशनी लुटाएगा, किसी चराग का अपना मकां नहीं होता।
”यह शेर सुनते ही पूरा सभागार तालियों और भावनाओं से गूंज उठा।
पत्नी अंशिका वर्मा का भावुक संदेश
बरेली में एसपी साउथ के पद पर तैनात IPS अंशिका वर्मा, जो केके बिश्नोई की पत्नी हैं, ने इंस्टाग्राम स्टोरी पर उनकी तस्वीर साझा करते हुए लिखा—> “Always Proud of You! Best Wishes for the Next Assignment.”सोशल मीडिया पर यह संदेश हजारों लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गया और लोगों ने दोनों अधिकारियों की सार्वजनिक सेवा और आपसी सम्मान की सराहना की।
कैसे बने ‘सुपर कॉप’?
24 नवंबर 2024 की संभल हिंसा के बाद केके बिश्नोई ने कानून-व्यवस्था बहाल करने के लिए कई निर्णायक कदम उठाए:
हिंसा के फरार आरोपियों के पोस्टर सार्वजनिक स्थानों पर लगवाए।
शारिक साठा गैंग पर गैंगस्टर एक्ट के तहत कार्रवाई की।
जिले की सीमाओं पर 10 सुरक्षा बैरियर स्थापित किए।
39 नई पुलिस चौकियों का निर्माण कराया।
जामा मस्जिद क्षेत्र के पास सत्यव्रत पुलिस चौकी और जिला कंट्रोल रूम स्थापित कराया।
शहर में 250 से अधिक CCTV कैमरे लगवाकर इंटीग्रेटेड कमांड एंड कंट्रोल सेंटर विकसित कराया।
भविष्य की सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए ATS इकाई की स्थापना की पैरवी भी की।
एक अधिकारी की विदाई, एक अध्याय का अंत
प्रशासनिक गलियारों में केके बिश्नोई की विदाई केवल तबादले की औपचारिकता नहीं मानी जा रही, बल्कि उसे उस दौर के समापन के रूप में देखा जा रहा है जिसमें संभल ने हिंसा से कानून के राज तक का कठिन सफर तय किया।
विदाई समारोह का सबसे मार्मिक दृश्य वही रहा—एक सख्त पुलिस कप्तान की नम आंखें और उन्हें संभालते हुए जिलाधिकारी का मौन साथ।
यही तस्वीर अब संभल की यादों में लंबे समय तक दर्ज रहेगी।

