तीनों चुनाव आयुक्तों की ‘एक तस्वीर’ और मेज पर रखी छोटी-छोटी बोतलें… पानी की बोतलों की कीमत तक पहुंचीं सोशल मीडिया की चर्चा EC की फोटो ने छेड़ दी नई बहस, लेकिन असली सवाल तस्वीर से कहीं बड़ा

बी के झा

NSK news Ind

नई दिल्ली, 26 सितंबर

चुनाव आयोग के तीनों आयुक्त एक साथ बैठे हैं। सामने फाइलें हैं, बीच में टेबल है और टेबल पर रखी हैं छोटी-छोटी कांच की पानी की बोतलें। तस्वीर सामान्य होती, अगर इसके ठीक पहले निर्वाचन आयोग को लेकर SIR, आंतरिक असहमति और फैसलों की प्रक्रिया पर देशभर में बहस न छिड़ी होती।

शनिवार को नई दिल्ली स्थित निर्वाचन सदन में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की बैठक हुई। बैठक के बाद आयोग ने तीनों की साझा तस्वीर जारी की और SIR, मतदाता सूची तथा तकनीकी व्यवस्था से जुड़े कई मुद्दों पर अपना पक्ष स्पष्ट किया।

लेकिन सोशल मीडिया पर बैठक के फैसलों से ज्यादा लोगों की नजर टेबल पर रखी पानी की छोटी बोतलों पर टिक गई।यहीं से शुरू हुई एक नई बहस—क्या ये सिर्फ पानी की बोतलें हैं, या एक संवैधानिक संस्था की तस्वीर के बीच दिखने वाली छोटी-सी लेकिन दिलचस्प कहानी?

250 एमएल की बोतल, कीमत करीब ₹125

तस्वीर में दिखाई दे रही बोतलों को Aava ब्रांड से जोड़ा जा रहा है। कंपनी की अपनी वेबसाइट पर 250 एमएल की कांच की बोतलों का आठ बोतलों वाला पैक फिलहाल ₹999 में सूचीबद्ध है। इस हिसाब से एक बोतल की कीमत करीब ₹125 और एक लीटर की प्रभावी कीमत लगभग ₹500 बैठती है। हालांकि यहां एक जरूरी तथ्य यह है कि यह खुदरा/ऑनलाइन सूचीबद्ध कीमत है। किसी सरकारी बैठक में इस्तेमाल हुई बोतलों के लिए वास्तव में कितना भुगतान किया गया, किसने भुगतान किया या इन्हें किस मद में खरीदा गया—इसकी जानकारी तस्वीर से नहीं मिलती।

इसलिए केवल बोतल की कीमत देखकर किसी तरह की वित्तीय अनियमितता का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।

Aava क्या है?

Aava खुद को अरावली क्षेत्र से प्राप्त प्राकृतिक मिनरल वाटर ब्रांड के रूप में पेश करती है। कंपनी के अनुसार उसका पानी प्राकृतिक रूप से alkaline है और उसमें कैल्शियम, मैग्नीशियम, बाइकार्बोनेट तथा अन्य खनिज मौजूद हैं।

कंपनी 250 एमएल की कांच की बोतल को विशेष रूप से प्रीमियम होटल, कॉन्फ्रेंस, बोर्डरूम और आयोजनों के लिए इस्तेमाल होने वाला उत्पाद बताती है। यानी बोतल का महंगा होना अपने आप में कोई छिपी हुई बात नहीं है—कंपनी खुद इसे प्रीमियम/लक्जरी लाइफस्टाइल उत्पाद के तौर पर बाजार में रखती है।

लेकिन तस्वीर की असली कहानी पानी नहीं, ‘एकजुटता’ है

दिलचस्प बात यह है कि तीनों आयुक्तों की यह तस्वीर ऐसे समय सामने आई है जब निर्वाचन आयोग के भीतर कथित मतभेद को लेकर राजनीतिक तूफान मचा हुआ है।एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त एसएस संधू और विवेक जोशी ने पिछले दस महीनों में कम से कम 14 बार विभिन्न फैसलों पर लिखित आपत्तियां दर्ज कीं।

रिपोर्ट में SIR, मतदाता सूची में नाम जोड़ने-हटाने और तकनीकी नियंत्रण जैसे मुद्दों का उल्लेख किया गया। लेकिन निर्वाचन आयोग ने इन रिपोर्टों को अलग तरीके से पेश किया।आयोग का कहना है कि बहु-सदस्यीय संवैधानिक संस्था में अलग-अलग राय, सुझाव और टिप्पणियां आना सामान्य प्रक्रिया है और अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए।

यानी एक तरफ रिपोर्ट में दर्ज कथित आपत्तियां हैं और दूसरी तरफ आयोग का आधिकारिक स्पष्टीकरण।और इसी बीच आई तीनों आयुक्तों की साथ तस्वीर।यही वजह है कि तस्वीर को केवल तस्वीर मानकर नजरअंदाज करना भी मुश्किल है।

क्या EC ने तस्वीर के जरिए कोई संदेश दिया?

यह कहना कि आयोग ने जानबूझकर तस्वीर किसी राजनीतिक संदेश के लिए जारी की, बिना आधिकारिक पुष्टि के अनुमान होगा।लेकिन राजनीतिक संचार के नजरिए से तस्वीर का समय जरूर महत्वपूर्ण है।जब किसी संवैधानिक संस्था के भीतर मतभेद की खबरें सार्वजनिक हों और उसी के बाद उसके तीनों शीर्ष पदाधिकारी एक साथ दिखाई दें, तो स्वाभाविक रूप से यह संदेश जाता है कि संस्था अपने स्तर पर सामूहिक और संस्थागत निर्णय प्रक्रिया को रेखांकित करना चाहती है।आयोग ने इसी बैठक में अपने निर्णयों और प्रक्रियाओं को लेकर स्पष्टीकरण भी जारी किया।

विपक्ष का सवाल—“तस्वीर से सवाल खत्म नहीं होंगे

”विपक्षी दलों ने SIR और निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर पहले ही गंभीर सवाल उठाए हैं।कांग्रेस सहित कई विपक्षी नेताओं ने कथित 14 आपत्तियों वाली रिपोर्ट के बाद CEC ज्ञानेश कुमार पर सवाल उठाए और कार्रवाई की मांग की। कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी वाड्रा ने भी शनिवार को निर्वाचन आयोग पर तीखा हमला किया और CEC के इस्तीफे की मांग की। पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने SIR को लेकर आयोग पर आरोप लगाए और ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग दोहराई। उनके आरोपों को निर्वाचन आयोग ने स्वीकार नहीं किया है। विपक्षी दलों का व्यापक सवाल यह है कि मतदाता सूची में किसी भी पात्र नागरिक का नाम प्रभावित नहीं होना चाहिए और पूरी प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए।

भाजपा और सहयोगी पक्ष का तर्क—आयोग ने अपना पक्ष स्पष्ट कर दिया

भाजपा ने विपक्ष के आरोपों का विरोध किया है और कहा है कि आयोग के भीतर विचार-विमर्श को “विद्रोह” या “फूट” के रूप में पेश करना उचित नहीं है। भाजपा ने विपक्ष को संसद में प्रस्ताव लाने की चुनौती भी दी है।

TDP प्रमुख और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू ने भी निर्वाचन आयोग की नई सफाई का स्वागत करते हुए कहा कि इससे आयोग की प्रक्रिया को लेकर बनी गलतफहमियां दूर होती हैं। इस तरह तस्वीर को लेकर सोशल मीडिया पर चाहे जितनी चर्चा हो, राजनीतिक विवाद का मूल प्रश्न पानी की बोतल नहीं बल्कि चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया और SIR की पारदर्शिता है।

कानूनविदों के लिए बड़ा सवाल: असहमति और संस्थागत निर्णय में अंतर

कानूनी दृष्टि से किसी बहु-सदस्यीय संस्था में किसी सदस्य की टिप्पणी या आपत्ति और अंतिम संस्थागत निर्णय एक ही चीज नहीं होते।निर्वाचन आयोग स्वयं कह चुका है कि उसके सदस्य deliberations के दौरान अलग-अलग सुझाव दे सकते हैं, लेकिन अंतिम निर्णय आयोग के सामूहिक निर्णय होते हैं।

इसलिए असली कानूनी सवाल यह है कि—क्या दर्ज आपत्तियां अंतिम निर्णयों को प्रभावित करती थीं?

क्या किसी निर्णय को संबंधित आयुक्तों की जानकारी या सहमति के बिना जारी किया गया?

और यदि ऐसा हुआ तो उसकी संस्थागत जिम्मेदारी किसकी होगी?

इन सवालों का उत्तर केवल राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि संबंधित रिकॉर्ड और आधिकारिक दस्तावेज दे सकते हैं।

SIR पर सुप्रीम कोर्ट की निगाह भी महत्वपूर्ण

दिल्ली में SIR प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने भी चुनाव आयोग से “लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी” वाले नोटिसों के आधार और प्रक्रिया पर स्पष्टीकरण मांगा है। रिपोर्टों के अनुसार अदालत ने यह सवाल भी उठाया कि क्या कुछ नोटिस पर्याप्त व्यक्तिगत जांच के बिना जारी किए गए। शनिवार को आयोग ने SIR प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए कुछ बदलावों की घोषणा भी की, जिनमें पात्र मतदाताओं के लिए घर पर दस्तावेज लेने की व्यवस्था और कुछ मामलों में ऑनलाइन सुनवाई जैसी सुविधाएं शामिल हैं।

यानी चुनाव आयोग के सामने अब केवल राजनीतिक आलोचना नहीं, बल्कि प्रशासनिक पारदर्शिता और न्यायिक निगरानी से जुड़े सवाल भी मौजूद हैं।

एनएसके विश्लेषण:

बोतल छोटी है, बहस बहुत बड़ी

तीनों चुनाव आयुक्तों की तस्वीर में टेबल पर रखी 250 एमएल की बोतलें भले ही सोशल मीडिया का आकर्षण बन गई हों, लेकिन लोकतंत्र की मेज पर असली सवाल पानी का नहीं है।

असली सवाल है—मतदाता सूची कितनी शुद्ध है?

SIR कितना पारदर्शी है?

निर्वाचन आयोग के भीतर निर्णय कैसे लिए जाते हैं?

आयुक्तों की व्यक्तिगत आपत्तियों का संस्थागत रिकॉर्ड क्या है?

और सबसे महत्वपूर्ण—एक आम मतदाता को अपने वोट को लेकर कितना भरोसा होना चाहिए?

राजनीतिक दल अपने-अपने पक्ष रखेंगे।

सोशल मीडिया अपनी व्याख्या करेगा।

तस्वीरें वायरल होंगी और बयान सुर्खियां बनेंगे।

लेकिन चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था के लिए सबसे महत्वपूर्ण चीज छवि नहीं, संस्थागत विश्वास है।अगर आयोग कहता है कि तीनों आयुक्तों के अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से होते हैं, तो उस दावे को रिकॉर्ड और पारदर्शिता मजबूत कर सकते हैं।

अगर विपक्ष कथित आपत्तियों को लेकर सवाल उठा रहा है, तो उन सवालों का जवाब भी दस्तावेज और प्रक्रिया से ही दिया जाना चाहिए।

क्योंकि लोकतंत्र में बोतल की कीमत पर बहस कुछ घंटों की हो सकती है, लेकिन मतदाता के भरोसे की कीमत तय नहीं की जा सकती।

और यही इस वायरल तस्वीर के पीछे छिपा सबसे बड़ा सवाल है।

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