बी के झा
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मुंबई/नई दिल्ली, 27 सितंबर
चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर देश की राजनीति में जारी टकराव अब व्यक्तिगत हमलों तक पहुंच गया है।
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी के ‘वोट चोरी’ संबंधी आरोपों पर बेहद तीखा और व्यंग्यात्मक पलटवार किया है।फडणवीस ने कहा कि “वोट चोरी नहीं हुई, राहुल गांधी का दिमाग चोरी हो गया है।
” उन्होंने यहां तक तंज कसा कि प्रधानमंत्री को एक समिति बनानी चाहिए, जो राहुल गांधी का ‘दिमाग’ ढूंढकर वापस लाए, ताकि वह देशहित और सच की बात कर सकें।
फडणवीस का यह बयान ऐसे समय आया है जब चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, SIR और मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष आमने-सामने हैं।
‘संवैधानिक संस्थाओं पर भरोसा कमजोर करना रणनीति’
फडणवीस ने राहुल गांधी के चुनाव आयोग पर लगाए जा रहे आरोपों को केवल राजनीतिक आलोचना नहीं, बल्कि संवैधानिक संस्थाओं पर जनता के विश्वास से जुड़ा मुद्दा बताया।उनका आरोप है कि राहुल गांधी संविधान को सामने रखकर उन्हीं संस्थाओं पर सवाल खड़े कर रहे हैं जो संविधान और कानून के तहत काम करती हैं।
फडणवीस ने चुनाव आयोग के अलावा सुप्रीम कोर्ट, भारतीय रिजर्व बैंक और नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी CAG जैसी संस्थाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि ऐसी संस्थाओं के प्रति लगातार संदेह पैदा करने से अंततः लोकतांत्रिक व्यवस्था पर लोगों का भरोसा प्रभावित हो सकता है।
उन्होंने सवाल उठाया कि क्या डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर द्वारा निर्मित संवैधानिक व्यवस्था इतनी कमजोर है कि उसके तहत बनाई गई संस्थाओं को खत्म किया जा सके।यह फडणवीस का राजनीतिक आकलन है।
दूसरी ओर विपक्ष का तर्क है कि संवैधानिक संस्थाओं से सवाल पूछना लोकतांत्रिक जवाबदेही का हिस्सा है और चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता से जुड़े प्रश्नों का उत्तर देना संस्थाओं की जिम्मेदारी है।
‘दिमाग चोरी’ वाला बयान क्यों बना सुर्खियों में?
फडणवीस का बयान इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि उन्होंने राहुल गांधी के ‘वोट चोरी’ के आरोप का जवाब उसी शब्दावली को पलटकर दिया।
राहुल गांधी चुनावी प्रक्रिया और मतदाता सूची में कथित अनियमितताओं को लेकर ‘वोट चोरी’ का मुद्दा उठा रहे हैं। फडणवीस ने इसी आरोप को खारिज करते हुए कहा कि चोरी वोट की नहीं, बल्कि राहुल गांधी के ‘दिमाग’ की हुई है।इसके बाद उन्होंने प्रधानमंत्री से कथित तौर पर ऐसी समिति बनाने का तंज किया जो राहुल गांधी का ‘दिमाग’ खोज सके।
राजनीतिक भाषणों में इस तरह के व्यंग्यात्मक हमले नए नहीं हैं, लेकिन इस बयान ने SIR जैसे संस्थागत और चुनावी मुद्दे को व्यक्तिगत राजनीतिक बयानबाजी के केंद्र में ला दिया है।
SIR विवाद के बीच क्यों महत्वपूर्ण है फडणवीस का हमला?
इस पूरे विवाद की पृष्ठभूमि में चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर सामने आई एक रिपोर्ट है। 23 सितंबर को द इंडियन एक्सप्रेस ने रिपोर्ट प्रकाशित की कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने अक्टूबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच आयोग के कुछ फैसलों और आदेशों पर कम से कम 14 बार आपत्तियां दर्ज की थीं।
रिपोर्ट में SIR, मतदाता नाम हटाने और चुनावी डेटा के प्रबंधन सहित कई मुद्दों का उल्लेख किया गया।इस रिपोर्ट के बाद विपक्ष ने चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर सवाल उठाए। लेकिन चुनाव आयोग ने इन आरोपों की एक अलग तस्वीर पेश की।
आयोग ने कहा कि सदस्यों द्वारा सुझाव, सवाल या आपत्तियां दर्ज करना संस्थागत निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा है और अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए।
26 सितंबर को चुनाव आयोग ने क्या कहा?
विवाद बढ़ने के बाद 26 सितंबर को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू तथा विवेक जोशी ने पूर्ण आयोग की बैठक की।इसके बाद चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रव्यापी SIR को लेकर आदेश सहित प्रमुख फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की सर्वसम्मत मंजूरी से लिए गए थे। आयोग ने यह भी कहा कि मतदाता सूची में नाम शामिल करने के लिए इस्तेमाल होने वाले Form 6 में किए गए बदलावों को सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा है।
यानी इस समय विवाद के दो महत्वपूर्ण पक्ष हैं—रिपोर्ट का दावा: दो चुनाव आयुक्तों ने कई फैसलों पर आपत्तियां दर्ज कीं।
चुनाव आयोग का पक्ष: ये विचार-विमर्श और प्रक्रियागत सवाल थे; अंतिम फैसले सर्वसम्मति से हुए।इन दोनों बातों को एक ही अर्थ मानना उचित नहीं होगा।
फडणवीस बोले—‘SIR पर तीनों की सहमति थी’
फडणवीस ने चुनाव आयोग के स्पष्टीकरण को अपने तर्क का आधार बनाया।उनका कहना है कि जिस रिपोर्ट के आधार पर विवाद खड़ा हुआ, उसमें चुनाव आयोग के अंतिम निर्णय के खिलाफ किसी स्पष्ट असहमति का प्रमाण नहीं था।उन्होंने कहा कि तीनों चुनाव आयुक्तों ने एक साथ सामने आकर स्थिति स्पष्ट कर दी है और SIR का निर्णय सामूहिक था।
चुनाव आयोग ने भी अपने बयान में कहा है कि अलग-अलग स्तर पर राय या सुझाव होना सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा है, लेकिन आयोग के अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए।
‘चौकीदार चोर है’ से लेकर SIR तक—फडणवीस ने पुराने विवाद भी गिनाए
फडणवीस ने राहुल गांधी की मौजूदा राजनीति को उनके पुराने बयानों और विवादों से जोड़ने की कोशिश की।उन्होंने ‘चौकीदार चोर है’ नारे और उससे जुड़े सुप्रीम कोर्ट के घटनाक्रम का उल्लेख किया।
राहुल गांधी ने 2019 में राफेल मामले में अपने ‘चौकीदार चोर है’ संबंधी बयान को लेकर सुप्रीम कोर्ट में खेद व्यक्त किया था।फडणवीस ने इसके साथ राहुल गांधी के सेना और सर्जिकल स्ट्राइक से जुड़े पुराने बयानों का भी उल्लेख किया और आरोप लगाया कि कांग्रेस नेता लगातार ऐसी संस्थाओं पर सवाल उठाते रहे हैं जिन पर देश की व्यवस्था निर्भर करती है।
हालांकि, इन घटनाओं की राजनीतिक व्याख्या पर BJP और कांग्रेस के दृष्टिकोण अलग-अलग रहे हैं।
पश्चिम बंगाल चुनाव का उदाहरण देकर फडणवीस का सवाल
SIR पर विपक्ष के आरोपों का जवाब देते हुए फडणवीस ने पश्चिम बंगाल का उदाहरण भी दिया।उनका सवाल था कि यदि SIR के जरिए भाजपा-विरोधी मतदाताओं के नाम हटाए गए थे, जैसा विपक्ष आरोप लगाता है, तो उन क्षेत्रों में तृणमूल कांग्रेस चुनाव कैसे जीत पाई?
यह फडणवीस द्वारा प्रस्तुत राजनीतिक तर्क है। इससे अपने आप मतदाता सूची में नाम हटने या न हटने का सांख्यिकीय निष्कर्ष नहीं निकलता।
चुनाव आयोग की प्रक्रिया में राजनीतिक दलों को बूथ लेवल एजेंट के माध्यम से मतदाता सूची की जांच और आपत्तियां दर्ज कराने की व्यवस्था उपलब्ध है। इसी प्रक्रिया का उल्लेख करते हुए फडणवीस ने कहा कि राजनीतिक दलों को मतदाता सूची के नामों पर आपत्ति दर्ज कराने का अधिकार है।
राहुल गांधी का सवाल बनाम फडणवीस का जवाब
पूरे विवाद को यदि दो राजनीतिक दावों में समेटें तो तस्वीर कुछ इस तरह बनती है—राहुल गांधी का आरोप: मतदाता सूची और चुनावी प्रक्रिया में गंभीर सवाल हैं और ‘वोट चोरी’ की जांच होनी चाहिए।
फडणवीस का पलटवार: वोट चोरी का आरोप निराधार है और विपक्ष संवैधानिक संस्थाओं के प्रति जनता का विश्वास कमजोर कर रहा है।
चुनाव आयोग का पक्ष: SIR से जुड़े अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए।
रिपोर्ट में सामने आया तथ्य: दो चुनाव आयुक्तों ने विभिन्न चरणों में कुछ फैसलों/प्रक्रियाओं पर आपत्तियां या चिंताएं दर्ज की थीं।
यही वह बिंदु है जहां राजनीतिक आरोपों और संस्थागत तथ्यों को अलग-अलग देखना जरूरी हो जाता है।
असली बहस ‘दिमाग’ पर नहीं, मतदाता सूची पर है
फडणवीस का ‘दिमाग चोरी’ वाला बयान राजनीतिक रूप से तीखा जरूर है, लेकिन SIR विवाद का मूल प्रश्न इससे अलग है।
मूल प्रश्न यह है कि मतदाता सूची कितनी सटीक है?
किसी मतदाता का नाम हटता है तो उसके पास क्या प्रक्रिया है?
नए मतदाता का नाम जोड़ने की व्यवस्था कितनी सरल है?
राजनीतिक दलों को आपत्तियां दर्ज कराने और सत्यापन की कितनी प्रभावी व्यवस्था उपलब्ध है?
और सबसे महत्वपूर्ण—चुनाव आयोग अपने निर्णयों और डेटा प्रबंधन को लेकर कितनी पारदर्शिता उपलब्ध कराता है?
इन प्रश्नों का उत्तर व्यक्तिगत राजनीतिक कटाक्ष से नहीं, बल्कि दस्तावेज, प्रक्रिया, आंकड़े और संस्थागत जवाबदेही से मिलेगा।
संवैधानिक संस्थाओं पर सवाल उठाना बनाम संस्थाओं की जवाबदेही
फडणवीस ने संवैधानिक संस्थाओं पर जनता का भरोसा बनाए रखने की बात कही है।यह लोकतांत्रिक व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण प्रश्न है।लेकिन उसी के साथ दूसरा सिद्धांत भी उतना ही महत्वपूर्ण है—संवैधानिक संस्थाएं जनता के प्रति जवाबदेह भी होती हैं।
चुनाव आयोग की स्वतंत्रता लोकतंत्र की बुनियादी जरूरत है, लेकिन चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता और मतदाता के अधिकार भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।
इसलिए चुनाव आयोग पर सवाल उठाना अपने आप में संस्थाओं को कमजोर करना नहीं कहा जा सकता। सवाल यह है कि आरोप प्रमाण पर आधारित हैं या नहीं और संस्था उन सवालों का किस तरह जवाब देती है।
वर्तमान विवाद में आयोग ने अपना पक्ष सार्वजनिक रूप से रखा है और विपक्ष अब भी उन स्पष्टीकरणों से संतुष्ट नहीं है।
राजनीतिक कटाक्ष जितना तीखा, मुद्दे की गंभीरता उतनी ही बड़ी
राहुल गांधी का ‘वोट चोरी’ अभियान हो या फडणवीस का ‘दिमाग चोरी’ वाला तंज—दोनों ही बयान राजनीतिक ध्रुवीकरण को तेज करते हैं।लेकिन चुनाव लोकतंत्र की ऐसी प्रक्रिया है जिसमें अंतिम शक्ति राजनीतिक दलों से ज्यादा मतदाता के पास होती है।
इसलिए मतदाता सूची से जुड़े किसी भी विवाद का समाधान राजनीतिक मंच पर आरोप-प्रत्यारोप से ज्यादा महत्वपूर्ण है।
जरूरत है कि जिन नामों को हटाने या जोड़ने पर सवाल हैं, उनके आंकड़े सामने आएं;
जिन प्रक्रियाओं पर आपत्ति है,
उनकी स्पष्ट व्याख्या हो; और जहां किसी मतदाता के अधिकार प्रभावित हुए हों, वहां प्रभावी सुधार का रास्ता उपलब्ध हो।
निष्कर्ष:
‘वोट चोरी’ बनाम ‘दिमाग चोरी’ से आगे भी है लोकतंत्र का असली सवाल
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने राहुल गांधी के आरोपों का जवाब बेहद तीखे व्यंग्य के साथ दिया है। उनका ‘दिमाग चोरी’ वाला बयान अब राजनीतिक बहस का नया हथियार बन चुका है।
लेकिन SIR का विवाद इससे कहीं बड़ा है।
एक तरफ विपक्ष चुनावी प्रक्रिया और मतदाता सूची को लेकर सवाल उठा रहा है।
दूसरी तरफ चुनाव आयोग कह रहा है कि उसके अंतिम फैसले सर्वसम्मति से हुए हैं।
रिपोर्टों में दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों का उल्लेख है, जबकि आयोग उन्हें निर्णय प्रक्रिया के सामान्य हिस्से के रूप में देख रहा है।
इसलिए आने वाले दिनों में असली राजनीतिक लड़ाई शायद इस बात पर नहीं होगी कि ‘दिमाग किसका चोरी हुआ’, बल्कि इस बात पर होगी कि मतदाता सूची में क्या बदला, क्यों बदला, किसके नाम जुड़े, किसके नाम हटे और उस पूरी प्रक्रिया का सार्वजनिक प्रमाण क्या है।
क्योंकि लोकतंत्र में सबसे महत्वपूर्ण सवाल न ‘वोट चोरी’ का नारा है, न ‘दिमाग चोरी’ का तंज।
सबसे महत्वपूर्ण सवाल है—मतदाता का वोट सुरक्षित है या नहीं, और चुनावी प्रक्रिया पर जनता का भरोसा तथ्यों और पारदर्शिता से कैसे कायम रखा जाए?
एनएसके
विशेष रिपोर्ट
