परिसीमन पर निर्णायक दांव! विशेष सत्र की आहट से तेज हुई सियासत, 850 सीटों वाले नए लोकसभा मॉडल पर सरकार-विपक्ष आमने-सामने, सरकार सहमति बनाने में जुटी, विपक्ष ने पहले ही विरोध के संकेत दिए

बी के झा

नई दिल्ली, 5 अगस्त

देश की राजनीति एक बार फिर परिसीमन (Delimitation) के मुद्दे पर निर्णायक मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है। संसद के मानसून सत्र में जारी गतिरोध के बीच सरकार और विपक्ष के बीच संवाद की नई पहल ने राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है। सूत्रों के अनुसार संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के बीच हुई लंबी बैठक में संभावित विशेष सत्र और परिसीमन विधेयक पर विस्तार से चर्चा हुई।

सरकारी सूत्रों का दावा है कि 15 अगस्त के बाद, 16 से 18 अगस्त के बीच विशेष सत्र बुलाने पर गंभीर विचार चल रहा है, जिसमें सरकार परिसीमन से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक को चर्चा के बाद पारित कराने का प्रयास कर सकती है। हालांकि, इस संबंध में सरकार की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है।

सहमति बनाने की कवायद तेज

सूत्रों के अनुसार सरकार इस संवेदनशील विषय पर राजनीतिक सहमति बनाने के लिए बहुस्तरीय संवाद चला रही है। किरेन रिजिजू को कांग्रेस नेतृत्व से बातचीत की जिम्मेदारी दी गई है, जबकि केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी, पीयूष गोयल, अर्जुन राम मेघवाल और एस. मुरुगन अन्य विपक्षी दलों के नेताओं से संपर्क साध रहे हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि सरकार व्यापक सहमति के साथ विधेयक लाती है तो यह केवल संसदीय प्रक्रिया नहीं बल्कि भारतीय लोकतंत्र की संरचना में सबसे बड़े बदलावों में से एक साबित हो सकता है।

एफसीआरए संशोधन विधेयक भी एजेंडे में

सूत्रों का कहना है कि सरकार अगले सप्ताह Foreign Contribution (Regulation) Amendment Bill, 2026 भी संसद में पेश करने की तैयारी कर रही है। ऐसे में संभावना है कि विशेष सत्र का एजेंडा केवल परिसीमन तक सीमित न रहकर कई महत्वपूर्ण विधेयकों पर केंद्रित हो।

कांग्रेस का रुख स्पष्ट

कांग्रेस पहले ही संकेत दे चुकी है कि वह परिसीमन विधेयक का विरोध करेगी। मानसून सत्र से पहले कांग्रेस संसदीय दल की बैठक में निर्णय लिया गया था कि यदि सरकार यह विधेयक लाती है तो पार्टी इसका विरोध करेगी।विपक्षी दलों का तर्क है कि 2026 के बाद होने वाली जनगणना के आंकड़ों और राज्यों की जनसंख्या में असमान वृद्धि को देखते हुए परिसीमन दक्षिण और जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों के प्रतिनिधित्व को प्रभावित कर सकता है।

उनका कहना है कि इस विषय पर जल्दबाजी के बजाय सर्वदलीय सहमति और विस्तृत विमर्श आवश्यक है।

आखिर क्या है परिसीमन?

परिसीमन का अर्थ है जनसंख्या के आधार पर संसदीय और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण। सरकार का प्रस्ताव महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करने और बढ़ती जनसंख्या के अनुरूप प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के उद्देश्य से सांसदों और विधायकों की संख्या बढ़ाने से जुड़ा बताया जा रहा है।सूत्रों के अनुसार प्रस्तावित संशोधन के बाद लोकसभा की कुल सदस्य संख्या 543 से बढ़कर लगभग 850 हो सकती है, जिसमें 815 सीटें राज्यों तथा 35 सीटें केंद्रशासित प्रदेशों के लिए निर्धारित की जा सकती हैं। इसके लिए संविधान के अनुच्छेद 81 में संशोधन आवश्यक होगा।

संविधान विशेषज्ञ क्या कहते हैं?

संविधान विशेषज्ञों का मानना है कि परिसीमन केवल सीटों की संख्या बढ़ाने का मामला नहीं है, बल्कि यह संघीय ढांचे, राज्यों के प्रतिनिधित्व और लोकतांत्रिक संतुलन से जुड़ा अत्यंत संवेदनशील विषय है।उनके अनुसार यदि परिसीमन केवल जनसंख्या के आधार पर किया गया तो उत्तर और दक्षिण भारत के बीच राजनीतिक प्रतिनिधित्व का संतुलन बदल सकता है। इसलिए इस प्रक्रिया में संविधान की मूल भावना—समान प्रतिनिधित्व और संघीय संतुलन—दोनों का ध्यान रखना होगा।

राजनीतिक विश्लेषकों की राय

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि सरकार इस विधेयक को महिला आरक्षण लागू करने की दिशा में अगला बड़ा कदम बताकर राजनीतिक समर्थन जुटाने की कोशिश करेगी, जबकि विपक्ष इसे राजनीतिक प्रतिनिधित्व के पुनर्संतुलन का मुद्दा बनाकर जनता के बीच ले जा सकता है।विश्लेषकों का यह भी मानना है कि यदि यह विधेयक पारित होता है तो आने वाले लोकसभा और विधानसभा चुनावों की राजनीतिक रणनीति, सीटों का गणित और गठबंधन की राजनीति पूरी तरह बदल सकती है।

सामाजिक संगठनों की प्रतिक्रिया

लोकतांत्रिक सुधारों पर काम करने वाले कई सामाजिक संगठनों और नागरिक समूहों का मत है कि परिसीमन प्रक्रिया पारदर्शी, वैज्ञानिक और राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त होनी चाहिए। उनका सुझाव है कि सभी राज्यों, राजनीतिक दलों, संवैधानिक विशेषज्ञों और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों को विश्वास में लेकर ही अंतिम निर्णय लिया जाए, ताकि भविष्य में किसी प्रकार का संवैधानिक या राजनीतिक विवाद उत्पन्न न हो।

सरकार का पक्ष

सरकार का मानना है कि देश की बढ़ती आबादी के अनुपात में जनप्रतिनिधियों की संख्या बढ़ाना समय की आवश्यकता है। सरकार का तर्क है कि इससे संसद में नागरिकों का प्रतिनिधित्व बेहतर होगा तथा महिला आरक्षण को प्रभावी ढंग से लागू करने का रास्ता भी प्रशस्त होगा।

आगे क्या?

अब राजनीतिक निगाहें सरकार के अगले कदम पर टिकी हैं। यदि अगस्त के मध्य में विशेष सत्र बुलाया जाता है तो परिसीमन विधेयक स्वतंत्र भारत के संसदीय इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक बहसों में शामिल हो सकता है। सरकार इसे लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व का नया अध्याय बता रही है, जबकि विपक्ष इसे संघीय ढांचे और राज्यों के अधिकारों से जुड़ा गंभीर विषय मानते हुए व्यापक राष्ट्रीय सहमति की मांग कर रहा है।

फिलहाल इतना स्पष्ट है कि परिसीमन का प्रश्न केवल सीटों की संख्या बढ़ाने का नहीं, बल्कि भारत के भविष्य के राजनीतिक मानचित्र, संघीय संतुलन और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व की नई परिभाषा तय करने का प्रश्न बन चुका है।

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