जब एक विधायक के सामने बैठा पूरा सिस्टम! चीफ सेक्रेटरी से DGP तक एक टेबल पर… बांकीपुर की जीत के बाद प्रशांत किशोर ने दिखाई कैसी ‘पावर’? पटना की सड़क, पानी, नाली और ट्रैफिक से शुरू हुई PK की नई पारी

बी के झा

NSK news Ind

पटना, 28 अगस्त

राजनीति में कुछ तस्वीरें बोलती नहीं हैं, लेकिन बहुत कुछ कह जाती हैं।पटना में गुरुवार को ऐसी ही एक तस्वीर बनी।एक तरफ बांकीपुर के नवनिर्वाचित विधायक प्रशांत किशोर थे और दूसरी तरफ बिहार की प्रशासनिक मशीनरी के शीर्ष चेहरे। टेबल पर मुख्य सचिव प्रत्यय अमृत, डीजीपी विनय कुमार, परिवहन और नगर विकास विभाग के वरिष्ठ अधिकारी, पटना नगर निगम के कमिश्नर समेत कई बड़े अफसर मौजूद थे।

सवाल उठना स्वाभाविक था—एक विधायक के सामने बिहार का इतना बड़ा प्रशासनिक अमला क्यों बैठा था?

क्या यह महज एक प्रशासनिक बैठक थी?

या फिर बांकीपुर की चुनावी जीत के बाद प्रशांत किशोर ने बिहार की राजनीति को यह संदेश दे दिया है कि अब वह सिर्फ चुनाव लड़ने नहीं, बल्कि व्यवस्था को चुनौती देने और उससे जवाब मांगने की भूमिका में आ गए हैं?

यही वह सवाल है, जिसने पटना के राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है–जिस सीट को बीजेपी का किला कहा जाता था, वहां PK ने इतिहास लिख दिया

प्रशांत किशोर की कहानी को समझने के लिए बांकीपुर की कहानी समझनी होगी।

बांकीपुर कोई सामान्य विधानसभा सीट नहीं थी।

यह लंबे समय तक बीजेपी का मजबूत राजनीतिक गढ़ रही।

नितिन नवीन लगातार पांच बार यहां से विधायक रहे।

उनसे पहले उनके पिता भी चार बार इस सीट का प्रतिनिधित्व कर चुके थे।

यानी इस सीट पर सिर्फ एक पार्टी नहीं, बल्कि एक राजनीतिक विरासत की पकड़ थी

फिर चुनाव आया।

प्रशांत किशोर मैदान में उतरे।

नतीजा आया तो राजनीतिक गणित बदल चुका था।

उन्होंने बीजेपी प्रत्याशी नीरज कुमार सिन्हा को करीब 19 हजार मतों के अंतर से हराया।

जन सुराज का विधानसभा में खाता खुला।

लेकिन असली कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।

यहीं से शुरू हुई—जीत के बाद माला नहीं, फाइलों की तरफ मुड़े प्रशांत किशोर

आमतौर पर चुनाव जीतने के बाद राजनीति में जश्न दिखाई देता है।

बधाइयां होती हैं।

समर्थकों की भीड़ होती है।

जीत का श्रेय लेने की होड़ होती है।

लेकिन प्रशांत किशोर ने जीत के बाद पटना की समस्याओं को लेकर प्रशासनिक अधिकारियों के साथ बैठक का रास्ता चुना।और यह बैठक भी ऐसी कि उसमें राज्य के मुख्य सचिव और डीजीपी तक मौजूद रहे।यह दृश्य इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि प्रशांत किशोर अब सिर्फ जन सुराज के सूत्रधार नहीं हैं।

अब उनके पास जनता का दिया हुआ संवैधानिक जनादेश है।और यही जनादेश उन्हें प्रशासन के सामने जनता की समस्याएं रखने का अधिकार और राजनीतिक ताकत देता है।-

PK की ‘चार्जशीट’ में पटना की रोजमर्रा की जिंदगी

प्रशांत किशोर ने अधिकारियों के सामने कोई ऐसी सूची नहीं रखी जिसे सिर्फ राजनीतिक भाषणों में सुनाया जाए।

मुद्दे सीधे जनता की जिंदगी से जुड़े थे।

ट्रैफिक।

पानी।

नाली।

सड़क।

स्ट्रीट लाइट।

वेंडिंग जोन।

ड्रेनेज।

राशन।

यानी वह समस्याएं जिनसे पटना का आम आदमी रोज गुजरता है।

शहर में जाम लगता है तो सबसे पहले नौकरीपेशा व्यक्ति परेशान होता है।

पानी नहीं आता तो सबसे ज्यादा परेशानी उस परिवार को होती है जो रोजमर्रा की जरूरतों के लिए सरकारी व्यवस्था पर निर्भर है।

बारिश में नाली भरती है तो सबसे पहले मोहल्ले का गरीब और मध्यमवर्गीय परिवार प्रभावित होता है।

स्ट्रीट लाइट खराब होती है तो सुरक्षा का सवाल खड़ा होता है।

यही वजह है कि पीके का एजेंडा राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण है।

उन्होंने बड़े-बड़े नारों के बजाय छोटी लेकिन चुभने वाली समस्याओं को राजनीति के केंद्र में रखा है।-

पटना का ट्रैफिक: सिर्फ जाम नहीं, विकास की परीक्षा

पटना का ट्रैफिक लंबे समय से शहर की सबसे बड़ी परेशानियों में शामिल है।प्रशांत किशोर ने इसके लिए इंटर-डिपार्टमेंटल वर्कशॉप आयोजित करने और आईआईटी जैसे संस्थानों तथा विशेषज्ञों की मदद लेने की बात कही है।यहां एक महत्वपूर्ण बात है।

अगर ट्रैफिक की समस्या का समाधान सिर्फ पुलिस की ड्यूटी बढ़ाकर किया जा सकता, तो शायद समस्या कब की खत्म हो चुकी होती।

सवाल सड़क की क्षमता का है।

शहर की बढ़ती आबादी का है।

पार्किंग का है।

वेंडिंग जोन का है।

सार्वजनिक परिवहन का है।

सड़कों की डिजाइन और भविष्य की जरूरतों का है।

इसलिए पीके का ‘फ्यूचरिस्टिक प्लान’ अगर वास्तव में जमीन पर उतरता है तो यह बांकीपुर की सीमा से बाहर निकलकर पूरे पटना के लिए मॉडल बन सकता है।

—लेकिन जनता को भाषण नहीं, नतीजा चाहिए

यहीं प्रशांत किशोर की सबसे बड़ी परीक्षा शुरू होती है।अधिकारियों के साथ बैठक हो गई।

समस्याओं की सूची बन गई।

वर्कशॉप की बात हो गई।

योजना तैयार करने की बात हो गई।

लेकिन पटना का आम नागरिक आखिर पूछेगा क्या?

जाम कब कम होगा?

नल में पानी कब आएगा?

नाली कब साफ होगी?

सड़क कब बनेगी?

स्ट्रीट लाइट कब जलेगी?

यही वह जगह है जहां राजनीति का कैमरा बंद हो जाता है और जनप्रतिनिधि की असली परीक्षा शुरू होती है।अगर इन सवालों का जवाब आने वाले दिनों में जमीन पर दिखाई देता है, तो प्रशांत किशोर की यह पहल उनकी राजनीतिक पहचान का सबसे मजबूत अध्याय बन सकती है।-

–बिहार सरकार के लिए भी यह आसान परिस्थिति नहीं

इस पूरे घटनाक्रम का दूसरा पहलू बिहार सरकार से जुड़ा है।सरकार के लिए किसी निर्वाचित विधायक के साथ संवाद करना लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है।लेकिन राजनीति में हर प्रशासनिक बैठक का एक राजनीतिक अर्थ भी होता है।अगर सरकार पीके द्वारा उठाए गए मुद्दों पर तेजी से काम करती है तो उसका फायदा जनता को मिलेगा, लेकिन राजनीतिक श्रेय लेने की कोशिश भी होगी।

और अगर काम नहीं होता तो प्रशांत किशोर के पास सरकार को घेरने के लिए एक तैयार मंच होगा। यानी दोनों रास्तों में पीके के पास राजनीति करने की जमीन मौजूद है।यही उनकी रणनीति की खासियत हो सकती है।

विपक्ष के सामने भी नया सवाल

बिहार का पारंपरिक विपक्ष भी इस घटनाक्रम को नजरअंदाज नहीं कर सकता।क्योंकि प्रशांत किशोर अगर सिर्फ सरकार की आलोचना करते तो उन्हें एक और विपक्षी आवाज कहा जा सकता था।लेकिन वह प्रशासन के साथ बैठकर समस्याओं के समाधान की बात कर रहे हैं।यही फर्क उन्हें अलग राजनीतिक पहचान देने की कोशिश कर सकता है।

विपक्ष के लिए सवाल है—क्या वह पीके की इस सक्रियता को चुनौती देगा?

या जनता की समस्याओं के समाधान की दौड़ में खुद को उनके बराबर खड़ा करेगा? क्योंकि राजनीति में खाली जगह ज्यादा देर तक खाली नहीं रहती।-

–स्थानीय नागरिकों की उम्मीद भी बढ़ी, निगाहें भी

बांकीपुर के लोगों के लिए यह घटनाक्रम सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है।जिस विधायक को उन्होंने चुना है, वह अगर राजधानी की समस्याओं को राज्य के सबसे बड़े अधिकारियों के सामने रखता है तो उम्मीद पैदा होना स्वाभाविक है।लेकिन उम्मीद के साथ निगाह भी होगी।स्थानीय नागरिक अब यह देखेंगे कि बैठक के बाद क्या बदला।

क्या सिर्फ अफसरों की बैठक हुई या मोहल्ले की जिंदगी भी बदलेगी?‌ क्योंकि जनता अब उस दौर से आगे बढ़ चुकी है जहां केवल आश्वासन से संतोष हो जाए।

शिक्षाविदों की नजर में बदलती राजनीति का संकेत

शिक्षाविदों और लोकतांत्रिक शासन के विशेषज्ञों के लिए यह घटनाक्रम एक बड़े प्रयोग की तरह देखा जा सकता है।भारतीय लोकतंत्र में विधायक जनता और सरकार के बीच महत्वपूर्ण कड़ी है।लेकिन आम धारणा यह रही है कि विधायक विधानसभा में सवाल उठाता है, अधिकारियों को पत्र लिखता है और क्षेत्रीय समस्याओं के लिए सरकार से आग्रह करता है।

प्रशांत किशोर का तरीका इससे कुछ अलग दिखाई देता है।वह सीधे समस्या को शीर्ष प्रशासनिक स्तर तक ले जाने की कोशिश कर रहे हैं।अगर यह व्यवस्था संस्थागत संवाद में बदलती है तो इसका लाभ सिर्फ एक विधायक को नहीं, बल्कि दूसरे जनप्रतिनिधियों को भी मिल सकता है।लेकिन यदि यह सिर्फ किसी व्यक्ति के राजनीतिक प्रभाव तक सीमित रह गई तो इसका असर उतना व्यापक नहीं होगा।

कानूनविदों की नजर में असली सीमा भी समझनी होगी

यहां एक संवैधानिक तथ्य को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।विधायक जनता की आवाज उठा सकता है, सरकार से जवाब मांग सकता है और प्रशासन के सामने समस्याएं रख सकता है, लेकिन उसके पास प्रशासनिक अधिकारियों को उसी तरह कार्यकारी आदेश देने की शक्ति नहीं होती जैसी सरकार और सक्षम प्रशासनिक पदाधिकारियों के पास होती है।

इसलिए प्रशांत किशोर के लिए भी असली चुनौती यही होगी कि जनप्रतिनिधि की ताकत और कार्यपालिका की संवैधानिक सीमा के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।यही संतुलन उनकी राजनीति को परिपक्वता देगा।

समाजसेवी संगठनों के लिए भी यह उम्मीद का क्षण

पटना में लंबे समय से नागरिक सुविधाओं से जुड़े मुद्दों पर काम करने वाले सामाजिक समूहों के लिए यह पहल इसलिए महत्वपूर्ण हो सकती है क्योंकि पहली बार समस्याओं को तकनीकी और प्रशासनिक समाधान से जोड़ने की बात सामने आ रही है।यदि ट्रैफिक के लिए तकनीकी संस्थानों की मदद ली जाती है, जलनिकासी के लिए वैज्ञानिक समाधान तैयार होते हैं और शहरी नियोजन को भविष्य की जरूरतों से जोड़ा जाता है, तो राजनीति सिर्फ आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़ सकती है।

लेकिन इसके लिए पारदर्शिता, समयसीमा और जनता की भागीदारी जरूरी होगी। और यहीं से प्रशांत किशोर की असली ‘पावर’ तय होगी

मुख्य सचिव के सामने बैठना शक्ति का प्रतीक हो सकता है।

डीजीपी की मौजूदगी राजनीतिक चर्चा का विषय बन सकती है।

छह बड़े अधिकारियों के साथ बैठक सुर्खियां बना सकती है।

लेकिन लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि की सबसे बड़ी ताकत किसी अधिकारी की मौजूदगी नहीं होती।उसकी सबसे बड़ी ताकत जनता का भरोसा होती है।

बांकीपुर ने प्रशांत किशोर को वह भरोसा दिया है।अब देखना यह है कि वह उस भरोसे को कितनी दूर तक ले जाते हैं।

यह सिर्फ बांकीपुर की कहानी नहीं हैअगर प्रशांत किशोर अपने क्षेत्र की समस्याओं को समयबद्ध तरीके से हल कराने में सफल होते हैं तो यह प्रयोग बांकीपुर से निकलकर पूरे बिहार की राजनीति को प्रभावित कर सकता है।

दूसरे विधायक भी पूछ सकते हैं—अगर एक विधायक मुख्य सचिव और डीजीपी के साथ बैठकर अपने क्षेत्र की समस्या रख सकता है, तो बाकी जनप्रतिनिधि ऐसा क्यों नहीं कर सकते?

और यही सवाल आने वाले दिनों में बिहार की राजनीतिक संस्कृति को बदलने की शुरुआत कर सकता है।

सबसे बड़ा सवाल: PK कितने दिन तक ‘पावर’ को ‘परफॉर्मेंस’ में बदल पाते हैं?

प्रशांत किशोर की राजनीति हमेशा से नैरेटिव बनाने के लिए जानी जाती रही है।लेकिन अब उनके पास नैरेटिव बनाने से कहीं ज्यादा बड़ी जिम्मेदारी है—नतीजे देने की।

बांकीपुर की जनता ने उन्हें मौका दिया है।

प्रशासन उनके साथ टेबल पर बैठा है।

सरकार के पास उनके मुद्दों पर काम करने का अवसर है।

विपक्ष का उनके अगले कदम पर नजर रखे हुए है।

और जनता इंतजार कर रही है। क्योंकि अब सवाल यह नहीं है कि प्रशांत किशोर के साथ कितने बड़े अधिकारी बैठे।सवाल यह है कि उन अधिकारियों के उठने के बाद पटना कितना बदला।

अगर पटना बदला, तो प्रशांत किशोर की यह बैठक बिहार की राजनीति में सिर्फ एक दिन की खबर नहीं रहेगी।वह एक नए राजनीतिक मॉडल की शुरुआत कही जाएगी।

और अगर पटना नहीं बदला…तो वही बैठक उनके लिए एक ऐसा आईना बन जाएगी, जिसमें सत्ता की चमक तो दिखाई देगी, लेकिन जनता की उम्मीदों का जवाब नहीं।यही प्रशांत किशोर की राजनीति की सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा है।

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