बच्चों को संस्कारों से जोड़ना होगा, गुरुकुल की ओर लौटना होगा’: आचार्य प्रमोद कृष्णम का बड़ा बयान, सनातन मूल्यों और राष्ट्रभावना से जुड़ी शिक्षा व्यवस्था की जरूरत, पर छिड़ी नई बहस

बी के झा

NSK news Ind

मुरादाबाद, 2 अगस्त

कल्कि पीठाधीश्वर आचार्य प्रमोद कृष्णम ने देश की शिक्षा व्यवस्था और नई पीढ़ी के संस्कारों को लेकर बड़ा बयान देते हुए गुरुकुल परंपरा को फिर से मजबूत करने की वकालत की है। उन्होंने कहा कि यदि माता-पिता चाहते हैं कि उनके बच्चे भारतीय संस्कृति, सनातन मूल्यों और राष्ट्रहित की भावना से जुड़े आदर्श नागरिक बनें, तो उन्हें गुरुकुल जैसी शिक्षा पद्धति से प्रेरणा लेनी होगी।

मुरादाबाद में एक गुरुकुल के उद्घाटन समारोह में पहुंचे आचार्य प्रमोद कृष्णम ने कहा कि आधुनिक शिक्षा के साथ-साथ बच्चों को नैतिक शिक्षा, संस्कार और भारतीय परंपराओं का ज्ञान देना भी आवश्यक है। उन्होंने कहा कि केवल डिग्री हासिल करना शिक्षा का अंतिम उद्देश्य नहीं होना चाहिए, बल्कि शिक्षा का लक्ष्य चरित्र निर्माण और जिम्मेदार नागरिक तैयार करना होना चाहिए।

‘विवेकानंद और दयानंद जैसे आदर्शों से प्रेरणा लें युवा’आचार्य प्रमोद कृष्णम ने अभिभावकों से अपील की कि वे अपने बच्चों को ऐसे वातावरण में शिक्षित करें, जहां उनमें अनुशासन, सेवा भाव, आत्मविश्वास और राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी की भावना विकसित हो सके।उन्होंने कहा कि भारत की प्राचीन गुरुकुल परंपरा में शिक्षा के साथ जीवन मूल्यों पर भी विशेष जोर दिया जाता था।

उन्होंने स्वामी विवेकानंद, महर्षि दयानंद सरस्वती और महर्षि दधीचि जैसे महान व्यक्तित्वों का उदाहरण देते हुए कहा कि नई पीढ़ी को ऐसे आदर्शों से परिचित कराना समय की आवश्यकता है।

‘कॉकरोच बनने से रोकना है तो गुरुकुल का मार्ग दिखाना होगा’—

बयान पर चर्चा कार्यक्रम के दौरान आचार्य प्रमोद कृष्णम ने कहा कि यदि माता-पिता अपने बच्चों को केवल भौतिक सफलता की दौड़ में नहीं, बल्कि संस्कार और आदर्शों के मार्ग पर आगे बढ़ाना चाहते हैं तो गुरुकुल शिक्षा व्यवस्था से जुड़ना होगा। इसी संदर्भ में उन्होंने बच्चों को “कॉकरोच बनने से बचाने” जैसी टिप्पणी की, जिस पर राजनीतिक और सामाजिक हलकों में चर्चा शुरू हो गई है।उनके समर्थकों का कहना है कि इस टिप्पणी का उद्देश्य आधुनिक जीवन में बढ़ती नैतिक चुनौतियों की ओर संकेत करना था, जबकि आलोचकों का मानना है कि बच्चों और युवा पीढ़ी के लिए ऐसे शब्दों का प्रयोग उचित नहीं है।

शिक्षाविदों की राय: आधुनिक शिक्षा और संस्कारों में संतुलन जरूरी

शिक्षाविदों का कहना है कि भारत की प्राचीन शिक्षा परंपरा में चरित्र निर्माण, अनुशासन और नैतिक मूल्यों का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। हालांकि, वर्तमान समय में विज्ञान, तकनीक, रोजगार कौशल और आधुनिक ज्ञान भी उतने ही आवश्यक हैं।उनका मानना है कि आदर्श शिक्षा व्यवस्था वही होगी, जिसमें आधुनिक ज्ञान के साथ भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों और नैतिक शिक्षा का संतुलन बनाया जा सके।

धर्माचार्यों का समर्थन: ‘संस्कार ही समाज की नींव’

कई धर्माचार्यों ने आचार्य प्रमोद कृष्णम के विचारों का समर्थन करते हुए कहा कि परिवार और शिक्षा संस्थानों की जिम्मेदारी है कि वे बच्चों में अच्छे संस्कार विकसित करें। उनका कहना है कि संस्कृति और परंपराओं से जुड़ाव युवा पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ता है।

विपक्ष और आलोचकों की प्रतिक्रिया

विपक्षी नेताओं और कुछ सामाजिक टिप्पणीकारों ने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य बच्चों में वैज्ञानिक सोच, संवैधानिक मूल्यों, सहिष्णुता और आधुनिक कौशल का विकास करना भी है। उनका कहना है कि शिक्षा व्यवस्था को किसी एक विचारधारा तक सीमित करने के बजाय व्यापक और समावेशी दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।

कुछ नेताओं ने आचार्य के “कॉकरोच” वाले बयान पर आपत्ति जताते हुए कहा कि बच्चों और युवाओं के लिए भाषा का चयन अधिक संवेदनशील होना चाहिए।

अन्य राजनीतिक और धार्मिक मुद्दों पर भी रखी राय

मीडिया से बातचीत के दौरान आचार्य प्रमोद कृष्णम ने कई समसामयिक मुद्दों पर भी अपनी प्रतिक्रिया दी। भगवान शिव को लेकर मौलाना जरजिस की कथित टिप्पणी पर उन्होंने कहा कि धार्मिक आस्थाओं का सम्मान होना चाहिए और किसी भी धर्म या देवी-देवताओं के प्रति आपत्तिजनक भाषा का प्रयोग स्वीकार्य नहीं है।

संसद परिसर के बाहर पप्पू यादव द्वारा भगवा वस्त्र पहनने के मामले पर उन्होंने टिप्पणी करते हुए कहा कि धार्मिक प्रतीकों का सम्मान होना चाहिए और उनका उपयोग केवल राजनीतिक प्रदर्शन के लिए नहीं किया जाना चाहिए।’

कॉकरोच पार्टी’ आंदोलन पर भी टिप्पणी

आचार्य प्रमोद कृष्णम ने कॉकरोच पार्टी के आंदोलन को लेकर भी अपनी प्रतिक्रिया दी और इसे उन्होंने विरोध प्रदर्शन के बजाय अव्यवस्था बताया। प्रधानमंत्री द्वारा इस मामले में माफी मांगने के सवाल पर उन्होंने कहा कि यह प्रधानमंत्री की उदारता और बड़े हृदय का परिचायक है।

वहीं वंदे मातरम् को लेकर एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने कहा कि राष्ट्र के प्रति सम्मान और देशभक्ति सभी नागरिकों का कर्तव्य है।

राजनीतिक विश्लेषण: शिक्षा और संस्कृति पर नई बहस

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आचार्य प्रमोद कृष्णम का बयान ऐसे समय आया है जब देश में शिक्षा नीति, सांस्कृतिक पहचान और मूल्यों आधारित शिक्षा को लेकर व्यापक चर्चा चल रही है।विश्लेषकों के अनुसार, एक ओर जहां भारतीय परंपराओं और नैतिक शिक्षा को मजबूत करने की मांग उठ रही है, वहीं दूसरी ओर आधुनिक शिक्षा, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और संवैधानिक मूल्यों के संतुलन को लेकर भी बहस जारी है।

निष्कर्ष:

शिक्षा का लक्ष्य चरित्र और क्षमता दोनों का निर्माणआचार्य प्रमोद कृष्णम के बयान ने एक बार फिर यह बहस तेज कर दी है कि भारत की शिक्षा व्यवस्था में परंपरा और आधुनिकता का संतुलन किस प्रकार बनाया जाए। जहां गुरुकुल परंपरा को समर्थक संस्कार और चरित्र निर्माण का माध्यम मानते हैं, वहीं विशेषज्ञ आधुनिक ज्ञान और वैज्ञानिक सोच को भी अनिवार्य बताते हैं।

आखिरकार चुनौती यही है कि ऐसी शिक्षा व्यवस्था तैयार हो, जो बच्चों को अपनी संस्कृति से जोड़ने के साथ-साथ उन्हें बदलती दुनिया की चुनौतियों का सामना करने में भी सक्षम बनाए।

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