शाहपुर में फिर दहशत की दस्तक! BJP विधायक राकेश रंजन को जान से मारने की धमकी, जेल अधीक्षक समेत चार पर साजिश का केस; भरत तिवारी एनकाउंटर के बाद फिर सुर्खियों में इलाका

बी के झा

NSK news India

आरा / पटना, 8 अगस्त

भोजपुर जिले के शाहपुर इलाके में एक बार फिर कानून-व्यवस्था और आपराधिक साजिश को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। शाहपुर से भाजपा विधायक राकेश रंजन उर्फ राकेश रंजन ओझा को कथित तौर पर जान से मारने की धमकी मिलने के बाद पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया है। विधायक को मिले एक गुमनाम पत्र में उनकी हत्या की कथित साजिश का दावा किया गया है। मामले की गंभीरता को देखते हुए करनामेपुर थाने में भागलपुर केंद्रीय कारा के जेल अधीक्षक समेत चार लोगों के खिलाफ आपराधिक षड्यंत्र के आरोप में प्राथमिकी दर्ज की गई है।

हालांकि, पत्र में लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है। पुलिस पूरे मामले की जांच कर रही है और जांच पूरी होने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि धमकी और कथित साजिश के पीछे वास्तविकता क्या है।लेकिन इस घटनाक्रम ने उस शाहपुर इलाके को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है, जो हाल के दिनों में भरत तिवारी एनकाउंटर के बाद से लगातार पुलिस और अपराध से जुड़े घटनाक्रमों के कारण सुर्खियों में रहा है।

गुमनाम पत्र ने बढ़ाई बेचैनी

विधायक राकेश रंजन ओझा के मुताबिक उन्हें कुछ दिन पहले एक गुमनाम पत्र मिला था। पत्र में दावा किया गया कि भागलपुर केंद्रीय कारा के जेल अधीक्षक राजीव कुमार झा और जेल में बंद कुछ आरोपित मिलकर विधायक की हत्या की कथित साजिश रच रहे हैं।पत्र में जेल में बंद लंबू शर्मा, कुबेर मिश्रा और हरीश मिश्रा के नामों का भी उल्लेख किया गया है।

गुमनाम पत्र में गंभीर आरोप लगाते हुए यह दावा किया गया कि जेल के भीतर कुछ बंदियों को अलग से बातचीत का अवसर दिया जा रहा है और विधायक की हत्या के लिए कथित तौर पर हथियार तथा अन्य संसाधनों की व्यवस्था किए जाने की योजना है।इन आरोपों की सत्यता फिलहाल जांच का विषय है। पुलिस के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह पता लगाना है कि पत्र वास्तव में किसने भेजा, उसमें दी गई सूचनाओं का स्रोत क्या है और क्या धमकी के पीछे कोई वास्तविक आपराधिक नेटवर्क सक्रिय है।

जेल अधीक्षक समेत चार के खिलाफ FIR

मामले में विधायक की ओर से दिए गए आवेदन के आधार पर करनामेपुर थाने में जेल अधीक्षक समेत चार लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई है।यह घटनाक्रम इसलिए भी गंभीर माना जा रहा है क्योंकि आरोप सीधे जेल के भीतर से कथित आपराधिक साजिश संचालित होने की ओर इशारा करते हैं।यदि जांच में पत्र में लगाए गए आरोपों में कोई तथ्य सामने आता है तो यह केवल विधायक की सुरक्षा का मामला नहीं रहेगा, बल्कि जेल प्रशासन की निगरानी व्यवस्था और जेल के भीतर बंद आपराधिक नेटवर्क की गतिविधियों पर भी गंभीर प्रश्न खड़े होंगे।लेकिन फिलहाल इन आरोपों को प्रमाणित तथ्य मानना जल्दबाजी होगी।

पुलिस के सामने तीन बड़े सवाल

जांच एजेंसियों के सामने इस समय कई महत्वपूर्ण सवाल हैं।पहला—गुमनाम पत्र किसने लिखा और किसके कहने पर भेजा गया?

दूसरा—क्या विधायक को वास्तव में निशाना बनाने की कोई आपराधिक योजना बनाई गई थी?

तीसरा—क्या जेल में बंद आरोपितों और कथित बाहरी नेटवर्क के बीच किसी प्रकार का संपर्क स्थापित हुआ था?

इन सवालों के जवाब ही पूरे मामले की दिशा तय करेंगे।पुलिस ने मामले को गंभीरता से लेते हुए जांच शुरू कर दी है। अब तकनीकी साक्ष्यों, पत्र की जांच, संबंधित लोगों से पूछताछ और जेल की गतिविधियों की पड़ताल महत्वपूर्ण होगी।

भरत तिवारी एनकाउंटर के बाद फिर शाहपुर सुर्खियों में

शाहपुर क्षेत्र का नाम हाल में 17 जून को बिलौटी गांव में भरत तिवारी के एनकाउंटर के बाद भी चर्चा में रहा था।एनकाउंटर के बाद इलाके में कानून-व्यवस्था, अपराध और पुलिस कार्रवाई को लेकर विभिन्न तरह की चर्चाएं हुई थीं। ऐसे माहौल में स्थानीय भाजपा विधायक को कथित हत्या की धमकी मिलने की घटना ने सुरक्षा व्यवस्था को लेकर चिंता और बढ़ा दी है।पुलिस के लिए चुनौती यह है कि क्षेत्र में किसी भी संभावित आपराधिक गतिविधि को समय रहते चिन्हित किया जाए और राजनीतिक तथा सामाजिक रूप से संवेदनशील व्यक्तियों की सुरक्षा को लेकर किसी तरह की चूक न हो।

विधायक परिवार पहले भी झेल चुका है हिंसा

राकेश रंजन ओझा के परिवार का आपराधिक हिंसा से पुराना सामना रहा है। उनके पिता और पूर्व भाजपा नेता विशेश्वर ओझा की हत्या ने भोजपुर की राजनीति और अपराध जगत को लंबे समय तक प्रभावित किया था।ऐसे पारिवारिक इतिहास के बीच वर्तमान विधायक को मिली कथित धमकी को सामान्य घटना मानकर नजरअंदाज करना पुलिस के लिए आसान नहीं होगा।यही कारण है कि जांच एजेंसियों को धमकी की प्रकृति, संभावित मकसद और किसी पुराने आपराधिक नेटवर्क से इसके संबंध की भी पड़ताल करनी होगी।

क्या जेल से बाहर संचालित हो रही थी साजिश?

इस पूरे मामले का सबसे संवेदनशील पहलू जेल कनेक्शन है।गुमनाम पत्र में दावा किया गया है कि जेल में बंद कुछ आरोपितों के माध्यम से विधायक की हत्या की योजना तैयार की जा रही थी। यदि यह दावा गलत है तो भी यह पता लगाना जरूरी है कि इतनी गंभीर सूचना वाला पत्र आखिर किस उद्देश्य से भेजा गया।और यदि जांच में आरोपों का कोई हिस्सा सही पाया जाता है तो मामला जेल सुरक्षा की गंभीर विफलता का रूप ले सकता है।जेल किसी अपराधी नेटवर्क के संचालन का केंद्र न बने, इसके लिए बंदियों की मुलाकात, संचार और गतिविधियों की निगरानी अत्यंत महत्वपूर्ण होती है।

राजनीति भी होगी गरम, लेकिन जांच सबसे ऊपर

विधायक को धमकी मिलने के बाद राजनीतिक बयानबाजी तेज होना स्वाभाविक है। भाजपा इसे विपक्षी राजनीति से जोड़ने की कोशिश कर सकती है, जबकि विपक्ष सरकार से यह सवाल पूछ सकता है कि जब सत्तारूढ़ दल के विधायक ही सुरक्षित नहीं हैं तो आम नागरिकों की सुरक्षा का क्या हाल है।लेकिन इस मामले में राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से अधिक महत्वपूर्ण निष्पक्ष जांच है।

किसी भी व्यक्ति को केवल गुमनाम पत्र में नाम आने के आधार पर दोषी मान लेना उचित नहीं होगा। पुलिस को ठोस साक्ष्यों के आधार पर ही आगे बढ़ना होगा।

शाहपुर की असली चिंता—दहशत का माहौल न बने

किसी जनप्रतिनिधि को धमकी मिलना केवल व्यक्तिगत सुरक्षा का विषय नहीं होता। इसका असर पूरे इलाके के राजनीतिक और सामाजिक वातावरण पर पड़ सकता है।यदि जनता में यह धारणा बनने लगे कि अपराधी राजनीतिक प्रभाव वाले लोगों को भी निशाना बना सकते हैं, तो कानून के प्रति विश्वास कमजोर हो सकता है।

इसलिए पुलिस के लिए जरूरी है कि वह न केवल मामले का खुलासा करे, बल्कि जनता को यह भरोसा भी दिलाए कि कानून से ऊपर कोई नहीं है।

अब पुलिस की जांच पर टिकी निगाहें

फिलहाल प्राथमिकी दर्ज हो चुकी है और पुलिस मामले की छानबीन कर रही है। जांच में यह स्पष्ट होना बाकी है कि गुमनाम पत्र के पीछे कौन है, उसमें लगाए गए आरोपों में कितना तथ्य है और विधायक को वास्तव में कोई खतरा था या नहीं।जांच का निष्कर्ष ही तय करेगा कि यह किसी बड़े आपराधिक षड्यंत्र की शुरुआती कड़ी थी, किसी व्यक्ति की डर पैदा करने की कोशिश थी या फिर किसी अन्य उद्देश्य से भेजा गया धमकी भरा पत्र।

निष्कर्ष

शाहपुर में एक बार फिर सवाल कानून के राज और अपराधी नेटवर्क की संभावित सक्रियता पर आकर टिक गया है।भरत तिवारी एनकाउंटर के बाद चर्चा में आया यह इलाका अब भाजपा विधायक को मिली कथित जान से मारने की धमकी और जेल अधीक्षक समेत चार लोगों के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी के कारण फिर सुर्खियों में है।

अब गेंद पुलिस के पाले में है।गुमनाम पत्र में लिखे आरोप कितने सच हैं, यह अदालत या पुलिस की जांच तय करेगी; लेकिन एक निर्वाचित जनप्रतिनिधि को मिली कथित हत्या की धमकी को हल्के में लेना भी संभव नहीं।इस मामले में सबसे जरूरी है—निष्पक्ष जांच, ठोस सबूत और दोषी तक कानून का पहुंचना।

क्योंकि शाहपुर को अब दहशत की सुर्खियों से नहीं, बल्कि मजबूत कानून-व्यवस्था और अपराध पर निर्णायक कार्रवाई की खबरों से पहचाने जाने की जरूरत है।

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