31 दिसंबर 2029 की डेडलाइन: नशे के साम्राज्य पर अमित शाह का निर्णायक प्रहार, अब ‘जब्ती’ नहीं नेटवर्क ध्वस्त करने का मिशन , 36 राज्यों-केंद्रशासित प्रदेशों की एजेंसियां एक साझा अभियान में

बी. के. झा

NSK news Ind

नई दिल्ली, 23 सितंबर

भारत में नशे के कारोबार के खिलाफ लड़ाई अब केवल छापेमारी, गिरफ्तारी और ड्रग्स की जब्ती तक सीमित रखने के बजाय पूरे नेटवर्क को जड़ से उखाड़ने की दिशा में ले जाने का दावा केंद्र सरकार ने किया है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 31 दिसंबर 2029 की स्पष्ट समय-सीमा तय करते हुए कहा है कि इस तारीख तक देश से ड्रग्स के कारोबार को जड़ से खत्म करने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों को मिलकर निर्णायक अभियान चलाना होगा।

नई दिल्ली में एंटी-नारकोटिक्स टास्क फोर्स (ANTF) के प्रमुखों की तीसरी राष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए शाह ने इस लड़ाई की दिशा बदलने का संदेश दिया। उनका जोर केवल यह बताने पर नहीं था कि कितनी मात्रा में ड्रग्स पकड़ी गई, बल्कि इस बात पर था कि उसके पीछे कौन-सा नेटवर्क है, पैसा कहां से आता है, सप्लाई चेन किस तरह काम करती है और असली सरगना तक जांच कैसे पहुंचे।

शाह ने साफ शब्दों में कहा—अब “मीटिंग से मिशन, रिपोर्टिंग से रिजल्ट, जब्ती से नेटवर्क के ध्वस्तीकरण और केस से कन्विक्शन” की तरफ बढ़ना होगा।

31 दिसंबर 2029 क्यों महत्वपूर्ण है?

गृह मंत्री ने पहली बार इस अभियान के लिए ऐसी निश्चित तारीख सामने रखी है, जिसे अब सरकारी मशीनरी के प्रदर्शन को मापने के पैमाने के तौर पर देखा जाएगा।सरकार ने जून 2026 में Vision Document on Narcotics Control 2026-2029 जारी किया था। इसमें केवल पुलिस कार्रवाई नहीं, बल्कि इंटेलिजेंस, आर्थिक जांच, सिंथेटिक ड्रग्स, प्रीकर्सर केमिकल्स, डार्कनेट, क्रिप्टोकरेंसी, उपचार, पुनर्वास और जन-जागरूकता को एक साथ जोड़ने की रणनीति रखी गई है।

यानी सरकार का मॉडल तीन स्तरों पर काम करने की कोशिश कर रहा है—पहला—Supply Reduction: ड्रग्स देश में आने और बनने से रोकना।

दूसरा—Demand Reduction: युवाओं और समाज में नशे की मांग कम करना।

तीसरा—Harm Reduction: नशे की गिरफ्त में आ चुके लोगों को इलाज और पुनर्वास उपलब्ध कराना।

‘एक ग्राम भी न आने देंगे, एक ग्राम भी बाहर नहीं जाने देंगे’

अमित शाह ने कहा कि लक्ष्य केवल भारत के भीतर ड्रग्स पकड़ना नहीं, बल्कि देश को नशीले पदार्थों की अंतरराष्ट्रीय सप्लाई चेन का रास्ता बनने से रोकना भी है। उन्होंने कहा कि लक्ष्य है कि न तो एक ग्राम ड्रग्स भारत में प्रवेश करे और न ही भारत को रास्ता बनाकर ड्रग्स बाहर जाए।यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत की भौगोलिक स्थिति उसे अंतरराष्ट्रीय ड्रग तस्करी के कुछ प्रमुख रूटों के बीच स्थित करती है। सरकार ने पहले ही ‘डेथ ट्रायंगल’ और ‘डेथ क्रेसेंट’ से आने वाले नेटवर्क पर निगरानी मजबूत करने की रणनीति की बात कही है।

जब्ती से आगे—असली लड़ाई ‘किंगपिन’ तक पहुंचने की

नारकोटिक्स के खिलाफ किसी भी अभियान की सफलता सिर्फ पकड़ी गई खेप के वजन से तय नहीं होती। असली सवाल यह है कि उस खेप के पीछे मौजूद पूरा आर्थिक और आपराधिक ढांचा कितना कमजोर हुआ।इसीलिए सरकार के नए रोडमैप में बड़े मामलों में Financial Investigation, ड्रग नेटवर्क के backward-forward linkages और मनी ट्रेल पर जोर दिया गया है। ईडी, FIU, बैंकिंग सिस्टम, सीबीआई, इंटरपोल, सीमा सुरक्षा एजेंसियां और राज्य पुलिस को अलग-अलग सूचनाओं के बजाय साझा रणनीति के तहत काम करने का लक्ष्य रखा गया है।सरकार ने यह भी कहा है कि बड़े मामलों में ड्रग तस्करी से होने वाली कमाई और संपत्ति के स्रोत का पता लगाना नेटवर्क तोड़ने का महत्वपूर्ण हिस्सा होगा।

यानी तस्वीर अब सिर्फ ‘कितनी ड्रग्स पकड़ी गई? की नहीं, बल्कि ‘किसका नेटवर्क टूटा और उसकी आर्थिक रीढ़ कितनी कमजोर हुई?’ की होगी।

डार्कनेट और क्रिप्टो ने बदली चुनौती की शक्ल

नशे का कारोबार अब सिर्फ सड़क, सीमा और बंदरगाहों तक सीमित नहीं है। सिंथेटिक ड्रग्स, ऑनलाइन नेटवर्क, डार्कनेट, एन्क्रिप्टेड कम्युनिकेशन और क्रिप्टोकरेंसी के जरिए भुगतान ने जांच एजेंसियों के सामने नई चुनौती खड़ी की है।

सरकार के 2026-29 रोडमैप में इन नई तकनीकी चुनौतियों पर विशेष जोर है। एंटी-नारकोटिक्स टास्क फोर्स में डार्कनेट-क्रिप्टो से जुड़े अपराधों की जांच की क्षमता बढ़ाने और आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल की योजना बताई गई है।यही वजह है कि इस लड़ाई में पुलिस की पारंपरिक जांच के साथ साइबर विशेषज्ञता, फोरेंसिक तकनीक और वित्तीय खुफिया तंत्र की भूमिका बढ़ने वाली है।

सरकार के दावे और आंकड़े क्या कहते हैं?

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2014 से 2026 के बीच 1.19 करोड़ किलोग्राम से अधिक ड्रग्स जब्त किए गए, जिनकी अनुमानित कीमत करीब 1.89 लाख करोड़ रुपये बताई गई है। सरकार ने यह भी कहा है कि नशा-मुक्त भारत अभियान के तहत 25 करोड़ नागरिकों तक पहुंच बनाई गई और करीब 5.70 लाख लोगों को उपचार एवं पुनर्वास के जरिए नशे से बाहर लाया गया।वहीं, एनसीबी के 2025 के आंकड़ों के अनुसार अकेले एनसीबी ने 1,33,965 किलोग्राम मादक पदार्थ जब्त किए, करीब 1,980 करोड़ रुपये मूल्य की जब्ती बताई गई और 994 कथित ड्रग तस्करों को गिरफ्तार किया गया। एनसीबी के मुताबिक 2025 में 131 मामलों में 265 आरोपियों को दोषसिद्धि मिली और उसकी conviction rate करीब 67 फीसदी रही।

इन आंकड़ों से कार्रवाई की व्यापकता तो सामने आती है, लेकिन 2029 की कसौटी इससे आगे होगी—क्या नए नेटवर्क बनने की क्षमता भी कम हुई?

कानूनविदों के नजरिए से सबसे कठिन चरण: केस से सजा तक

नारकोटिक्स के मामलों में गिरफ्तारी और चार्जशीट के बाद अदालत में दोषसिद्धि तक पहुंचना अलग कानूनी चुनौती है। NDPS कानून के तहत कई प्रावधान कठोर हैं, लेकिन जांच की गुणवत्ता, साक्ष्य की शुद्धता, फोरेंसिक प्रक्रिया, जब्ती की वैधानिक प्रक्रिया और अभियोजन की मजबूती निर्णायक भूमिका निभाती है।सरकार के विजन डॉक्यूमेंट में बड़े मामलों के लिए विशेष अभियोजन व्यवस्था और विशेष NDPS अदालतों की दिशा में राज्यों को पहल करने की बात कही गई है।

गृह मंत्रालय ने हाई कोर्ट के स्तर पर भी विशेष अदालतों, पर्याप्त न्यायिक क्षमता और प्रमुख मामलों की सुनवाई को तेज करने की जरूरत रेखांकित की है।यहीं अमित शाह का ‘केस से कन्विक्शन’ वाला फॉर्मूला महत्वपूर्ण हो जाता है।

इसका अर्थ यह है कि पुलिस कार्रवाई का अंतिम लक्ष्य केवल आरोपी को पकड़ना नहीं, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया में मजबूत साक्ष्य के साथ मामला साबित करना भी होगा।

शिक्षाविदों के लिए असली सवाल—स्कूल और कॉलेज कितने सुरक्षित होंगे?

नशे की लड़ाई का दूसरा मोर्चा पुलिस थाने से नहीं, बल्कि स्कूल-कॉलेज और परिवार से जुड़ा है।सरकार के रोडमैप में शिक्षा संस्थानों को ड्रग-फ्री बनाने, शिक्षकों और अभिभावकों में जागरूकता बढ़ाने तथा युवाओं को नशे से दूर रखने पर भी जोर है।

शिक्षा मंत्रालय के स्तर पर Drug-Free Campus framework की दिशा में काम करने की बात भी रखी गई है।यानी नशे के खिलाफ रणनीति का मूल्यांकन सिर्फ सीमा पर पकड़ी गई खेप से नहीं, बल्कि इस सवाल से भी होगा कि कितने युवाओं को नशे की पहली सीढ़ी पर पहुंचने से रोका गया।

समाजसेवी संस्थाओं के लिए भी बड़ी भूमिका

नशे की समस्या को केवल अपराध मानकर देखना अधूरा होगा। इसमें स्वास्थ्य, परिवार, मानसिक-सामाजिक पुनर्वास, रोजगार और सामाजिक स्वीकार्यता जैसे प्रश्न भी जुड़े हैं।सरकार ने 2026-29 रोडमैप में de-addiction और rehabilitation व्यवस्था के विस्तार को शामिल किया है। उपलब्ध सरकारी जानकारी के मुताबिक देश में नशामुक्ति केंद्रों की संख्या बढ़ाकर 1,751 करने की दिशा में काम किया जा रहा है।इसका मतलब साफ है—जो व्यक्ति नशे के जाल में फंस चुका है, उसके लिए सिर्फ जेल या दंड पर्याप्त नहीं माना जा सकता। उसे उपचार, काउंसलिंग और समाज में पुनर्वापसी का रास्ता भी देना होगा।

विपक्ष की भूमिका और राजनीतिक सवाल

इस घोषणा पर प्रमुख विपक्षी दलों की ओर से ऐसी कोई स्पष्ट, समेकित प्रतिक्रिया उपलब्ध नहीं है जिसे इस रिपोर्ट में तथ्य के रूप में उद्धृत किया जा सके। इसलिए किसी पार्टी के नाम से प्रतिक्रिया जोड़ना उचित नहीं होगा। हालांकि राजनीतिक स्तर पर इस अभियान से जुड़े कुछ सवाल स्वाभाविक रूप से उठते हैं—क्या 2029 की समय-सीमा को राज्यवार और जिला स्तर पर मापने योग्य लक्ष्यों में बदला जाएगा?

किन राज्यों में ड्रग नेटवर्क पर कार्रवाई की प्राथमिकता होगी?

केंद्र और राज्य पुलिस के बीच सूचना साझा करने की व्यवस्था कितनी प्रभावी होगी?

और यदि किसी राज्य में लक्ष्य पूरे नहीं होते तो जवाबदेही किसकी तय होगी?

यही वे प्रश्न हैं जो आने वाले तीन वर्षों में इस अभियान की राजनीतिक और प्रशासनिक समीक्षा का आधार बन सकते हैं।सिर्फ पुलिस नहीं, पूरा शासन तंत्र होगा

परीक्षा में अमित शाह ने इस लड़ाई को केवल गृह मंत्रालय का अभियान मानने से इनकार किया है। उन्होंने पहले ही स्पष्ट किया है कि स्कूल के प्रिंसिपल से लेकर ग्राम स्तर के कर्मचारी, पुलिस अधिकारी, डीजीपी, मुख्य सचिव और केंद्रीय गृह सचिव तक को एक दिशा में काम करना होगा।यही इस पूरे मिशन की सबसे बड़ी प्रशासनिक चुनौती भी है।

क्योंकि ड्रग नेटवर्क पुलिस सीमा नहीं पहचानते। एक राज्य में तैयार होने वाला माल दूसरे राज्य में जा सकता है, भुगतान किसी तीसरे राज्य से हो सकता है और नेटवर्क का सरगना विदेश में बैठा हो सकता है।ऐसे में राज्य की सीमा पर खत्म होने वाली पुलिस कार्रवाई से अंतरराज्यीय या अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क नहीं टूटता। उसके लिए साझा डेटाबेस, रियल-टाइम इंटेलिजेंस, वित्तीय जांच और अंतरराष्ट्रीय सहयोग जरूरी होगा।

एन एस के विश्लेषण:

2029 की तारीख अब सरकार की कसौटी भी है

अमित शाह ने नारकोटिक्स के खिलाफ लड़ाई को एक निश्चित तारीख दे दी है—31 दिसंबर 2029।अब इस तारीख का महत्व सिर्फ एक सरकारी घोषणा के रूप में नहीं, बल्कि प्रदर्शन की कसौटी के रूप में भी देखा जाएगा।सरकार के सामने तीन समानांतर लक्ष्य हैं—ड्रग्स की सप्लाई रोकना,

नेटवर्क और उसकी वित्तीय रीढ़ तोड़ना

तथा नशे की मांग घटाना।

अगर केवल जब्ती बढ़ती है, लेकिन नए नेटवर्क बनते रहते हैं, तो लड़ाई अधूरी रहेगी।

अगर गिरफ्तारियां बढ़ती हैं लेकिन दोषसिद्धि नहीं बढ़ती, तो ‘केस से कन्विक्शन’ का लक्ष्य कमजोर पड़ेगा। और अगर तस्करी पर कार्रवाई होती है लेकिन युवाओं के बीच नशे की मांग बनी रहती है, तो समस्या का दूसरा सिरा जस का तस रहेगा।इसलिए 31 दिसंबर 2029 तक पहुंचने की असली कहानी आंकड़ों के वजन से नहीं, नेटवर्क के टूटने, मनी ट्रेल के बंद होने, दोषसिद्धि बढ़ने, नशे की मांग घटने और पुनर्वास के मजबूत होने से लिखी जाएगी।

अमित शाह का संदेश स्पष्ट है—अब नारकोटिक्स के खिलाफ अभियान को बैठक और बयान से निकालकर मिशन की जमीन पर उतारना होगा।

लेकिन इस मिशन की अंतिम सफलता का पैमाना वही होगा जो हर शासन-व्यवस्था की अंतिम परीक्षा होता है—क्या नीति का असर देश के नागरिक, खासकर उसके युवाओं की जिंदगी में दिखाई देता है?

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