जमुई के बाद ढेंकनाल में भी सड़क पर ‘भीड़ का कानून’! श्रद्धालु युवक-युवती को रोका, मारपीट और बदसलूकी का वीडियो वायरल; सवाल—सड़क पर किसी की निजी जिंदगी का फैसला करने का अधिकार भीड़ को किसने दिया?

बी. के. झा

NSK news Ind

नई दिल्ली, 23‌ सितंबर

बिहार के जमुई में नाबालिग छात्रा और उसके साथी के साथ सड़क पर कथित बदसलूकी का मामला अभी शांत भी नहीं हुआ था कि ओडिशा के ढेंकनाल से सामने आए एक वीडियो ने फिर वही बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—क्या किसी व्यक्ति को सड़क पर रोककर उसकी निजी जिंदगी का फैसला करने का अधिकार किसी भीड़ को दिया जा सकता है?

ढेंकनाल में कपिलाश मंदिर से लौट रहे एक युवक और युवती को कथित तौर पर रास्ते में रोककर उनके साथ दुर्व्यवहार और मारपीट की गई। घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आने के बाद मामला सुर्खियों में आया। पुलिस ने कार्रवाई करते हुए तीन लोगों को गिरफ्तार किया है।घटना 18 सितंबर की बताई जा रही है। हालांकि पुलिस की जांच अभी जारी है और वीडियो में दिखाई देने वाले प्रत्येक व्यक्ति की भूमिका तथा पूरी घटना का क्रम साक्ष्यों के आधार पर तय किया जाना बाकी है।

कपिलाश से लौट रहे थे श्रद्धालु, रास्ते में रोक लिया

पुलिस और मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, कटक जिले के चाउद्वार इलाके से चार लोग—दो युवक और दो युवतियां—कपिलाश मंदिर में दर्शन के लिए गए थे। लौटते समय ढेंकनाल जिले में कपिलाश-टांगी मार्ग के पास कथित तौर पर कुछ लोगों ने उन्हें रोक लिया।इसके बाद उनके साथ गाली-गलौज और मारपीट किए जाने का आरोप है।घटना के बाद सोशल मीडिया पर सामने आए वीडियो में लोगों के एक समूह के बीच युवक को घिरा हुआ देखा जा सकता है, जबकि युवती कथित तौर पर उन्हें छोड़ने की गुहार लगाती दिखाई देती है। वीडियो की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, इसलिए पुलिस की जांच के अंतिम निष्कर्ष का इंतजार जरूरी है।

रिपोर्टों के अनुसार, स्थानीय लोगों के हस्तक्षेप के बाद स्थिति कुछ समय के लिए शांत हुई। इसके बाद पीड़ित वापस लौट गए। बाद में वीडियो सोशल मीडिया पर प्रसारित हुआ।यहीं से कहानी का दूसरा और अधिक गंभीर पहलू सामने आता है—घटना का वीडियो बनाना और उसका प्रसार।

वीडियो वायरल हुआ तो हरकत में आई पुलिस

महिला की शिकायत के बाद मामले में कार्रवाई शुरू हुई। रिपोर्टों के अनुसार शिकायत पहले चाउद्वार थाने में दर्ज हुई और बाद में जीरो एफआईआर के जरिए मामला गांदिया थाना पुलिस तक पहुंचा। इसके बाद पुलिस ने जांच तेज की।ढेंकनाल के पुलिस अधीक्षक अभिनव सोनकर के मुताबिक वीडियो के आधार पर जांच की गई और तीन लोगों को पकड़ा गया। पुलिस ने कहा है कि शिकायतकर्ता का बयान, वीडियो फुटेज और अन्य साक्ष्य जुटाए जा रहे हैं और जिस स्तर का अपराध प्रमाणित होगा, उसी के अनुसार आगे कानूनी कार्रवाई की जाएगी।गिरफ्तार किए गए लोगों की पहचान सरोज नायक, समीर नायक और संग्राम रथ के रूप में की गई है। रिपोर्टों के मुताबिक इनके खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं तथा सूचना प्रौद्योगिकी कानून के तहत मामला दर्ज किया गया है।

‘मोरल पुलिसिंग’ या कानून हाथ में लेने की कोशिश?

इस घटना ने एक पुरानी लेकिन बेहद गंभीर बहस को फिर सामने ला दिया है।अगर किसी व्यक्ति के व्यवहार पर कोई आपत्ति है, किसी अपराध का संदेह है या कोई कानूनी शिकायत है तो उसका रास्ता पुलिस और न्याय व्यवस्था है।सड़क पर रोकना, घेरना, मारपीट करना, अपमानित करना या वीडियो बनाकर उसे सार्वजनिक करना कानून-व्यवस्था की जगह नहीं ले सकता।यही वह बिंदु है जहां ‘मोरल पुलिसिंग’ और वैधानिक कानून-व्यवस्था के बीच अंतर समझना जरूरी हो जाता है।किसी को किसी की नैतिकता का जज नियुक्त नहीं किया गया है।और यदि किसी व्यक्ति ने अपराध किया भी हो तो अपराध तय करने का अधिकार जांच एजेंसी और अदालत की प्रक्रिया का है, भीड़ का नहीं।

जमुई से ढेंकनाल तक—समानता कहां दिख रही है?

जमुई और ढेंकनाल की घटनाओं को बिल्कुल समान मानना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा। जमुई मामले में पीड़ित दो नाबालिग छात्र थे और पुलिस ने POCSO समेत अन्य धाराओं में कार्रवाई की है। ढेंकनाल में पीड़ित वयस्क श्रद्धालु बताए गए हैं और पुलिस द्वारा दर्ज आरोप अलग प्रकृति के हैं।फिर भी दोनों घटनाओं में एक चिंताजनक समानता दिखाई देती है—युवाओं को सड़क पर रोकना, समूह द्वारा घेरना, कथित दुर्व्यवहार/हिंसा और घटना का वीडियो बनाना।जमुई मामले में वीडियो वायरल होने के बाद पुलिस ने कई आरोपियों की पहचान की और SIT गठित की थी।

राष्ट्रीय महिला आयोग ने भी स्वतः संज्ञान लेते हुए कार्रवाई की मांग की थी।ढेंकनाल में भी वीडियो सामने आने के बाद पुलिस कार्रवाई तेज हुई।यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है कि क्या सोशल मीडिया वीडियो अब पुलिस तक शिकायत पहुंचाने का नया माध्यम बन रहा है, या पुलिस की सक्रियता शिकायत मिलने से पहले भी उतनी ही तेज होनी चाहिए?

कानूनविदों के नजरिए से सबसे बड़ा सवाल

कानूनी दृष्टि से किसी भी मामले में आरोपी होना और दोषी सिद्ध होना दो अलग-अलग बातें हैं।इस मामले में पुलिस ने कुछ लोगों को गिरफ्तार किया है, लेकिन अंतिम दोषसिद्धि अदालत में साक्ष्यों के आधार पर होगी।कानूनविदों के लिए यहां तीन बिंदु महत्वपूर्ण हैं—

पहला: क्या सभी आरोपियों की पहचान और उनकी व्यक्तिगत भूमिका स्पष्ट रूप से स्थापित होती है?

दूसरा: क्या वीडियो की फॉरेंसिक जांच से घटना का पूरा क्रम स्पष्ट होता है?

तीसरा: क्या मारपीट, धमकी, कथित यौन उत्पीड़न या वीडियो प्रसार से जुड़े आरोपों को पर्याप्त साक्ष्य के साथ अदालत में साबित किया जा सकेगा?

यही कारण है कि पुलिस ने भी अभी जांच पूरी होने से पहले अपराध की अंतिम प्रकृति पर निष्कर्ष देने के बजाय साक्ष्य जुटाने की बात कही है।

शिक्षाविदों के लिए चिंता सिर्फ अपराध की नहीं, सामाजिक सोच की भी

शिक्षाविदों के नजरिए से इस तरह की घटनाएं केवल कानून-व्यवस्था का प्रश्न नहीं हैं।स्कूल, कॉलेज और समाज में बच्चों तथा युवाओं को यह समझाना जरूरी है कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता और दूसरे व्यक्ति की गरिमा का सम्मान लोकतांत्रिक समाज की बुनियादी शर्त है।किसी लड़की या युवक का किसी के साथ जाना, घूमना या यात्रा करना किसी तीसरे व्यक्ति को उसे अपमानित करने या हिंसा करने का अधिकार नहीं देता।यदि किसी स्थिति में वास्तविक अपराध दिखाई देता है तो मदद करने का सही तरीका पुलिस को सूचना देना है—भीड़ बनकर आरोपी, जज और सजा देने वाला तीनों बन जाना नहीं।

समाजसेवी संगठनों के लिए भी चेतावनी

महिला अधिकार और सामाजिक संगठनों के सामने भी इस घटना ने एक व्यापक चुनौती रखी है।सड़क पर होने वाली हिंसा अक्सर सिर्फ पीड़ित व्यक्ति तक सीमित नहीं रहती। घटना का वीडियो बनाकर उसे सोशल मीडिया पर फैलाना पीड़ित की निजता और गरिमा को दूसरी बार चोट पहुंचा सकता है।इसलिए सामाजिक संगठनों की भूमिका केवल घटना के बाद विरोध करने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। उन्हें पुलिस, प्रशासन, स्कूल-कॉलेज और स्थानीय समुदायों के साथ मिलकर सुरक्षित सार्वजनिक स्थानों, डिजिटल जिम्मेदारी और लैंगिक संवेदनशीलता पर जागरूकता अभियान चलाने की जरूरत है।

राजनीतिक सवाल भी उठेगा—सार्वजनिक स्थान कितने सुरक्षित हैं?

ऐसी घटनाएं सामने आने के बाद विपक्षी दलों की ओर से आमतौर पर कानून-व्यवस्था और महिला सुरक्षा पर सरकार से जवाबदेही की मांग उठती है। लेकिन इस विशेष ढेंकनाल घटना पर प्रमुख विपक्षी नेताओं की कोई ऐसी ताजा, सत्यापित प्रतिक्रिया फिलहाल उपलब्ध नहीं मिली है जिसे तथ्य के रूप में उद्धृत किया जा सके।इसलिए राजनीतिक प्रतिक्रिया गढ़ने के बजाय असली राजनीतिक सवाल अधिक महत्वपूर्ण है—क्या सरकार यह सुनिश्चित कर सकती है कि धार्मिक और पर्यटन स्थलों की ओर जाने वाली सड़कों पर यात्रियों को स्थानीय समूहों द्वारा इस तरह रोका न जाए?

यह सवाल केवल ओडिशा का नहीं है।देश के हर राज्य में धार्मिक स्थल, पर्यटन स्थल और ग्रामीण संपर्क मार्ग बड़ी संख्या में लोगों की आवाजाही से जुड़े हैं।सुरक्षा व्यवस्था केवल मंदिर के मुख्य परिसर तक सीमित नहीं रह सकती। मंदिर तक पहुंचने वाली सड़क भी उतनी ही सुरक्षित होनी चाहिए।

श्रद्धास्थल की यात्रा और सड़क पर डर—यह विरोधाभास क्यों?

कपिलाश ओडिशा का प्रमुख धार्मिक और पर्यटन स्थल है। यहां श्रद्धालु और पर्यटक दूर-दूर से पहुंचते हैं।लेकिन यदि किसी श्रद्धालु परिवार या युवा यात्री को मंदिर से लौटते समय सड़क पर रोककर डराया जाए, तो इससे सिर्फ दो लोगों की सुरक्षा प्रभावित नहीं होती—उस इलाके की पर्यटन छवि और स्थानीय प्रशासन पर विश्वास भी प्रभावित होता है।यही कारण है कि ऐसी घटनाओं को केवल ‘एक गांव की घटना’ मानकर खत्म करना पर्याप्त नहीं होगा।

एनएसके विश्लेषण:

सड़क पर भीड़ नहीं, कानून का राज चाहिए

जमुई हो या ढेंकनाल—दोनों घटनाओं की परिस्थितियां अलग हैं और दोनों की कानूनी प्रक्रिया भी अलग होगी। लेकिन एक बात समान रूप से महत्वपूर्ण है।किसी भी लोकतांत्रिक समाज में सड़क पर भीड़ को कानून का विकल्प नहीं बनाया जा सकता।किसी को अपराधी मानने से पहले जांच जरूरी है।

किसी पर आरोप लगाने के बाद भी न्यायिक प्रक्रिया जरूरी है।और किसी निर्दोष व्यक्ति की गरिमा बचाना भी उतना ही जरूरी है जितना अपराधी को सजा दिलाना।ढेंकनाल मामले में पुलिस ने तीन लोगों को गिरफ्तार कर जांच आगे बढ़ा दी है।

अब असली परीक्षा यह होगी कि वीडियो में दिखाई देने वाली पूरी घटना का सच क्या था, कौन-कौन लोग उसमें शामिल थे और प्रत्येक व्यक्ति की भूमिका क्या थी।अगर किसी ने कानून हाथ में लिया है तो कानून के मुताबिक कार्रवाई होनी चाहिए।

लेकिन उससे भी बड़ा सबक समाज के लिए है—किसी सड़क को ‘मोरल पुलिसिंग’ का मंच नहीं बनने दिया जा सकता।

श्रद्धालु हों, छात्र हों, परिवार हों या दोस्त—सार्वजनिक सड़क पर उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी राज्य की है और उनकी गरिमा का सम्मान समाज की।

कानून का राज तभी मजबूत होगा, जब भीड़ फैसला सुनाने के बजाय पुलिस को सूचना देगी और अदालत फैसला सुनाने के बजाय कोई और नहीं।

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