“हाँ” ‘मैं दिमागी नक्सल हूं’ कहकर नसीरुद्दीन शाह का सरकार पर हमला, वीडियो से गरमाई सियासत;जामिया में छात्र आंदोलन के बीच अभिनेता के तीखे बयान पर छिड़ी बहस; बीजेपी आईटी सेल, केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री को लेकर की गई टिप्पणियों पर सवाल, हिंदू संगठनों और बुद्धिजीवियों के एक वर्ग ने महाराष्ट्र सरकार से कार्रवाई की मांग की

बी के झा, एनएसके

NSK news India

नई दिल्ली, 28 अक्टूबर

देश में विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता, छात्र आंदोलनों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर जारी राजनीतिक बहस के बीच जाने-माने अभिनेता नसीरुद्दीन शाह का एक वीडियो चर्चा में है। जामिया मिल्लिया इस्लामिया में छात्रों के आंदोलन के बीच सोशल मीडिया पर साझा किए गए इस वीडियो में शाह ने केंद्र सरकार की नीतियों पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने खुद को ‘दिमागी नक्सल’ बताते हुए सरकार पर युवाओं के हौसले तोड़ने, शिक्षण संस्थानों को नुकसान पहुंचाने और लोकतंत्र को खतरे में डालने का आरोप लगाया।

अभिनेता के इस बयान ने एक बार फिर राजनीतिक विरोध, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सार्वजनिक जीवन में इस्तेमाल की जाने वाली भाषा को लेकर बहस तेज कर दी है। जहां सरकार के आलोचक इसे सत्ता से सवाल पूछने की अभिव्यक्ति मान सकते हैं, वहीं शाह की भाषा से असहमत लोगों का कहना है कि राजनीतिक विरोध के दौरान शब्दों की मर्यादा और सार्वजनिक जिम्मेदारी को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।

“हां” ‘मैं फक्र के साथ कहता हूं, मैं दिमागी नक्सल हूं

‘नसीरुद्दीन शाह ने अपने फेसबुक वीडियो में कहा, “मैं फक्र के साथ कहता हूं… मैं दिमागी नक्सल हूं।” उन्होंने दावा किया कि उनके जैसे लोगों को सरकार की ओर से एंटी-नेशनल और ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ जैसे नाम दिए जाते हैं। इसके बाद उन्होंने सरकार पर ही देश को बांटने वाली राजनीति करने का आरोप लगाया।शाह ने कहा कि वह सरकार से पूछना चाहते हैं कि देश के नौजवानों का हौसला तोड़ने, शिक्षण संस्थानों को बर्बाद करने और लोकतंत्र को खतरे में डालने के लिए वह और कितना आगे जाएगी।

उन्होंने सरकार के आसपास मौजूद लोगों पर भी तीखी टिप्पणियां कीं।अभिनेता ने अपने वीडियो में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, सत्यजित रे फिल्म एंड टेलीविजन संस्थान और जामिया मिल्लिया इस्लामिया का उल्लेख करते हुए छात्रों के साथ कथित अन्याय का मुद्दा उठाया।

उन्होंने चेतावनी भरे अंदाज में कहा कि छात्रों के साथ जो कुछ हो रहा है, उसे याद रखा जाएगा।बीजेपी की आईटी सेल पर निशाना साधते हुए भी शाह ने आक्रामक भाषा का इस्तेमाल किया।

वीडियो के अंत में उन्होंने दावा किया कि न तो देश के युवाओं का हौसला टूटेगा और न ही लोकतंत्र को कमजोर करने की कोशिशें सफल होंगी।

जामिया का आंदोलन बना राजनीतिक बहस का केंद्र

नसीरुद्दीन शाह के बयान की पृष्ठभूमि में दिल्ली स्थित जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय में चल रहा छात्र आंदोलन है। प्रदर्शनकारी छात्र छात्रसंघ चुनाव बहाल करने, मुख्य प्रॉक्टर को हटाने और छात्रों के खिलाफ की गई अनुशासनात्मक कार्रवाइयों को वापस लेने जैसी मांगें उठा रहे हैं।छात्रों के प्रदर्शन में एसएफआई, एनएसयूआई और आइसा जैसे छात्र संगठनों से जुड़े लोगों की भागीदारी की बात सामने आई है।

आंदोलन को लेकर विश्वविद्यालय प्रशासन और प्रदर्शनकारी छात्रों के बीच मतभेदों ने इसे राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बना दिया है।इसी माहौल में नसीरुद्दीन शाह का वीडियो सामने आया। अभिनेता ने छात्रों के पक्ष में आवाज उठाते हुए केंद्र सरकार की नीतियों पर सवाल खड़े किए। उनके बयान ने इस बहस को विश्वविद्यालय परिसर से आगे बढ़ाकर राष्ट्रीय राजनीति और सोशल मीडिया तक पहुंचा दिया है।

हालांकि, जामिया में छात्रों की मांगों और प्रशासन की कार्रवाई से जुड़े प्रत्येक आरोप की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है। इसी तरह अभिनेता के वीडियो पर प्रतिक्रिया देने वाले संगठनों की पहचान, उनके वास्तविक बयान और किसी कानूनी शिकायत की स्थिति को भी अलग-अलग सत्यापित किया जाना चाहिए।

‘राजनीतिक विरोध के नाम पर भाषा की मर्यादा कहां तक?

‘नसीरुद्दीन शाह के वीडियो पर विवाद का एक प्रमुख पहलू उनकी भाषा भी है। उनके आलोचकों का कहना है कि सरकार की नीतियों का विरोध करना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन सार्वजनिक मंच पर इस्तेमाल किए जाने वाले शब्दों की भी अपनी जिम्मेदारी होती है।

हिंदू संगठनों और बुद्धिजीवी वर्ग के कुछ लोगों ने कथित तौर पर अभिनेता के बयान पर आपत्ति जताते हुए केंद्र सरकार और महाराष्ट्र सरकार से कार्रवाई की मांग की है। उनका तर्क है कि यदि किसी सार्वजनिक व्यक्ति की टिप्पणी कानून का उल्लंघन करती है, तो उसके खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए।इन आलोचकों की ओर से यह आशंका भी जताई गई है कि राजनीतिक रूप से संवेदनशील मुद्दों पर तीखी भाषा समाज में तनाव बढ़ा सकती है।

हालांकि, किसी बयान को केवल अप्रिय, आक्रामक या सरकार विरोधी होने के आधार पर अपराध नहीं माना जा सकता। उसके कानूनी मूल्यांकन के लिए वास्तविक शब्दों, पूरे संदर्भ और लागू कानून को देखना जरूरी है। फिलहाल, उपलब्ध सामग्री के आधार पर यह स्पष्ट रूप से नहीं कहा जा सकता कि अभिनेता के वीडियो को लेकर कोई औपचारिक शिकायत दर्ज हुई है या किसी सरकार अथवा जांच एजेंसी ने कार्रवाई शुरू की है।

राहुल गांधी और विपक्ष पर भी उठाए सवाल

इस विवाद ने विपक्ष की राजनीति को लेकर भी सवाल खड़े किए हैं। आलोचकों के एक वर्ग ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी और अन्य विपक्षी दलों पर आरोप लगाया है कि वे सरकार के खिलाफ आंदोलनों को राजनीतिक समर्थन देकर सत्ता पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं।कुछ आलोचकों ने फ्रांस, नेपाल और बांग्लादेश में हुए राजनीतिक घटनाक्रमों का हवाला देते हुए भारत में भी राजनीतिक अस्थिरता पैदा होने की आशंका जताई है।

उनका आरोप है कि सत्ता विरोधी अभियान में ऐसे बयानों का इस्तेमाल किया जा रहा है, जो राजनीतिक टकराव को और तीखा बना सकते हैं। हालांकि, इन आरोपों को प्रमाणित तथ्य के रूप में प्रस्तुत करने के लिए ठोस साक्ष्य आवश्यक है।

किसी विपक्षी नेता, अभिनेता या छात्र संगठन पर देश में अराजकता फैलाने की साजिश का आरोप लगाना और उसे साबित करना दो अलग-अलग बातें हैं। केवल सरकार की आलोचना या विपक्ष के समर्थन से किसी व्यक्ति की मंशा को आपराधिक नहीं ठहराया जा सकता।

लोकतंत्र में विपक्ष का काम सरकार से सवाल पूछना है, जबकि सरकार की नीतियों का समर्थन करना भी नागरिकों का अधिकार है। इन दोनों भूमिकाओं के बीच टकराव को राजनीतिक बहस और संवैधानिक प्रक्रियाओं के दायरे में ही रखा जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पर टिप्पणियों का भी जिक्र

आलोचकों ने कांग्रेस और शिवसेना के उद्धव ठाकरे गुट से जुड़े कुछ नेताओं की न्यायपालिका पर की गई टिप्पणियों का उल्लेख करते हुए भी आपत्ति जताई है। उनके मुताबिक, संवैधानिक संस्थाओं के प्रति सम्मान और असहमति व्यक्त करने के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है।हालांकि, किसी नेता ने वास्तव में क्या कहा, उसका संदर्भ क्या था और क्या वह टिप्पणी किसी कानून का उल्लंघन करती है, इसका आकलन संबंधित बयान और विश्वसनीय रिकॉर्ड के आधार पर ही किया जाना चाहिए।

न्यायपालिका की आलोचना, न्यायिक फैसलों से असहमति और किसी न्यायाधीश को धमकी देना एक जैसी स्थितियां नहीं हैं। यदि किसी व्यक्ति ने वास्तव में धमकी दी है, तो उसकी जांच और कानूनी कार्रवाई का रास्ता खुला है। लेकिन राजनीतिक आरोपों को प्रमाण के बिना न्यायिक निष्कर्ष की तरह पेश करना उचित नहीं होगा।

भारत की तुलना फ्रांस, नेपाल और बांग्लादेश से करना कितना उचित?

भारत में राजनीतिक विरोध और छात्र आंदोलनों के संदर्भ में फ्रांस, नेपाल तथा बांग्लादेश का उदाहरण देना भी बहस का हिस्सा बन गया है। आलोचकों का मानना है कि दूसरे देशों में हुए राजनीतिक संघर्षों का हवाला देकर भारत में भी अस्थिरता की आशंका पैदा करना गैर-जिम्मेदाराना हो सकता है।

दूसरी ओर, किसी देश में लोकतांत्रिक संस्थाओं, छात्र आंदोलनों या राजनीतिक विरोध पर चर्चा करना अपने आप में गलत नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि तुलना तथ्यों के आधार पर हो और उससे हिंसा या अराजकता को बढ़ावा देने के बजाय समस्याओं के समाधान पर चर्चा आगे बढ़े।भारत का संविधान नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है। साथ ही, कानून के दायरे में उचित प्रतिबंधों की व्यवस्था भी करता है। इसलिए किसी बयान का मूल्यांकन राजनीतिक पसंद या नापसंद से नहीं, बल्कि उसके वास्तविक स्वरूप और कानूनी स्थिति के आधार पर किया जाना चाहिए।

कार्रवाई की मांग के बीच बड़ा सवाल: विरोध की सीमा क्या हो?

नसीरुद्दीन शाह का वीडियो एक बार फिर उस बुनियादी सवाल को सामने लाता है कि लोकतंत्र में सरकार की आलोचना, राजनीतिक विरोध और सार्वजनिक भाषा की सीमाएं क्या होनी चाहिए।एक ओर, सरकार और संवैधानिक संस्थाओं से सवाल पूछना नागरिकों का अधिकार है। विश्वविद्यालयों में छात्रों की मांगों, प्रशासनिक फैसलों और लोकतांत्रिक अधिकारों पर चर्चा को दबाने के बजाय तथ्यों के आधार पर उसका जवाब दिया जाना चाहिए।

दूसरी ओर, सार्वजनिक जीवन में सक्रिय व्यक्तियों से यह अपेक्षा भी की जाती है कि वे अपने शब्दों और उनके संभावित प्रभाव के प्रति जिम्मेदार रहें। यही कसौटी सरकार समर्थकों, विपक्षी नेताओं, अभिनेताओं, पत्रकारों और छात्र संगठनों पर समान रूप से लागू होनी चाहिए।

यदि नसीरुद्दीन शाह के किसी बयान को लेकर कोई वैधानिक शिकायत सामने आती है, तो संबंधित अधिकारियों को निष्पक्ष जांच करनी चाहिए। किसी भी कार्रवाई का आधार कानून और प्रमाण होने चाहिए, न कि केवल राजनीतिक दबाव या वैचारिक असहमति।फिलहाल, इस प्रकरण में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि क्या जामिया के छात्रों की मांगों पर तथ्यपरक संवाद आगे बढ़ेगा, या यह मुद्दा एक बार फिर सरकार बनाम विपक्ष की राजनीतिक लड़ाई में उलझकर रह जाएगा।

नसीरुद्दीन शाह के वीडियो ने बहस को तीखा जरूर किया है, लेकिन लोकतंत्र की मजबूती का फैसला केवल इस बात से नहीं होगा कि कौन कितनी आक्रामक भाषा बोलता है। असली कसौटी यह होगी कि असहमति का जवाब तथ्यों, तर्कों और संवैधानिक मर्यादाओं के भीतर दिया जाता है या नहीं।

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