“अगर शांति चाहिए, तो युद्ध की तैयारी रखिए”: पाकिस्तान तात्कालिक चुनौती, लेकिन दीर्घकाल में चीन होगा भारत का सबसे बड़ा प्रतिस्पर्धी, चीन पर जनरल नरवणे का बड़ा रणनीतिक संदेश

बी के झा

NSK news Ind

नई दिल्ली , 21 अगस्त

भारत के पूर्व सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे ने राष्ट्रीय सुरक्षा और भू-राजनीति पर एक महत्वपूर्ण संदेश देते हुए कहा कि “यदि आप शांति चाहते हैं, तो युद्ध की तैयारी करें।” उन्होंने स्पष्ट किया कि पाकिस्तान से तत्काल खतरा आतंकवाद के कारण बना हुआ है, लेकिन आने वाले दशकों में चीन भारत का सबसे बड़ा राजनीतिक, आर्थिक, व्यापारिक और सैन्य प्रतिस्पर्धी होगा।

अपनी पुस्तक “The Curious and the Classified: Unearthing Military Myths and Mysteries” के विमोचन समारोह में बोलते हुए उन्होंने जानबूझकर चीन के लिए “शत्रु” नहीं बल्कि “प्रतिस्पर्धी” शब्द का प्रयोग किया और कहा कि मतभेदों का समाधान कूटनीति से होना चाहिए, जबकि मजबूत सैन्य प्रतिरोधक क्षमता समानांतर बनी रहनी चाहिए।

नरवणे का रणनीतिक संदेश

जनरल नरवणे ने कहा कि भारत ने पाकिस्तान और चीन दोनों के साथ युद्ध लड़े हैं तथा दोनों के साथ सीमा विवाद अभी भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं। उनके अनुसार दोनों देशों की चुनौती अलग-अलग प्रकृति की है—

पाकिस्तान: आतंकवाद और सीमा पार अस्थिरता।

चीन: दीर्घकालिक वैश्विक प्रतिस्पर्धा, तकनीक, अर्थव्यवस्था और सैन्य प्रभाव।

उन्होंने कहा कि भारत को शक्ति प्रदर्शन के बजाय विश्वसनीय प्रतिरोधक क्षमता विकसित करनी चाहिए, ताकि किसी भी संभावित दुस्साहस को रोका जा सके।

पड़ोसी देशों पर भी दिया संदेश

पूर्व सेना प्रमुख ने नेपाल, भूटान, बांग्लादेश और म्यांमार का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत की सुरक्षा केवल सीमाओं तक सीमित नहीं है। यदि पड़ोसी देशों में अस्थिरता बढ़ती है तो उसका असर शरणार्थी संकट, तस्करी, मादक पदार्थों और अवैध हथियारों के रूप में भारत तक पहुंचता है।उनका प्रसिद्ध कथन था—

“आप अपने पड़ोसी नहीं चुन सकते, लेकिन उनके साथ सर्वोत्तम संबंध जरूर बना सकते हैं।”

रक्षा विशेषज्ञों की राय

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि जनरल नरवणे की टिप्पणी भारत की द्वि-मोर्चा सुरक्षा चुनौती की वास्तविक तस्वीर प्रस्तुत करती है। उनके अनुसार भविष्य के संघर्ष केवल सीमा पर नहीं, बल्कि साइबर, अंतरिक्ष, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और आर्थिक आपूर्ति श्रृंखलाओं में भी होंगे।

राजनीतिक विश्लेषण

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार यह बयान किसी युद्ध की चेतावनी नहीं, बल्कि प्रतिरोध आधारित शांति (Deterrence) की रणनीति है। चीन के साथ व्यापार और संवाद जारी रखते हुए सैन्य तैयारी मजबूत रखना भारत की संतुलित विदेश नीति का हिस्सा माना जा रहा है।

कानूनविदों का दृष्टिकोण

अंतरराष्ट्रीय कानून के जानकारों का कहना है कि संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुसार बल प्रयोग अंतिम विकल्प होना चाहिए। सीमा विवादों का समाधान बातचीत, द्विपक्षीय समझौतों और कूटनीतिक तंत्र के माध्यम से किया जाना अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के अनुरूप है।

सरकार और विपक्ष की संभावित प्रतिक्रिया

सरकारी पक्ष का मत है कि भारत आत्मनिर्भर रक्षा, सीमा अवसंरचना और आधुनिक सैन्य क्षमता पर लगातार निवेश कर रहा है तथा शांति के साथ सुरक्षा दोनों समान प्राथमिकताएं हैं।

विपक्षी दलों का कहना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा पर राजनीतिक मतभेद नहीं होने चाहिए, लेकिन चीन से जुड़े सीमा विवाद, रक्षा आधुनिकीकरण और पड़ोसी देशों की नीति पर संसद में नियमित चर्चा आवश्यक है।

निष्कर्ष

जनरल नरवणे का संदेश स्पष्ट है— भारत की सबसे बड़ी शक्ति युद्ध लड़ना नहीं, बल्कि ऐसा प्रतिरोध खड़ा करना है जिससे युद्ध की नौबत ही न आए।

पाकिस्तान की तात्कालिक चुनौती और चीन की दीर्घकालिक प्रतिस्पर्धा के बीच भारत को कूटनीति, आर्थिक शक्ति और सैन्य तैयारी— तीनों मोर्चों पर समान रूप से मजबूत रहना होगा।

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