बी के झा
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देवबंद (सहारनपुर), 21 अगस्त
एशिया की प्रसिद्ध इस्लामी शिक्षण संस्था दारुल उलूम देवबंद ने अपने परिसर में स्थित 86 वर्ष पुराने बाब-ए-जाहिर द्वार को गिराने का निर्णय लिया है। यह ऐतिहासिक प्रवेश द्वार वर्ष 1940 (1359 हिजरी) में अफगानिस्तान के तत्कालीन बादशाह मोहम्मद जहीर शाह ने अपने निजी खर्च पर बनवाया था। संस्था का कहना है कि भवन अब जर्जर हो चुका है और सुरक्षा कारणों से इसे हटाना आवश्यक है।
इतिहास से जुड़ा था यह द्वार
बाब-ए-जाहिर केवल एक प्रवेश द्वार नहीं, बल्कि भारत-अफगानिस्तान के ऐतिहासिक संबंधों का प्रतीक माना जाता है। वर्ष 1958 में भारत यात्रा के दौरान जहीर शाह स्वयं दारुल उलूम आए थे, जहां तत्कालीन मोहतमिम कारी मुहम्मद तैय्यब ने उनका स्वागत किया था। गेट के दोनों ओर हिफ्ज़-ए-कुरआन की कक्षाएं भी स्थापित की गई थीं।
2006 में टला था फैसला
संस्था ने पहली बार 2006 में इस गेट को हटाने का प्रस्ताव रखा था, लेकिन उस समय जीवित जहीर शाह ने इसका विरोध जताया था। अब उनके निधन के लगभग दो दशक बाद दारुल उलूम ने अंतिम निर्णय लेते हुए नोटिस जारी कर दिया है। नायब मोहतमिम मौलाना खालिक मद्रासी ने पुष्टि की कि अगले दो दिनों में इसे हटाया जाएगा।
राजनीतिक विश्लेषण
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मुद्दा धार्मिक कम और विरासत बनाम सुरक्षा का अधिक है। हालांकि देवबंद की पहचान और ऐतिहासिक महत्व के कारण इस फैसले पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी स्वाभाविक हैं।
कानूनविदों की राय
कानून विशेषज्ञों के अनुसार यदि भवन निजी संस्था की संपत्ति है और उसे संरक्षित स्मारक का दर्जा प्राप्त नहीं है, तो संस्था को सुरक्षा कारणों से पुनर्निर्माण या ध्वस्तीकरण का अधिकार है। फिर भी ऐसी ऐतिहासिक संरचनाओं का दस्तावेजीकरण और अभिलेखीकरण किया जाना चाहिए।
शिक्षाविद और समाजसेवी क्या कहते हैं?
शिक्षाविदों का मत है कि बाब-ए-जाहिर दक्षिण एशिया और अफगान इतिहास की साझा विरासत का हिस्सा था। समाजसेवी संस्थाओं ने सुझाव दिया कि गेट हटाने से पहले उसकी वास्तुकला, शिलालेख और इतिहास को संग्रहालय या डिजिटल अभिलेख में संरक्षित किया जाए।
मुस्लिम संगठनों की प्रतिक्रिया
स्थानीय मुस्लिम संगठनों ने संस्था के निर्णय को आंतरिक प्रशासनिक विषय बताते हुए कहा कि यदि इमारत वास्तव में जर्जर है तो सुरक्षा सर्वोपरि है। साथ ही उन्होंने ऐतिहासिक पहचान को संरक्षित रखने की अपील भी की।
सरकार और विपक्ष का रुख
सरकारी सूत्रों का कहना है कि यह दारुल उलूम का संस्थागत निर्णय है और स्थानीय प्रशासन केवल सुरक्षा एवं कानून-व्यवस्था सुनिश्चित करेगा।विपक्षी दलों के कुछ नेताओं ने कहा कि देश की ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण के लिए स्पष्ट नीति होनी चाहिए, चाहे वे किसी भी धर्म या समुदाय से जुड़ी हों।
निष्कर्ष
बाब-ए-जाहिर का ध्वस्तीकरण एक युग का अंत है। यह फैसला सुरक्षा की आवश्यकता और ऐतिहासिक विरासत के संरक्षण के बीच संतुलन की बहस को फिर सामने ले आया है।
अब सबकी नजर इस पर रहेगी कि क्या इस ऐतिहासिक द्वार की स्मृति को किसी नए स्वरूप में संरक्षित किया जाएगा या वह केवल इतिहास के पन्नों तक सिमट कर रह जाएगा।
