बी के झा
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नई दिल्ली / वॉशिंगटन/सियोल /प्योंगयांग, 21 अगस्त
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक ओर ईरान को किसी भी कीमत पर परमाणु हथियार हासिल नहीं करने देने की बात करते हैं, लेकिन दूसरी ओर उनकी एशिया नीति एक ऐसे सहयोगी को असुरक्षित महसूस करा रही है जो दशकों से अमेरिकी परमाणु सुरक्षा कवच पर निर्भर रहा है। सवाल यह है कि क्या ट्रंप की नई रणनीति दक्षिण कोरिया को अपना परमाणु हथियार कार्यक्रम फिर शुरू करने के लिए मजबूर कर सकती है?
यूरेशियन टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार ट्रंप ने पेंटागन को दक्षिण कोरिया के साथ संयुक्त सैन्य अभ्यास सीमित करने का निर्देश दिया है। साथ ही उन्होंने सियोल से मांग की है कि वह अमेरिकी सैनिकों की तैनाती के बदले हर साल 10 अरब डॉलर का भुगतान करे। यही वह बिंदु है जिसने सियोल में सुरक्षा को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
ट्रंप की नीति क्यों बनी चिंता का कारण?
दक्षिण कोरिया की सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह अमेरिका के साथ सैन्य गठबंधन पर टिकी रही है। लगभग 28 हजार अमेरिकी सैनिक वहां तैनात हैं और अमेरिका “न्यूक्लियर अंब्रेला” के तहत सियोल की रक्षा का वादा करता है।लेकिन यदि अमेरिका सैन्य मौजूदगी घटाता है, अभ्यास कम करता है और सुरक्षा को आर्थिक सौदे में बदल देता है, तो दक्षिण कोरिया के सामने सबसे बड़ा सवाल यही होगा—क्या वह अकेले उत्तर कोरिया और चीन जैसी ताकतों का सामना कर पाएगा?
उत्तर कोरिया के पास बम, दक्षिण के पास भरोसा
स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) के अनुसार उत्तर कोरिया के पास लगभग 60 परमाणु हथियार माने जाते हैं। उसने रूस के साथ रक्षा सहयोग भी मजबूत किया है।इसके विपरीत दक्षिण कोरिया के पास एक भी परमाणु हथियार नहीं है। वह परमाणु अप्रसार संधि (NPT) का हस्ताक्षरकर्ता है और अमेरिकी सुरक्षा आश्वासन पर निर्भर है। यही असमानता सियोल में परमाणु विकल्प की चर्चा को फिर जीवित कर रही है।
1970 का वह गुप्त परमाणु अभियान
कम लोग जानते हैं कि दक्षिण कोरिया ने 1970 के दशक में गुप्त रूप से परमाणु हथियार विकसित करने की कोशिश की थी।राष्ट्रपति पार्क चुंग-ही ने “युलगोक योजना” के तहत रक्षा आत्मनिर्भरता अभियान शुरू किया। एजेंसी फॉर डिफेंस डेवलपमेंट और विशेष हथियार समितियों का गठन हुआ।
फ्रांस से प्लूटोनियम रीप्रोसेसिंग तकनीक और कनाडा से हैवी-वॉटर रिएक्टर खरीदने की तैयारी भी की गई।लेकिन जैसे ही अमेरिका को इस गुप्त कार्यक्रम की भनक लगी, वॉशिंगटन ने कड़ा दबाव बनाया। फ्रांस और कनाडा पर भी अनुबंध रद्द कराने का दबाव डाला गया और अंततः सियोल को कार्यक्रम रोकना पड़ा।
अमेरिका पर भरोसा पहली बार कब टूटा?
1970 में अमेरिका ने दक्षिण कोरिया को संकेत दिया कि वह अपनी सेना कम करेगा। उसी दौर में उसने ताइवान से भी सैन्य मौजूदगी घटा दी। इससे सियोल को लगा कि संकट की घड़ी में अमेरिका अपने सहयोगियों को अकेला छोड़ सकता है।यही अविश्वास दक्षिण कोरिया के गुप्त परमाणु कार्यक्रम की सबसे बड़ी प्रेरणा बना था। आज विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप की नई नीति वैसी ही मनोवैज्ञानिक स्थिति दोबारा पैदा कर सकती है।
1958 से 1991 तक दक्षिण कोरिया में थे अमेरिकी परमाणु हथियार
शीत युद्ध के दौरान अमेरिका ने दक्षिण कोरिया में 900 से अधिक सामरिक परमाणु हथियार तैनात किए थे। उनका उद्देश्य उत्तर कोरिया और उसके पीछे खड़े सोवियत संघ तथा चीन को रोकना था।1991 में शीत युद्ध समाप्त होने के बाद अमेरिका ने अपने सभी परमाणु हथियार वापस बुला लिए, लेकिन सुरक्षा गारंटी जारी रखी। अब यदि वही गारंटी कमजोर पड़ती है तो पूरा सामरिक संतुलन बदल सकता है।
क्या सचमुच दक्षिण कोरिया परमाणु बम बना सकता है?
तकनीकी दृष्टि से दक्षिण कोरिया दुनिया के सबसे उन्नत परमाणु ऊर्जा कार्यक्रमों में शामिल है। उसके पास वैज्ञानिक क्षमता, औद्योगिक आधार और मिसाइल तकनीक मौजूद है। यदि राजनीतिक निर्णय लिया जाए तो कई विशेषज्ञ मानते हैं कि वह अपेक्षाकृत कम समय में परमाणु हथियार विकसित करने की क्षमता रखता है।हालांकि ऐसा कदम उठाने का अर्थ होगा NPT से टकराव, अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों का खतरा और पूर्वी एशिया में नई परमाणु हथियारों की दौड़।
बड़ा सवाल: ट्रंप का दबाव या एशिया में नई परमाणु दौड़?
ट्रंप की 10 अरब डॉलर की मांग केवल आर्थिक विवाद नहीं है; यह अमेरिका–दक्षिण कोरिया गठबंधन की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़ा करती है। यदि सियोल को लगे कि अमेरिकी सुरक्षा गारंटी अब पहले जैसी नहीं रही, तो 1970 के दशक की तरह आत्मनिर्भर परमाणु विकल्प फिर राष्ट्रीय बहस का केंद्र बन सकता है।
पूर्वी एशिया में आज उत्तर कोरिया के परमाणु हथियार, चीन का बढ़ता सैन्य विस्तार और रूस–उत्तर कोरिया की नजदीकी पहले ही तनाव बढ़ा चुके हैं।
ऐसे में ट्रंप की नीतियां केवल एक सहयोगी से पैसे मांगने का मामला नहीं, बल्कि पूरे एशिया की परमाणु सुरक्षा व्यवस्था को प्रभावित करने वाला भू-राजनीतिक दांव बन सकती हैं।
