बी के झा
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काठमांडू / नई दिल्ली, 27 अगस्त
बुधवार की सुबह नेपाल के लिए एक सामान्य दिन की तरह शुरू हुई थी, लेकिन अगले कुछ घंटों में पहाड़ों ने अपना ऐसा रौद्र रूप दिखाया कि भोटेकोशी से लेकर त्रिशूली और नारायणी तक जिंदगी पानी के सैलाब में बहती चली गई। यह महज बाढ़ नहीं थी—यह पहाड़ों से मैदानों की ओर तेजी से उतरती एक ऐसी जलप्रलय थी, जिसने लोगों को संभलने का भी पूरा मौका नहीं दिया।
नेपाल के जल विज्ञान अनुसंधान केंद्र के बाढ़ पूर्वानुमान महाशाखा की तकनीकी रिपोर्ट ने इस भयावह आपदा की पल-पल की तस्वीर सामने रखी है। रिपोर्ट के मुताबिक, तिब्बत की ओर नदी का प्रवाह रुकने से बनी झील के टूटने के बाद भोटेकोशी में अचानक भारी मात्रा में पानी आया। देखते ही देखते यह सैलाब त्रिशूली और फिर नारायणी के तटीय इलाकों की ओर बढ़ गया।
8:37 बजे—भूकंप का झटका, फिर शुरू हुआ जलप्रलय
सुबह 8:37 बजे भूकंप मापन केंद्र ने 4.4 तीव्रता का भूकंप दर्ज किया। इसके महज कुछ समय बाद तिब्बत की ओर से भोटेकोशी नदी में अचानक बाढ़ आने की सूचना मिली।
8:50 बजे रसुवा के स्याफ्रुबेँसी जलमापन केंद्र से आंकड़े मिलना बंद हो गए। उस समय अंतिम जलस्तर 1.62 मीटर दर्ज किया गया था। यह इस बात का पहला संकेत था कि नदी सामान्य स्थिति से बहुत आगे निकल चुकी है।
9:00 बजे रसुवा जिला प्रशासन और बेत्रावती जलमापन केंद्र के कर्मचारियों ने तिब्बत की ओर से भोटेकोशी में बड़े जलप्रवाह की सूचना दी।इसके बाद प्रशासन ने समय गंवाए बिना चेतावनी अभियान शुरू कर दिया।
9:15 बजे—लाखों मोबाइल फोन पर गूंजी खतरे की घंटी
सुबह 9:15 से 9:16 बजे के बीच बाढ़ पूर्वानुमान महाशाखा ने मुग्लिन तक त्रिशूली नदी के तटीय इलाकों और जोखिम वाली बस्तियों के लिए उच्च-सतर्कता संदेश जारी किए।
नेपाल टेलिकम और एनसेल के जरिए 6 लाख 79 हजार 295 चेतावनी एसएमएस भेजे गए। इनमें नेपाल टेलिकम के 4,35,635 और एनसेल के 2,43,660 संदेश शामिल थे।यही पूर्व चेतावनी बड़ी संख्या में लोगों के लिए जिंदगी और मौत के बीच दीवार साबित हुई।
हजारों लोग समय रहते सुरक्षित स्थानों की ओर निकल गए।लेकिन सैलाब की रफ्तार चेतावनियों से कहीं ज्यादा तेज थी।
10:28 बजे—सड़कें और बस्तियां खतरे की जद में10:28 बजे बाढ़ धादिङ-गल्छी क्षेत्र के आसपास पहुंच गई। पृथ्वी राजमार्ग, मुग्लिन-नारायणगढ़ सड़क और त्रिशूली नदी के किनारे बसे इलाकों के लिए दोबारा चेतावनी जारी करनी पड़ी।
11:26 बजे मलेखु के फुर्केखोला जलमापन केंद्र पर पानी चेतावनी सीमा के ऊपर पहुंच गया।
11:43 बजे जलस्तर खतरे की सीमा पार कर गया। इसके कुछ ही समय बाद पुल सहित जलमापन केंद्र बाढ़ के वेग में बह गया। निगरानी का एक महत्वपूर्ण केंद्र ही तबाही का शिकार हो चुका था।
11:50 बजे बाढ़ मलेखु बाजार के आसपास पहुंच गई।दोपहर—सैलाब बाजारों को पार करता हुआ आगे बढ़ा दोपहर 1 बजे बाढ़ मुग्लिन बाजार को पार कर चुकी थी।
1:35 बजे प्रशासन ने फिर चेताया कि चीन की ओर नदी के रुकने से बनी झील पूरी तरह नहीं खुली है और खतरा अभी समाप्त नहीं हुआ है। यानी जो दिखाई दे रहा था, उसके पीछे एक और बड़े खतरे की आशंका बनी हुई थी।
2:14 बजे कालीखोला जलमापन केंद्र पर जलस्तर खतरे की 12.1 मीटर सीमा को पार करते हुए 12.3 मीटर के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया।
3:20 बजे—नारायणी तक पहुंच गया मौत का पानी दोपहर 3:20 बजे बाढ़ नारायणी-देवघाट क्षेत्र तक पहुंच गई।
भोटेकोशी से शुरू हुआ जलप्रलय अब नदी तंत्र के जरिए बहुत दूर तक अपना असर दिखा चुका था। शाम 4 बजे देवघाट जलमापन केंद्र पर जलस्तर 6.57 मीटर के उच्चतम स्तर तक पहुंचा। इसके बाद पानी घटने लगा।लेकिन तब तक सैलाब अपनी तबाही की इबारत लिख चुका था।
शाम 6:30 बजे देवघाट में नदी का बहाव करीब 4 मीटर के सामान्य स्तर के आसपास लौट आया। पानी उतरने लगा, मगर पीछे रह गया मलबा, टूटी सड़कें, बह चुके पुल और अपनों की तलाश में भटकते लोग।
चार जलमापन केंद्र बने तबाही के गवाहबाढ़ की ताकत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जलविज्ञान एवं जलस्रोत अनुसंधान केंद्र के अंतर्गत संचालित चार स्वचालित जलमापन केंद्र पूरी तरह बह गए।
इनमें रसुवा भोटेकोशी,
रसुवा स्याफ्रुबेँसी,
नुवाकोट बेत्रावती
और धादिङ मलेखु-फुर्के केंद्र शामिल हैं।
कुछ केंद्र पुलों के साथ ही बाढ़ में समा गए।इन निगरानी केंद्रों के नष्ट होने के बाद कई स्थानों से प्रत्यक्ष जलस्तर का आंकड़ा मिलना बंद हो गया। यानी जिस सैलाब को मापने की कोशिश की जा रही थी, वही सैलाब मापने वाले उपकरणों को अपने साथ बहा ले गया।
दो करोड़ घनमीटर अतिरिक्त पानी—तबाही की भयावह तस्वीर
तकनीकी आकलन के मुताबिक, बाढ़ की पूरी अवधि में देवघाट से ही करीब 2 करोड़ घनमीटर अतिरिक्त पानी बहा। पानी की यह विशाल मात्रा बताती है कि नेपाल की पहाड़ियों से मैदानों की ओर उतरे इस सैलाब की ताकत कितनी विकराल रही होगी।
महाशाखा ने रसुवागढ़ी सीमा से लेकर नेपाल-भारत सीमा तक के इलाकों को अति उच्च, उच्च और मध्यम जोखिम वाले क्षेत्रों में वर्गीकृत किया है।
चेतावनी ने बचाई जान, लेकिन तबाही नहीं रोक सकी
इस आपदा की सबसे महत्वपूर्ण सीख यह है कि प्राकृतिक आपदा को रोकना हमेशा संभव नहीं होता, लेकिन समय पर चेतावनी देकर उसके नुकसान को कम किया जा सकता है। करीब 6.79 लाख चेतावनी संदेशों ने हजारों लोगों को सुरक्षित स्थान तक पहुंचने का मौका दिया।
फिर भी इस जलप्रलय ने एक कठोर सवाल छोड़ दिया है—
जब पहाड़ों में कुछ घंटों के भीतर नदी का स्वभाव बदल जाए और निगरानी केंद्र तक बह जाएं, तो मैदानी इलाकों को कितनी तेजी से तैयार किया जा सकता है?
नेपाल की इस त्रासदी में पानी उतर गया है, लेकिन खतरे का सबक अभी बाकी है। भोटेकोशी से नारायणी तक बहा यह सैलाब सिर्फ एक प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि हिमालयी नदी तंत्र की उस भयावह ताकत की चेतावनी है, जो कुछ घंटों में पहाड़ों से मैदानों तक जिंदगी का पूरा भूगोल बदल सकती है।
