यूपी के 16 हजार वित्तविहीन मदरसे ATS के रडार पर: बैंक खातों से विदेशी फंडिंग तक, जांच ने छेड़ा बड़ा सवाल—धर्म की आड़ में कारोबार या शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता?

बी के झा

NSK news Ind

लखनऊ/अमरोहा, 26 अगस्त

उत्तर प्रदेश में मदरसों की फंडिंग एक बार फिर सियासत, सुरक्षा और शिक्षा के त्रिकोण के बीच आ खड़ी हुई है। प्रदेश में संचालित हजारों वित्तविहीन मदरसों के बैंक खातों, आय-व्यय, विदेशी चंदे और वहां पढ़ने वाले छात्रों के रिकॉर्ड की पड़ताल ने एक साथ कई सवाल खड़े कर दिए हैं। सवाल सिर्फ यह नहीं है कि मदरसों को पैसा कहां से मिल रहा है, बल्कि बड़ा प्रश्न यह भी है कि उस पैसे का इस्तेमाल किस काम में हो रहा है, दान देने वालों की पहचान क्या है और जिन संस्थानों में बड़ी संख्या में बच्चे पढ़ रहे हैं, उनकी वित्तीय तथा शैक्षणिक जवाबदेही कितनी है?

उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार उत्तर प्रदेश में 24,962 मदरसों का आंकड़ा सामने आया है। इनमें 16,513 मान्यता प्राप्त और 8,449 गैर-मान्यता प्राप्त बताए गए हैं। 558 मदरसे सरकारी अनुदान प्राप्त करते हैं, जबकि लगभग 16 हजार मदरसे वित्तविहीन हैं। इन संस्थानों का संचालन निजी प्रबंधन या संस्थाओं के माध्यम से होता है।अब ATS की पड़ताल का केंद्र यही वित्तविहीन व्यवस्था बनती दिखाई दे रही है।

बैंक खाते बताएंगे मदरसे की आर्थिक कहानी

जांच में यह देखा जा रहा है कि मदरसों के बैंक खातों में पैसा कहां से आया, किस तारीख को आया, किस व्यक्ति या संस्था ने भेजा और रकम का इस्तेमाल कहां किया गया। विदेशी फंडिंग के मामले में जांच एजेंसियों की नजर विशेष रूप से इस बात पर होगी कि धन भारत के बाहर से आया तो किस चैनल से आया और क्या उसके लिए आवश्यक कानूनी औपचारिकताएं पूरी की गई थीं।इसके साथ भवन निर्माण, संस्थान के संचालन, शिक्षकों के भुगतान, भोजन, छात्रावास और अन्य खर्चों का हिसाब भी महत्वपूर्ण हो सकता है।

फरवरी 2026 में भी राज्य सरकार की ओर से मदरसों के भवन निर्माण में खर्च हुए धन और उसके स्रोत की जांच की बात सामने आई थी।

अर्थात जांच का असली सवाल है—मदरसा चल रहा है तो उसका आर्थिक मॉडल क्या है?

छात्रों का रिकॉर्ड भी जांच के घेरे में

ATS की पड़ताल केवल बैंक खातों तक सीमित नहीं है। यह भी देखा जा रहा है कि मदरसों में कितने छात्र पढ़ते हैं, वे किन जिलों या राज्यों से आते हैं और उनके रिकॉर्ड कितने व्यवस्थित हैं।यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। किसी मदरसे में दूसरे राज्य या देश का छात्र पढ़ता है, यह अपने आप में अपराध का प्रमाण नहीं है। लेकिन यदि किसी विदेशी नागरिक के प्रवेश, रहने, शिक्षा या आर्थिक सहायता से संबंधित कानूनी नियमों का उल्लंघन होता है, तो वह अलग जांच का विषय बन सकता है।यही वजह है कि छात्रों का रिकॉर्ड जांच में एक प्रशासनिक और सुरक्षा संबंधी दस्तावेज के रूप में देखा जा रहा है।

हाईकोर्ट ने भी जांच को तत्काल रोकने से किया था इनकार

मदरसों की ATS जांच को लेकर विवाद नया नहीं है। मदरसा प्रबंधन से जुड़े संगठनों ने इस जांच को चुनौती दी थी। उनका तर्क था कि संस्थान कानूनी रूप से चल रहे हैं और बिना ठोस आधार के ATS जांच कराना मनमाना है।अप्रैल 2026 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सरकार और ATS से जांच के आधार पर जवाब मांगा था। बाद में जुलाई में अदालत ने 4,000 से अधिक गैर-सहायता प्राप्त मदरसों की फंडिंग की जांच में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जांच अपने आप में कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं है और संबंधित संस्थान जांच समिति के सामने अपना जवाब दे सकते हैं।

कानूनविदों के लिए यही इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु है—जांच और दोषसिद्धि दो अलग-अलग चीजें हैं।जब तक जांच से कोई अपराध साबित नहीं होता, किसी संस्था या उसके संचालक को दोषी ठहराना कानूनी रूप से उचित नहीं होगा।

मुस्लिम संगठनों और मौलानाओं में भी दो तरह की राय

इस कार्रवाई को लेकर मुस्लिम समाज के भीतर भी एक राय नहीं है।एक तरफ कुछ मुस्लिम संगठनों और मदरसा प्रबंधन से जुड़े लोगों ने इस प्रकार की जांच पर आपत्ति जताते हुए इसे समुदाय को निशाना बनाने की कोशिश बताया है। मदरसा प्रबंधन की ओर से अदालत में भी यह दलील दी गई कि पूर्व में हुई जांचों में गंभीर अनियमितता सामने नहीं आई और नई जांच से संस्थानों को परेशान किया जा रहा है।

दूसरी तरफ बरेली के मौलाना शहाबुद्दीन रज़वी ने मदरसा फंडिंग की ATS जांच का स्वागत किया था। उन्होंने पारदर्शिता और गलत तत्वों की पहचान के लिए जांच को जरूरी बताया।यानी मुस्लिम समाज के भीतर भी बहस केवल ‘जांच हो या न हो’ की नहीं, बल्कि जांच का तरीका निष्पक्ष और पारदर्शी हो या नहीं, इस पर है।

हिंदू संगठनों के लिए बड़ा सवाल—पारदर्शिता सबकी हो

हिंदू संगठनों और राष्ट्रवादी सामाजिक संगठनों के बीच इस कार्रवाई को लेकर मुख्य तर्क यह है कि धार्मिक संस्थाओं को विदेशी या संदिग्ध फंडिंग मिलती है तो उसकी जांच होनी चाहिए। लेकिन इस बहस को केवल हिंदू-मुस्लिम चश्मे से देखना भी समस्या का समाधान नहीं है।यदि कोई मदरसा विदेशी धन प्राप्त करता है तो उसके स्रोत की जांच होनी चाहिए।

इसी तरह किसी मंदिर, आश्रम, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारे या किसी अन्य धार्मिक-सामाजिक संस्था को संदिग्ध विदेशी धन प्राप्त होता है तो उसके लिए भी समान कानूनी कसौटी होनी चाहिए।यही समानता जांच को विश्वसनीय बनाएगी।

राजनीति में क्यों गरमाएगा मुद्दा?

उत्तर प्रदेश में 2027 का विधानसभा चुनाव नजदीक है। ऐसे में मदरसा जांच का मुद्दा केवल प्रशासनिक कार्रवाई तक सीमित रहने की संभावना कम है। वहीं सत्तापक्ष के लिए यह कार्रवाई पारदर्शिता, राष्ट्रीय सुरक्षा और अवैध फंडिंग के खिलाफ अभियान के रूप में पेश की जा सकती है।

वहीं विपक्ष यह सवाल उठा सकता है कि क्या जांच सभी धार्मिक और शैक्षणिक संस्थानों पर समान मानदंड से हो रही है या केवल एक समुदाय के संस्थानों को लक्ष्य बनाया जा रहा है।यही वह बिंदु है जहां सुरक्षा बनाम राजनीतिक ध्रुवीकरण की बहस जन्म लेती है।राजनीतिक विश्लेषकों की नजर में सरकार के सामने दोहरी चुनौती है। एक ओर यदि किसी संस्थान में संदिग्ध वित्तीय गतिविधि है तो उस पर कठोर कार्रवाई करना जरूरी है।

दूसरी ओर यदि जांच का राजनीतिक संदेश यह जाता है कि हजारों संस्थानों को केवल उनकी धार्मिक पहचान के कारण संदेह की नजर से देखा जा रहा है, तो सरकार को इसका राजनीतिक नुकसान भी उठाना पड़ सकता है।इसलिए जांच की विश्वसनीयता का सबसे बड़ा आधार नतीजे और सबूत होंगे, बयान नहीं।

विपक्ष के सामने भी दोहरी चुनौती

विपक्ष के लिए भी यह मामला आसान नहीं है। यदि वह बिना जांच पूरी हुए हर कार्रवाई को ‘मुस्लिम विरोधी’ बताता है, तो सरकार को राजनीतिक लाभ मिल सकता है। लेकिन यदि विपक्ष केवल सुरक्षा के नाम पर हर जांच का समर्थन करता है तो उसके सामने अल्पसंख्यक संस्थानों की स्वतंत्रता और अधिकारों का सवाल खड़ा होगा।

सबसे संतुलित राजनीतिक रुख यही हो सकता है कि—संदिग्ध फंडिंग की जांच हो, लेकिन दोष सिद्ध होने से पहले किसी पूरे समुदाय को कटघरे में न खड़ा किया जाए।

ATS के सामने सबसे बड़ी परीक्षा

जांच एजेंसी के सामने चुनौती केवल संदिग्ध लेनदेन खोजने की नहीं है। उसे यह साबित करना होगा कि किसी संदिग्ध लेनदेन का आपराधिक गतिविधि से वास्तविक संबंध है या नहीं।किसी खाते में विदेश से पैसा आना अपने आप में आतंकवाद का प्रमाण नहीं है। किसी संस्था को विदेशी चंदा मिलना भी अपने आप में अपराध नहीं है, बशर्ते वह कानून के मुताबिक हो और निर्धारित उद्देश्य के लिए इस्तेमाल हुआ हो।

लेकिन यदि जांच में फर्जी दस्तावेज, हवाला, अवैध विदेशी फंडिंग, धन के वास्तविक स्रोत को छिपाने या आतंकी गतिविधियों तक धन पहुंचाने के प्रमाण मिलते हैं, तो मामला बेहद गंभीर हो जाएगा।

हाल के महीनों में UP ATS ने कथित आतंकी फंडिंग और विदेशी नेटवर्क से जुड़े अलग-अलग मामलों में कार्रवाई की है।

जुलाई में पश्चिम बंगाल में मदरसा निर्माण से जुड़े कथित विदेशी फंडिंग मामले में TMC नेता के ठिकाने पर भी ATS ने तलाशी ली थी।

अगस्त 2026 में ATS ने बिहार के एक व्यक्ति को कथित जैश-ए-मोहम्मद लिंक और मदरसे के नाम पर चंदा जुटाकर पाकिस्तान स्थित हैंडलरों तक धन पहुंचाने के आरोप में गिरफ्तार किए जाने की भी जानकारी सामने आई।

हालांकि यह मामला अलग है और इससे प्रदेश के सभी मदरसों को जोड़ना उचित नहीं होगा।

अमरोहा के दो मदरसों का पुराना संदर्भ फिर चर्चा में

अमरोहा में वर्तमान जांच ने पुराने सुरक्षा संदर्भों को भी चर्चा में ला दिया है। स्थानीय स्तर पर 2007 में दो मदरसों का नाम आतंकी गतिविधियों के संदर्भ में चर्चा में आया था। रिपोर्ट के मुताबिक लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े अबु हमजा ने जिले के एक मदरसे में शिक्षा ग्रहण की थी और बाद में कश्मीर में सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में मारा गया था।लेकिन किसी व्यक्ति का किसी संस्थान में पढ़ना और उस संस्थान का आतंकी गतिविधि में शामिल होना दो अलग-अलग बातें हैं। इसलिए इस पुराने घटनाक्रम को वर्तमान जांच में केवल संदर्भ के रूप में देखा जाना चाहिए, निष्कर्ष के रूप में नहीं।

शिक्षाविदों की नजर में असली मुद्दा शिक्षा का भविष्य

शिक्षाविदों के लिए यह विवाद एक और बड़ा सवाल खड़ा करता है—मदरसा शिक्षा को आधुनिक शिक्षा व्यवस्था से किस तरह जोड़ा जाए?

यदि किसी मदरसे में हजारों बच्चे पढ़ रहे हैं तो वहां केवल धार्मिक शिक्षा ही नहीं, बल्कि गणित,

विज्ञान,

कंप्यूटर,

भाषा,

नागरिक शास्त्र और रोजगार

पर शिक्षा की गुणवत्ता भी महत्वपूर्ण है।इसलिए फंडिंग की जांच के साथ-साथ यह भी देखा जाना चाहिए कि बच्चों की शिक्षा का स्तर क्या है, प्रमाणपत्रों की मान्यता क्या है और पढ़ाई पूरी करने के बाद उनके सामने रोजगार तथा उच्च शिक्षा के कितने विकल्प हैं।

समाजसेवी संस्थाओं के लिए भी एक सवाल

समाजसेवी संगठनों की भूमिका यहां महत्वपूर्ण हो सकती है। यदि कोई संस्था गरीब बच्चों की शिक्षा, भोजन या छात्रावास के लिए धन देती है तो उसका रिकॉर्ड डिजिटल और सार्वजनिक होना चाहिए।

दानदाता कौन है?

कितना पैसा मिला?

किस उद्देश्य से मिला?

कितना खर्च हुआ?

कितने छात्रों पर खर्च हुआ?

इन सवालों का जवाब केवल मदरसे से नहीं, बल्कि हर धार्मिक और सामाजिक संस्था से मांगा जाना चाहिए।

सवाल सिर्फ 16 हजार मदरसों का नहीं यह पूरा मामला आखिरकार एक बड़े सिद्धांत पर आकर टिकता है—

धार्मिक स्वतंत्रता और वित्तीय पारदर्शिता एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं।मदरसे धार्मिक शिक्षा देने के अधिकार के तहत संचालित हो सकते हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि उनके वित्तीय लेनदेन कानून से बाहर होंगे। इसी तरह किसी मदरसे की जांच का अर्थ यह भी नहीं होना चाहिए कि वहां पढ़ने वाला हर बच्चा, शिक्षक या संचालक संदेह के घेरे में है।सरकार को जांच करनी है तो करे, ATS को दस्तावेज देखने हैं तो देखे, बैंक खातों की पड़ताल करनी है तो करे—लेकिन अंतिम निष्कर्ष सबूत के आधार पर निकले।

अब सबसे बड़ा सवाल—जांच से निकलेगा क्या?

फिलहाल जांच जारी है और उपलब्ध रिपोर्टों में यह स्पष्ट नहीं है कि अमरोहा समेत प्रदेश के इन वित्तविहीन मदरसों के बड़े पैमाने पर किसी आपराधिक नेटवर्क से जुड़े होने का निष्कर्ष सामने आया है। इसलिए अभी किसी संस्था को दोषी बताना जल्दबाजी होगी।लेकिन जांच ने एक जरूरी सवाल जरूर सामने ला दिया है—अगर कोई संस्था शिक्षा के नाम पर चल रही है, तो उसकी आर्थिक पारदर्शिता कितनी है?

और दूसरा उतना ही महत्वपूर्ण सवाल—क्या पारदर्शिता की यह कसौटी केवल मदरसों के लिए होगी या देश की हर धार्मिक और शैक्षणिक संस्था के लिए समान होगी?

यूपी सरकार और ATS की कार्रवाई की असली परीक्षा इसी दोहरे सवाल के जवाब में होगी।यदि जांच में संदिग्ध विदेशी फंडिंग या आपराधिक गतिविधि के प्रमाण मिलते हैं तो कार्रवाई होनी चाहिए और यदि कुछ नहीं मिलता तो सरकार को भी उतनी ही स्पष्टता से यह बताना चाहिए कि संबंधित संस्थानों के खिलाफ कोई आपराधिक तथ्य नहीं मिला।

क्योंकि कानून की ताकत केवल कार्रवाई में नहीं, बल्कि निष्पक्षता में दिखाई देती है।

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