Big Breking news: new Delhi; दिल्ली में मासूमियत भी असुरक्षित! स्कूल की दहलीज से स्लीपर बस तक उठे महिला सुरक्षा पर सवाल, आखिर किस भरोसे पढ़ने जाएं बेटियां?

बी के झा

NSK news Ind

नई दिल्ली, 31 अगस्त

दिल्ली को देश की राजधानी कहा जाता है। यहां संसद है, सुप्रीम कोर्ट है, केंद्र सरकार है, दिल्ली सरकार है और देश की सबसे बड़ी सुरक्षा एवं कानून-व्यवस्था मशीनरी में से एक मौजूद है। लेकिन जब एक तीन साल की बच्ची स्कूल की चारदीवारी के भीतर कथित यौन शोषण का शिकार होती है

और कुछ ही दिनों में एक 16 वर्षीय छात्रा स्लीपर बस के भीतर कथित सामूहिक दुष्कर्म का आरोप लगाती है, तो सवाल सिर्फ दो आपराधिक घटनाओं का नहीं रह जाता। सवाल यह है कि राजधानी में बच्चे और बेटियां आखिर सुरक्षित कहां हैं?

बवाना के एक निजी स्कूल में नर्सरी की तीन साल की बच्ची से कथित यौन शोषण के मामले ने अभिभावकों की चिंता को झकझोर दिया है। पुलिस ने स्कूल से जुड़े ड्राइवर विकास को गिरफ्तार किया है। शुरुआती जांच में आरोप है कि बच्ची को चॉकलेट का लालच देकर उसके साथ कई बार गलत हरकत की गई।

मामला तब सामने आया जब परिजनों ने बच्ची के शरीर पर चोट के निशान देखे। पूछताछ में बच्ची ने एक ‘बैड अंकल’ का जिक्र किया। बाद में फोटो और CCTV फुटेज के जरिए आरोपी की पहचान कराए जाने की बात सामने आई है।यहां सबसे बेचैन करने वाली बात सिर्फ कथित अपराध नहीं, बल्कि भरोसे की वह दीवार है जिसे तोड़ा गया।

बच्ची स्कूल में पढ़ने गई थी। उसके माता-पिता ने उसे सुरक्षित समझकर स्कूल भेजा था। स्कूल का ड्राइवर उसके लिए व्यवस्था का हिस्सा था, सुरक्षा का नहीं तो कम से कम खतरे से दूर रहने वाला व्यक्ति जरूर होना चाहिए था।

यदि जांच में आरोप सही साबित होते हैं तो यह सिर्फ एक व्यक्ति की आपराधिक मानसिकता का मामला नहीं होगा, बल्कि यह भी जांच का विषय बनेगा कि स्कूल ने कर्मचारियों की नियुक्ति, सत्यापन, निगरानी और बच्चों की सुरक्षा के लिए क्या व्यवस्थाएं लागू की थीं।

‘बैड अंकल’ से शुरू हुई कहानी ने व्यवस्था को आईना दिखाया

तीन साल की बच्ची शायद कानूनी भाषा नहीं समझती। वह आरोपी का नाम भी नहीं बता सकी। उसके लिए वह सिर्फ ‘बैड अंकल’ था। यही बात इस मामले को और भयावह बनाती है।

बच्चों के साथ होने वाले यौन अपराधों में अपराधी अक्सर भरोसे, लालच या डर का इस्तेमाल करते हैं। चॉकलेट जैसी मामूली चीज किसी बच्चे के लिए विश्वास का माध्यम बन सकती है। इसलिए स्कूल सुरक्षा का अर्थ केवल गेट पर गार्ड खड़ा करना या CCTV लगाना नहीं है।

सुरक्षा का अर्थ है—बच्चे के आसपास मौजूद हर व्यक्ति की जवाबदेही तय होना।

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के स्कूल सुरक्षा संबंधी दिशा-निर्देशों में शिकायत निवारण व्यवस्था, CCTV और बच्चों की सुरक्षा से जुड़े कई सुरक्षा उपायों पर जोर दिया गया है।

आयोग के पास POCSO e-Box जैसी शिकायत व्यवस्था भी है।

अब सवाल यह है कि क्या राजधानी के निजी स्कूल इन व्यवस्थाओं को सिर्फ कागज पर लागू कर रहे हैं या वास्तव में बच्चों की सुरक्षा के लिए उनका इस्तेमाल भी हो रहा है?

एक तरफ स्कूल, दूसरी तरफ चलती बस—दोनों जगह सवाल

बवाना की घटना से कुछ ही समय पहले की एक दूसरी घटना ने दिल्ली की महिला सुरक्षा पर बहस को और गंभीर कर दिया है। पुलिस के मुताबिक, 16 वर्षीय कक्षा 11 की छात्रा के साथ ग्रेटर नोएडा से दिल्ली के कश्मीरी गेट के बीच चलने वाली स्लीपर बस में कथित सामूहिक दुष्कर्म हुआ।

मामले में बस चालक कुलदीप और कंडक्टर संदीप को गिरफ्तार किया गया है। पुलिस ने बस को भी कब्जे में लेकर जांच शुरू की है।

बताया गया है कि छात्रा भारी बारिश के दौरान रास्ता भटक गई थी और परी चौक के पास बस में बैठी थी। आरोप है कि इसके बाद चालक और कंडक्टर ने उसे निशाना बनाया और बस करीब 47 किलोमीटर तक चलती रही।

यहां भी सवाल केवल दो आरोपियों तक सीमित नहीं है। सवाल है कि सार्वजनिक परिवहन में यात्रियों की सुरक्षा का तंत्र कहां था?

एक नाबालिग लड़की बारिश और अंधेरे में मदद की उम्मीद में बस में बैठती है और आरोप है कि वही बस उसके लिए अपराध का स्थान बन जाती है। यदि जांच में आरोप प्रमाणित होते हैं तो यह परिवहन व्यवस्था के भीतर सुरक्षा की गंभीर खामियों की ओर संकेत करेगा।

राजनीति के लिए नहीं, जवाबदेही के लिए उठने चाहिए सवाल

इन घटनाओं के बाद विपक्षी नेताओं और स्थानीय नागरिकों की ओर से दिल्ली की कानून-व्यवस्था तथा महिला सुरक्षा को लेकर सरकार पर सवाल उठाए जा रहे हैं।

कांग्रेस से जुड़े नेताओं और स्थानीय लोगों ने मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता तथा केंद्र सरकार की कानून-व्यवस्था पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया है कि राजधानी में अपराधियों के मन में पुलिस का भय कम हुआ है।इन राजनीतिक आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि इस समय उपलब्ध नहीं है, लेकिन लोकतंत्र में विपक्ष का काम सवाल पूछना भी है।

वहीं सरकार और पुलिस का दायित्व है कि वह इन सवालों का जवाब राजनीतिक बयान से नहीं, कार्रवाई और आंकड़ों से दे।

क्योंकि किसी भी सरकार की असली परीक्षा भाषणों में नहीं होती। असली परीक्षा उस समय होती है जब कोई मां अपने तीन साल के बच्चे को स्कूल के गेट पर छोड़ती है और मन में यह विश्वास रखती है कि कुछ घंटों बाद उसका बच्चा सुरक्षित वापस लौटेगा।

कानूनविदों के लिए भी यह चेतावनी का क्षण

कानून के जानकारों के नजरिए से ऐसे मामलों में सबसे महत्वपूर्ण बात है कि जांच तेज होने के साथ-साथ निष्पक्ष और साक्ष्य आधारित भी हो।

POCSO कानून बच्चों के यौन अपराधों से निपटने के लिए विशेष कानूनी ढांचा देता है।

ऐसे मामलों में बच्चे की पहचान की गोपनीयता, संवेदनशील पूछताछ, मेडिकल और फोरेंसिक जांच तथा अदालत में बाल-अनुकूल प्रक्रिया बेहद महत्वपूर्ण होती है।इसलिए आरोपी की गिरफ्तारी को अंतिम न्याय नहीं माना जा सकता।

गिरफ्तारी जांच की शुरुआत है, अंत नहीं।

पुलिस को CCTV फुटेज, मोबाइल फोन, स्कूल रिकॉर्ड, कर्मचारियों की नियुक्ति और सत्यापन दस्तावेज, बस संचालन से जुड़े रिकॉर्ड तथा अन्य संभावित साक्ष्यों की वैज्ञानिक जांच करनी होगी।

यदि किसी अन्य बच्चे के साथ भी अपराध हुआ है तो उसे सामने लाना और उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करना भी जांच की महत्वपूर्ण कड़ी होगी।

शिक्षाविदों की चिंता: स्कूल सिर्फ पढ़ाई की जगह नहीं, भरोसे की संस्था है

शिक्षाविदों के लिए इस घटना का सबसे बड़ा संदेश यह है कि स्कूल की गुणवत्ता केवल बोर्ड परीक्षा के परिणाम, शानदार भवन और महंगी फीस से तय नहीं होती।

जिस स्कूल में बच्चा सुरक्षित नहीं है, उसकी चमकदार इमारत भी अधूरी है।

स्कूलों में नियमित कर्मचारी सत्यापन, पुलिस वेरिफिकेशन, बाल सुरक्षा प्रशिक्षण, CCTV की प्रभावी निगरानी, संवेदनशील स्थानों की निगरानी, शिकायत तंत्र और अभिभावकों के साथ पारदर्शी संवाद को अनिवार्य रूप से गंभीरता से लेना होगा।

खासकर नर्सरी और छोटे बच्चों के मामलों में स्कूलों को यह समझना होगा कि तीन-चार साल का बच्चा कई बार अपराध की भाषा में अपनी बात कह ही नहीं सकता। इसलिए उसके व्यवहार में अचानक बदलाव भी एक महत्वपूर्ण संकेत हो सकता है।

समाजसेवी संस्थाओं की भूमिका भी उतनी ही जरूरी

बाल अधिकारों पर काम करने वाली संस्थाओं का लंबे समय से यह तर्क रहा है कि केवल घटना के बाद कार्रवाई पर्याप्त नहीं है।

रोकथाम की संस्कृति विकसित करनी होगी।

बच्चों को उम्र के अनुरूप ‘गुड टच-बैड टच’, सुरक्षित और असुरक्षित व्यवहार, भरोसेमंद वयस्क से बात करने तथा किसी लालच या धमकी की स्थिति में तुरंत जानकारी देने के बारे में समझाना जरूरी है।

लेकिन यहां जिम्मेदारी बच्चे की नहीं, वयस्कों की है।

तीन साल के बच्चे से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह अपराधी को पहचानकर खुद को बचा लेगा। जिम्मेदारी उस व्यवस्था की है जिसे उसके माता-पिता ने उसकी सुरक्षा के लिए चुना है।

सरकार के सामने अब पांच सीधे सवाल

इन घटनाओं के बाद दिल्ली सरकार, पुलिस और स्कूल प्रशासन के सामने कुछ सवालों से बचना मुश्किल होगा—पहला, निजी स्कूलों में बच्चों के सीधे संपर्क में आने वाले हर कर्मचारी का सत्यापन कितनी गंभीरता से होता है?

दूसरा, स्कूल बसों और निजी वाहनों में चालक-कंडक्टर की निगरानी और सत्यापन का क्या तंत्र है?

तीसरा, CCTV कैमरे लगने के बाद उनकी नियमित निगरानी कौन करता है और फुटेज कितने समय तक सुरक्षित रखी जाती है?

चौथा, स्कूलों में POCSO और बाल सुरक्षा संबंधी शिकायतों के लिए अभिभावकों को वास्तविक और प्रभावी व्यवस्था कितनी आसानी से उपलब्ध है?

पांचवां, अगर किसी स्कूल में बच्चे के साथ अपराध होता है तो स्कूल प्रबंधन की संस्थागत जिम्मेदारी किस स्तर तक तय की जाती है?

इन सवालों के जवाब केवल बवाना के एक स्कूल के लिए नहीं, बल्कि पूरी दिल्ली के लिए जरूरी हैं।

राजधानी की बेटियों को भाषण नहीं, भरोसा चाहिए

दिल्ली में महिला सुरक्षा हमेशा राजनीतिक बहस का बड़ा मुद्दा रही है। सरकारें बदलती रही हैं, नारे बदलते रहे हैं और घोषणाएं भी होती रही हैं। लेकिन सड़क पर चलती लड़की, स्कूल जाती बच्ची और बस में सफर करती छात्रा के मन का डर तभी खत्म होगा जब उसे व्यवस्था पर वास्तविक भरोसा होगा।

राजनीतिक दल एक-दूसरे पर आरोप लगाते रहेंगे।

सत्ता पक्ष अपने आंकड़े रखेगा और विपक्ष अपने सवाल। लेकिन तीन साल की बच्ची को इन बहसों से कोई मतलब नहीं।उसे सिर्फ इतना पता है कि स्कूल जाना सुरक्षित होना चाहिए।

16 साल की छात्रा को भी राजनीति नहीं चाहिए थी।

उसे रास्ते में मदद चाहिए थी।

यही वह बिंदु है जहां राजनीति खत्म और शासन की असली जिम्मेदारी शुरू होती है।

दिल्ली की सड़कों पर कानून का डर अपराधी के मन में और सुरक्षा का भरोसा माता-पिता के मन में होना चाहिए। यदि एक बच्ची स्कूल के भीतर और एक नाबालिग छात्रा सार्वजनिक परिवहन में खुद को सुरक्षित नहीं महसूस कर सकती, तो राजधानी की सुरक्षा व्यवस्था को अपनी प्राथमिकताओं की दोबारा समीक्षा करनी ही होगी।

क्योंकि किसी भी शहर की असली पहचान उसकी ऊंची इमारतों से नहीं होती।उसकी पहचान इस बात से होती है कि वहां सबसे कमजोर, सबसे छोटा और सबसे असहाय नागरिक कितना सुरक्षित है।

और दिल्ली के सामने आज यही सबसे बड़ा सवाल खड़ा है—क्या राजधानी अपने बच्चों और बेटियों को सिर्फ सुरक्षा का वादा देगी, या उन्हें सचमुच सुरक्षित भी करेगी?

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