दिल्ली के प्ले स्कूल में मासूमियत पर हमला: तीन साल के बच्चे की चीख ने खोल दी ‘सुरक्षित स्कूल’ की पोल, POCSO के बाद अब सरकार की जवाबदेही का इम्तिहान

बी के झा

NSK news Ind

नई दिल्ली, 31 अगस्त

स्कूल… वह जगह जहां माता-पिता अपने सबसे नाजुक भरोसे को छोड़कर जाते हैं। जहां बच्चे को अक्षर पहचानने से पहले यह भरोसा सिखाया जाता है कि दुनिया सुरक्षित है। लेकिन उत्तर-पूर्वी दिल्ली के जाफराबाद-मौजपुर इलाके के एक प्ले स्कूल से सामने आई घटना ने इसी भरोसे को भीतर तक हिला दिया है।

महज साढ़े तीन साल के एक बच्चे के साथ कथित मारपीट, प्रताड़ना और यौन दुर्व्यवहार के आरोप ने राजधानी की बाल सुरक्षा व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। बच्चे के परिवार के मुताबिक, उसके व्यवहार में अचानक बदलाव आया, वह रात में डरकर उठने लगा और बाथरूम जाने से भी घबराने लगा।

चिकित्सकीय जांच में उसके कानों में गंभीर सूजन सामने आई। इसके बाद जब परिवार ने स्कूल की CCTV फुटेज खंगाली तो कथित तौर पर बच्चे के साथ मारपीट और प्रताड़ना के दृश्य सामने आए।

सबसे गंभीर बात यह है कि मामला केवल एक कर्मचारी की कथित करतूत तक सीमित नहीं रह जाता। पुलिस ने स्कूल की निदेशिका, प्रधानाचार्या, शिक्षिका और आया के खिलाफ POCSO, जुवेनाइल जस्टिस एक्ट और BNS की संबंधित धाराओं में मामला दर्ज किया है।

एक महिला अटेंडेंट को गिरफ्तार किए जाने की बात सामने आई है, जबकि अन्य आरोपियों की भूमिका की जांच जारी है।जब बच्चा बोल नहीं पाया तो उसके व्यवहार ने चीखकर बताया दर्दतीन-चार साल का बच्चा आखिर अपने साथ हुई हिंसा को किस भाषा में बताए?

यही इस घटना का सबसे भयावह पहलू है।

परिजनों के मुताबिक बच्चे के व्यवहार में बदलाव आने लगा।

वह बाथरूम जाने से डरने लगा, रात में चीखकर उठता और सामान्य परिस्थितियों में भी सहमा हुआ रहता था। ऐसी उम्र में बच्चा शिकायत का बयान नहीं लिख सकता, आरोपी का नाम नहीं बता सकता और कानूनी भाषा में अपनी पीड़ा नहीं समझा सकता।

वह केवल रो सकता है।और कई बार उसका शरीर वह सब बता देता है, जिसे उसकी जुबान कह नहीं पाती।

मेडिकल जांच में कानों में सूजन और शरीर पर चोट के निशान सामने आने के बाद परिवार का संदेह गहरा हुआ। इसके बाद CCTV फुटेज ने मामले को एक अलग ही गंभीरता दे दी।

₹1,500 में CCTV का पासवर्ड… और खुल गया पूरा राज

इस मामले का एक और पहलू बेहद गंभीर है।परिवार का आरोप है कि जब उन्होंने स्कूल से CCTV फुटेज देखने की मांग की तो पहले उन्हें टालने की कोशिश की गई। बाद में CCTV एक्सेस के लिए ₹1,500 लिए गए।

परिवार ने रकम चुकाई और उन्हें एक्सेस मिला। इसके बाद बच्चे की मां ने 16, 17 और 18 अगस्त की पुरानी रिकॉर्डिंग खंगाली।यहीं से कहानी ने भयावह मोड़ लिया।परिजनों के मुताबिक फुटेज में बच्चे के साथ मारपीट और प्रताड़ना के दृश्य दिखाई दिए।

कुछ रिपोर्टों में बच्चे को कुर्सी से बांधने और उसके साथ कथित दुर्व्यवहार का भी उल्लेख है। पुलिस ने अब CCTV फुटेज और DVR अपने कब्जे में ले लिए हैं।

सवाल सिर्फ यह नहीं कि कैमरे में क्या रिकॉर्ड हुआ।सवाल यह भी है कि अगर CCTV था, तो उसकी निगरानी कौन कर रहा था?

अगर बच्चा स्कूल में सुरक्षित था तो CCTV की फुटेज परिवार को दिखाने में आनाकानी क्यों हुई?

और अगर स्कूल प्रशासन को किसी कर्मचारी की हरकत की जानकारी थी, तो कार्रवाई पहले क्यों नहीं हुई?

इन सवालों के जवाब जांच में मिलने चाहिए।

POCSO की धाराएं क्यों लगीं, यह समझना भी जरूरी है

यहां एक कानूनी तथ्य बेहद महत्वपूर्ण है। POCSO यानी Protection of Children from Sexual Offences Act बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा देने वाला विशेष कानून है। तीन साल जैसे छोटे बच्चे के मामले में कथित यौन दुर्व्यवहार का आरोप सामने आना अपने आप में अत्यंत गंभीर विषय है। लेकिन POCSO लगना किसी आरोपी को अदालत में दोषी साबित नहीं करता।

दोष सिद्धि न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही होगी। इसलिए इस मामले में पुलिस जांच, मेडिकल साक्ष्य, CCTV फुटेज और गवाहों के बयान निर्णायक होंगे।यही कारण है कि इस मामले को सनसनी से नहीं, सख्त लेकिन जिम्मेदार पत्रकारिता के साथ देखना जरूरी है।

कानून किताब में मजबूत है, सवाल जमीन पर है

भारत में बच्चों की सुरक्षा को लेकर कानूनों की कमी नहीं है। POCSO है, जुवेनाइल जस्टिस कानून है, स्कूलों के लिए सुरक्षा संबंधी दिशानिर्देश हैं और CCTV जैसी तकनीकी व्यवस्था भी है।फिर समस्या कहां है?

समस्या अक्सर कानून और उसके क्रियान्वयन के बीच दिखाई देती है।स्कूल में बच्चे की सुरक्षा की जिम्मेदारी केवल शिक्षक की नहीं होती। प्रबंधन, प्रधानाचार्य, स्टाफ चयन, शिकायत व्यवस्था, CCTV निगरानी और समय पर कार्रवाई—हर स्तर पर जवाबदेही तय होनी चाहिए।

अगर किसी स्कूल में एक मासूम बच्चा घंटों कथित प्रताड़ना झेलता रहा और किसी जिम्मेदार व्यक्ति को भनक तक नहीं लगी, तो यह सिर्फ व्यक्तिगत अपराध का सवाल नहीं है।यह संस्थागत निगरानी की विफलता का भी सवाल है।

शिक्षा निदेशालय ने बनाई जांच कमिटी, अब रिपोर्ट पर नजर

मामले के सामने आने के बाद दिल्ली शिक्षा निदेशालय ने विशेष जांच कमिटी गठित की है। कमिटी की अध्यक्षता अतिरिक्त शिक्षा निदेशक स्तर के अधिकारी द्वारा किए जाने की बात सामने आई है और उसे दो दिनों में रिपोर्ट देने का निर्देश दिया गया है।यह कदम महत्वपूर्ण है, लेकिन असली परीक्षा रिपोर्ट के बाद शुरू होगी।

क्या स्कूल की मान्यता और संचालन व्यवस्था की जांच होगी?

क्या वहां काम करने वाले कर्मचारियों का पुलिस सत्यापन हुआ था?

क्या CCTV नियमित रूप से मॉनिटर किया जाता था?

क्या अभिभावकों के लिए शिकायत की कोई स्वतंत्र व्यवस्था थी?क्या दूसरे बच्चों की सुरक्षा की भी जांच होगी?

और सबसे महत्वपूर्ण—अगर प्रबंधन की लापरवाही सामने आती है तो क्या केवल कर्मचारी पर कार्रवाई होगी या जिम्मेदारी ऊपर तक तय होगी? इन सवालों से बचना इस घटना के साथ न्याय नहीं होगा।

राजनीति भी मैदान में उतरी, AAP ने सरकार पर बोला हमला

घटना सामने आने के बाद दिल्ली की राजनीति भी गरमा गई है। आम आदमी पार्टी की ओर से मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता और केंद्र सरकार पर कानून-व्यवस्था को लेकर निशाना साधा गया है। पार्टी नेता संजीव झा ने आरोप लगाया कि राजधानी में महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा की स्थिति चिंताजनक है और सरकार को जवाब देना चाहिए।

विपक्ष का यह हमला राजनीतिक रूप से स्वाभाविक है। सत्ता में बैठी सरकार से कानून-व्यवस्था पर सवाल पूछना लोकतंत्र का हिस्सा है।लेकिन यहां राजनीति से बड़ा मुद्दा एक मासूम की सुरक्षा है।अगर विपक्ष सरकार से जवाब मांगता है तो सरकार को जवाब देना चाहिए।अगर सरकार कार्रवाई करती है तो उसे कार्रवाई जमीन पर दिखानी चाहिए।

और अगर स्कूल प्रशासन दोषी पाया जाता है तो कानून को बिना किसी दबाव के अपना काम करना चाहिए।बच्चे की पीड़ा को राजनीतिक बयानबाजी का ईंधन बनाना आसान है, लेकिन ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए व्यवस्था बदलना असली चुनौती है।

समाजसेवी संस्थाओं और बाल अधिकार विशेषज्ञों के लिए भी बड़ा सवाल

बाल अधिकारों पर काम करने वाली संस्थाओं के लिए यह घटना चेतावनी की तरह है। विशेषज्ञ लंबे समय से कहते रहे हैं कि छोटे बच्चे स्कूलों में होने वाली हिंसा या दुर्व्यवहार को अक्सर शब्दों में व्यक्त नहीं कर पाते। इसलिए अभिभावकों को बच्चे के व्यवहार में आने वाले अचानक बदलाव को गंभीरता से लेना चाहिए।

बच्चे का अचानक स्कूल जाने से डरना, किसी खास व्यक्ति या कमरे से भयभीत होना, नींद में चीखना, असामान्य चुप्पी, आक्रामक व्यवहार या किसी खास गतिविधि से डरना—इन संकेतों को ‘बच्चे की जिद’ कहकर टालना खतरनाक हो सकता है।

इस घटना ने स्कूलों के सामने भी एक स्पष्ट सवाल रख दिया है—क्या हम बच्चों को पढ़ाने के लिए पर्याप्त व्यवस्था कर रहे हैं, या उन्हें सुरक्षित रखने के लिए भी उतनी ही गंभीरता दिखा रहे हैं?

राजनीतिक दलों से आगे बढ़कर अब दिल्ली को चाहिए ‘चाइल्ड सेफ्टी ऑडिट’इस घटना के बाद केवल FIR और गिरफ्तारी पर्याप्त नहीं होनी चाहिए।

दिल्ली के सभी प्ले स्कूलों और छोटे निजी स्कूलों का व्यापक Child Safety Audit कराया जाना चाहिए। स्कूलों में काम करने वाले प्रत्येक कर्मचारी का पुलिस सत्यापन, CCTV की नियमित निगरानी, बच्चों के लिए सुरक्षित शिकायत तंत्र, अभिभावकों को स्पष्ट सुरक्षा प्रोटोकॉल और शिकायत मिलने पर समयबद्ध कार्रवाई—इन सबको अनिवार्य रूप से जांच के दायरे में लाया जाना चाहिए।

खासकर प्ले स्कूलों में तो मानक और भी कड़े होने चाहिए, क्योंकि वहां पढ़ने वाले बच्चे इतने छोटे होते हैं कि वे अपने साथ हुई घटना का पूरा विवरण तक नहीं बता सकते।

सबसे बड़ा सवाल: स्कूल में बच्चा किसके भरोसे?

यह मामला केवल जाफराबाद के एक प्ले स्कूल का मामला मानकर खत्म कर देना सबसे बड़ी भूल होगी।आज दिल्ली का हर अभिभावक यही सवाल पूछ रहा होगा—

जब मैं अपने तीन साल के बच्चे को स्कूल के गेट पर छोड़ता हूं तो क्या वह वास्तव में सुरक्षित है?

माता-पिता बच्चे को स्कूल में इसलिए छोड़ते हैं क्योंकि उन्हें भरोसा होता है कि वहां शिक्षक उसके लिए अभिभावक की भूमिका निभाएंगे।

उस भरोसे की कीमत किसी फीस रसीद में नहीं लिखी होती।

वह भरोसा टूट जाए तो सिर्फ एक बच्चा नहीं डरता—पूरा समाज डरता है।इसलिए इस मामले में न्याय केवल आरोपी की गिरफ्तारी से पूरा नहीं होगा।

न्याय तब होगा जब जांच निष्पक्ष हो, दोषी को कानून के मुताबिक सजा मिले, प्रबंधन की भूमिका तय हो और ऐसी घटना दोबारा न हो इसके लिए व्यवस्था बदले।

क्योंकि तीन साल का बच्चा अदालत में अपनी लड़ाई नहीं लड़ सकता। उसकी लड़ाई समाज, सरकार, पुलिस, स्कूल प्रशासन और कानून—सबको मिलकर लड़नी होगी।

और दिल्ली सरकार के सामने अब असली सवाल यही है—क्या राजधानी के स्कूलों में ‘सुरक्षा’ सिर्फ CCTV कैमरे तक सीमित रहेगी,

या उन कैमरों के पीछे जवाबदेही की ऐसी व्यवस्था भी बनेगी जो किसी मासूम की चीख को अगली बार रिकॉर्ड होने से पहले ही रोक दे?

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