बी के झा
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नई दिल्ली, 4 सितंबर
स्कूल खुलते ही अभिभावकों की जेब पर एक बार फिर यूनिफॉर्म का बोझ बढ़ने लगा है। शर्ट, पैंट, स्कर्ट, टाई, बेल्ट, जूते और मोजे… बच्चों की स्कूल ड्रेस से जुड़ी हर छोटी-बड़ी चीज खरीदते-बेचते बिल कई बार हजारों रुपये तक पहुंच जाता है। सबसे ज्यादा सवाल तब उठता है, जब सामान्य दिखने वाली टाई-बेल्ट जैसी चीज के लिए भी अभिभावकों से कई गुना कीमत वसूली जाती है।
मसलन, जिस टाई-बेल्ट सेट के लिए किसी स्कूल या अधिकृत विक्रेता के यहां करीब 300 रुपये तक चुकाने पड़ सकते हैं, उसकी अनुमानित थोक कीमत कई मामलों में इससे काफी कम बताई जाती है। बाजार से जुड़े लोगों के मुताबिक बड़े ऑर्डर में सामान्य गुणवत्ता की टाई-बेल्ट करीब 75 से 130 रुपये प्रति सेट तक पड़ सकती है।
हालांकि यह कोई तय सरकारी या सर्वव्यापी बाजार दर नहीं है। कपड़े, बकल, डिजाइन, लोगो, पैकिंग, ऑर्डर की संख्या और टैक्स के हिसाब से कीमत बदलती है।
यहीं से अभिभावकों का सवाल शुरू होता है—आखिर स्कूल यूनिफॉर्म की अंतिम कीमत तय कैसे होती है और रिटेल कीमत तथा उत्पादन लागत के बीच कितना अंतर उचित है?
300 रुपये की टाई-बेल्ट, होलसेल में 75-130 रुपये तक
यूनिफॉर्म कारोबार से जुड़े लोगों के अनुसार 100 सेट के आसपास का ऑर्डर होने पर सामान्य टाई-बेल्ट की कीमत करीब 90 से 150 रुपये प्रति सेट हो सकती है। वहीं 500 या उससे ज्यादा सेट का ऑर्डर होने पर यही कीमत लगभग 75 से 130 रुपये तक आने की संभावना रहती है।
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि 300 रुपये की बिक्री कीमत और 100 रुपये की थोक कीमत के बीच पूरा अंतर सीधे मुनाफा है। दुकान का किराया, कर्मचारी, परिवहन, स्टॉक रखने का खर्च, पैकिंग, टैक्स, खराब या बचे हुए स्टॉक का जोखिम और स्कूल के लिए विशेष डिजाइन जैसी लागतें भी अंतिम कीमत में जुड़ती हैं।
फिर भी सवाल अपनी जगह कायम है—क्या अभिभावकों को यूनिफॉर्म की कीमत का स्पष्ट ब्रेकअप मिलना चाहिए?
शर्ट 100-160 रुपये, पैंट 150-230 रुपये तक
बड़े ऑर्डर में सामान्य स्कूल शर्ट की अनुमानित थोक कीमत करीब 100 से 160 रुपये और 500 पीस के आसपास के ऑर्डर में करीब 85 से 140 रुपये तक हो सकती है।इसी तरह सामान्य स्कूल पैंट 100 पीस के ऑर्डर में करीब 150 से 230 रुपये, जबकि बड़े ऑर्डर में लगभग 130 से 200 रुपये तक पड़ सकती है।
लड़कियों की स्कर्ट वाली यूनिफॉर्म में 100 पीस पर करीब 130 से 210 रुपये और बड़े ऑर्डर पर करीब 110 से 180 रुपये की अनुमानित रेंज बताई जाती है।यानी बड़ी मात्रा में खरीदारी होने पर प्रति यूनिट लागत में उल्लेखनीय अंतर आ सकता है।
चार चीजों का सेट 300 से 540 रुपये तक
अगर शर्ट, पैंट, टाई और बेल्ट को मिलाकर एक बेसिक यूनिफॉर्म सेट तैयार किया जाए, तो 100 पीस के ऑर्डर में इसकी अनुमानित थोक लागत करीब 350 से 540 रुपये और 500 पीस के ऑर्डर में लगभग 300 से 470 रुपये तक हो सकती है।स्कर्ट वाली यूनिफॉर्म में भी कीमत इसी तरह कपड़े, डिजाइन, साइज और सिलाई की गुणवत्ता पर निर्भर करेगी।यही वह आंकड़ा है जो अभिभावकों को सोचने पर मजबूर करता है। सवाल सिर्फ महंगी यूनिफॉर्म का नहीं, बल्कि कीमत तय करने की पारदर्शिता का है।
शिक्षाविदों की चिंता: शिक्षा के साथ खर्च का दबाव क्यों?
शिक्षाविदों का तर्क है कि स्कूल यूनिफॉर्म का उद्देश्य विद्यार्थियों में समानता और अनुशासन की भावना पैदा करना है, लेकिन यदि उसी यूनिफॉर्म को खरीदना परिवारों के लिए आर्थिक दबाव बन जाए तो व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
उनका कहना है कि स्कूलों को यूनिफॉर्म के लिए अनावश्यक रूप से महंगे या सीमित विकल्पों पर निर्भरता पैदा करने के बजाय अभिभावकों को उचित कीमत पर सामान उपलब्ध कराने की व्यवस्था करनी चाहिए। खासकर छोटे बच्चों की यूनिफॉर्म, जो हर साल साइज बदलने के कारण दोबारा खरीदनी पड़ती है, उसमें लागत का बोझ और बढ़ जाता है।
कानूनविदों का सवाल: पारदर्शिता और विकल्प जरूरी
कानूनविदों के मुताबिक निजी स्कूलों में यूनिफॉर्म की बिक्री को लेकर सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा पारदर्शिता और अभिभावकों की पसंद का है। यदि किसी विशेष विक्रेता से ही यूनिफॉर्म खरीदने की बाध्यता पैदा होती है, तो कीमत, गुणवत्ता और प्रतिस्पर्धा को लेकर सवाल उठ सकते हैं।
हालांकि हर महंगी यूनिफॉर्म को मनमाना मुनाफा या अवैध वसूली मान लेना भी उचित नहीं होगा। किसी मामले में वास्तविक स्थिति जानने के लिए स्कूल की व्यवस्था, खरीद प्रक्रिया, कर, गुणवत्ता और अन्य खर्चों की जांच जरूरी होगी।
सामाजिक संगठनों की मांग: कीमतों की सार्वजनिक जानकारी हो
अभिभावक संगठनों और सामाजिक संस्थाओं की ओर से समय-समय पर यह मांग उठती रही है कि स्कूल यूनिफॉर्म, किताबों और अन्य जरूरी सामान की कीमतों में अधिक पारदर्शिता होनी चाहिए।सामाजिक क्षेत्र से जुड़े लोगों का कहना है कि अभिभावकों को कम से कम इतना पता होना चाहिए कि किसी वस्तु की कीमत किन आधारों पर तय की गई है।
उनका सुझाव है कि स्कूल यूनिफॉर्म की अधिकृत कीमत, कपड़े की गुणवत्ता, ब्रांड या निर्माता तथा उपलब्ध वैकल्पिक विक्रेताओं की जानकारी स्पष्ट रूप से दी जाए।
सरकार के सामने भी बड़ा सवाल
स्कूली शिक्षा का बड़ा हिस्सा राज्यों के अधिकार क्षेत्र में आता है, जबकि केंद्र सरकार भी शिक्षा क्षेत्र में नीतिगत भूमिका निभाती है। ऐसे में यूनिफॉर्म की कीमतों को लेकर कार्रवाई संबंधित नियमों और स्थानीय व्यवस्था पर निर्भर करती है।सरकार की ओर से शिक्षा को सुलभ और परिवारों पर अनावश्यक आर्थिक बोझ से मुक्त रखने पर लगातार जोर दिया जाता रहा है।
लेकिन जमीनी स्तर पर अभिभावकों का सवाल सीधा है—जब बच्चे की पढ़ाई पहले ही फीस, किताबों और परिवहन जैसे खर्चों से महंगी हो रही है, तब यूनिफॉर्म के नाम पर अतिरिक्त बोझ को नियंत्रित कौन करेगा?
विपक्ष को मिला सरकार पर निशाना साधने का मुद्दा
यूनिफॉर्म और स्कूल से जुड़े खर्च का मुद्दा विपक्षी दलों के लिए भी सरकार और शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाने का अवसर देता है। विपक्ष की ओर से आम तौर पर यह सवाल उठाया जा सकता है कि शिक्षा को परिवारों के लिए आर्थिक रूप से बोझिल होने से रोकने के लिए सरकार की निगरानी व्यवस्था कितनी प्रभावी है।
विपक्षी दल यह भी मांग उठा सकते हैं कि स्कूलों और अधिकृत विक्रेताओं द्वारा वसूली जाने वाली कीमतों में पारदर्शिता सुनिश्चित की जाए और अभिभावकों को एक ही दुकान या सप्लायर पर निर्भर न रहना पड़े।
बड़ा सवाल मुनाफे का नहीं, पारदर्शिता का
यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। थोक कीमत और खुदरा कीमत का अंतर अपने आप में गलत नहीं है। निर्माता से दुकान तक पहुंचने में परिवहन, भंडारण, कर्मचारी, किराया, पैकिंग, टैक्स और अन्य खर्च जुड़ते हैं। स्कूल के लोगो और विशेष डिजाइन वाली यूनिफॉर्म की लागत भी सामान्य बाजार की ड्रेस से अलग हो सकती है।
लेकिन अगर किसी वस्तु की खरीद कीमत और अंतिम बिक्री कीमत के बीच बड़ा अंतर है, तो अभिभावकों का यह जानना बिल्कुल जायज है कि उस अंतर के पीछे कौन-कौन से खर्च हैं। यही वजह है कि मामला सिर्फ ‘300 रुपये की टाई-बेल्ट’ का नहीं है।
असली मुद्दा है—क्या अभिभावकों को स्कूल यूनिफॉर्म की कीमत तय होने की पूरी तस्वीर दिखाई जा रही है?
अभिभावकों के लिए भी जरूरी सावधानी
बाजार में बताए जाने वाले थोक रेट को सीधे स्कूल की खरीद कीमत मान लेना सही नहीं होगा। अलग-अलग शहरों, फैक्ट्रियों, कपड़ों, साइज, डिजाइन, लोगो, ऑर्डर की मात्रा, GST और पैकिंग के कारण वास्तविक कीमत काफी बदल सकती है। इसलिए किसी स्कूल पर केवल अनुमानित थोक कीमत के आधार पर आरोप लगाना उचित नहीं होगा।
लेकिन अभिभावकों के लिए यह जरूर जरूरी है कि वे बिल लें, कीमतों की तुलना करें और जहां संभव हो, यूनिफॉर्म के वैकल्पिक स्रोतों के बारे में जानकारी मांगें।
निष्कर्ष
स्कूल यूनिफॉर्म बच्चे की जरूरत है, विलासिता की वस्तु नहीं। इसलिए उसकी कीमत ऐसी होनी चाहिए जो स्कूल की गुणवत्ता और जरूरतों के अनुरूप हो, लेकिन परिवारों पर अनावश्यक आर्थिक दबाव न डाले।
300 रुपये की टाई-बेल्ट की कहानी सिर्फ एक उत्पाद की कीमत का सवाल नहीं उठाती, बल्कि यह बड़ा सवाल सामने रखती है कि शिक्षा से जुड़े अनिवार्य खर्चों में पारदर्शिता कितनी है।
