Breking news, Madhubani; राजनगर राजपरिसर में सम्राट चौधरी: कमाख्या मंदिर में की पूजा से आगे विरासत बचाने की परीक्षा, क्या अब बदलेगी ऐतिहासिक धरोहर की तस्वीर? अब सवाल —- विरासत के संरक्षण का अगला कदम क्या होगा••?

बी के झा

NSK news Ind

मधुबनी/राजनगर/नई दिल्ली, 6 सितम्बर

बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी का रविवार को मधुबनी के राजनगर स्थित ऐतिहासिक राजपरिसर पहुंचना महज एक धार्मिक यात्रा भर नहीं माना जा सकता। कामाख्या मंदिर में पूजा-अर्चना से लेकर जिलाधिकारी की करीब 25 मिनट की प्रस्तुति तक, मुख्यमंत्री के सामने राजनगर की वह विरासत रखी गई जिसे वर्षों से संरक्षण, विकास और पहचान की प्रतीक्षा है।

मुख्यमंत्री करीब 3:14 बजे हेलीकॉप्टर से राज खेल मैदान पहुंचे और वहां से ऐतिहासिक राजपरिसर स्थित कामाख्या मंदिर पहुंचे। उन्होंने विधिवत पूजा-अर्चना, आरती और परिक्रमा की। इसके बाद एसएसबी कैंप में जिलाधिकारी आनंद शर्मा ने लाइव प्रेजेंटेशन के माध्यम से राजपरिसर की जमीन, भौगोलिक स्थिति, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और पुरातात्विक महत्व की जानकारी दी।

लेकिन असली सवाल यहीं से शुरू होता है—क्या यह दौरा सिर्फ दर्शन और निरीक्षण तक सीमित रहेगा या राजनगर की ऐतिहासिक धरोहर को वास्तविक संरक्षण और विकास का रास्ता भी मिलेगा?

पूजा के बाद विरासत की फाइल—संकेत क्या दे रहा है मुख्यमंत्री का दौरा?

राजपरिसर में काली मंदिर,

दुर्गा मंदिर,

कामाख्या मंदिर,

हनुमान मंदिर,

गिरिजा मंदिर,

रानी महल,

नौलखा पैलेस और हाथी घर जैसी ऐतिहासिक एवं धार्मिक धरोहरें मौजूद हैं।

प्रशासन ने मुख्यमंत्री के आगमन से पहले इन स्थलों का जायजा लेकर उनकी ऐतिहासिक और धार्मिक महत्ता से उन्हें अवगत कराने की तैयारी की थी।

जिलाधिकारी की प्रस्तुति में सिर्फ इतिहास नहीं था, बल्कि राजपरिसर की जमीन और भविष्य के विकास से जुड़े सवाल भी शामिल थे।यही वह बिंदु है जहां मुख्यमंत्री का दौरा राजनीतिक और प्रशासनिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हो जाता है।

क्योंकि किसी विरासत स्थल का महत्व केवल उसके अतीत में नहीं होता। उसका वास्तविक मूल्य इस बात से तय होता है कि वर्तमान सरकार उसे आने वाली पीढ़ियों के लिए किस रूप में सुरक्षित करती है।

शिक्षाविदों और इतिहासकारों के लिए यह सिर्फ इमारत नहीं, सभ्यता की स्मृति है

राजनगर राजपरिसर को लेकर स्थानीय इतिहासकारों और शिक्षाविदों की चिंता लंबे समय से यही रही है कि ऐसी विरासत को केवल धार्मिक पर्यटन की दृष्टि से नहीं देखा जाना चाहिए।यह क्षेत्र मिथिला की सांस्कृतिक स्मृति, स्थापत्य परंपरा और दरभंगा राज के इतिहास से जुड़ा हुआ है।प्रशासन की तैयारियों के दौरान शिक्षाविद् एवं इतिहासकार प्रो. हीरानंद आचार्य से भी राजपरिसर के ऐतिहासिक एवं धार्मिक महत्व पर जानकारी ली गई थी।

जिलाधिकारी ने स्वयं इस परिसर को अद्वितीय बताते हुए इसे सहेजने और संवारने की आवश्यकता पर जोर दिया था।इसलिए अब इतिहास के जानकारों के सामने भी एक बड़ा सवाल है—क्या राजनगर को सिर्फ एक धार्मिक स्थल बनाया जाएगा या इसे मिथिला की संपूर्ण सांस्कृतिक विरासत के केंद्र के रूप में विकसित किया जाएगा?

कानूनविदों की नजर में सबसे अहम सवाल—जमीन और संरक्षण की स्पष्ट नीति

राजपरिसर की जमीन से जुड़े पहलुओं पर मुख्यमंत्री को जानकारी दिया जाना इस पूरे दौरे का बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है।किसी ऐतिहासिक परिसर के विकास में सबसे बड़ी चुनौती अक्सर केवल धन की नहीं होती।

जमीन का स्वामित्व,

उपयोग,

संरक्षण की कानूनी स्थिति,

अतिक्रमण,

विभिन्न संस्थाओं के अधिकार और पुरातात्विक संरक्षण के नियम—ये सभी विषय विकास की दिशा तय करते हैं।ऐसे में कानूनविदों की नजर में सरकार के सामने सबसे पहले एक स्पष्ट और सार्वजनिक विरासत नीति रखने की चुनौती होगी।

कौन-सी जमीन किसके अधीन है?

किस हिस्से का संरक्षण होगा?

कहां पर्यटन सुविधाएं विकसित होंगी?

ऐतिहासिक संरचनाओं के मूल स्वरूप से छेड़छाड़ कैसे रोकी जाएगी?

और सबसे महत्वपूर्ण—क्या विकास के नाम पर विरासत की आत्मा से समझौता तो नहीं होगा?

ये ऐसे प्रश्न हैं जिनका जवाब आने वाले दिनों में सरकार को देना होगा।

राजनीतिक संदेश भी कम महत्वपूर्ण नहीं

मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी का राजपरिसर पहुंचना ऐसे समय में हुआ है जब बिहार सरकार अपनी प्रशासनिक और राजनीतिक छवि को मजबूत करने की कोशिश कर रही है।राजनगर के भाजपा विधायक सुजीत पासवान ने मुख्यमंत्री के दौरे को क्षेत्र के लिए नई उम्मीद बताते हुए राजपरिसर के अलावा कृषि कॉलेज और पावर ग्रिड जैसी परियोजनाओं को भी विकास की दृष्टि से महत्वपूर्ण बताया है।

सत्तापक्ष के लिए यह दौरा निश्चित रूप से एक सकारात्मक संदेश है—मिथिला की ऐतिहासिक पहचान और स्थानीय विकास दोनों को एक साथ आगे बढ़ाने की कोशिश।लेकिन राजनीति में घोषणा से अधिक महत्व उसके परिणाम का होता है।

विपक्षी दलों के लिए यही सबसे बड़ा सवाल बन सकता है कि मुख्यमंत्री के दौरे के बाद कितनी राशि स्वीकृत होती है, कौन-सी योजना जमीन पर उतरती है और कब तक काम शुरू होता है।

क्योंकि बिहार की राजनीति में ऐतिहासिक धरोहरों को लेकर घोषणाएं नई बात नहीं हैं;

असली कसौटी है—संरक्षण की स्थायी व्यवस्था और धरातल पर दिखाई देने वाला बदलाव।

हिन्दू संगठनों और धर्माचार्यों के लिए आस्था के साथ संरक्षण भी जरूरी

कामाख्या मंदिर में मुख्यमंत्री द्वारा पूजा-अर्चना किए जाने से स्थानीय धार्मिक समुदाय में स्वाभाविक रूप से उत्साह का वातावरण बना।हिन्दू संगठनों और धर्माचार्यों की दृष्टि से यह परिसर केवल स्थापत्य या पर्यटन की वस्तु नहीं, बल्कि आस्था और धार्मिक परंपरा से जुड़ा जीवंत क्षेत्र है।ऐसे में उनकी अपेक्षा स्वाभाविक है कि मंदिरों का संरक्षण केवल रंग-रोगन तक सीमित न हो।

पूजा-पद्धति, धार्मिक परंपरा, मंदिरों की मूल वास्तुकला और परिसर की आध्यात्मिक पहचान को सुरक्षित रखते हुए सुविधाओं का विकास किया जाए।

राजपरिसर में पर्यटन बढ़े, लेकिन तीर्थ की गरिमा और विरासत की मर्यादा भी बनी रहे।

समाजसेवी संस्थाओं की चिंता—विकास हो, लेकिन स्थानीय लोगों को साथ लेकर

सामाजिक संगठनों और स्थानीय नागरिकों के लिए राजपरिसर का विकास रोजगार और पर्यटन का बड़ा अवसर बन सकता है।अगर यहां व्यवस्थित तरीके से पर्यटन सुविधाएं विकसित होती हैं तो स्थानीय युवाओं के लिए

गाइड,

हस्तशिल्प,

परिवहन,

होटल,

भोजन,

सांस्कृतिक कार्यक्रम और अन्य सेवाओं में रोजगार के अवसर पैदा हो सकते हैं।लेकिन विकास का मॉडल ऐसा होना चाहिए जिसमें स्थानीय समाज केवल दर्शक न बने, बल्कि विरासत का भागीदार और लाभार्थी बने।

मिथिला की पहचान केवल उसके महलों और मंदिरों से नहीं है। उसकी पहचान उसकी भाषा,

लोककला,

मधुबनी चित्रकला,

संस्कृति,

परंपरा और यहां के लोगों से है। इसलिए राजनगर को विकसित करने की किसी भी योजना में स्थानीय समुदाय की भागीदारी अनिवार्य होनी चाहिए।

स्थानीय नागरिकों की उम्मीद—अब सिर्फ निरीक्षण नहीं, निर्णय चाहिए

राजनगर के लोगों के लिए मुख्यमंत्री का दौरा उम्मीद की एक नई खिड़की खोलता है।लोग चाहते हैं कि वर्षों से उपेक्षा झेल रहा राजपरिसर अब बिहार के पर्यटन मानचित्र पर अपनी वास्तविक जगह हासिल करे।स्थानीय स्तर पर उठ रही मांगों में राजपरिसर के विकास के साथ कृषि कॉलेज और पावर ग्रिड जैसी परियोजनाओं को गति देने की अपेक्षा भी शामिल है। भाजपा विधायक ने भी मुख्यमंत्री के दौरे के बाद इन परियोजनाओं को लेकर उम्मीद जताई है।

लेकिन जनता का सवाल सीधा है—राजपरिसर कब संवरेगा?

पर्यटन की ठोस योजना कब बनेगी?

धरोहरों का वैज्ञानिक संरक्षण कब शुरू होगा?

और सबसे बड़ा सवाल—क्या मुख्यमंत्री का यह दौरा राजनगर की तस्वीर बदलने की शुरुआत बनेगा या सरकारी फाइलों में दर्ज एक और निरीक्षण बनकर रह जाएगा?

56 मिनट का दौरा, लेकिन उम्मीदें वर्षों की

मुख्यमंत्री राजनगर में लगभग 56 मिनट रहे। पूजा-अर्चना के बाद उन्होंने एसएसबी कैंप में अधिकारियों से जानकारी ली और करीब 4 बजे के बाद पिलखवार के लिए रवाना हो गए।समय भले ही 56 मिनट का था, लेकिन राजनगर की उम्मीदें इससे कहीं लंबी हैं।यहां सवाल किसी मुख्यमंत्री के मंदिर जाने का नहीं है।सवाल यह है कि मुख्यमंत्री के सामने दिखाई गई विरासत की तस्वीर अब सरकारी कार्रवाई की तस्वीर कब बनेगी?

NSK विश्लेषण: विरासत को पर्यटन नहीं, पहचान मानना होगा

राजनगर राजपरिसर बिहार के सामने एक अवसर भी है और परीक्षा भी।अवसर इसलिए कि इसे विकसित कर मिथिला के सांस्कृतिक पर्यटन का बड़ा केंद्र बनाया जा सकता है।

परीक्षा इसलिए कि विकास के नाम पर कहीं ऐतिहासिक स्वरूप नष्ट न हो जाए।

मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने कामाख्या मंदिर में पूजा की, अधिकारियों से इतिहास जाना और राजपरिसर की जमीन एवं विकास से जुड़े पहलुओं को समझा।

अब अगला अध्याय सरकार को लिखना है।

क्या राजनगर को सिर्फ एक खूबसूरत पर्यटन स्थल बनाया जाएगा या उसे मिथिला की ऐतिहासिक आत्मा के रूप में संरक्षित किया जाएगा?

यही सवाल आने वाले समय में मुख्यमंत्री के इस दौरे की वास्तविक सफलता तय करेगा।

NSK की नजर अब राजपरिसर की घोषणाओं पर नहीं, उनके क्रियान्वयन पर होगी।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *