FIR रद्द कराने हाईकोर्ट पहुंचे दोस्त, अदालत ने कहा- राहत मिलेगी, लेकिन पहले अस्पताल में सेवा करो

बी के झा

NSK news Ind

नई दिल्ली, 6 सितंबर

अदालत के दरवाजे पर पहुंचा एक आपराधिक विवाद आखिरकार समझौते की दहलीज पर आकर थम गया। दोनों पक्षों ने कहा—अब कोई शिकायत नहीं, रिश्ते सामान्य हैं और वे आज भी दोस्त हैं। लेकिन दिल्ली हाईकोर्ट ने मामले को सिर्फ FIR रद्द करके खत्म नहीं किया।

अदालत ने दोनों आरोपियों को राहत तो दी, मगर उसके साथ जिम्मेदारी भी जोड़ दी।

हाईकोर्ट ने FIR रद्द करते हुए दोनों आरोपियों को मणिपुर के रीजनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (RIMS) में सामुदायिक सेवा करने का आदेश दिया। दोनों को दो-दो घंटे के छह सत्र पूरे करने होंगे। इसके अलावा उन्हें सामूहिक रूप से 10 हजार रुपये दिल्ली हाईकोर्ट बार एसोसिएशन को भी देने होंगे।यह आदेश महज एक आपराधिक मामले का निपटारा नहीं है, बल्कि यह सवाल भी सामने रखता है कि क्या हर विवाद का समाधान केवल दंड है, या सुधार और सामाजिक जिम्मेदारी भी न्याय का हिस्सा हो सकती है?

दोस्ती में शुरू हुआ विवाद FIR तक पहुंचा

मामला दिल्ली के डाबड़ी थाने में दर्ज FIR से जुड़ा है।शिकायतकर्ता के अनुसार वह अपने एक दोस्त के साथ किराए के फ्लैट में रह रहा था। आरोप था कि दोनों आरोपी जबरन फ्लैट में दाखिल हुए और शिकायतकर्ता तथा उसके दोस्त के साथ मारपीट की।विवाद ने कानूनी रूप लिया और पुलिस ने FIR दर्ज कर दी।लेकिन समय के साथ परिस्थितियां बदल गईं।

अदालत के सामने दोनों पक्षों ने कहा कि उनके बीच अब कोई विवाद नहीं है और वे आपसी सहमति से मामले को समाप्त करना चाहते हैं।समझौता हुआ, मगर अदालत ने सिर्फ ‘माफ’ नहीं किया सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट को बताया गया कि दोनों पक्षों ने बिना किसी दबाव या अनुचित प्रभाव के समझौता किया है। सुलहनामे पर भी हस्ताक्षर किए गए हैं।

घटना में घायल हुए व्यक्ति ने भी अदालत को बताया कि वह अब पूरी तरह ठीक है और चोट के कारण उसे कोई स्थायी दुष्प्रभाव नहीं हुआ।दोनों पक्षों ने यह भी कहा कि वे आज भी मित्र हैं और एक-दूसरे के खिलाफ उनकी कोई मौजूदा शिकायत नहीं है।इन परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने माना कि मामले में दोषसिद्धि की संभावना काफी कम है। ऐसे में आपराधिक कार्यवाही को आगे बढ़ाने से कोई उपयोगी उद्देश्य पूरा नहीं होगा।

लेकिन यहीं से इस आदेश की सबसे महत्वपूर्ण तस्वीर सामने आती है।FIR खत्म, लेकिन जिम्मेदारी बाकी

जस्टिस प्रतीक जालान ने FIR रद्द करने की राहत को सामुदायिक सेवा और उपयुक्त मुआवजे की शर्त से जोड़ना उचित माना।यानी अदालत ने यह संदेश दिया कि समझौते के बाद आपराधिक मुकदमा खत्म किया जा सकता है, लेकिन अदालत से मिलने वाली राहत को सामाजिक जिम्मेदारी से जोड़ा जा सकता है।दोनों आरोपियों को अब मणिपुर के RIMS में सामुदायिक सेवा करनी होगी।

अस्पताल का मेडिकल सुपरिंटेंडेंट तय करेगा काम

हाईकोर्ट के आदेश के अनुसार दोनों आरोपियों को अस्पताल के मेडिकल सुपरिंटेंडेंट के समक्ष रिपोर्ट करना होगा।अस्पताल प्रशासन उनकी क्षमता और परिस्थितियों के अनुरूप उन्हें उपयुक्त सामुदायिक सेवा का काम सौंपेगा।छह सत्रों में सेवा पूरी करनी होगी और प्रत्येक सत्र दो घंटे का होगा।अदालत ने इसके लिए समय सीमा भी तय की है।

सामुदायिक सेवा शुरू होने की तारीख से दो महीने के भीतर सभी छह सत्र पूरे करने होंगे।सेवा पूरी होने के बाद अस्पताल के मेडिकल सुपरिंटेंडेंट की ओर से दोनों को अनुपालन प्रमाणपत्र दिया जाएगा, जिसे अदालत के रिकॉर्ड पर पेश करना होगा।

10 हजार रुपये भी देने होंगे सिर्फ अस्पताल में सेवा ही नहीं—दोनों आरोपियों को आर्थिक योगदान भी देना होगा।

हाईकोर्ट ने दोनों को दो सप्ताह के भीतर सामूहिक रूप से 10 हजार रुपये दिल्ली हाईकोर्ट बार एसोसिएशन को भुगतान करने का निर्देश दिया है।इस तरह अदालत ने समझौते के बाद दी गई राहत को केवल कानूनी प्रक्रिया का अंत नहीं बनाया, बल्कि उसे सामाजिक दायित्व से भी जोड़ दिया।

NSK की नजर–

इस आदेश की असली अहमियत FIR रद्द होने से कहीं आगे है।

आपराधिक न्याय व्यवस्था का एक उद्देश्य अपराध के लिए दंड देना है, लेकिन न्याय का एक दूसरा पक्ष सुधार और समाज के प्रति जिम्मेदारी भी है।

इस मामले में अदालत ने दोनों पक्षों के बीच सुलह को स्वीकार किया, क्योंकि शिकायतकर्ता और आरोपी अब विवाद खत्म कर चुके हैं और उनके बीच कोई मौजूदा शिकायत नहीं है।

लेकिन अदालत ने यह भी सुनिश्चित किया कि राहत का अर्थ यह न हो कि घटना के बाद कोई जिम्मेदारी ही न बचे।इसलिए अदालत ने मुकदमा खत्म किया, लेकिन जिम्मेदारी नहीं।

दो घंटे के छह सत्र शायद कागज पर एक छोटी-सी शर्त दिखाई दें, लेकिन इसका संदेश बड़ा है—कानून कभी-कभी किसी व्यक्ति को केवल दंडित करने के बजाय उसे समाज के लिए कुछ अच्छा करने का अवसर भी दे सकता है।

यह आदेश न्याय की उस मानवीय तस्वीर को सामने लाता है, जिसमें अदालत सिर्फ यह नहीं पूछती कि “गलती किसकी थी?”,

बल्कि यह भी देखती है कि “अब आगे क्या बेहतर किया जा सकता है?”

और शायद यही इस मामले की सबसे बड़ी सीख है—विवाद का अंत समझौते से हुआ, लेकिन न्याय का अंत जिम्मेदारी से।

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