बी के झा
नई दिल्ली/अमेठी, 6 सितम्बर
2024 के लोकसभा चुनाव में अमेठी से हार के बाद केंद्रीय मंत्री पद से बाहर हुईं स्मृति ईरानी अब एक बार फिर भारतीय जनता पार्टी की केंद्रीय टीम में सक्रिय भूमिका में दिखाई दे रही हैं। लेकिन उनकी राजनीतिक यात्रा का एक सवाल अब भी चर्चा में है—अमेठी की हार के बाद बीजेपी ने उन्हें राज्यसभा क्यों नहीं भेजा?
एक पॉडकास्ट में स्मृति ईरानी ने इस सवाल का जवाब देते हुए साफ संकेत दिया कि बीजेपी की राजनीति में किसी पद को अंतिम उपलब्धि मानना उनकी कार्यशैली का हिस्सा नहीं है। उन्होंने कहा कि संगठन में पद किसी की पहचान नहीं, बल्कि काम करने का एक अवसर है।उनका यह बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि 2019 में उन्होंने अमेठी में कांग्रेस नेता राहुल गांधी को हराकर राष्ट्रीय राजनीति में एक बड़ी राजनीतिक कहानी लिखी थी। लेकिन पांच साल बाद 2024 में उन्हें कांग्रेस के किशोरी लाल शर्मा के हाथों हार का सामना करना पड़ा।
ईरानी ने कहा कि अगर उनके लिए केवल राजनीतिक ताकत और पद ही महत्वपूर्ण होते तो वह अमेठी जैसी सीट पर चुनाव लड़ने नहीं जातीं, क्योंकि अमेठी लंबे समय तक बीजेपी के लिए चुनौतीपूर्ण सीट रही थी।
अमेठी की जीत ने बनाया था ‘जायंट किलर’, हार ने बदल दी तस्वीर
स्मृति ईरानी की अमेठी की कहानी भारतीय राजनीति की सबसे चर्चित चुनावी कहानियों में रही है। 2014 में राहुल गांधी के खिलाफ चुनाव लड़ने के बाद 2019 में उन्होंने कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष को हराकर बड़ा राजनीतिक उलटफेर किया था।लेकिन 2024 में समीकरण बदल गए। कांग्रेस ने किशोरी लाल शर्मा को मैदान में उतारा और उन्होंने स्मृति ईरानी को पराजित कर दिया।
यहीं से एक नया सवाल उठा—क्या बीजेपी स्मृति ईरानी को राज्यसभा के रास्ते संसद में वापस लाएगी?
ऐसा नहीं हुआ।अब ईरानी के ताजा बयान ने इस सवाल को एक अलग राजनीतिक अर्थ दे दिया है। उनका कहना है कि संगठन में पद महत्वपूर्ण नहीं है। यानी पार्टी के भीतर सक्रियता और जिम्मेदारी को वह संसद की सदस्यता से अलग करके देख रही हैं।
‘पद पहचान नहीं, मौका है’—कितना बड़ा राजनीतिक संदेश?
स्मृति ईरानी का बयान बीजेपी की उस संगठनात्मक संस्कृति की ओर इशारा करता है, जिसमें पार्टी के भीतर लंबे समय तक काम करने वाले कार्यकर्ताओं के लिए चुनावी पद ही राजनीतिक सफलता का एकमात्र पैमाना नहीं माना जाता।राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह बयान दो स्तरों पर देखा जा सकता है।पहला, ईरानी खुद को केवल पूर्व केंद्रीय मंत्री या पूर्व सांसद की पहचान में सीमित नहीं रखना चाहतीं।दूसरा, पार्टी की केंद्रीय टीम में वापसी के बाद वह यह संदेश दे रही हैं कि उनकी राजनीतिक उपयोगिता संसद के भीतर मौजूदगी पर निर्भर नहीं है।
राजनीतिक विश्लेषक क्या देखते हैं?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बीजेपी में संगठनात्मक राजनीति का महत्व लंबे समय से चुनावी राजनीति के समानांतर रहा है। ऐसे में किसी नेता को राज्यसभा भेजना ही सक्रिय भूमिका का एकमात्र रास्ता नहीं है।एक राजनीतिक विश्लेषण के मुताबिक, स्मृति ईरानी के मामले में पार्टी ने शायद यह आकलन किया हो कि उनकी भूमिका संगठन, प्रचार और राजनीतिक संवाद के स्तर पर अधिक प्रभावी हो सकती है।
हालांकि, यह भी ध्यान रखना होगा कि राज्यसभा नहीं भेजे जाने के पीछे बीजेपी की ओर से कोई ऐसा आधिकारिक कारण सार्वजनिक नहीं किया गया है, जिसे अंतिम निष्कर्ष माना जा सके।
अमेठी में स्थानीय मतदाताओं की नजर से क्या बदला?
अमेठी की राजनीति को केवल बीजेपी बनाम कांग्रेस के चश्मे से देखना भी पूरी तस्वीर नहीं देता।स्थानीय मतदाताओं के बीच 2024 के चुनाव को लेकर अलग-अलग राय रही। एक वर्ग ने स्थानीय उम्मीदवार और क्षेत्र से जुड़ाव को महत्व दिया, जबकि दूसरे मतदाताओं के लिए राष्ट्रीय मुद्दे अधिक महत्वपूर्ण रहे।राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अमेठी में 2019 और 2024 के बीच मतदाताओं की प्राथमिकताओं में बदलाव को समझना जरूरी है।
2019 में स्मृति ईरानी की जीत जहां कांग्रेस के पारंपरिक गढ़ में सत्ता परिवर्तन का प्रतीक बनी, वहीं 2024 में कांग्रेस की वापसी ने यह संदेश दिया कि अमेठी में राजनीतिक समीकरण स्थायी नहीं हैं।यही कारण है कि स्मृति ईरानी की वर्तमान भूमिका को केवल अमेठी की हार के संदर्भ में देखना राजनीतिक रूप से अधूरा विश्लेषण होगा।
विपक्ष के लिए भी ईरानी का बयान क्यों महत्वपूर्ण?
विपक्ष निश्चित रूप से स्मृति ईरानी की अमेठी में हार को बीजेपी की राजनीतिक कमजोरी के प्रतीक के रूप में पेश करता रहा है। दूसरी ओर, बीजेपी समर्थक इसे एक चुनावी परिणाम के रूप में देखते हैं और ईरानी की संगठनात्मक भूमिका को उनकी राजनीतिक क्षमता से जोड़ते हैं।विपक्षी दलों की ओर से इस बयान को लेकर यह तर्क सामने आ सकता है कि अगर ईरानी को दोबारा केंद्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिलती है, तो पार्टी को यह स्पष्ट करना होगा कि अमेठी की हार के बाद उनका राजनीतिक पुनर्वास किस रणनीति का हिस्सा है।
वहीं बीजेपी के नजरिए से देखें तो सवाल यह हो सकता है कि क्या संसद में होना ही किसी नेता की राजनीतिक ताकत का पैमाना है?
स्मृति ईरानी का जवाब इसी सवाल के इर्द-गिर्द घूमता है।
देवेंद्र फडणवीस के साथ पुरानी यादें भी सुनाईं
पॉडकास्ट में स्मृति ईरानी ने अपने शुरुआती संगठनात्मक दिनों को भी याद किया। उन्होंने बताया कि 2003 में जब वह महाराष्ट्र बीजेपी युवा मोर्चा में पदाधिकारी बनी थीं, तब देवेंद्र फडणवीस भी उनके साथ संगठन में महत्वपूर्ण भूमिका में थे।उन्होंने कहा कि उस दौर में दोनों ने कभी नहीं सोचा था कि वे भविष्य में इतनी बड़ी राजनीतिक जिम्मेदारियों तक पहुंचेंगे।ईरानी ने यह भी बताया कि युवा मोर्चा के दिनों में कार्यकर्ताओं की मदद के लिए वह घर से पेट्रोल और पानी तक के पैसे लिया करती थीं। उनके अनुसार, संगठन के वरिष्ठ नेताओं ने उन्हें यह सिखाया कि गरीब और जरूरतमंद कार्यकर्ता को साथ लेकर चलना संगठन की जिम्मेदारी है।
यही प्रसंग उनके मौजूदा बयान को और अर्थ देता है— राजनीति में पद से ज्यादा संगठन और कार्यकर्ता।
‘पीएम मोदी ने इग्नोर किया’ वाले वीडियो पर भी बोलीं ईरानी
पॉडकास्ट में बंगाल के एक कार्यक्रम का वह वीडियो भी चर्चा में आया, जिसे विपक्ष की ओर से इस दावे के साथ साझा किया गया था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्मृति ईरानी को नजरअंदाज किया।
ईरानी ने इस दावे को अलग नजरिए से देखा। उन्होंने कहा कि उस समय वह मिथुन चक्रवर्ती के साथ बैठी थीं और वीडियो में प्रधानमंत्री की पीठ दिखाई दे रही थी। ऐसे में केवल वीडियो के आधार पर यह तय करना संभव नहीं कि कौन किसका अभिवादन कर रहा था।
उन्होंने बंगाल के बीजेपी कार्यकर्ताओं के संघर्ष का जिक्र करते हुए कहा कि उस मंच पर मौजूद कई कार्यकर्ताओं ने कठिन परिस्थितियों का सामना किया था और उनके लिए चुनावी जीत अधिक महत्वपूर्ण थी।
शिक्षाविदों की नजर में ‘पद बनाम राजनीतिक प्रभाव’
राजनीति और लोकतांत्रिक संस्थाओं का अध्ययन करने वाले शिक्षाविदों के अनुसार, आधुनिक भारतीय राजनीति में किसी नेता की भूमिका को केवल उसके संवैधानिक पद से मापना पर्याप्त नहीं है।किसी नेता का प्रभाव पार्टी संगठन, जनसंपर्क, चुनावी रणनीति, मीडिया नैरेटिव और कार्यकर्ताओं के बीच स्वीकार्यता से भी तय होता है।
इस नजरिए से देखें तो स्मृति ईरानी का राज्यसभा सदस्य न होना उनकी राजनीतिक सक्रियता का अंत नहीं माना जा सकता। उलटे, केंद्रीय संगठन में भूमिका मिलने से वह पार्टी की रणनीति और चुनावी अभियान में अलग प्रकार की भूमिका निभा सकती हैं।
बड़ा सवाल: अमेठी से आगे की राजनीति क्या होगी?
स्मृति ईरानी की राजनीतिक कहानी अभी खत्म नहीं हुई है। बल्कि अमेठी की हार के बाद उनका अगला राजनीतिक अध्याय ज्यादा दिलचस्प हो गया है।एक तरफ 2019 की ऐतिहासिक जीत की विरासत है, दूसरी तरफ 2024 की हार का राजनीतिक सबक।
बीच में राज्यसभा न भेजे जाने का फैसला है और अब केंद्रीय टीम में वापसी।ऐसे में असली सवाल यह नहीं है कि स्मृति ईरानी राज्यसभा क्यों नहीं गईं?
असली सवाल यह है कि बीजेपी उन्हें आगे किस राजनीतिक भूमिका में इस्तेमाल करना चाहती है?
क्योंकि भारतीय राजनीति में कई बार संसद से बाहर बैठा नेता भी सत्ता के गलियारों में उतना ही प्रभावशाली हो सकता है, जितना सदन के भीतर बैठा सांसद।
और स्मृति ईरानी का ताजा बयान कम से कम इतना संकेत जरूर देता है कि अमेठी की हार को वह अपनी राजनीतिक यात्रा का ‘पूर्णविराम’ नहीं, बल्कि एक नया पड़ाव मान रही हैं।
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