सहारनपुर के मलबे में इतिहास का बंद दरवाजा! 20 फीट नीचे मिली संरचना ने बढ़ाई हलचल, शाहजहां काल से मंदिर तक के दावे पर पुरातत्व विभाग ने कहा—पहले प्रमाण लाइए पुरातत्व अधिकारी खुद उतरे 20 फीट नीचे

बी के झा

NSK news Ind

सहारनपुर, 7 सितंबर

मलबा कभी-कभी सिर्फ टूटे हुए पत्थर और ईंटें नहीं छिपाता, वह इतिहास के ऐसे सवाल भी सामने ला देता है जिनका जवाब वर्षों तक जमीन के नीचे दबा रहता है।उत्तर प्रदेश के सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में ध्वस्तीकरण के बाद सामने आई एक कुएं जैसी प्राचीन संरचना ने ऐसा ही सवाल खड़ा किया है। करीब 20 फीट गहरी इस संरचना के सामने आने के बाद अब सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि यह कुआं है या कोई दूसरी वास्तु संरचना—सवाल यह भी है कि इसे किसने बनाया, कब बनाया और इसका इस्तेमाल किस उद्देश्य से होता था?

उत्तर प्रदेश राज्य पुरातत्व विभाग के सहायक पुरातत्व अधिकारी मनोज कुमार यादव ने मौके पर पहुंचकर खुद संरचना के भीतर उतरकर निरीक्षण किया। प्रथम दृष्टया उन्होंने इसे उत्तर-मध्यकालीन वास्तुकला से जुड़ी संरचना बताया और इसकी उम्र करीब 200 से 250 वर्ष होने का अनुमान जताया है।

लेकिन कहानी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यही है—अभी अंतिम निष्कर्ष नहीं निकला है।

20 फीट नीचे क्या मिला?

पुरातत्व अधिकारी के मुताबिक संरचना की गहराई मौजूदा धरातल से लगभग 20 फीट है और इसका व्यास करीब तीन फीट बताया गया है।इसमें इस्तेमाल हुई ईंटें लखौरी ईंटें हैं, जिनका आकार लगभग 20×10×5 सेंटीमीटर बताया गया है। ईंटों को जोड़ने में चूना-सुर्खी यानी लाइम मोर्टार का इस्तेमाल दिखाई देता है। ऊपरी हिस्से में चूने का प्लास्टर भी मिला है।करीब तीन फीट की गहराई पर ऐसी निर्मित ईंट भी दिखाई दी है जिसे काटकर गोलाकार रूप दिए जाने की संभावना है।यानी नीचे सिर्फ ईंटों का गड्ढा नहीं, बल्कि किसी सुनियोजित निर्माण तकनीक के संकेत दिखाई दे रहे हैं।फिर भी पुरातत्व विज्ञान अनुमान से नहीं चलता।

कुआं है या कुछ और? अभी रहस्य कायम

सबसे दिलचस्प बात यह है कि अधिकारी भी इसे अभी निश्चित रूप से कुआं घोषित करने से बच रहे हैं।संरचना के भीतर मलबा भरा हुआ है। जब तक उसे वैज्ञानिक तरीके से हटाकर पूरी संरचना का अध्ययन नहीं किया जाता, तब तक यह कहना जल्दबाजी होगा कि यह वास्तव में कुआं ही है या किसी दूसरी वास्तु संरचना का हिस्सा।पुरातत्व विभाग की जांच का उद्देश्य भी यही है—संरचना की प्राचीनता, प्रकृति और ऐतिहासिक संदर्भ का वैज्ञानिक निर्धारण।

क्या यह शाहजहां के समय का है?

यही सवाल इस खोज को सबसे ज्यादा चर्चा में ला रहा है।लेकिन यहां इतिहास और राजनीतिक दावे के बीच एक स्पष्ट रेखा खींचना जरूरी है।मनोज कुमार यादव ने साफ कहा है कि किसी संरचना को किसी विशेष शासक से जोड़ने के लिए ठोस पुरातात्विक प्रमाण जरूरी हैं। सिक्का, मुहर, अभिलेख या ऐसा कोई प्रमाण मिलना चाहिए जो उस संरचना के काल और संबंध को स्थापित कर सके।

इसलिए अभी इसे शाहजहां काल की संरचना कहना इतिहास नहीं, सिर्फ अनुमान होगा।और यही बात मंदिर, धार्मिक स्थल या किसी अन्य धार्मिक दावे पर भी लागू होती है।संभावना इतिहास नहीं होती। प्रमाण इतिहास बनाता है।

क्या यह किसी पुराने धार्मिक स्थल का हिस्सा था?

यह सवाल भी उठ रहा है।लेकिन इसका जवाब भी फिलहाल पुरातत्व विभाग के पास नहीं है।किसी पुराने कुएं का किसी धार्मिक स्थल के आसपास होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि वह धार्मिक संरचना का हिस्सा था। उसी तरह किसी मस्जिद के नीचे से मिलने वाली पुरानी संरचना अपने आप में यह साबित नहीं करती कि वहां पहले मंदिर था।इतिहास को नारे से नहीं, स्तर-दर-स्तर मिले पुरातात्विक साक्ष्यों से पढ़ा जाता है।यही कारण है कि इस मामले में जल्दबाजी से निकाला गया कोई भी निष्कर्ष आने वाले वैज्ञानिक अध्ययन को प्रभावित कर सकता है।

राजनीतिक गलियारों में क्यों गरम है मामला?

यह खोज ऐसे समय सामने आई है जब कलेक्ट्रेट परिसर में मौजूद मस्जिद को लेकर पहले से ही राजनीतिक और कानूनी विवाद चल रहा था।प्रशासन ने अदालत के आदेश के बाद कार्रवाई की और ढांचे को हटाया। रिपोर्टों के मुताबिक संबंधित न्यायिक प्रक्रिया में निर्माण को सरकारी भूमि से जुड़ा अतिक्रमण माना गया था।

अब उसी स्थान से पुरानी संरचना मिलने के बाद राजनीतिक सवाल फिर तेज हो गए हैं।यहीं से दो अलग-अलग विमर्श सामने आते हैं—एक पक्ष पूछ रहा है: क्या इस संरचना के इतिहास की पूरी वैज्ञानिक जांच होनी चाहिए?

दूसरा सवाल: क्या इस खोज को धार्मिक या राजनीतिक दावे का आधार बनाया जाना चाहिए?

दोनों सवालों का जवाब अलग है।पहले सवाल का जवाब है—हां, वैज्ञानिक जांच होनी चाहिए।

दूसरे का जवाब फिलहाल—प्रमाण मिलने तक इंतजार।

हिंदू संगठनों के सामने भी परीक्षा

हिंदू संगठनों के लिए यह मामला भावनात्मक रूप से महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन यदि किसी संगठन की ओर से इसे मंदिर या प्राचीन हिंदू स्थल साबित करने का दावा किया जाता है तो उसकी पुष्टि पुरातात्विक साक्ष्यों से ही होगी।किसी धार्मिक दावे की विश्वसनीयता भी तभी मजबूत होगी जब उसके पीछे अभिलेख, स्थापत्य साक्ष्य, पुरातात्विक परतें या अन्य प्रमाण मौजूद हों।इतिहास को अपने पक्ष में साबित करने के लिए इतिहास के प्रमाणों का सम्मान करना ही सबसे मजबूत रास्ता है।

मुस्लिम समाज के लिए भी यही कसौटी

मुस्लिम समाज की ओर से यदि इस कार्रवाई या पुरानी संरचना को लेकर सवाल उठाए जाते हैं तो उन सवालों की जांच भी कानून और प्रमाण के आधार पर होनी चाहिए।किसी पुरानी संरचना का मिलना अपने आप में किसी समुदाय के खिलाफ प्रमाण नहीं है।पुरातत्व का उद्देश्य किसी समुदाय को दोषी या निर्दोष साबित करना नहीं, बल्कि अतीत को समझना है।

इसलिए मुस्लिम समाज और उसके धार्मिक नेतृत्व के लिए भी सबसे महत्वपूर्ण बात यही होगी कि जांच निष्पक्ष हो, वैज्ञानिक हो और जो प्रमाण सामने आएं, उन्हें स्वीकार किया जाए।

धर्माचार्यों और मौलानाओं के लिए बड़ा संदेश

हिंदू धर्माचार्य हों या मुस्लिम मौलाना—दोनों से समाज की अपेक्षा सिर्फ धार्मिक नेतृत्व की नहीं, बल्कि सामाजिक संयम की भी होती है।अगर संरचना से भविष्य में कोई महत्वपूर्ण प्रमाण मिलता है तो उस पर विशेषज्ञ बोलें, दस्तावेज बोलें और पुरातत्व बोले।

धर्मगुरुओं की जिम्मेदारी यह भी है कि अधूरी जानकारी के आधार पर ऐसा कोई दावा न किया जाए जिससे दो समुदायों के बीच तनाव पैदा हो।इतिहास की खुदाई को इतिहास तक ही रहने देना होगा, उसे सामाजिक टकराव की खुदाई नहीं बनने देना चाहिए।

कानूनविदों की नजर में मामला कहां खड़ा है?

कानूनी दृष्टि से किसी पुरानी संरचना की मौजूदगी अपने आप में जमीन के स्वामित्व या धार्मिक अधिकार का प्रमाण नहीं बनती।यदि आगे खुदाई होती है तो उसके लिए सक्षम प्रशासनिक और पुरातात्विक प्रक्रिया का पालन महत्वपूर्ण होगा। संरचना से यदि कोई पुरावशेष, अभिलेख या अन्य महत्वपूर्ण सामग्री मिलती है तो उसका संरक्षण और वैज्ञानिक परीक्षण भी उतना ही जरूरी होगा।इसलिए फिलहाल कानूनी लड़ाई से ज्यादा महत्वपूर्ण है—साक्ष्य सुरक्षित रखना।

शिक्षाविदों का सबसे बड़ा सवाल: बच्चों को कौन-सा इतिहास पढ़ाएंगे?

इस पूरे मामले का एक और महत्वपूर्ण पहलू शिक्षा से जुड़ा है।अगर कल जांच में पता चलता है कि यह संरचना 200-250 वर्ष पुरानी है, तो उसका इतिहास दर्ज होना चाहिए।अगर इससे भी पुरानी सामग्री मिलती है, तो उसका भी अध्ययन होना चाहिए।

और अगर अंततः यह साबित होता है कि इसका किसी धार्मिक दावे से संबंध नहीं था, तो वह निष्कर्ष भी उतनी ही ईमानदारी से स्वीकार किया जाना चाहिए।

क्योंकि विद्यार्थियों को ऐसा इतिहास नहीं चाहिए जो राजनीतिक सुविधा के अनुसार बदले।उन्हें ऐसा इतिहास चाहिए जो प्रमाण पर खड़ा हो।

समाजसेवी संगठनों की भूमिका क्या हो?

स्थानीय समाजसेवी और नागरिक संगठन इस मामले में तीन मांगों को आगे रख सकते हैं—

पहली— संरचना की सुरक्षा सुनिश्चित हो।

दूसरी— वैज्ञानिक जांच पूरी होने तक किसी प्रकार की छेड़छाड़ न हो।

तीसरी— जांच के निष्कर्ष सार्वजनिक किए जाएं।अगर कोई ऐतिहासिक प्रमाण सामने आता है तो उसे संग्रहित और संरक्षित किया जाना चाहिए।

यह किसी एक समुदाय की विरासत नहीं होगी—यह सहारनपुर और भारत की ऐतिहासिक विरासत होगी।

विपक्ष बनाम सरकार: जांच पर राजनीति या पारदर्शिता?

विपक्ष के लिए यह मामला प्रशासन से सवाल पूछने का अवसर है।सरकार और स्थानीय प्रशासन के लिए चुनौती यह है कि वह इस खोज को किसी राजनीतिक दावे की दिशा में जाने देने के बजाय पारदर्शी पुरातात्विक जांच कराए।प्रशासन पहले ही संरचना की सुरक्षा के लिए निगरानी बढ़ा चुका है और मौके पर सीसीटीवी लगाए जाने की जानकारी सामने आई है।

अब अगला सवाल यही है—

क्या यहां विस्तृत वैज्ञानिक खुदाई होगी?

और अगर होगी तो उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक होगी?

यही पारदर्शिता इस पूरे विवाद को अफवाहों से निकालकर तथ्य की जमीन पर ला सकती है।

सहारनपुर का इतिहास अभी खुला नहीं, सिर्फ दरवाजा खुला है

सहारनपुर और गंगा-यमुना दोआब का क्षेत्र ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण रहा है। पुरातत्व अधिकारी ने भी इस व्यापक क्षेत्र में विभिन्न कालखंडों से जुड़े अवशेष मिलने की बात कही है।इसलिए जमीन के नीचे से निकली यह संरचना कोई असंभव खोज नहीं है।लेकिन इसकी असली कहानी अभी बंद है।

20 फीट नीचे एक संरचना मिली है।

200-250 वर्ष की प्रारंभिक संभावना सामने आई है।

लखौरी ईंटें मिली हैं।चूना-सुर्खी का इस्तेमाल दिख रहा है।लेकिन इसका निर्माता कौन था—पता नहीं।

उद्देश्य क्या था—पता नहीं।

शाहजहां काल से संबंध—सिद्ध नहीं।

मंदिर से संबंध—सिद्ध नहीं।

मस्जिद से संबंध—सिद्ध नहीं।

और यही इस खबर का सबसे बड़ा सच है।

NSK News India का विश्लेषण

सहारनपुर की जमीन ने एक सवाल उठाया है, लेकिन अभी उसका जवाब नहीं दिया है।इसलिए इस समय सबसे जिम्मेदार पत्रकारिता यह नहीं होगी कि हम कह दें—“यह शाहजहां के समय का कुआं है”, या “यह मंदिर का प्रमाण है”।

जिम्मेदार पत्रकारिता यह पूछेगी—कुआं आखिर कितना पुराना है?

इसे किसने बनाया?

किस उद्देश्य से बनाया?

इसके नीचे और क्या छिपा है?

क्या कोई अभिलेख, सिक्का या अन्य पुरावशेष मिलता है?

और क्या वैज्ञानिक जांच की पूरी रिपोर्ट जनता के सामने आएगी?

इतिहास किसी के पक्ष में फैसला सुनाने के लिए नहीं होता।इतिहास वह आईना है जिसमें समाज अपने अतीत को देखता है—और उस आईने पर राजनीति की धूल नहीं, प्रमाण की रोशनी पड़नी चाहिए।

फिलहाल सहारनपुर के इस 20 फीट गहरे रहस्य का फैसला न हिंदू संगठन कर सकते हैं, न मुस्लिम समाज, न सत्ता और न विपक्ष।

फैसला करेगा—साक्ष्य। और अब निगाहें उसी पर हैं।

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