पूर्व CM के PA के घर ED की रेड: 32 लाख कैश, 200 ग्राम सोना और 1.28 करोड़ की महंगी घड़ियां; 2016 की भर्ती में OMR से ‘खेल’ का पैसा कहां गया? ED की कार्रवाई ने उत्तराखंड की भर्ती व्यवस्था पर फिर खड़े किए गंभीर सवाल

बी के झा

देहरादून, 11 सितंबर

उत्तराखंड में सरकारी नौकरी की परीक्षा सिर्फ एक परीक्षा नहीं होती। यह हजारों युवाओं के भविष्य, उनके परिवारों की उम्मीद और सरकारी व्यवस्था पर भरोसे की परीक्षा भी होती है। ऐसे में यदि किसी भर्ती परीक्षा की OMR शीट में पैसे लेकर कथित तौर पर जवाब बदले जाने का आरोप सामने आए और उसी मामले की मनी लॉन्ड्रिंग जांच में किसी पूर्व मुख्यमंत्री के करीबी के घर से लाखों की नकदी, सोना और करोड़ों रुपये मूल्य की महंगी घड़ियां बरामद होने का दावा हो, तो सवाल सिर्फ एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता—पूरी भर्ती व्यवस्था की विश्वसनीयता कटघरे में आ जाती है।

प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने 10 सितंबर 2026 को देहरादून में कई ठिकानों पर छापेमारी की। कार्रवाई धन शोधन निवारण अधिनियम यानी PMLA के तहत बताई गई है। जांच का संबंध उत्तराखंड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग (UKSSSC) की 2016 की ग्राम पंचायत विकास अधिकारी यानी VPDO भर्ती परीक्षा में कथित OMR हेरफेर से है।मामले की गंभीरता इसलिए और बढ़ जाती है क्योंकि तलाशी एक ऐसे व्यक्ति के घर तक पहुंची, जो उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश सिंह रावत के निजी सहायक के रूप में काम कर रहा है और इससे पहले उनके मुख्यमंत्री कार्यकाल में OSD भी रह चुका है।

पूर्व CM के PA के घर से क्या मिला?

ED के अनुसार, चंदन सिंह जीना के आवास से करीब 32 लाख रुपये की बेहिसाब नकदी और लगभग 200.5 ग्राम सोना बरामद हुआ। इसमें सोने के सिक्के और चेन शामिल हैं।जांच एजेंसी के मुताबिक, वहां Rolex, Rado, Piaget, Movado, Tissot और Casio Edifice जैसे ब्रांड की कुल 12 घड़ियां भी मिलीं, जिनकी कीमत लगभग 1.28 करोड़ रुपये आंकी गई है।

कुछ घड़ियों का मूल्यांकन अभी अलग से किया जाना बताया गया है।इसके अलावा जीना और उनके परिवार के सदस्यों से जुड़े बैंक खातों को भी PMLA के तहत फ्रीज किया गया, जिनमें करीब 52.16 लाख रुपये का बैलेंस होने की बात ED ने कही है।

यहां सबसे महत्वपूर्ण शब्द है—‘ज्ञात आय से मेल न खाने वाली संपत्ति’। हालांकि अंतिम निष्कर्ष जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही सामने आएगा।

OMR में छेड़छाड़ का आरोप—यानी मेरिट से ज्यादा पैसा?

2016 में आयोजित VPDO परीक्षा में 196 पदों के लिए परीक्षा हुई थी। बाद में OMR शीट में हेरफेर के आरोपों ने पूरी चयन प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर दिए। परीक्षा रद्द हुई और बाद में दोबारा परीक्षा कराई गई। 2018 की पुनर्परीक्षा में पहले चयनित 196 अभ्यर्थियों में से केवल आठ उम्मीदवारों के दोबारा चयन की जानकारी सामने आई थी।यानी विवाद महज कागज की एक गलती का नहीं था।आरोप था कि कुछ OMR शीट ऐसी चुनी गईं जिनमें कम उत्तर भरे थे। फिर कथित तौर पर उनके रोल नंबर अलग किए गए और निजी कंप्यूटर एजेंसी से जुड़े लोगों के जरिए OMR में उत्तर भरे या बदले गए।

यदि जांच में यह आरोप प्रमाणित होता है तो यह भर्ती घोटाले का वह रूप है जिसमें पेपर लीक करने की जरूरत भी नहीं पड़ती—अभ्यर्थी की परीक्षा देने के बाद उसकी कॉपी ही कथित तौर पर बदल दी जाती है।यही इस मामले को बेहद गंभीर बनाता है।

सवाल OMR से निकलकर ‘मनी ट्रेल’ तक पहुंच गया

ED की कार्रवाई का असली महत्व यहीं है।किसी भर्ती परीक्षा में अनियमितता की जांच एक बात है, लेकिन उस कथित अनियमितता से पैदा हुई रकम कहां गई, किसके पास पहुंची और उस रकम से कौन-सी संपत्तियां बनाई गईं—यह जांच धन शोधन कानून के दायरे में आती है।

ED पहले भी UKSSSC से जुड़े मामलों में संपत्तियों पर कार्रवाई कर चुकी है। अगस्त 2026 में एजेंसी ने आरोपी हाकम सिंह रावत की करीब 63.30 लाख रुपये की चल-अचल संपत्तियां PMLA के तहत अटैच की थीं। जांच में 2016 और 2021 की VDO/VPDO परीक्षाओं से जुड़े पेपर लीक और भर्ती में हेरफेर के आरोप सामने आए थे।इसलिए 10 सितंबर की कार्रवाई को अलग-थलग घटना के बजाय UKSSSC भर्ती घोटालों की लंबी वित्तीय जांच की अगली कड़ी के रूप में देखना अधिक महत्वपूर्ण है।

पूर्व मुख्यमंत्री के PA तक पहुंची जांच, इसलिए बढ़ा राजनीतिक तापमान

चंदन सिंह जीना का पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के साथ राजनीतिक-प्रशासनिक जुड़ाव इस मामले को स्वाभाविक रूप से राजनीतिक बहस के केंद्र में ला सकता है।लेकिन यहां एक जरूरी कानूनी सावधानी भी है।किसी व्यक्ति का किसी मुख्यमंत्री या राजनीतिक नेता का PA अथवा OSD होना अपने आप में अपराध में संलिप्तता का प्रमाण नहीं है।ED की बरामदगी और जांच के दावों को अंतिम दोषसिद्धि तभी माना जा सकता है जब अदालत में आरोप प्रमाणित हों।

यही लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियादी कसौटी है—जांच एजेंसी का आरोप अलग चीज है और अदालत से सिद्ध अपराध अलग।

भाजपा के लिए भी यह सिर्फ विपक्ष पर हमला करने का मुद्दा नहीं

सत्तारूढ़ भाजपा के लिए यह मामला राजनीतिक रूप से दोधारी तलवार है।एक तरफ सरकार यह तर्क दे सकती है कि पुरानी भर्ती अनियमितताओं पर भी कार्रवाई हो रही है और भ्रष्टाचार के खिलाफ एजेंसियां स्वतंत्र रूप से जांच कर रही हैं।

दूसरी तरफ विपक्ष यह सवाल उठा सकता है कि आखिर भर्ती व्यवस्था में ऐसी खामियां पैदा ही क्यों हुईं जिनमें परीक्षा के बाद OMR शीट तक कथित तौर पर सुरक्षित सरकारी व्यवस्था से बाहर पहुंच गई?

राजनीतिक रूप से भाजपा के लिए सबसे मजबूत स्थिति यही होगी कि सरकार पारदर्शी जांच, समयबद्ध कार्रवाई और दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ बिना राजनीतिक भेदभाव के कार्रवाई का स्पष्ट रोडमैप सामने रखे।क्योंकि भर्ती घोटालों में केवल आरोपी पकड़ना पर्याप्त नहीं होता; व्यवस्था की उन दरारों को बंद करना भी जरूरी है जिनसे भ्रष्टाचार अंदर आया।

कानूनविदों की नजर में सबसे अहम सवाल—‘प्रोसीड्स ऑफ क्राइम’ कहां हैं?

कानूनी दृष्टि से PMLA की जांच का केंद्र केवल बरामद नकदी या सोना नहीं होता। जांच एजेंसी को यह स्थापित करना होता है कि संबंधित संपत्ति या धन कथित आपराधिक गतिविधि से जुड़े ‘proceeds of crime’ हैं या नहीं।इसलिए आगे की जांच में

बैंक लेन-देन,

संपत्ति खरीद,

आयकर रिकॉर्ड,

नकदी के स्रोत,

डिजिटल उपकरणों,

कथित बिचौलियों और परीक्षा प्रक्रिया से जुड़े लोगों के बीच संपर्क महत्वपूर्ण हो सकते हैं।यही कारण है कि जीना का मोबाइल फोन जब्त किया जाना और बैंक खातों की जांच महज औपचारिक कार्रवाई नहीं मानी जा सकती।

समाजसेवी संगठनों का बड़ा सवाल—योग्य युवाओं के साथ कौन न्याय करेगा?

भर्ती घोटाले का सबसे बड़ा नुकसान किसी आरोपी की संपत्ति से नहीं मापा जा सकता।उसका असली नुकसान उस युवा के भविष्य से मापा जाना चाहिए जिसने वर्षों तक पढ़ाई की, परीक्षा दी और यह सोचकर परिणाम का इंतजार किया कि उसकी मेहनत का फैसला मेरिट करेगी।यदि किसी अभ्यर्थी के अंक पैसे के आधार पर बढ़ाए गए, तो उससे केवल एक नौकरी नहीं छीनी गई—उससे व्यवस्था पर भरोसा छीना गया।यही वजह है कि भर्ती परीक्षाओं में

OMR की सुरक्षा,

डिजिटल लॉग,

CCTV निगरानी,

प्रश्नपत्र और उत्तरपुस्तिका की कस्टडी तथा हर स्तर पर जवाबदेही को केवल तकनीकी विषय नहीं बल्कि सार्वजनिक हित का विषय माना जाना चाहिए।

2016 की कहानी आज भी क्यों महत्वपूर्ण है?

सबसे बड़ा सवाल यही है कि 2016 में हुई कथित गड़बड़ी की परतें 2026 तक क्यों खुल रही हैं?

अगर किसी भर्ती में OMR से छेड़छाड़ के आरोप इतने गंभीर थे कि पूरी चयन प्रक्रिया निरस्त करनी पड़ी और दोबारा परीक्षा करानी पड़ी, तो उस समय वित्तीय नेटवर्क की पूरी तस्वीर सामने क्यों नहीं आई?

यही सवाल उत्तराखंड की भर्ती व्यवस्था पर सबसे बड़ा राजनीतिक और प्रशासनिक प्रश्नचिह्न लगाता है।पुरानी परीक्षा में गड़बड़ी केवल पुरानी फाइल नहीं है।जिस व्यवस्था ने उस समय युवाओं के भरोसे को चोट पहुंचाई, उसकी जवाबदेही आज भी तय होनी बाकी है।

असली लड़ाई अब ‘किसके घर कितना मिला’ से आगे की है

32 लाख रुपये की नकदी, 200 ग्राम से ज्यादा सोना और महंगी घड़ियां निश्चित तौर पर सुर्खियां बनेंगी।लेकिन इस मामले का वास्तविक निष्कर्ष बरामद सामान की कीमत से नहीं निकलेगा।

असल सवाल होंगे—पैसा आया कहां से?

किसने दिया?

किसके लिए दिया गया?

OMR किसके निर्देश पर बदली गई?

कौन-कौन लोग इस नेटवर्क में शामिल थे?

क्या कथित अवैध रकम से कोई संपत्ति बनाई गई?

और सबसे महत्वपूर्ण—क्या उस नेटवर्क की आखिरी कड़ी तक जांच पहुंचेगी?

यदि ED और अन्य जांच एजेंसियां इन सवालों के जवाब खोज लेती हैं, तभी 2016 का VPDO प्रकरण महज एक पुराना भर्ती घोटाला नहीं रहेगा, बल्कि उत्तराखंड में सरकारी भर्ती व्यवस्था को भ्रष्टाचार से मुक्त करने की दिशा में निर्णायक केस बन सकता है।

NSK निष्कर्ष

उत्तराखंड के युवाओं के लिए सरकारी नौकरी सिर्फ रोजगार नहीं, सामाजिक सम्मान और आर्थिक सुरक्षा का रास्ता है। इसलिए भर्ती परीक्षा में कथित OMR हेरफेर को किसी भी राजनीतिक रंग से ऊपर उठकर देखना होगा।

सरकार भाजपा की हो या कांग्रेस की, आरोपी किसी भी राजनीतिक खेमे से जुड़ा हो—भर्ती की मेज पर केवल मेरिट चलनी चाहिए, पहुंच और पैसा नहीं।

ED की मौजूदा कार्रवाई ने एक दशक पुराने सवाल को फिर जिंदा कर दिया है।

अब देखना यह है कि जांच 32 लाख की नकदी और महंगी घड़ियों पर रुकती है या उस कथित नेटवर्क की उस आखिरी कड़ी तक पहुंचती है,

जहां से ‘नौकरी के बदले पैसे’ का पूरा खेल संचालित हुआ।

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