बी के झा
NSK news Ind


नई दिल्ली, 12 सितंबर
राजधानी दिल्ली आज सिर्फ एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन की मेजबानी नहीं कर रही, बल्कि वैश्विक राजनीति के बदलते समीकरणों की एक महत्वपूर्ण तस्वीर पेश करने जा रही है। 18वें BRICS शिखर सम्मेलन की शुरुआत के साथ भारत मंडपम दुनिया की कूटनीतिक गतिविधियों का केंद्र बनने वाला है। मंच पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मौजूदगी इस सम्मेलन को असाधारण रणनीतिक महत्व दे रही है।
BRICS के मंच पर दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं और उभरती शक्तियों के नेताओं का जमावड़ा ऐसे समय हो रहा है, जब वैश्विक व्यवस्था पुराने शक्ति-संतुलन से आगे बढ़कर एक बहुध्रुवीय स्वरूप की ओर बढ़ रही है। ऐसे में दिल्ली से निकलने वाले संदेश को केवल BRICS तक सीमित करके नहीं देखा जा रहा। इसकी गूंज वैश्विक कूटनीति, व्यापार और रणनीतिक साझेदारियों तक सुनाई दे सकती है।
एक फ्रेम में मोदी, पुतिन और जिनपिंग—दुनिया की निगाहें दिल्ली पर
आज BRICS के मंच पर तीन बड़े चेहरे एक साथ दिखाई देंगे—प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग। तीनों देशों के बीच संबंधों की अपनी अलग जटिलताएं और रणनीतिक प्राथमिकताएं हैं, लेकिन BRICS का मंच उन्हें एक साझा बहुपक्षीय ढांचे में साथ लाता है।
एक दिन पहले BRICS बिजनेस फोरम में प्रधानमंत्री मोदी ने भारत को वैश्विक भरोसे के केंद्र के रूप में पेश किया। यह संदेश महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत खुद को केवल तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के रूप में नहीं, बल्कि वैश्विक दक्षिण और विकसित होती बहुध्रुवीय दुनिया के बीच एक भरोसेमंद सेतु के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहा है।
मोदी-जिनपिंग मुलाकात पर सबसे ज्यादा नजर
आज की सबसे महत्वपूर्ण द्विपक्षीय गतिविधियों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात शामिल है। करीब सात वर्ष बाद जिनपिंग की भारत यात्रा को दोनों देशों के रिश्तों के संदर्भ में बेहद अहम माना जा रहा है।भारत और चीन के संबंधों में सीमा विवाद के कारण लंबे समय से तनाव रहा है। ऐसे में दोनों नेताओं की मुलाकात सिर्फ औपचारिक कूटनीतिक मुलाकात नहीं होगी, बल्कि यह देखने का अवसर भी होगी कि दोनों देश रिश्तों को किस दिशा में आगे ले जाना चाहते हैं।
बैठक में सीमा पर शांति और स्थिरता के साथ-साथ विश्वास बहाली, द्विपक्षीय व्यापार, ट्रेड डेफिसिट और आर्थिक सहयोग जैसे मुद्दे प्रमुखता से उठ सकते हैं। सवाल यही है कि क्या दोनों एशियाई शक्तियां प्रतिस्पर्धा के बीच सहयोग की कोई नई जमीन तैयार कर पाएंगी?
BRICS का एजेंडा: डॉलर से आगे राष्ट्रीय मुद्राओं की बहस
BRICS के भीतर आर्थिक व्यवस्था को लेकर भी चर्चा तेज है। ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने कहा है कि सदस्य देशों की अलग-अलग राय होने के बावजूद इस बात पर सहमति है कि राष्ट्रीय मुद्राओं को मजबूत किया जाना चाहिए और सदस्य देशों के बीच व्यापार में राष्ट्रीय मुद्राओं का इस्तेमाल बढ़ना चाहिए।यह बयान वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में चल रही एक बड़ी बहस की ओर संकेत करता है।
BRICS देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने की चर्चा लंबे समय से होती रही है। हालांकि, साझा मुद्रा की दिशा में आगे बढ़ना एक अलग और कहीं अधिक जटिल विषय है।इसलिए दिल्ली सम्मेलन में आर्थिक सहयोग की दिशा में होने वाली चर्चा का महत्व सिर्फ BRICS देशों तक सीमित नहीं रहेगा।
दुनिया यह देखेगी कि उभरती अर्थव्यवस्थाएं वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में अपनी भूमिका को किस तरह मजबूत करना चाहती हैं।
WTO से WHO तक, दिल्ली में वैश्विक संस्थाओं की मौजूदगी
BRICS सम्मेलन की व्यापकता का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि विश्व व्यापार संगठन की महानिदेशक न्गोजी ओकोन्जो-इवेला और विश्व स्वास्थ्य संगठन के महानिदेशक डॉ. टेड्रोस एडनोम घेब्रेयेसस भी दिल्ली पहुंच चुके हैं।फिलीपींस के राष्ट्रपति फर्डिनेंड रोमुआल्डेज मार्कोस भी सम्मेलन में शामिल होने भारत पहुंचे हैं। वहीं क्यूबा के विदेश मंत्री ब्रूनो रोड्रिग्ज पारिला भी दिल्ली पहुंच चुके हैं।इस तरह भारत की राजधानी आज सिर्फ राष्ट्राध्यक्षों की बैठक का केंद्र नहीं, बल्कि व्यापार, स्वास्थ्य, विकास और वैश्विक शासन से जुड़े विमर्श का भी महत्वपूर्ण मंच बन रही है।
बंद कमरे की बैठक से डिनर डिप्लोमेसी तक
भारत मंडपम में BRICS नेताओं का क्लोज्ड-डोर सेशन होगा। बंद कमरे में होने वाली चर्चाओं में वैश्विक अर्थव्यवस्था, व्यापार, विकास, बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार और अंतरराष्ट्रीय चुनौतियों जैसे मुद्दों पर विचार-विमर्श होने की उम्मीद है।
देर शाम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मेजबानी में डिनर का आयोजन भी होगा। कूटनीति में ऐसे अनौपचारिक अवसरों को अक्सर औपचारिक बैठकों से कम महत्वपूर्ण नहीं माना जाता। कई बार बंद कमरे की बातचीत और अनौपचारिक संवाद ही रिश्तों में जमी बर्फ पिघलाने का रास्ता खोलते हैं।
दिल्ली से दुनिया को क्या संदेश मिलेगा?
18वां BRICS सम्मेलन भारत के लिए केवल मेजबानी का अवसर नहीं है। यह अपनी कूटनीतिक क्षमता, आर्थिक ताकत और वैश्विक भूमिका को प्रदर्शित करने का भी मंच है।मोदी-पुतिन-जिनपिंग की एक साथ मौजूदगी अपने आप में एक बड़ा दृश्य होगा, लेकिन असली महत्व उस संदेश का होगा जो इस सम्मेलन के फैसलों और संवाद से निकलेगा।
क्या BRICS वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में अपनी भूमिका और मजबूत करेगा?
क्या भारत और चीन रिश्तों में नई शुरुआत की जमीन तैयार करेंगे?
क्या राष्ट्रीय मुद्राओं में व्यापार को नई गति मिलेगी?
और क्या दिल्ली से बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की कोई ठोस तस्वीर सामने आएगी?
इन सवालों के जवाब आज होने वाली बैठकों और आने वाले दिनों में सामने आने वाले फैसलों में छिपे होंगे।
फिलहाल इतना तय है—आज दुनिया की नजरें दिल्ली पर हैं और भारत मंडपम सिर्फ सम्मेलन स्थल नहीं, बल्कि बदलती विश्व व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण मंच बन चुका है।
