सहारनपुर के बाद लखीमपुर में मस्जिद के हिस्से पर कार्रवाई का आदेश, 36,750 रुपये जुर्माना; पुनर्विचार याचिका से फिर खुला मामला

बी के झा

NSK news Ind

लखीमपुर खीरी/धौरहरा, 13 सितंबर

उत्तर प्रदेश में सार्वजनिक भूमि पर कथित अतिक्रमण का मामला एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। सहारनपुर में धार्मिक स्थल के हिस्से पर प्रशासनिक कार्रवाई के बाद अब लखीमपुर खीरी के धौरहरा क्षेत्र में सार्वजनिक उपयोग के लिए दर्ज जमीन पर मस्जिद के हिस्से के निर्माण को लेकर तहसीलदार न्यायालय का आदेश सामने आया है। हालांकि, इस मामले की तस्वीर अभी अंतिम नहीं है, क्योंकि प्रतिवादी की ओर से आदेश के खिलाफ पुनर्विचार/बाजदायर प्रार्थनापत्र दाखिल किया गया है, जिसे तहसीलदार ने स्वीकार करते हुए दोबारा सुनवाई का आदेश दिया है।

मामला ग्राम व परगना धौरहरा की गाटा संख्या 1954/1.121 हेक्टेयर भूमि से जुड़ा है, जो राजस्व अभिलेखों में सड़क के नाम दर्ज बताई गई है। प्रशासन के मुताबिक इसी भूमि के 0.105 हेक्टेयर हिस्से पर जियाउल्ला खां पुत्र कुर्बान, निवासी जवाहर नगर, धौरहरा द्वारा पक्का निर्माण कर कब्जा किए जाने की शिकायत सामने आई थी।लेखपाल की रिपोर्ट के बाद पहुंचा मामला तहसीलदार कोर्ट मामले में क्षेत्रीय लेखपाल ने ग्रामीणों की मौजूदगी में भूमि का निरीक्षण कर रिपोर्ट तहसीलदार न्यायालय में प्रस्तुत की।

रिपोर्ट के अनुसार संबंधित भूमि के हिस्से में पक्का निर्माण पाया गया। तहसीलदार आदित्य विशाल की अदालत में उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता की धारा 67 के तहत मामले की सुनवाई हुई।नौ सितंबर को पारित आदेश में अदालत ने कथित अतिक्रमण को हटाने और संबंधित व्यक्ति को जमीन से बेदखल करने के साथ 36,750 रुपये का अर्थदंड जमा कराने का निर्देश दिया।यानी प्रशासनिक रिकॉर्ड के मुताबिक कार्रवाई का मूल आधार धार्मिक पहचान नहीं, बल्कि भूमि का राजस्व रिकॉर्ड और कथित अतिक्रमण है। यही बिंदु इस पूरे मामले को समझने में सबसे महत्वपूर्ण है।लेकिन कहानी अभी खत्म नहीं हुई आदेश आने के बाद जियाउल्ला खां की ओर से पुनर्विचार के लिए प्रार्थनापत्र दाखिल किया गया।

प्रतिवादी का कहना है कि मामला अभी अदालत में विचाराधीन है और आदेश के खिलाफ उन्होंने अपनी आपत्ति दर्ज कराई है।तहसीलदार आदित्य विशाल ने भी स्पष्ट किया कि पहले आदेश पारित हो चुका है, लेकिन विपक्ष की ओर से बाजदायर प्रार्थनापत्र प्रस्तुत किया गया है। अब इस पर दोबारा सुनवाई होगी और उसके बाद ही आगे का फैसला किया जाएगा।इसका अर्थ साफ है कि फिलहाल इसे अंतिम और अपरिवर्तनीय प्रशासनिक कार्रवाई के रूप में देखना जल्दबाजी होगी।

कानून बनाम धार्मिक पहचान—बहस का असली केंद्र

इस मामले ने एक बार फिर उत्तर प्रदेश में सार्वजनिक भूमि पर बने धार्मिक ढांचों को लेकर पुरानी बहस को हवा दी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ऐसे मामलों में प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती दोहरी होती है—एक तरफ सरकारी अथवा सार्वजनिक भूमि को अतिक्रमण से मुक्त कराना और दूसरी तरफ कार्रवाई को इस तरह अंजाम देना कि वह किसी समुदाय विशेष के खिलाफ कार्रवाई के रूप में प्रस्तुत न हो।

कानूनविदों की नजर में राजस्व अभिलेख, भूमि की वास्तविक स्थिति, निर्माण की वैधता और संबंधित पक्ष को अपना पक्ष रखने का अवसर—ये सभी महत्वपूर्ण प्रश्न हैं। यदि भूमि वास्तव में सार्वजनिक उपयोग के लिए दर्ज है और निर्माण बिना वैध अनुमति हुआ है तो कानून के अनुसार कार्रवाई का रास्ता खुलता है।

वहीं, यदि प्रभावित पक्ष के पास भूमि अथवा निर्माण से संबंधित कोई वैध दस्तावेज या न्यायिक राहत का आधार है, तो उसे सुनवाई का पूरा अवसर मिलना भी न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा है।

मुस्लिम संगठनों की संभावित चिंता भी महत्वपूर्ण

स्थानीय मुस्लिम संगठनों और मौलानाओं के नजरिए से इस तरह के मामलों में सबसे बड़ा सवाल यह रहता है कि प्रशासनिक कार्रवाई कानूनी मानकों पर समान रूप से लागू हो और धार्मिक पहचान के आधार पर किसी तरह का भेदभाव न हो।मुस्लिम पक्ष के लिए यह जरूरी होगा कि यदि निर्माण को लेकर कोई वैध दस्तावेज, पुराना राजस्व रिकॉर्ड, अनुमति या न्यायालय से संबंधित आदेश मौजूद है तो उसे पुनर्विचार की सुनवाई में प्रस्तुत किया जाए। दूसरी ओर, प्रशासन के लिए भी जरूरी है कि कार्रवाई की पूरी प्रक्रिया पारदर्शी रहे और प्रत्येक पक्ष को अपना पक्ष रखने का अवसर मिले।

विपक्ष के लिए भी बड़ा राजनीतिक सवाल

विपक्षी दल ऐसे मामलों में अक्सर प्रशासनिक कार्रवाई की निष्पक्षता पर सवाल उठाते रहे हैं। राजनीतिक तौर पर यह मुद्दा इसलिए भी संवेदनशील है क्योंकि धार्मिक स्थल से जुड़ा कोई भी प्रशासनिक फैसला तेजी से राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन सकता है।विपक्ष यदि इस कार्रवाई को भेदभावपूर्ण बताता है तो उसे यह भी स्पष्ट करना होगा कि राजस्व अभिलेख में दर्ज भूमि और कथित अतिक्रमण के तथ्य पर उसकी आपत्ति क्या है।

वहीं सत्ता पक्ष और प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वह केवल कार्रवाई का आदेश जारी करने के बजाय यह भी सार्वजनिक करे कि समान परिस्थितियों में अन्य समुदायों और अन्य धार्मिक स्थलों से जुड़े मामलों में क्या कार्रवाई की गई है।यही पारदर्शिता राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बीच प्रशासन की विश्वसनीयता को मजबूत कर सकती है।

समाजसेवी संस्थाओं की नजर में समाधान टकराव नहीं, पारदर्शिता

सामाजिक संगठनों और नागरिक समूहों के लिए यह मामला एक व्यापक सवाल खड़ा करता है—क्या सार्वजनिक उपयोग की जमीन पर किसी भी प्रकार का अतिक्रमण स्वीकार किया जा सकता है?

यदि जवाब नहीं है तो कार्रवाई सभी मामलों में समान होनी चाहिए। सड़क, तालाब, नाला, सरकारी जमीन या अन्य सार्वजनिक उपयोग की भूमि पर अतिक्रमण किसी भी व्यक्ति या समुदाय द्वारा किया गया हो, कानून का पैमाना एक जैसा होना चाहिए।

शिक्षाविदों का मानना है कि धार्मिक भावनाओं से जुड़े मामलों में प्रशासनिक भाषा और कार्रवाई दोनों संयमित होनी चाहिए। इससे कानून का संदेश भी स्पष्ट जाता है और सामाजिक तनाव की संभावना भी कम होती है।

लखीमपुर में लोक अदालत ने भी दिखाया कानून का दूसरा चेहरा

इसी बीच लखीमपुर खीरी में आयोजित राष्ट्रीय लोक अदालत ने न्याय व्यवस्था का एक दूसरा मानवीय पक्ष सामने रखा। जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के अध्यक्ष जिला जज शिवकुमार सिंह की अध्यक्षता में आयोजित लोक अदालत में जिले की विभिन्न अदालतों में 80 हजार से अधिक मामलों का निस्तारण किया गया।

राजस्व अदालतों में ही 75,497 वादों का निस्तारण हुआ।

परिवार न्यायालय से 30 जोड़े आपसी मतभेद भुलाकर साथ रहने के लिए विदा हुए।

दुर्घटना दावा प्राधिकरण की जज डॉ. कपिला राघव ने 187 दुर्घटना प्रतिकर मामलों का समझौते के आधार पर निस्तारण करते हुए पीड़ित पक्षों को 10 करोड़ 65 लाख 76 हजार रुपये से अधिक की प्रतिकर राशि दिलाई।

जिला जज शिवकुमार सिंह ने चार वादों का निस्तारण किया, जबकि विशेष न्यायाधीश विद्युत अधिनियम ने 356 मामलों का निस्तारण किया।

जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव अम्बरीष त्रिपाठी ने लोक अदालत की उपलब्धियों की जानकारी दी।

एनएसके विश्लेषण : असली कसौटी कार्रवाई नहीं, समानता है

लखीमपुर का यह मामला केवल एक मस्जिद के हिस्से या 36,750 रुपये के जुर्माने तक सीमित नहीं है।

असली सवाल इससे कहीं बड़ा है—सार्वजनिक जमीन पर अतिक्रमण के खिलाफ कानून कितना निष्पक्ष और समान रूप से लागू होता है?

यदि राजस्व रिकॉर्ड में जमीन सड़क के नाम दर्ज है और जांच में अवैध कब्जा प्रमाणित होता है तो कानून के मुताबिक कार्रवाई स्वाभाविक है। लेकिन धार्मिक स्थल से जुड़ा मामला होने के कारण प्रशासन की जिम्मेदारी सामान्य अतिक्रमण से कहीं अधिक बढ़ जाती है।

कार्रवाई की पारदर्शिता,

पक्षकार को सुनवाई का अधिकार,

दस्तावेजों की जांच और समान परिस्थितियों में समान कानून—यही चार कसौटियां तय करेंगी कि यह मामला केवल एक राजस्व विवाद बनकर रह जाता है या फिर उत्तर प्रदेश में धार्मिक स्थलों और सार्वजनिक भूमि से जुड़े विवादों की बड़ी राजनीतिक बहस का हिस्सा बनता है।

फिलहाल महत्वपूर्ण तथ्य यही है कि तहसीलदार का प्रारंभिक आदेश आ चुका है, लेकिन प्रतिवादी की पुनर्विचार अर्जी स्वीकार हो चुकी है।

इसलिए अंतिम निष्कर्ष से पहले अगली सुनवाई और उसके फैसले का इंतजार करना ही कानून और पत्रकारिता—दोनों की दृष्टि से उचित होगा।

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