BRICS में आधी रात तक चली कूटनीति! टैरिफ और एकतरफा प्रतिबंधों पर BRICS का सख्त रुख, आतंकवाद पर दो टूक संदेश; पहलगाम हमले की निंदा और UNSC में भारत की स्थायी सदस्यता का समर्थन—फिलिस्तीन पर प्रस्ताव से इजरायल को कूटनीतिक झटका

बी के झा

NSK news Ind

नई दिल्ली, 13 सितंबर

भारत की राजधानी में आयोजित BRICS शिखर सम्मेलन का मंच शनिवार को केवल घोषणाओं का मंच नहीं रहा, बल्कि पर्दे के पीछे चल रही गहन कूटनीतिक कवायद का भी गवाह बना। ‘नई दिल्ली घोषणा-पत्र-2026’ को सर्वसम्मति से जारी कराने के लिए भारत को आधी रात के बाद तक विभिन्न सदस्य देशों के साथ बातचीत करनी पड़ी।

सूत्रों के मुताबिक, ईरान को साझा घोषणा पर सहमत कराने की कोशिश शनिवार सुबह करीब चार बजे तक चलती रही।45 पन्नों और 140 बिंदुओं वाले इस घोषणा-पत्र में BRICS देशों ने एकतरफा टैरिफ, व्यापार प्रतिबंधों और संयुक्त राष्ट्र की मंजूरी के बिना लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों पर कड़ा रुख अपनाया है। समूह ने ऐसी कार्रवाइयों को वैश्विक व्यापार, आपूर्ति शृंखला और आर्थिक स्थिरता के लिए नुकसानदेह बताते हुए इनसे बचने का आह्वान किया।

वैश्विक व्यापार व्यवस्था में बदलाव की मांगBRICS ने विश्व व्यापार संगठन यानी WTO की विवाद निपटारा व्यवस्था को प्रभावी ढंग से बहाल करने की जरूरत बताई। साथ ही वैश्विक व्यापार व्यवस्था को अधिक न्यायसंगत और समावेशी बनाने पर जोर दिया गया।घोषणा-पत्र में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक जैसी वैश्विक वित्तीय संस्थाओं में विकासशील देशों की आवाज और हिस्सेदारी बढ़ाने की मांग भी सामने आई है।

संदेश साफ है—विश्व अर्थव्यवस्था के फैसले अब केवल विकसित देशों की चौखट पर तय नहीं होने चाहिए।

आतंकवाद पर BRICS का दो टूक संदेशनई दिल्ली घोषणा-पत्र में आतंकवाद को लेकर भी स्पष्ट और कठोर रुख अपनाया गया है।

BRICS देशों ने आतंकवाद के हर स्वरूप की कड़ी निंदा करते हुए कहा कि किसी भी कारण, उद्देश्य या राजनीतिक मकसद के आधार पर आतंकवादी घटनाओं को उचित नहीं ठहराया जा सकता।सदस्य देशों ने आतंकवाद की आर्थिक मदद रोकने, सीमा पार आतंकवाद से निपटने और आतंकवादियों को सुरक्षित ठिकाना उपलब्ध कराने के खिलाफ सामूहिक कार्रवाई की प्रतिबद्धता दोहराई।

घोषणा-पत्र में यह भी स्पष्ट किया गया कि आतंकवाद को किसी धर्म, राष्ट्रीयता, सभ्यता या जातीय समूह के साथ नहीं जोड़ा जाना चाहिए। BRICS काउंटर-टेररिज्म वर्किंग ग्रुप और उसके पांच उप-समूहों के कार्यों की भी सराहना की गई।

पहलगाम हमले की गूंज BRICS घोषणा में

भारत के लिए इस घोषणा-पत्र का एक महत्वपूर्ण पक्ष 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले की निंदा है। BRICS देशों ने हमले की कड़ी निंदा की, जिसमें 26 लोगों की मौत हुई थी और कई लोग घायल हुए थे।यह उल्लेख इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आतंकवाद के खिलाफ ठोस और सामूहिक कार्रवाई की मांग करता रहा है।

UNSC में भारत की स्थायी सदस्यता का फिर समर्थन

नई दिल्ली घोषणा-पत्र में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में भारत की स्थायी सदस्यता के समर्थन को भी दोहराया गया। चीन और रूस ने भारत की बड़ी भूमिका के समर्थन की बात कही।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी UNSC में सुधार को लेकर स्पष्ट संदेश दिया कि वैश्विक संस्थाओं में सुधार को अब और टाला नहीं जा सकता। बदलती वैश्विक शक्ति-समीकरणों के बीच भारत की यह मांग अब केवल राष्ट्रीय आकांक्षा नहीं, बल्कि विकासशील दुनिया के प्रतिनिधित्व से जुड़ा बड़ा सवाल बनती जा रही है।

फिलिस्तीन पर BRICS का रुख, इजरायल के लिए कूटनीतिक संदेश

नई दिल्ली घोषणा-पत्र में इजरायल-फिलिस्तीन संघर्ष का स्थायी समाधान शांतिपूर्ण माध्यमों से निकालने पर जोर दिया गया। BRICS ने वैश्विक संस्थाओं में फिलिस्तीन के उचित प्रतिनिधित्व की जरूरत को भी रेखांकित किया।यूएई लंबे समय से फिलिस्तीन समस्या के द्वि-राष्ट्र समाधान का समर्थन करता रहा है, जबकि ईरान भी फिलिस्तीन के सवाल पर मुखर रहा है। ऐसे में घोषणा-पत्र में फिलिस्तीन से जुड़े प्रस्तावों का शामिल होना इजरायल के लिए एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक संदेश माना जा रहा है।

मध्य एशिया को परमाणु हथियार मुक्त क्षेत्र बनाने की मांग

नई दिल्ली घोषणा-पत्र में समूचे मध्य एशिया को परमाणु हथियारों से मुक्त क्षेत्र घोषित करने का प्रस्ताव भी सामने आया है। ऐसे क्षेत्रों में परमाणु हथियारों के निर्माण और प्रसार पर रोक का प्रावधान होता है।ईरान पर अमेरिकी हमलों की पृष्ठभूमि और पश्चिम एशिया में लगातार बढ़ते तनाव के बीच इस प्रस्ताव का रणनीतिक महत्व और बढ़ जाता है।

आखिर ईरान क्यों अटका और कैसे बनी सहमति?

सबसे दिलचस्प सवाल यही है कि जब घोषणा-पत्र को सर्वसम्मति से पारित किया जाना था, तब ईरान को मनाने में इतनी मशक्कत क्यों करनी पड़ी?

आधिकारिक तौर पर इस संबंध में विस्तृत जानकारी सामने नहीं आई है, लेकिन सूत्रों का दावा है कि ईरान ने साझा बयान में फिलिस्तीन को लेकर महत्वपूर्ण प्रस्ताव शामिल करने की मांग की थी। इनमें फिलिस्तीन को संयुक्त राष्ट्र की पूर्ण सदस्यता देने की मांग प्रमुख बताई जा रही है।यूएई ने भी इन प्रस्तावों का समर्थन किया। इसके बाद दोनों देशों के रुख में समानता दिखाई दी और सहमति बनाने का रास्ता साफ हुआ।

सूत्रों के मुताबिक, सभी पक्षों को एकमत करने के लिए भारत ने शनिवार सुबह करीब चार बजे तक बातचीत जारी रखी। आखिरकार सहमति बनी और नई दिल्ली घोषणा-पत्र सामने आया।

घोषणा-पत्र के प्रस्ताव संख्या 31 में कहा गया है कि इजरायल-फिलिस्तीन संघर्ष का सही और स्थायी समाधान शांतिपूर्ण तरीकों से ही हासिल किया जा सकता है। BRICS ने विश्व बैंक और IMF जैसी वित्तीय संस्थाओं समेत वैश्विक संगठनों में फिलिस्तीन के उचित प्रतिनिधित्व की जरूरत को भी स्वीकार किया।

भारत की कूटनीति का असली इम्तिहान

नई दिल्ली घोषणा-पत्र को केवल 45 पन्नों और 140 बिंदुओं का दस्तावेज मानना शायद इसकी असली तस्वीर को छोटा कर देना होगा। इसके पीछे वह कूटनीतिक श्रम दिखाई देता है जिसमें अलग-अलग हितों, क्षेत्रीय संघर्षों और वैश्विक शक्तियों के बीच एक साझा भाषा तलाशनी पड़ी।

ईरान की असहमति से लेकर फिलिस्तीन के मुद्दे तक और आतंकवाद से लेकर वैश्विक वित्तीय संस्थाओं में सुधार तक—-नई दिल्ली घोषणा ने BRICS के बढ़ते दायरे को रेखांकित किया है।

सबसे बड़ा संदेश यही है कि BRICS अब केवल आर्थिक सहयोग का मंच नहीं रह गया है।

यह बदलती विश्व व्यवस्था में विकासशील देशों की आवाज को अधिक प्रभावशाली बनाने की कोशिश का एक बड़ा केंद्र बनता दिखाई दे रहा है।

और इस पूरी कवायद के केंद्र में इस बार नई दिल्ली थी।

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