JDU के दो बनडमरू!’ प्रशांत किशोर का नीतीश-अमित शाह पर बड़ा हमला, बोले- नाम जनता दल नीतीश हो या JDU, चलाने वाले अमित शाह, PK ने साधा निशाना, कहा- बिहार की राजनीति का नैरेटिव अब शिक्षा और रोजगार पर आ गया

बी के झा

NSK news Ind

‘ पटना, 14 सितंबर

बिहार की राजनीति में विधानसभा चुनाव के बाद सत्ता के समीकरण भले बदल गए हों, लेकिन राजनीतिक बयानबाजी का तापमान कम होता दिखाई नहीं दे रहा है। जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर ने जनता दल यूनाइटेड (JDU), मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व पर एक साथ निशाना साधते हुए पार्टी के भीतर वास्तविक सत्ता-संतुलन को लेकर तीखा सवाल खड़ा किया है।

उनका हमला केवल जेडीयू के संभावित नाम परिवर्तन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने बिहार की सत्ता, भाजपा-जेडीयू संबंध, बिजली परियोजनाओं और चुनावी नैरेटिव तक को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की।

प्रशांत किशोर ने जेडीयू के नाम को लेकर चल रही चर्चा पर कटाक्ष करते हुए कहा कि पार्टी का नाम जनता दल यूनाइटेड रहे या जनता दल नीतीश, इससे कोई खास फर्क नहीं पड़ता। उनके मुताबिक पार्टी को चलाने वाली वास्तविक ताकत कहीं और है।

PK ने बेहद तीखे अंदाज में कहा कि जेडीयू में ऊपर नीतीश कुमार का नाम भले दिखाई देता हो, लेकिन उनके अनुसार पार्टी के फैसलों पर भाजपा नेतृत्व का प्रभाव है। उन्होंने यहां तक दावा किया कि पार्टी में कुछ ऐसे लोग हैं जिन्हें भाजपा नेतृत्व ने जिम्मेदारी दे रखी है और भाजपा जो तय करती है, वही जेडीयू में होता है।

हालांकि, प्रशांत किशोर के इस दावे को लेकर एनडीए खेमे की ओर से राजनीतिक प्रतिक्रिया स्वाभाविक रूप से महत्वपूर्ण होगी। जेडीयू और भाजपा लगातार गठबंधन की एकजुटता तथा सरकार के कामकाज को प्राथमिकता देने की बात कहते रहे हैं। ऐसे में PK का यह बयान विपक्ष को एनडीए के भीतर कथित शक्ति-संतुलन पर हमला करने का नया अवसर देता है।

‘अमित शाह जैसा चाहेंगे, वैसा चलेगा’—PK का दावा

प्रशांत किशोर ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को भी सीधे निशाने पर लिया। उन्होंने आरोप लगाया कि बिहार की राजनीति में जेडीयू की स्वतंत्र राजनीतिक पहचान कमजोर हुई है और पार्टी के संचालन में भाजपा नेतृत्व की निर्णायक भूमिका है।

राजनीतिक विश्लेषकों के लिए यही बयान सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है।

बिहार में लंबे समय तक नीतीश कुमार की राजनीति की पहचान अपने राजनीतिक फैसले स्वयं लेने वाले नेता के रूप में रही है। ऐसे में यदि विपक्षी राजनीति से यह सवाल उठाया जा रहा है कि नीतीश कुमार की पार्टी के निर्णय कितने स्वतंत्र हैं, तो यह आने वाले समय में एनडीए की राजनीति का बड़ा मुद्दा बन सकता है।

दूसरी तरफ एनडीए के समर्थक इसे विपक्ष की राजनीतिक रणनीति बता सकते हैं। उनका तर्क हो सकता है कि गठबंधन में सहयोगी दलों के बीच समन्वय को किसी एक दल के दूसरे पर नियंत्रण के रूप में देखना राजनीतिक अतिशयोक्ति है।

पीरपैंती पावर प्लांट पर भी PK ने उठाए सवाल

प्रशांत किशोर ने भागलपुर के पीरपैंती में प्रस्तावित पावर प्लांट का मुद्दा उठाते हुए उद्योगपति गौतम अडानी और गुजरात से जुड़े कारोबारी हितों पर भी सवाल खड़े किए। उन्होंने दावा किया कि पहले इस परियोजना को एनटीपीसी से जोड़े जाने की बात थी, लेकिन बाद में तस्वीर बदल गई।उन्होंने जमीन, बिजली खरीद समझौते और परियोजना के वित्तीय मॉडल को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए।

PK का कहना है कि जनता के संसाधनों और सरकारी व्यवस्था का इस्तेमाल कर निजी कारोबारी हितों को लाभ पहुंचाया जा रहा है।इन आरोपों का वास्तविक मूल्यांकन परियोजना से जुड़े आधिकारिक दस्तावेजों, भूमि आवंटन की शर्तों, बिजली खरीद समझौते और निविदा प्रक्रिया के आधार पर ही किया जा सकता है। इसलिए पीरपैंती परियोजना को लेकर PK के दावों की स्वतंत्र पुष्टि और संबंधित पक्षों का जवाब इस पूरे विवाद का महत्वपूर्ण हिस्सा होगा।

‘वोट खरीदकर चुनाव जीता’—PK ने फिर उठाया चुनावी नैरेटिव

प्रशांत किशोर ने चुनावी राजनीति के मुद्दे पर भी भाजपा पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि चुनाव के दौरान वोट खरीदने जैसे मुद्दे सामने आए और बाद में राजनीतिक नैरेटिव को जाति, अपराध और एनकाउंटर जैसे विषयों की ओर मोड़ दिया गया।उन्होंने कहा कि बांकीपुर में उनकी राजनीतिक सफलता के बाद बिहार की राजनीति का विमर्श शिक्षा और रोजगार की ओर लौट आया है। PK के मुताबिक अब प्रदेश की राजनीति में सबसे बड़ा सवाल यही है कि कौन-सा दल युवाओं को बेहतर शिक्षा और रोजगार के अवसर देगा।

यही वह बिंदु है जहां प्रशांत किशोर अपनी राजनीति का केंद्रीय एजेंडा स्थापित करने की कोशिश करते दिखाई देते हैं। बिहार की राजनीति में जातीय समीकरण लंबे समय से निर्णायक रहे हैं, लेकिन बेरोजगारी, पलायन, प्रतियोगी परीक्षाओं में पारदर्शिता और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा जैसे मुद्दे लगातार युवाओं के बीच प्रभावी होते जा रहे हैं।

‘बेचारा’ पर भी नीतीश को घेरा

मुख्यमंत्री द्वारा प्रशांत किशोर को ‘बेचारा’ कहे जाने पर भी PK ने पलटवार किया। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री को किसी ने ‘बेचारा’ शब्द का शाब्दिक अर्थ नहीं बताया।प्रशांत किशोर ने व्यंग्य करते हुए कहा कि ‘बेचारा’ का अर्थ होता है—जिसके पास कोई चारा नहीं।

यह टिप्पणी महज व्यक्तिगत राजनीतिक कटाक्ष नहीं है। इसके पीछे PK की वह रणनीति दिखाई देती है जिसमें वे नीतीश कुमार के लंबे राजनीतिक अनुभव और वर्तमान सत्ता-समीकरणों के बीच अंतर रेखांकित करना चाहते हैं।

शिक्षा-रोजगार बनाम जाति-अपराध: बदल रहा है बिहार का राजनीतिक विमर्श?

राजनीतिक विश्लेषकों के एक वर्ग का मानना है कि बिहार की राजनीति में चुनावी जीत केवल जातीय समीकरणों से तय नहीं होती। सत्ता विरोधी भावना, स्थानीय नेतृत्व, कल्याणकारी योजनाएं, कानून-व्यवस्था, रोजगार और विकास जैसे मुद्दे भी मतदाताओं के निर्णय को प्रभावित करते हैं।

वहीं शिक्षाविदों की दृष्टि से देखें तो बिहार के युवाओं के लिए शिक्षा और रोजगार का सवाल लंबे समय से केंद्रीय चिंता रहा है। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए दूसरे राज्यों में पलायन, निजी रोजगार के सीमित अवसर और सरकारी नौकरियों पर अत्यधिक निर्भरता ऐसे मुद्दे हैं जिन्हें कोई भी राजनीतिक दल लंबे समय तक नजरअंदाज नहीं कर सकता।यही कारण है कि प्रशांत किशोर का शिक्षा और रोजगार वाला नैरेटिव यदि जमीन पर मजबूत होता है तो वह बिहार की पारंपरिक चुनावी राजनीति को चुनौती दे सकता है।

हालांकि इसकी वास्तविक परीक्षा संगठन, बूथ स्तर की मौजूदगी और चुनावी परिणामों में ही होगी।

एनडीए के सामने चुनौती, विपक्ष को मिला हमला करने का मुद्दा

PK के बयान से सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश यही निकलता है कि बिहार में एनडीए के भीतर नेतृत्व और निर्णय लेने की स्वतंत्रता का सवाल आने वाले समय में विपक्ष के हाथ में एक बड़ा राजनीतिक हथियार बन सकता है।विपक्षी दल यह सवाल उठा सकते हैं कि यदि जेडीयू और भाजपा समान रूप से सत्ता में हैं तो फैसलों में किसकी प्राथमिकता चलती है। वहीं एनडीए इस आरोप को गठबंधन की एकता के खिलाफ विपक्ष का राजनीतिक प्रचार बताते हुए खारिज कर सकता है।

राजनीतिक दृष्टि से असली सवाल यही है कि क्या प्रशांत किशोर अपने आरोपों को चुनावी मुद्दे में बदल पाएंगे?

क्या शिक्षा और रोजगार का एजेंडा जातीय समीकरणों पर भारी पड़ेगा?

और क्या जेडीयू अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान को और स्पष्ट करेगी?

बिहार की राजनीति में फिलहाल लड़ाई केवल सत्ता की नहीं, बल्कि नैरेटिव की भी है। एक तरफ एनडीए विकास, शासन और गठबंधन की स्थिरता को अपना आधार बना रहा है, तो दूसरी तरफ प्रशांत किशोर शिक्षा, रोजगार और राजनीतिक जवाबदेही को हथियार बनाकर स्थापित दलों की राजनीति को चुनौती देने की कोशिश कर रहे हैं।

आने वाले महीनों में यह स्पष्ट होगा कि PK के तीखे बयान केवल राजनीतिक सुर्खियां बनते हैं या बिहार के मतदाताओं के बीच कोई स्थायी नया राजनीतिक विमर्श भी खड़ा करते हैं।

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