बी. के. झा
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नई दिल्ली, 26 अगस्त
भारत और चीन के रिश्तों में बर्फ पिघलने के संकेतों के बीच राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने बीजिंग में ऐसा संदेश दिया है, जिसमें कूटनीतिक नरमी के साथ सुरक्षा हितों की स्पष्ट रेखा भी दिखाई देती है। मंगलवार को चीन के विदेश मंत्री और सीमा विवाद पर विशेष प्रतिनिधि वांग यी के साथ हुई 25वें दौर की विशेष प्रतिनिधि वार्ता में डोभाल ने साफ कर दिया कि भारत-चीन संबंधों की सामान्य स्थिति की बुनियाद सीमा पर शांति और स्थिरता ही है।
यानी व्यापार, संपर्क और कूटनीतिक रिश्तों में सुधार की गति सीधे LAC की स्थिति से जुड़ी रहेगी।यह बैठक ऐसे समय हुई है जब पूर्वी लद्दाख में 2020 के तनाव के बाद दोनों देशों ने सैन्य टकराव कम करने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं, लेकिन अरुणाचल प्रदेश में चीनी गतिविधियों और दावों को लेकर नई संवेदनशीलता बनी हुई है। हाल में अरुणाचल सीमा क्षेत्र में भारतीय और चीनी गश्ती दलों के बीच आमना-सामना भी हुआ था। ऐसे में डोभाल-वांग वार्ता को केवल सामान्य कूटनीतिक संवाद मानना रणनीतिक रूप से अधूरा होगा।
डोभाल का संदेश—सीमा पहले, बाकी रिश्ते बाद में
बैठक में डोभाल ने कहा कि पिछले एक वर्ष में द्विपक्षीय संबंधों में सामान्य स्थिति की ओर बढ़ने का सीधा कारण सीमा क्षेत्रों में दोनों पक्षों द्वारा शांति और स्थिरता बनाए रखना है। भारत का संदेश स्पष्ट है—सीमा पर भरोसा कायम होगा तो ही रिश्तों को व्यापक स्तर पर आगे बढ़ाया जा सकता है।यह बात इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि चीन लंबे समय से सीमा विवाद को द्विपक्षीय रिश्तों के व्यापक ढांचे से अलग देखने की कोशिश करता रहा है।
लेकिन नई दिल्ली का दृष्टिकोण इसके विपरीत है। भारत के लिए LAC पर स्थिति केवल सीमा सुरक्षा का विषय नहीं, बल्कि चीन के साथ पूरे रिश्ते की दिशा तय करने वाला केंद्रीय मुद्दा है।
अरुणाचल पर क्या हुई बात?
अरुणाचल प्रदेश वार्ता का सबसे संवेदनशील हिस्सा है। चीन अरुणाचल प्रदेश पर अपना दावा जताता रहा है और इसे ‘दक्षिण तिब्बत’ कहता है। भारत लगातार इस दावे को खारिज करता रहा है और अरुणाचल प्रदेश को भारत का अभिन्न हिस्सा बताता है।डोभाल ने बातचीत में सीमा क्षेत्रों में शांति और स्थिरता बनाए रखने के प्रयासों को और प्रभावी तथा मजबूत बनाने पर जोर दिया।
दोनों पक्षों ने सीमा प्रबंधन, सीमा वार्ता और सीमा-पार सहयोग को आगे बढ़ाने पर चर्चा की। चीन के बयान में भी दोनों देशों के बीच सीमा विवाद के लिए ‘न्यायसंगत, उचित और दोनों पक्षों को स्वीकार्य’ समाधान की दिशा में बातचीत जारी रखने की बात कही गई।
इसका अर्थ यह नहीं कि अरुणाचल पर भारत और चीन के बीच कोई समझौता हो गया है। बल्कि इसका संकेत यह है कि विवादित दावों को सैन्य तनाव में बदलने से रोकने के लिए संवाद की खिड़की खुली रखी गई है।
कैलाश मानसरोवर और सीमा व्यापार भी कूटनीति का हिस्सा
डोभाल ने लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने की दिशा में हुई प्रगति का भी उल्लेख किया। नाथू ला के रास्ते कैलाश मानसरोवर यात्रा और तीन पारंपरिक दर्रों के माध्यम से सीमा व्यापार की बहाली को दोनों देशों के सीमावर्ती क्षेत्रों के लिए सकारात्मक कदम माना गया है।
यहां भारत की रणनीति का एक महत्वपूर्ण पहलू दिखाई देता है—सुरक्षा और सहयोग को अलग-अलग खानों में नहीं, बल्कि एक साथ आगे बढ़ाना। सीमा पर सैनिकों के बीच दूरी कम हो, लोगों के बीच संपर्क बढ़े और आर्थिक रिश्ते सामान्य हों—लेकिन इन सबके बीच भारत अपनी क्षेत्रीय संप्रभुता पर समझौते के लिए तैयार नहीं दिख रहा।
चीन ने भी बदला सुर, लेकिन सावधानी जरूरी
वांग यी ने भारत को ‘अच्छा पड़ोसी और साझेदार’ बनाने की चीन की इच्छा जताई और दोनों देशों के रिश्तों को वैश्विक रणनीतिक महत्व वाला बताया। चीन ने दोनों पक्षों से मतभेदों को उचित ढंग से संभालने, संवाद जारी रखने और सीमा क्षेत्रों में शांति बनाए रखने पर जोर दिया।लेकिन यहीं भारतीय कूटनीति की असली परीक्षा शुरू होती है।
चीन की भाषा में नरमी को स्थायी रणनीतिक बदलाव मान लेना जल्दबाजी होगी। बीते वर्षों का अनुभव बताता है कि चीन के साथ संबंधों में राजनीतिक बयान से ज्यादा महत्व जमीन पर सैन्य तैनाती, गश्त, बुनियादी ढांचे और वास्तविक नियंत्रण रेखा पर व्यवहार का है।
रक्षा विशेषज्ञों के नजरिए से असली कसौटी
रक्षा मामलों के विश्लेषण की दृष्टि से डोभाल-वांग वार्ता की सबसे बड़ी उपलब्धि किसी तत्काल सीमा समझौते से ज्यादा तनाव प्रबंधन की संस्थागत प्रक्रिया को सक्रिय रखना है। भारत एक ओर चीन के साथ संवाद बढ़ा रहा है, दूसरी ओर सीमा पर अपनी सैन्य और रणनीतिक तैयारी को कमजोर करने का कोई संकेत नहीं दे रहा।यही भारत की वर्तमान रणनीति का सार है—संवाद भी, सतर्कता भी; सहयोग भी, संप्रभुता पर कोई समझौता नहीं।
विशेषज्ञों के लिए असली सवाल यह है कि क्या बीजिंग अपने बयानों को जमीन पर भी उतारेगा?
क्या सीमा पर गश्त के दौरान टकराव की संभावनाएं घटेंगी?
क्या अरुणाचल को लेकर चीनी दावों और नाम बदलने जैसी कार्रवाइयों में कमी आएगी?
और क्या सीमा विवाद के अंतिम समाधान की दिशा में कोई ठोस प्रगति होगी?
इन सवालों के जवाब आने वाले महीनों में मिलेंगे।
विपक्ष ने भी उठाया बड़ा सवाल—25 दौर की वार्ता के बाद हासिल क्या?
कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने बातचीत की जरूरत को स्वीकार करते हुए चीन के साथ सीमा विवाद को शीघ्र और स्पष्ट रूप से सुलझाने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि सीमा भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण है और चीन की ओर से लंबे समय से अनावश्यक उकसावे और परेशानी पैदा की जाती रही है। उन्होंने सवाल उठाया कि 25 दौर की वार्ता के बावजूद यदि ठोस प्रगति सीमित है तो आगे की रणनीति क्या होगी।
विपक्ष की यह आपत्ति राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। सरकार के लिए चुनौती केवल चीन से बातचीत करना नहीं है, बल्कि संसद और देश को यह भरोसा दिलाना भी है कि बातचीत के समानांतर भारत अपने रणनीतिक और क्षेत्रीय हितों की पर्याप्त सुरक्षा कर रहा है।
शी जिनपिंग की संभावित भारत यात्रा से पहले क्यों अहम है बैठक?
डोभाल-वांग वार्ता की टाइमिंग भी बहुत कुछ कहती है। यह बैठक सितंबर में नई दिल्ली में प्रस्तावित BRICS शिखर सम्मेलन से पहले हुई है, जिसमें चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की भारत यात्रा की संभावना जताई जा रही है। उनकी यात्रा की अभी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन संभावित मोदी-शी मुलाकात ने इस वार्ता को अतिरिक्त महत्व दे दिया है।यदि शी जिनपिंग भारत आते हैं तो 2020 के बाद भारत-चीन संबंधों में यह एक महत्वपूर्ण राजनीतिक पड़ाव हो सकता है।
लेकिन मोदी-शी संवाद की जमीन केवल आर्थिक सहयोग या BRICS नहीं होगी। उसके पीछे LAC की शांति, सीमा विवाद और परस्पर रणनीतिक विश्वास सबसे बड़ा मुद्दा रहेगा।
राजनीतिक संकेत साफ—भारत रिश्ते सुधारना चाहता है, लेकिन कीमत पर नहीं
भारत और चीन दोनों दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं हैं और वैश्विक मंचों पर कई मुद्दों पर उनके हित समान भी हैं। व्यापार, बहुपक्षीय संस्थाओं में सहयोग, सीमा क्षेत्रों में संपर्क और वैश्विक दक्षिण की राजनीति दोनों देशों को संवाद के लिए मजबूर करती है।लेकिन भारत की रणनीतिक चिंता भी उतनी ही स्पष्ट है।
2020 के गलवान संघर्ष ने यह साबित कर दिया कि आर्थिक रिश्तों के बावजूद सीमा पर भरोसे की कमी दोनों देशों को सीधे टकराव के मुहाने पर ला सकती है।इसलिए डोभाल की वार्ता को भारत की ‘चीन नीति में नरमी’ के बजाय ‘नियंत्रित सामान्यीकरण’ के रूप में देखना अधिक उचित होगा।
निष्कर्ष
बीजिंग में डोभाल ने चीन को कोई भावनात्मक संदेश नहीं दिया, बल्कि एक रणनीतिक शर्त रखी—सीमा पर शांति होगी तो रिश्तों में स्थिरता होगी।अरुणाचल पर भारत का दावा और संप्रभुता का प्रश्न अपनी जगह अडिग है।
चीन के साथ संवाद बंद करना भारत के हित में नहीं, लेकिन संवाद के नाम पर सीमा सुरक्षा से समझौता करना भी विकल्प नहीं।
अब गेंद चीन के पाले में है
अगर बीजिंग वास्तव में भारत को ‘पड़ोसी और साझेदार’ के रूप में देखता है, तो इसका प्रमाण बयान से नहीं, LAC पर उसके व्यवहार से मिलेगा।
अगले कुछ महीने यह तय करेंगे कि डोभाल-वांग वार्ता महज कूटनीतिक औपचारिकता थी या 2020 के बाद भारत-चीन संबंधों के एक नए अध्याय की वास्तविक शुरुआत।
