बी के झा
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नई दिल्ली/जयपुर, 15 सितंबर
राजस्थान के नगर निकाय चुनाव के नतीजों ने प्रदेश की सियासत में एक बार फिर सत्ता के समीकरणों पर चर्चा तेज कर दी है। शहरी मतदाताओं के बीच भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस पर स्पष्ट बढ़त बनाते हुए यह संकेत दिया है कि विधानसभा चुनाव के बाद भी उसकी राजनीतिक पकड़ कमजोर नहीं हुई है। सबसे दिलचस्प बात यह है कि भाजपा की यह बढ़त केवल राजधानी या किसी एक इलाके तक सीमित नहीं रही, बल्कि प्रदेश के कई प्रमुख शहरों तक दिखाई दी।
सोमवार को घोषित नतीजों के मुताबिक राजस्थान के 10 नगर निगमों में भाजपा कम से कम पांच स्थानों पर अपना मेयर बनाने की स्थिति में पहुंच गई है। जयपुर, कोटा, उदयपुर, भीलवाड़ा और अलवर में भाजपा का मेयर बनना लगभग तय माना जा रहा है। जोधपुर में भी पार्टी मेयर पद के लिए मजबूत स्थिति में है। इसके उलट कांग्रेस को केवल बीकानेर में स्पष्ट बढ़त मिली है।
अजमेर और पाली में निर्दलीय पार्षदों की भूमिका निर्णायक हो गई है।
इन नतीजों ने राजस्थान की राजनीति में एक सवाल जरूर खड़ा किया है—क्या कांग्रेस के सामने शहरी राजनीति में संगठन और जनाधार दोनों को नए सिरे से खड़ा करने की चुनौती आ गई है?
10,167 वार्डों का फैसला, BJP ने बनाई स्पष्ट बढ़तराज्य में 309 नगरीय निकायों के लिए दो चरणों में मतदान हुआ। कुल 10,167 वार्डों के सामने आए परिणामों में भाजपा ने 4,179 सीटों पर जीत दर्ज की, जबकि कांग्रेस 3,613 वार्डों तक पहुंच सकी।
संख्या का अंतर केवल चुनावी आंकड़ा नहीं है। यह राजस्थान के शहरी क्षेत्रों में दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों की मौजूदा स्थिति का संकेत भी देता है। भाजपा ने जहां अपने संगठन और सरकार की उपलब्धियों को चुनावी मुद्दा बनाया, वहीं कांग्रेस को स्थानीय स्तर पर नेतृत्व, संगठन और चुनावी प्रबंधन की चुनौतियों से जूझना पड़ा।
गहलोत के गढ़ जोधपुर में भाजपा की दस्तक
सबसे ज्यादा राजनीतिक चर्चा जोधपुर को लेकर है। पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अशोक गहलोत के प्रभाव वाले जोधपुर में भाजपा ने सेंध लगाई है। गहलोत के अपने वार्ड में भाजपा उम्मीदवार की जीत ने राजनीतिक हलकों का ध्यान खींचा है।
हालांकि इसी चुनाव में केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत के वार्ड में कांग्रेस उम्मीदवार की जीत भी हुई। इससे एक महत्वपूर्ण संदेश निकलता है—स्थानीय निकाय चुनावों में मतदाता केवल बड़े नेताओं की लोकप्रियता के आधार पर मतदान नहीं कर रहा, बल्किई स्थानीय उम्मीदवार और स्थानीय समीकरण भी निर्णायक बने हुए हैं।
कोटा में कांग्रेस की उम्मीदों को झटका
कांग्रेस के लिए कोटा का परिणाम भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। राहुल गांधी ने जिस कोटा से ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम की शुरुआत की थी, उसी शहर के 100 वार्डों में भाजपा ने 55 सीटें जीत लीं। कांग्रेस को 39 सीटें मिलीं, जबकि छह वार्ड निर्दलीयों के खाते में गए।यानी जिस शहर को कांग्रेस अपने राजनीतिक नैरेटिव के लिए महत्वपूर्ण मान रही थी, वहां भाजपा ने स्पष्ट बढ़त बनाकर अपनी स्थिति मजबूत कर ली।
अजमेर और पाली में निर्दलीय बने किंगमेकर
राजस्थान की शहरी राजनीति का दूसरा पहलू भी इन चुनावों में सामने आया। अजमेर और पाली में किसी एक दल को निर्णायक बहुमत नहीं मिला। यहां निर्दलीय पार्षद मेयर चुनाव में किंगमेकर की भूमिका निभाएंगे।
भरतपुर का परिणाम तो और भी ज्यादा रोचक रहा। 65 वार्डों में निर्दलीयों ने 38 सीटों पर कब्जा जमाया। भाजपा 20 और कांग्रेस महज सात सीटों पर सिमट गई।यह नतीजा बताता है कि दलों के मजबूत संगठन के बावजूद स्थानीय स्तर पर निर्दलीय उम्मीदवारों की राजनीतिक प्रासंगिकता खत्म नहीं हुई है।
टोंक में पायलट का प्रभाव कायम?
भाजपा की समग्र बढ़त के बीच टोंक कांग्रेस के लिए राहत की खबर लेकर आया। 59 वार्डों वाले टोंक में कांग्रेस ने 32 सीटों पर जीत दर्ज की। इस प्रदर्शन को कांग्रेस नेता सचिन पायलट के प्रभाव से जोड़कर देखा जा रहा है।टोंक का परिणाम यह भी बताता है कि राजस्थान की राजनीति में कांग्रेस पूरी तरह कमजोर नहीं हुई है। जहां स्थानीय नेतृत्व मजबूत है, वहां पार्टी अभी भी भाजपा को चुनौती देने की क्षमता रखती है।
झालरापाटन में वसुंधरा राजे का प्रभाव बरकरार
पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के राजनीतिक प्रभाव वाले झालरापाटन में भाजपा ने 35 में से 22 सीटें जीतकर अपनी पकड़ मजबूत दिखाई। राजे ने जीत का श्रेय भाजपा कार्यकर्ताओं की मेहनत और जनता के विश्वास को दिया।झालरापाटन का परिणाम भाजपा के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह पार्टी के भीतर पुराने और नए नेतृत्व के बीच चलने वाली राजनीतिक चर्चाओं के बीच वसुंधरा राजे के स्थानीय प्रभाव की तस्वीर भी सामने रखता है।
भाजपा के मुस्लिम उम्मीदवारों की हार ने खींचा ध्यान
भाजपा की व्यापक जीत के बीच एक पहलू राजनीतिक बहस का विषय बन गया है। जयपुर में भाजपा ने आठ वार्डों से मुस्लिम उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था, लेकिन इनमें से कोई भी जीत हासिल नहीं कर सका।भाजपा के लिए यह परिणाम दोहरी तस्वीर पेश करता है। एक ओर पार्टी ने व्यापक स्तर पर शानदार प्रदर्शन किया, दूसरी ओर उसके मुस्लिम उम्मीदवारों को स्थानीय स्तर पर अपेक्षित समर्थन नहीं मिल सका।
आने वाले चुनावों में भाजपा के लिए यह सवाल महत्वपूर्ण होगा कि मुस्लिम समाज में राजनीतिक स्वीकार्यता बढ़ाने की उसकी रणनीति किस दिशा में जाती है।
कांग्रेस ने उठाए सवाल, भाजपा ने जनता का फैसला बताया
चुनावी जीत के बाद कांग्रेस ने भाजपा पर सरकारी तंत्र के इस्तेमाल का आरोप लगाया। राजस्थान कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग का आरोप लगाया।
भाजपा ने इन आरोपों को खारिज करते हुए चुनाव परिणाम को जनता के समर्थन की अभिव्यक्ति बताया।राजनीतिक तौर पर देखा जाए तो यह आरोप-प्रत्यारोप चुनाव परिणाम के बाद की स्वाभाविक सियासी प्रक्रिया का हिस्सा हैं। लेकिन कांग्रेस के सामने इससे बड़ा प्रश्न यह है कि वह इन परिणामों के बाद अपनी संगठनात्मक रणनीति में क्या बदलाव करती है।
जीत के अगले दिन भजनलाल दिल्ली रवाना
निकाय चुनाव में भाजपा की बड़ी जीत के बीच मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा का दिल्ली दौरा भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। जीत के अगले दिन मुख्यमंत्री को दिल्ली बुलाया गया है, जहां पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के साथ उनकी मुलाकात होने की संभावना है।इस मुलाकात में राजस्थान के निकाय चुनाव परिणाम, सरकार के कामकाज और आगामी पंचायत चुनावों की रणनीति पर चर्चा हो सकती है।
भाजपा के लिए निकाय चुनावों का परिणाम मनोबल बढ़ाने वाला है और अब उसकी नजर पंचायत स्तर पर भी इसी प्रदर्शन को दोहराने पर होगी।
PM मोदी ने बताया ‘सत्य की विजय
‘प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राजस्थान के नगर निकाय चुनावों में भाजपा की जीत पर कार्यकर्ताओं और जनता को बधाई दी। उन्होंने इस जीत को ‘झूठ की गूंज के सामने सत्य की विजय’ का प्रमाण बताया।
मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने भी जीत का श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को देते हुए कहा कि देश के नौजवान प्रधानमंत्री मोदी के साथ हैं।यानी राजस्थान के निकाय चुनाव का संदेश अब स्थानीय निकायों की सीमाओं से बाहर निकलकर प्रदेश की व्यापक राजनीतिक दिशा से जोड़कर देखा जा रहा है।
असली परीक्षा अब पंचायत चुनाव में
नगर निकाय चुनाव में भाजपा की बढ़त निश्चित रूप से पार्टी के लिए उत्साह बढ़ाने वाली है, लेकिन इसे विधानसभा चुनाव का सीधा पूर्वाभ्यास मानना जल्दबाजी होगी। स्थानीय निकाय चुनावों में उम्मीदवार, जातीय समीकरण, स्थानीय मुद्दे और व्यक्तिगत संपर्क अक्सर बड़े राजनीतिक नैरेटिव पर भारी पड़ते हैं।
फिर भी एक बात स्पष्ट है—भाजपा ने राजस्थान के शहरी राजनीतिक मैदान में कांग्रेस को पीछे धकेलते हुए अपनी जमीन मजबूत की है।
कांग्रेस के लिए यह सिर्फ हार-जीत का आंकड़ा नहीं, बल्कि संगठन को पुनर्गठित करने और स्थानीय नेतृत्व को मजबूत करने की चेतावनी है।
अब निगाहें पंचायत चुनाव पर होंगी।
यदि भाजपा निकाय चुनाव के इस प्रदर्शन को ग्रामीण राजस्थान में भी दोहराने में सफल रहती है, तो भजनलाल शर्मा सरकार के लिए यह राजनीतिक रूप से बेहद मजबूत संकेत होगा।
वहीं कांग्रेस के लिए चुनौती केवल भाजपा को रोकने की नहीं, बल्कि अपने खोते हुए शहरी और स्थानीय संगठनात्मक आधार को फिर से खड़ा करने की होगी।
एनएसके विश्लेषण:
राजस्थान के नगर निकाय चुनाव ने फिलहाल बाजी भाजपा के हाथ में रखी है।
कांग्रेस के सामने सवाल अब यह नहीं कि वह कहां हारी, बल्कि यह है कि वह अगली लड़ाई के लिए अपनी जमीन कहां से और कैसे तैयार करेगी।
