नीतीश ने खुद छोड़ी कुर्सी या BJP का फैसला? सम्राट चौधरी के बयान से फिर गरमाई बिहार की सियासत, तेजस्वी के ‘चयनित मुख्यमंत्री’ वाले तंज पर भी पलटवार

बी के झा

NSK news Ind

पटना, 19 सितंबर

बिहार की सत्ता में नेतृत्व परिवर्तन को लेकर चल रही राजनीतिक बहस के बीच मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने एक बार फिर साफ शब्दों में कहा है कि पूर्व मुख्यमंत्री और जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री पद अपनी इच्छा से छोड़ा था। भाजपा ने उन्हें पद छोड़ने के लिए नहीं कहा था।‘पंचायत आज तक बिहार’ के मंच से सम्राट चौधरी ने कहा कि नीतीश कुमार आज भी बिहार में एनडीए के निर्विवाद नेता हैं। उनके मुताबिक, नेतृत्व परिवर्तन किसी दबाव का परिणाम नहीं बल्कि नीतीश कुमार का अपना निर्णय था।

सम्राट का यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री पद छोड़ने के बाद विपक्ष लगातार यह सवाल उठा रहा है कि क्या भाजपा ने बिहार में अपनी राजनीतिक ताकत के अनुरूप मुख्यमंत्री पद अपने हाथ में लिया है।

आरजेडी के राष्ट्रीय प्रवक्ता और राज्यसभा सांसद मनोज कुमार झा इससे पहले आरोप लगा चुके हैं कि नीतीश कुमार को भाजपा ने सत्ता से ‘पुश आउट’ किया और सम्राट चौधरी को जनता का जनादेश प्राप्त मुख्यमंत्री नहीं बताया।

सम्राट ने अतीत के पन्ने खोलकर दिया राजनीतिक जवाब

सम्राट चौधरी ने अपने बयान को केवल वर्तमान तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने भाजपा और नीतीश कुमार के पुराने राजनीतिक संबंधों का उदाहरण देते हुए वर्ष 2000 की घटना का उल्लेख किया।उनका तर्क था कि जब भाजपा के पास अधिक विधायक होने के बावजूद अटल बिहारी वाजपेयी के दौर में नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनने का अवसर दिया गया था, तब भाजपा ने गठबंधन की मर्यादा और सहयोगी के नेतृत्व का सम्मान किया था। अब नीतीश कुमार भी उसी राजनीतिक सद्भाव का प्रत्युत्तर देना चाहते थे।

दरअसल, वर्ष 2000 में त्रिशंकु विधानसभा के बाद नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी, लेकिन बहुमत साबित नहीं कर पाने के कारण उन्हें करीब एक सप्ताह के भीतर इस्तीफा देना पड़ा था।यानी सम्राट चौधरी का संदेश सिर्फ इतना नहीं है कि ‘नीतीश ने खुद पद छोड़ा’, बल्कि इसके पीछे भाजपा-जदयू संबंधों के पुराने राजनीतिक इतिहास को भी जोड़ना है।

लालू प्रसाद का जिक्र कर सम्राट ने बदल दिया बहस का फोकस

सम्राट चौधरी ने लालू प्रसाद यादव का भी उल्लेख किया और कहा कि लालू प्रसाद भी भाजपा के बाहरी समर्थन से मुख्यमंत्री बने थे।यहां उन्होंने 1990 की राजनीति का संदर्भ देते हुए रामसुंदर दास का नाम लिया। उस समय जनता दल की सरकार भाजपा के बाहरी समर्थन से बनी थी और मुख्यमंत्री पद की दौड़ में रामसुंदर दास भी शामिल थे। विधायक दल के चुनाव में लालू प्रसाद यादव ने उन्हें मामूली अंतर से पीछे छोड़ दिया था।सम्राट का यह राजनीतिक तर्क विपक्ष की उस दलील का जवाब माना जा सकता है जिसमें मौजूदा सत्ता परिवर्तन को भाजपा की रणनीति के रूप में पेश किया जाता रहा है।

तेजस्वी के ‘चयनित मुख्यमंत्री’ वाले तंज का भी जवाब

नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्हें ‘चुने हुए नहीं, चयनित मुख्यमंत्री’ कहकर निशाना साधा था। तेजस्वी ने यह भी आरोप लगाया था कि नीतीश कुमार को हटाकर नया मुख्यमंत्री बनाया गया है।

सम्राट चौधरी ने इस हमले का जवाब देते हुए कहा कि आलोचना करने वालों को यह भी याद रखना चाहिए कि उनकी माता राबड़ी देवी जब पहली बार मुख्यमंत्री बनी थीं, तब उन्होंने भी विधानसभा चुनाव लड़कर मुख्यमंत्री पद हासिल नहीं किया था।

यहां बिहार की राजनीति का एक दिलचस्प पहलू सामने आता है—सत्ता में नेतृत्व परिवर्तन को लेकर ‘जनादेश’ की परिभाषा दोनों खेमे अपने-अपने राजनीतिक संदर्भ से तय कर रहे हैं।

जेडीयू के लिए संदेश: नीतीश की भूमिका खत्म नहीं हुई

सम्राट चौधरी के बयान का दूसरा महत्वपूर्ण हिस्सा नीतीश कुमार को लेकर है। उन्होंने स्पष्ट किया कि राज्यसभा सदस्य बनने के बावजूद नीतीश कुमार एनडीए के निर्विवाद नेता बने हुए हैं।यह बात जेडीयू के भीतर और गठबंधन की राजनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण है। जेडीयू की ओर से भी पहले यह कहा गया है कि नीतीश कुमार ने राज्यसभा जाने का फैसला स्वेच्छा से किया और वह बिहार में एनडीए के वरिष्ठतम नेताओं में बने हुए हैं।

इससे यह संकेत मिलता है कि भाजपा के मुख्यमंत्री के नेतृत्व में सरकार चलने के बावजूद एनडीए के भीतर नीतीश कुमार की राजनीतिक भूमिका को सार्वजनिक तौर पर कमतर दिखाने की कोशिश नहीं की जा रही।

जेडीयू कार्यकर्ताओं की नजर में क्या मायने?

जेडीयू के लिए यह सवाल सिर्फ मुख्यमंत्री की कुर्सी का नहीं बल्कि पार्टी की राजनीतिक पहचान और नीतीश कुमार की भूमिका का भी है। पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच यह संदेश महत्वपूर्ण है कि सत्ता परिवर्तन को नीतीश बनाम भाजपा के संघर्ष के रूप में पेश करने के बजाय इसे गठबंधन के भीतर नेतृत्व के एक नए चरण के तौर पर देखा जाए।वहीं भाजपा के लिए चुनौती यह है कि मुख्यमंत्री पद संभालने के बाद सम्राट चौधरी को अपनी सरकार की उपलब्धियों के आधार पर राजनीतिक विश्वसनीयता स्थापित करनी है।

भाजपा नेता रविशंकर प्रसाद ने भी हाल में कहा कि भाजपा ने अतीत में अधिक सीटें होने के बावजूद नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाया था और अब बिहार में भाजपा का अपना मुख्यमंत्री होना पार्टी के लिए एक लंबे राजनीतिक लक्ष्य की पूर्ति है। साथ ही उन्होंने एनडीए की एकजुटता पर जोर दिया।

राजनीतिक विश्लेषण: असली बहस कुर्सी से ज्यादा ‘कथा’ की है

बिहार की राजनीति को समझने वाले विश्लेषकों के लिए मौजूदा घटनाक्रम का सबसे बड़ा पहलू यह है कि सत्ता परिवर्तन की दो अलग-अलग राजनीतिक कथाएं तैयार हो रही हैं।

सत्ता पक्ष की कथा है—नीतीश कुमार ने स्वेच्छा से पद छोड़ा, राज्यसभा का रास्ता चुना और भाजपा ने गठबंधन की परंपरा के तहत उन्हें सम्मान दिया।

विपक्ष की कथा इससे अलग है—2025 के चुनाव के बाद मिले जनादेश के केंद्र में नीतीश कुमार थे और भाजपा ने राजनीतिक समीकरण का इस्तेमाल कर मुख्यमंत्री की कुर्सी अपने पास कर ली।इन दोनों दावों के बीच तथ्य यह है कि नीतीश कुमार ने अप्रैल 2026 में मुख्यमंत्री पद छोड़ा और उसके बाद सम्राट चौधरी मुख्यमंत्री बने। सम्राट चौधरी बिहार के पहले भाजपा मुख्यमंत्री हैं।इसलिए अब राजनीतिक बहस का अगला चरण यह होगा कि जनता सरकार के कामकाज को किस नजर से देखती है।

शिक्षाविदों के लिए बड़ा सवाल: राजनीति की बहस से आगे विकास का रिपोर्ट कार्ड

शिक्षा क्षेत्र में सरकार की ओर से बड़े दावों के बीच अब बहस इस बात पर भी केंद्रित है कि नेतृत्व परिवर्तन का वास्तविक लाभ बिहार के विद्यार्थियों और युवाओं तक कितना पहुंचता है।

सम्राट चौधरी सरकार ने हाल में 211 डिग्री कॉलेजों के उद्घाटन, 700 मॉडल स्कूलों और उद्योगों के लिए करीब 1,000 एकड़ जमीन उपलब्ध कराने जैसे फैसलों और लक्ष्यों का उल्लेख किया है। मुख्यमंत्री ने 2030 तक युवाओं को शिक्षा के लिए बिहार से बाहर जाने की जरूरत कम करने का लक्ष्य भी बताया है।यही वह क्षेत्र है जहां राजनीतिक बयानबाजी से ज्यादा सरकार के काम का असर जनता के बीच दिखाई देगा।

स्थानीय नागरिकों के लिए सवाल सीधा है—कुर्सी किसकी थी नहीं, सरकार कैसी है?

बिहार के आम मतदाता के लिए सत्ता परिवर्तन की संवैधानिक और राजनीतिक व्याख्या से ज्यादा महत्वपूर्ण रोजमर्रा के सवाल हैं—रोजगार कितना बढ़ा, शिक्षा की गुणवत्ता कैसी हुई, स्वास्थ्य सेवाओं में क्या सुधार आया, अपराध पर कितना नियंत्रण हुआ, सड़क-बिजली-पानी की स्थिति क्या बदली और बाढ़ जैसी पुरानी समस्याओं से निपटने के लिए क्या ठोस व्यवस्था बनी?

यही वजह है कि सम्राट चौधरी सरकार के लिए आने वाला समय राजनीतिक बहस को जवाब देने से आगे बढ़कर अपने शासन का ठोस रिपोर्ट कार्ड पेश करने का समय है।

हालांकि सरकार ने अपने शुरुआती महीनों में कई विकास योजनाओं और प्रशासनिक फैसलों को अपनी उपलब्धि के तौर पर पेश किया है, लेकिन कुछ फैसलों में बदलाव और वापसी भी हुई है।

एक हालिया विश्लेषण में राजनीतिक विशेषज्ञ डॉ. संजय कुमार ने कुछ फैसलों के रोलबैक को तेज निर्णय प्रक्रिया और उनके संभावित असर के आकलन से जोड़ा।

एनएसके विश्लेषण:

नीतीश की विरासत, सम्राट की चुनौती और विपक्ष की रणनीति

बिहार में मुख्यमंत्री बदल गया है, लेकिन नीतीश कुमार की राजनीतिक छाया अभी खत्म नहीं हुई है।सम्राट चौधरी ने जिस स्पष्टता से कहा है कि भाजपा ने नीतीश कुमार से पद छोड़ने को नहीं कहा, उससे एक बात साफ है—सत्ता पक्ष नेतृत्व परिवर्तन को विवाद का विषय बनने से रोकना चाहता है।

दूसरी तरफ विपक्ष इस बदलाव को अपने राजनीतिक विमर्श का मुद्दा बनाए रखना चाहता है। तेजस्वी यादव का ‘चयनित मुख्यमंत्री’ वाला हमला इसी राजनीतिक नैरेटिव का हिस्सा है। आरजेडी ने जून में भी आरोप लगाया था कि भाजपा ने नीतीश को सत्ता से हटाया।

अब असली सवाल यह नहीं है कि नीतीश कुमार ने कुर्सी स्वेच्छा से छोड़ी या भाजपा ने राजनीतिक रूप से परिस्थितियां बनाई—इसका राजनीतिक अर्थ अलग-अलग दल अलग तरीके से निकालते रहेंगे।

असली सवाल यह है कि सम्राट चौधरी की सरकार अपने काम से बिहार की जनता के बीच अपनी अलग पहचान कितनी मजबूत कर पाती है और एनडीए के भीतर नीतीश कुमार की भूमिका आने वाले वर्षों में किस रूप में विकसित होती है।

यहीं से बिहार की राजनीति का अगला अध्याय आकार लेगा।

बी. के. झा , एनएसके

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