बी के झा
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मुंबई, 19 सितंबर
दिशा सालियान की मौत का छह साल पुराना मामला अब सिर्फ एक चर्चित मौत की जांच नहीं रह गया है। CCTV फुटेज, पुलिस रिकॉर्ड, पोस्टमार्टम, कथित सबूतों से छेड़छाड़ और तत्कालीन सत्ता के प्रभाव से जुड़े सवालों ने इसे महाराष्ट्र की राजनीति और कानून-व्यवस्था के बीच खड़ा कर दिया है।दिशा सालियान के पिता सतीश सालियान की ओर से अदालत में रखे गए आरोपों के बाद बॉम्बे हाईकोर्ट ने 2 सितंबर 2026 को मामले की जांच CBI को सौंपने का निर्देश दिया था। अदालत ने हालांकि साफ कहा था कि जांच के दौरान पर्याप्त सामग्री मिलने तक किसी व्यक्ति को आरोपी नहीं माना जाए।
अब पिता के वकील नीलेश ओझा ने CCTV फुटेज और पुलिस जांच को लेकर कई गंभीर दावे किए हैं। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी बाकी है, लेकिन CBI जांच शुरू होने के बाद इनका महत्व इसलिए बढ़ गया है क्योंकि एजेंसी को मामले के हर पहलू की जांच करने का निर्देश मिला है।
CCTV की पांच दिनों की रिकॉर्डिंग कहां गई?
नीलेश ओझा का दावा है कि मामले में CCTV फुटेज का DVR पुलिस ने बैकअप लेने के बाद सील किया था। उनका कहना है कि बाद में जब फुटेज की फोरेंसिक जांच की मांग उठी तो कथित तौर पर सामने आया कि 4 जून से 9 जून के बीच की रिकॉर्डिंग उपलब्ध नहीं थी।ओझा का आरोप है कि पुलिस कस्टडी में मौजूद डिजिटल साक्ष्य के साथ छेड़छाड़ या उसके गायब होने की स्थिति में यह जांच का गंभीर विषय बन जाता है।यही वह बिंदु है जहां मामला राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से निकलकर फोरेंसिक और साक्ष्य की विश्वसनीयता के सवाल में प्रवेश करता है।
यदि कोई डिजिटल रिकॉर्ड वास्तव में पुलिस के कब्जे में था, फिर वह किसके पास रहा, किस सिस्टम से कॉपी बना, मूल DVR किस स्थिति में था, सील कब खोली गई और रिकॉर्डिंग के मेटाडेटा में क्या मिला—इन सवालों का जवाब अब जांच एजेंसी को रिकॉर्ड के आधार पर देना होगा।
‘पहले सील, फिर जांच कैसे?’–वकील ने उठाया सवाल
ओझा ने यह भी सवाल उठाया कि पुलिस द्वारा DVR बैकअप लिए जाने और उसे सील किए जाने के बाद तत्कालीन पुलिस नेतृत्व की ओर से घटनास्थल पर मौजूदगी को लेकर बयान कैसे सामने आए।यह आरोप यदि जांच में प्रमाणित होता है तो जांच की टाइमलाइन स्वयं महत्वपूर्ण साक्ष्य बन सकती है। लेकिन केवल सवाल उठ जाना किसी व्यक्ति के खिलाफ अपराध सिद्ध नहीं करता।यही कारण है कि हाईकोर्ट ने CBI को मामले की सभी परिस्थितियों की स्वतंत्र जांच करने को कहा है। अदालत ने शुरुआती पुलिस जांच में कई विसंगतियों का उल्लेख किया और कहा कि कुछ परिस्थितियां नई जांच की जरूरत पैदा करती हैं।
सचिन वाझे की बहाली फिर चर्चा के केंद्र में
वकील नीलेश ओझा ने विवादित पूर्व पुलिस अधिकारी सचिन वाझे की सेवा में बहाली को भी मामले से जोड़ते हुए गंभीर आरोप लगाए हैं।उनका दावा है कि वाझे को दिशा सालियान की मौत से कुछ समय पहले पुलिस सेवा में वापस लाया गया था और यह बहाली तत्कालीन राजनीतिक नेतृत्व के दबाव में हुई थी।ओझा ने पूर्व मुंबई पुलिस आयुक्त परमबीर सिंह के कथित बयानों का भी हवाला दिया है।लेकिन यहां भी कानूनी कसौटी साफ है—किसी बयान में किसी व्यक्ति का नाम आना अपने आप में अपराध का प्रमाण नहीं है।
CBI को संबंधित दस्तावेज, आदेश, फाइल नोटिंग, सेवा रिकॉर्ड और गवाहों के बयान मिलाकर तथ्य निर्धारित करने होंगे।
उद्धव ठाकरे आरोपी और फडणवीस गवाह?
ओझा ने दावा किया है कि पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे की भूमिका जांच के दायरे में है, जबकि वर्तमान मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस महत्वपूर्ण गवाह हो सकते हैं।यह दावा महाराष्ट्र की राजनीति में इसलिए बड़ा है क्योंकि फडणवीस उस समय विपक्ष में थे और बाद में राज्य की सत्ता में महत्वपूर्ण भूमिका में आए।हालांकि उपलब्ध न्यायिक रिकॉर्ड का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि बॉम्बे हाईकोर्ट ने CBI को जांच का आदेश देते हुए कहा था कि पर्याप्त सामग्री मिलने से पहले किसी को आरोपी न माना जाए। इसलिए किसी व्यक्ति को अभी से दोषी या अपराध का जिम्मेदार बताना कानूनी रूप से उचित नहीं होगा।
CBI की FIR ने खोला नया अध्याय
CBI ने सितंबर में बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश के बाद FIR दर्ज की है। इसमें दिशा सालियान की मौत से जुड़े हत्या, सामूहिक दुष्कर्म, आपराधिक साजिश और कथित कवर-अप जैसे आरोपों की जांच की जा रही है। रिपोर्टों के अनुसार FIR में कई लोगों के नाम और भूमिकाएं जांच के दायरे में हैं।लेकिन यहां एक बेहद महत्वपूर्ण कानूनी फर्क समझना जरूरी है—FIR में किसी व्यक्ति का नाम या उसकी भूमिका की जांच होना दोष सिद्ध होना नहीं है।
CBI को अब यह देखना होगा कि आरोपों के समर्थन में कौन-सा भौतिक, डिजिटल, फोरेंसिक और प्रत्यक्ष साक्ष्य उपलब्ध है।
उद्धव ठाकरे का पलटवार—‘राजनीतिक बदनामी’ का आरोप
उद्धव ठाकरे ने अपने परिवार को दिशा सालियान मामले में घसीटे जाने को राजनीतिक रूप से प्रेरित बताया है और कानूनी कार्रवाई की चेतावनी दी है। आदित्य ठाकरे ने भी आरोपों को खारिज करते हुए दिशा सालियान से किसी परिचय से इनकार किया है।शिवसेना (UBT) सांसद संजय राउत ने भी CBI की कार्रवाई को ठाकरे परिवार की छवि खराब करने की कोशिश बताते हुए इसे राजनीतिक साजिश कहा है।
दूसरी तरफ, अब जांच का दायरा CBI के पास है। इसलिए राजनीतिक बयानबाजी से अधिक महत्वपूर्ण यह होगा कि एजेंसी को पुराने रिकॉर्ड से क्या मिलता है।
महाराष्ट्र सरकार के सामने भी बड़ी चुनौती
यह मामला मौजूदा मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के लिए भी असहज सवाल खड़े करता है—क्योंकि एक तरफ CBI जांच उन्हीं के राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों से जुड़े आरोपों को खंगाल रही है, वहीं दूसरी तरफ उनके नाम को लेकर वकील ने गवाह होने का दावा किया है।सरकार के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि जांच को राजनीतिक प्रभाव से मुक्त और पारदर्शी बनाए रखने का भरोसा कायम रहे।इससे पहले मुंबई पुलिस और बाद में तत्कालीन फडणवीस-शिंदे सरकार द्वारा गठित SIT ने मामले की जांच की थी और उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक उन्हें हत्या या अन्य आपराधिक साजिश का पर्याप्त आधार नहीं मिला था।
अब उसी जांच के कई पहलुओं की दोबारा समीक्षा हो रही है।यानी CBI के सामने केवल नई शिकायत की जांच नहीं, बल्कि पुरानी जांच सही थी या उसमें महत्वपूर्ण कड़ियां छूट गईं—यह भी परखने की चुनौती है।
कानूनविदों की नजर में असली लड़ाई ‘दावे बनाम डिजिटल सबूत’ की
कानूनी दृष्टि से इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू अब CCTV और डिजिटल साक्ष्य की chain of custody होगी।किसने DVR जब्त किया?
किसने उसका बैकअप बनाया?
मूल रिकॉर्ड किसके कब्जे में रहा?
सील की स्थिति क्या थी?
फोरेंसिक जांच कब हुई?
रिकॉर्डिंग के गायब हिस्से का तकनीकी कारण क्या था?
यदि इन सवालों के जवाब दस्तावेजों और फोरेंसिक रिपोर्ट से मिलते हैं तो जांच मजबूत होगी। यदि नहीं मिलते, तो केवल राजनीतिक आरोपों के आधार पर किसी व्यक्ति की आपराधिक जिम्मेदारी तय करना कठिन होगा।यही वजह है कि कानून के जानकारों की नजर अब बयानों से ज्यादा मूल रिकॉर्ड और फोरेंसिक साक्ष्य पर रहेगी।
शिक्षाविद और समाज के लिए बड़ा सवाल—इतने साल बाद न्याय कैसे सुनिश्चित होगा?
शिक्षाविदों और सामाजिक संगठनों के दृष्टिकोण से यह मामला एक व्यापक सवाल भी खड़ा करता है—अगर किसी संवेदनशील मामले में प्रारंभिक जांच पर वर्षों बाद सवाल उठते हैं तो जांच एजेंसियों की जवाबदेही कैसे तय हो?
सामाजिक संगठनों के लिए यह भी महत्वपूर्ण है कि मृतक की गरिमा और परिवार के अधिकारों की रक्षा करते हुए जांच हो तथा सोशल मीडिया और राजनीतिक मंचों पर अपुष्ट दावों को तथ्य की तरह प्रस्तुत न किया जाए।
दिशा सालियान की मौत को लेकर वर्षों से सार्वजनिक बहस चलती रही है। अब CBI जांच का उद्देश्य इस बहस को और उत्तेजित करना नहीं, बल्कि उपलब्ध साक्ष्यों से सत्य और आरोप के बीच स्पष्ट रेखा खींचना होना चाहिए।
राजनीतिक विश्लेषण: छह साल बाद कहानी नहीं, सबूत निर्णायक होंगे
महाराष्ट्र की राजनीति में यह मामला निश्चित तौर पर संवेदनशील है। एक ओर ठाकरे परिवार पर गंभीर आरोप हैं, दूसरी ओर ठाकरे गुट इन्हें राजनीतिक बदनामी बता रहा है। बीच में CBI जांच है, जिसके सामने अदालत के निर्देश और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आगे बढ़ने की जिम्मेदारी है।
राजनीतिक विश्लेषण का सबसे अहम बिंदु यही है कि अब इस मामले का फैसला टीवी बहस, प्रेस कॉन्फ्रेंस या राजनीतिक आरोपों से नहीं बल्कि जांच में सामने आने वाले प्रमाणों से होना चाहिए।यदि CCTV फुटेज से छेड़छाड़ का दावा सही साबित होता है तो यह जांच की दिशा बदल सकता है। यदि फोरेंसिक रिकॉर्ड इन दावों की पुष्टि नहीं करते तो आरोपों की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठेंगे।
इसी तरह सचिन वाझे की बहाली, तत्कालीन राजनीतिक नेतृत्व, पुलिस अधिकारियों की भूमिका और कथित कवर-अप के आरोप—हर कड़ी को अलग-अलग प्रमाणित करना होगा।
एनएसके विश्लेषण:
इस बार सवाल ‘कौन आरोपी है’ से पहले ‘सबूत क्या कहते हैं’ का है
दिशा सालियान मामले ने महाराष्ट्र की राजनीति को फिर दो ध्रुवों में खड़ा कर दिया है। लेकिन छह साल पुराने इस मामले में सबसे जरूरी बात यही है कि आरोप और अपराध सिद्ध होने के बीच कानून की पूरी प्रक्रिया कायम रहे।
बॉम्बे हाईकोर्ट ने जांच का रास्ता खोल दिया है।
CBI FIR दर्ज कर चुकी है।
अब गेंद जांच एजेंसी के पाले में है।CCTV का कथित गायब होना, DVR की कस्टडी, फोरेंसिक रिपोर्ट, पुलिस की कार्रवाई की टाइमलाइन, वाझे की बहाली और तत्कालीन राजनीतिक नेतृत्व से जुड़े आरोप—ये सभी अलग-अलग जांच के विषय हैं।
किसी को दोषी ठहराने का अधिकार राजनीतिक मंच को नहीं, कानून की प्रक्रिया को है।और शायद यही इस पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल भी है—
क्या छह साल बाद दिशा सालियान केस में आरोपों का शोर खत्म करके सबूतों की आवाज सुनी जाएगी?
अब महाराष्ट्र ही नहीं, पूरे देश की नजर CBI की जांच पर होगी।
बी. के. झा,
एनएसके
