SIR के घेरे में सत्ता से सिस्टम तक के दिग्गज: जयशंकर, सिसोदिया, CBI डायरेक्टर से पूर्व सेना प्रमुख तक को नोटिस, कहीं नाम तो कहीं माता-पिता के विवरण में अंतर, चुनाव आयोग बोला—नोटिस का मतलब नाम कटना नहीं

बी के झा

NSK news Ind

नई दिल्ली, 20 सितंबर

दिल्ली में मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) ने अब राजनीतिक गलियारों से निकलकर सत्ता, नौकरशाही, सुरक्षा तंत्र और न्यायपालिका से जुड़े कई चर्चित चेहरों तक दस्तक दे दी है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर, पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया, CBI निदेशक प्रवीण सूद, पूर्व सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी, सुप्रीम कोर्ट की पूर्व न्यायाधीश रंजना देसाई और कई वरिष्ठ नौकरशाहों समेत अनेक हाई-प्रोफाइल मतदाताओं को निर्वाचन अधिकारियों की ओर से नोटिस जारी किए गए हैं।लेकिन इस पूरी कवायद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि नोटिस को मतदाता सूची से नाम हटाए जाने का आदेश समझना गलत होगा।

दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय के मुताबिक ऐसे नोटिस उन मामलों में जारी किए जा रहे हैं, जहां मौजूदा रिकॉर्ड पिछले SIR के रिकॉर्ड से लिंक नहीं हो पाया या नाम/परिवार संबंधी विवरण में विसंगति सामने आई है।

जयशंकर से जनरल द्विवेदी तक—‘Unmapped’ रिकॉर्ड ने खींचा ध्यान

विदेश मंत्री एस. जयशंकर और उनकी पत्नी क्योको एस. जयशंकर का रिकॉर्ड ‘Unmapped with Last SIR’ श्रेणी में बताया गया है। इसका अर्थ है कि उनके मौजूदा मतदाता रिकॉर्ड को पिछले SIR के रिकॉर्ड से जोड़ा नहीं जा सका। दोनों नई दिल्ली विधानसभा क्षेत्र के सुंदर बाग क्षेत्र में पंजीकृत मतदाता बताए गए हैं।CBI निदेशक प्रवीण सूद, उनकी पत्नी वनीता सूद और उनकी मां कमलेश सूद के रिकॉर्ड भी इसी श्रेणी में बताए गए हैं। पूर्व सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी और उनकी पत्नी सुनीता द्विवेदी के नाम भी ‘Unmapped with Last SIR’ श्रेणी में सामने आए हैं।यानी SIR की प्रक्रिया यह सवाल नहीं पूछ रही कि व्यक्ति कितना बड़ा पद संभाल रहा है; वह यह देख रही है कि मौजूदा मतदाता रिकॉर्ड पिछली मतदाता सूची के रिकॉर्ड से प्रक्रियात्मक रूप से जुड़ रहा है या नहीं।

मनीष सिसोदिया के परिवार में अलग-अलग तरह की विसंगतियां

दिल्ली के पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया और उनके परिवार के सदस्यों को भी नोटिस मिला है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार उनकी पत्नी सीमा सिसोदिया के रिकॉर्ड में सेल्फ-नेम मिसमैच, जबकि बेटे मीर सिसोदिया के मामले में पैरेंट-नेम मिसमैच जैसी विसंगति दर्ज की गई है।यानी SIR में सामने आ रही गड़बड़ियां केवल किसी एक तरह की नहीं हैं। कहीं पुरानी सूची से रिकॉर्ड लिंक नहीं हो पा रहा है तो कहीं नाम या पारिवारिक विवरण में अंतर है।

पूर्व जज रंजना देसाई के परिवार तक पहुंचा नोटिस

सुप्रीम कोर्ट की पूर्व न्यायाधीश रंजना देसाई, उनके पति प्रकाश देसाई, बेटे एवं अधिवक्ता माइक देसाई और बहू साक्षी देसाई के नाम भी ‘Unmapped with Last SIR’ श्रेणी में बताए गए हैं।CPI(M) सांसद जॉन ब्रिटास के परिवार से भी उनकी पत्नी शीबा ब्रिटास और बेटे आनंद ब्रिटास को नोटिस मिला है। रिपोर्टों के अनुसार शीबा के रिकॉर्ड में नाम संबंधी और आनंद के रिकॉर्ड में माता-पिता के नाम से जुड़ी विसंगति दर्ज की गई है।

नौकरशाही के बड़े नाम भी जांच के दायरे में

SIR नोटिस पाने वालों की सूची में केवल राजनेता ही नहीं हैं। विदेश सचिव विक्रम मिसरी, SEBI चेयरमैन तुहिन कांत पांडे, प्रधानमंत्री के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार अजय कुमार सूद, स्वास्थ्य सचिव पुण्य सलिला श्रीवास्तव, मत्स्य सचिव अभिलक्ष लिखी, पूर्व सैनिक कल्याण सचिव सुकृति लिखी, उर्वरक सचिव रजत कुमार मिश्रा और भूमि संसाधन सचिव नरेंद्र भूषण समेत कई वरिष्ठ नौकरशाहों के नाम भी रिपोर्टों में सामने आए हैं।

व्यय सचिव वुमलुनमंग वुअलनाम और CAG के. संजय मूर्ति के रिकॉर्ड में भी अलग-अलग प्रकार की विसंगतियां बताए जाने की बात सामने आई है।यह सूची इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे साफ होता है कि SIR का दायरा किसी एक राजनीतिक दल या विचारधारा तक सीमित नहीं है। जिस रिकॉर्ड में निर्धारित मानकों के अनुसार मिलान या विवरण संबंधी समस्या सामने आ रही है, वह सत्यापन की प्रक्रिया में जा रहा है।

केजरीवाल परिवार भी पहले आ चुका है घेरे में

इससे एक दिन पहले दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी प्रमुख अरविंद केजरीवाल, उनकी पत्नी सुनीता केजरीवाल, माता-पिता और बेटे पुलकित केजरीवाल को भी ‘Unmapped with Last SIR’ श्रेणी में नोटिस जारी किए जाने की जानकारी सामने आई थी।दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता को भी उम्र संबंधी विसंगति के कारण नोटिस मिला था। हालांकि दस्तावेजों और सत्यापन के बाद उनकी प्रविष्टि को सही पाया गया और उसे वैध कर दिया गया।यही उदाहरण यह समझने के लिए महत्वपूर्ण है कि नोटिस अंतिम फैसला नहीं है।

2002 की मतदाता सूची क्यों बनी आधार?

दिल्ली में मौजूदा SIR के लिए पिछली विशेष गहन पुनरीक्षण सूची के तौर पर 2002 के रिकॉर्ड का इस्तेमाल किया जा रहा है। दिल्ली CEO कार्यालय ने मतदाताओं को निर्देश दिया है कि वे 2002 की सूची में अपना या अपने रिश्तेदार का विवरण खोजें और उसे Enumeration Form में दर्ज करें। अगर कोई व्यक्ति 2002 की दिल्ली सूची में नहीं था, लेकिन उसके माता-पिता या अन्य पात्र रिश्तेदार का नाम उस सूची में था, तो उनके विवरण का इस्तेमाल किया जा सकता है।यहीं से ‘Unmapped’ शब्द का अर्थ समझना जरूरी है।Unmapped का अर्थ अपने-आप में ‘फर्जी मतदाता’ नहीं है।यह एक प्रक्रियात्मक स्थिति है—मौजूदा रिकॉर्ड और पिछले SIR रिकॉर्ड के बीच अपेक्षित डिजिटल/दस्तावेजी मिलान नहीं हो पाया है।

नोटिस मिला तो आगे क्या होगा?

निर्वाचन अधिकारियों के सामने संबंधित मतदाता को अपना पक्ष रखने और जरूरी दस्तावेज प्रस्तुत करने का अवसर मिलेगा। दिल्ली CEO कार्यालय ने स्पष्ट किया है कि केवल नोटिस जारी होने के आधार पर किसी मतदाता का नाम स्वतः नहीं हटाया जाएगा। प्रक्रिया में सुनवाई और उचित आदेश का प्रावधान है।उपलब्ध कार्यक्रम के अनुसार नोटिसों के निस्तारण की प्रक्रिया 29 अक्टूबर 2026 तक पूरी की जानी है और अंतिम मतदाता सूची 4 नवंबर 2026 को प्रकाशित की जानी है।

SIR पर असली बहस यहीं से शुरू होती है

SIR का घोषित उद्देश्य मतदाता सूची को अधिक सटीक बनाना है। लेकिन इतनी बड़ी संख्या में रिकॉर्ड का ‘अनमैप्ड’ होना अपने साथ एक दूसरी चुनौती भी लाता है—क्या आम मतदाता समय पर अपने रिकॉर्ड की विसंगति दूर कर पाएगा?

यही वह सवाल है जो हाई-प्रोफाइल मामलों से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है।किसी केंद्रीय मंत्री, पूर्व मुख्यमंत्री या वरिष्ठ अधिकारी के पास दस्तावेज जुटाने और प्रशासनिक प्रक्रिया समझने के साधन उपलब्ध हो सकते हैं। लेकिन दूरदराज के इलाके में रहने वाले सामान्य मतदाता के लिए यही प्रक्रिया कितनी आसान होगी—यह SIR की वास्तविक प्रशासनिक परीक्षा होगी।

एनएसके विश्लेषण:

असली परीक्षा ‘नोटिस’ नहीं, ‘न्यायपूर्ण सत्यापन’ की

दिल्ली की SIR प्रक्रिया ने एक दिलचस्प तस्वीर सामने रखी है।एक तरफ विदेश मंत्री और CBI निदेशक जैसे मौजूदा शीर्ष पदों पर बैठे लोगों के रिकॉर्ड हैं, दूसरी तरफ पूर्व मुख्यमंत्री और पूर्व उपमुख्यमंत्री जैसे राजनीतिक चेहरे; इनके बीच वरिष्ठ नौकरशाह, पूर्व सैन्य अधिकारी और न्यायपालिका से जुड़े लोग भी हैं।

इससे कम-से-कम इतना स्पष्ट है कि SIR की मशीनरी बड़े नामों को भी सत्यापन प्रक्रिया से बाहर नहीं रख रही है।लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में मतदाता सूची की शुद्धता जितनी जरूरी है, उतना ही जरूरी है कि किसी पात्र मतदाता का नाम केवल रिकॉर्ड संबंधी अस्पष्टता के कारण प्रभावित न हो।

इसलिए आने वाले सप्ताहों में असली कहानी नोटिसों की संख्या नहीं होगी।असली कहानी यह होगी कि—कितने ‘Unmapped’ रिकॉर्ड वैध साबित होते हैं?

कितने रिकॉर्ड में वास्तव में सुधार की जरूरत निकलती है?

कितने मतदाताओं को अपने दस्तावेज साबित करने में परेशानी होती है?

और अंतिम सूची में कितने नाम कायम रहते हैं या बाहर होते हैं?

यही आंकड़े तय करेंगे कि दिल्ली का SIR केवल मतदाता सूची का प्रशासनिक पुनरीक्षण साबित होता है या चुनावी लोकतंत्र की विश्वसनीयता से जुड़ी एक बड़ी परीक्षा बनता है।एनएसके की नजर अब 4 नवंबर को प्रकाशित होने वाली अंतिम मतदाता सूची पर रहेगी।

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