सलवार खींचना, सीना दबाना और फिर कानून की कसौटी: पटना HC के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, CJI बोले- टिप्पणियां आपत्तिजनक, सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेकर आरोपी को नोटिस दिया, महिला आयोग ने कहा- यौन अपराधों की व्याख्या सिर्फ शारीरिक कृत्य तक सीमित नहीं होनी चाहिए

बी के झा

NSK news Ind

नई दिल्ली/पटना, 24 सितंबर

एक महिला की सलवार उतारने की कोशिश, बंद कमरे में उसे रोकना और उसके सीने को दबाने जैसे आरोपों को लेकर पटना हाईकोर्ट के 9 जुलाई 2026 के फैसले ने अब देश की सर्वोच्च अदालत का ध्यान खींच लिया है।

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार, 23 सितंबर को इस फैसले पर स्वतः संज्ञान लेते हुए कहा कि हाईकोर्ट के आदेश में कुछ टिप्पणियां आपत्तिजनक हैं। हालांकि, सर्वोच्च अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि आदेश को बदलने या रद्द करने से पहले आरोपी को सुनना जरूरी होगा।

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ में जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना शामिल थे। पीठ ने आरोपी हिमांशु कुमार पाठक को नोटिस जारी किया और बिहार के महाधिवक्ता एसडी संजय से स्थानीय पुलिस के माध्यम से नोटिस की तामील सुनिश्चित करने को कहा।

मामला क्या था?

मामला वर्ष 2008 का है। अभियोजन के मुताबिक बांका जिले के अमरपुर स्थित एक फोटो स्टूडियो में एक युवती अपने पिता के साथ तस्वीर खिंचवाने गई थी। आरोप था कि स्टूडियो संचालक ने उसके पिता को तस्वीर देखने के बहाने बाहर भेज दिया और कमरे का दरवाजा अंदर से बंद कर लिया। इसके बाद युवती के साथ जबरदस्ती की गई, उसकी सलवार खोलने का प्रयास किया गया और उसके सीने को दबाया गया। युवती के शोर मचाने पर उसके पिता दरवाजे की ओर पहुंचे और आरोपी वहां से निकल गया।

20 जनवरी 2008 को प्राथमिकी दर्ज हुई। निचली अदालत ने 2013 में आरोपी को दुष्कर्म के प्रयास और गलत तरीके से बंधक बनाने के आरोप में दोषी ठहराते हुए तीन वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। इसके बाद आरोपी ने पटना हाईकोर्ट में अपील की।

9 जुलाई को हाईकोर्ट ने क्यों पलटा फैसला?

पटना हाईकोर्ट ने अभियोजन के साक्ष्यों का परीक्षण करते हुए कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा मेडिकल साक्ष्य नहीं था जिससे दुष्कर्म के प्रयास की पुष्टि हो सके। अदालत ने यह भी कहा कि दुष्कर्म के प्रयास के लिए ऐसा स्पष्ट कृत्य होना चाहिए जिससे उस अपराध की ओर निर्णायक रूप से बढ़ना स्थापित हो।

हाईकोर्ट ने हालांकि यह माना कि आरोपी द्वारा युवती को कमरे में बंद करना, उसकी सलवार उतारने का प्रयास करना और उसके सीने को दबाना महिला के प्रति आपराधिक बल का इस्तेमाल था और इससे भारतीय दंड संहिता की धारा 354 के तहत महिला की लज्जा भंग करने का अपराध बनता है। लेकिन चूंकि आरोपी पर धारा 354 का आरोप लगाकर मुकदमा नहीं चलाया गया था, इसलिए उस आधार पर सजा कायम नहीं रखी गई।

यही वह कानूनी बिंदु है जिसने अब बहस को जन्म दिया है—किसी यौन हमले को ‘दुष्कर्म का प्रयास’ मानने की कानूनी सीमा कहां से शुरू होती है और क्या न्यायिक भाषा में पीड़िता के अनुभव, गरिमा और भय को पर्याप्त महत्व दिया जा रहा है?

सुप्रीम कोर्ट ने क्यों लिया स्वतः संज्ञान?

यह मामला पहली बार जुलाई में ही सुप्रीम कोर्ट के सामने आया था। वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा गुप्ता ने सुनवाई के दौरान पटना हाईकोर्ट के फैसले का उल्लेख किया था। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने न्यायिक फैसलों में यौन अपराधों से जुड़े तथ्यों और भाषा के इस्तेमाल को लेकर गंभीरता दिखाई।23 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने मामले को औपचारिक रूप से स्वतः संज्ञान के रूप में दर्ज किया।

CJI सूर्यकांत ने कहा कि आदेश में कुछ “offending observations” हैं और आरोपी को सुनने के बाद ही उन टिप्पणियों को हटाने या आदेश में हस्तक्षेप करने पर फैसला किया जा सकता है।

इसका अर्थ यह नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट ने अभी अंतिम रूप से हाईकोर्ट का फैसला रद्द कर दिया है। फिलहाल मामला न्यायिक परीक्षण के अधीन है और आरोपी को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया गया है।

महिला आयोग ने क्या कहा?

राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष विजया रहाटकर ने जुलाई में इस विवाद के बीच कहा था कि यौन अपराधों की व्याख्या केवल शारीरिक कृत्य तक सीमित नहीं होनी चाहिए। उनके अनुसार पीड़िता की गरिमा, सहमति, भय और मानसिक आघात को भी न्यायिक दृष्टिकोण में महत्व मिलना चाहिए।

महिला अधिकारों से जुड़े संगठनों और कानूनी विशेषज्ञों के बीच भी इसी प्रश्न को लेकर बहस सामने आई कि यौन अपराधों में न्यायिक भाषा कितनी संवेदनशील और पीड़ित-केंद्रित होनी चाहिए।

कानूनविदों के सामने असली सवाल

इस पूरे विवाद को केवल इस सवाल तक सीमित करना कि “सलवार उतारना रेप है या नहीं”, कानूनी बहस को अत्यधिक सरल बना देगा।

कानून में दुष्कर्म और दुष्कर्म के प्रयास के लिए अभियोजन को आवश्यक कानूनी तत्व साबित करने होते हैं। दूसरी ओर, हर यौन हमले को केवल इसलिए कम गंभीर नहीं माना जा सकता कि वह अंतिम शारीरिक कृत्य तक नहीं पहुंचा।

पटना हाईकोर्ट के फैसले ने इसी अंतर पर जोर दिया था। सुप्रीम कोर्ट की वर्तमान कार्यवाही अब यह देखने का अवसर देती है कि ऐसे मामलों में आपराधिक मंशा, किए गए कृत्य, उपलब्ध साक्ष्य और पीड़िता की गरिमा—इन सभी को किस कानूनी संतुलन के साथ देखा जाना चाहिए।

यही कारण है कि यह मामला सिर्फ एक आरोपी की सजा और बरी होने का विवाद नहीं रह गया है। यह न्यायिक भाषा, यौन अपराधों की कानूनी व्याख्या और पीड़ित-केंद्रित न्याय के बीच संतुलन का सवाल बन चुका है।

शिक्षाविदों और समाजशास्त्रियों के लिए भी बड़ा प्रश्न

शिक्षाविदों और समाजशास्त्रियों की दृष्टि से ऐसे मामले का प्रभाव अदालत की चारदीवारी से बाहर तक जाता है। यौन हिंसा के मामलों में पीड़ित व्यक्ति के लिए न्याय केवल कानूनी धाराओं का सवाल नहीं होता; उसमें सामाजिक प्रतिष्ठा, भय, मानसिक दबाव और संस्थागत विश्वास भी जुड़ा होता है।इसीलिए न्यायिक फैसलों में प्रयुक्त भाषा भी महत्वपूर्ण हो जाती है।

अदालत का हर शब्द कानूनी रिकॉर्ड का हिस्सा होता है और समाज में न्याय व्यवस्था को लेकर धारणा बनाने में उसकी भूमिका रहती है।

राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया पर तस्वीर क्या है?

इस विशेष मामले पर 23 सितंबर तक प्रमुख विपक्षी दलों की ओर से ऐसी कोई आधिकारिक, विस्तृत प्रतिक्रिया विश्वसनीय राष्ट्रीय रिपोर्टिंग में सामने नहीं आई है जिसे स्वतंत्र रूप से पुष्ट किया जा सके। इसलिए इस खबर में किसी राजनीतिक दल के नाम से बयान जोड़ना उचित नहीं होगा।

हालांकि, मामला न्यायपालिका, महिला सुरक्षा और यौन अपराधों की व्याख्या से जुड़ा होने के कारण इसके राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव पर बहस स्वाभाविक है।

विपक्षी दल यदि इस मुद्दे पर औपचारिक बयान जारी करते हैं, तो उसे अलग से जोड़ा जा सकता है।

‘न्याय’ केवल सजा का नाम नहीं, भाषा भी जिम्मेदार होनी चाहिए

इस मामले की सबसे महत्वपूर्ण परत शायद यही है कि अदालत से समाज सिर्फ फैसला नहीं सुनता, बल्कि न्याय की भाषा भी सुनता है।

पटना हाईकोर्ट ने अपने फैसले में अभियोजन के साक्ष्य और दुष्कर्म के प्रयास के कानूनी तत्वों के बीच अंतर को आधार बनाया।

सुप्रीम कोर्ट ने अब उसी फैसले की कुछ टिप्पणियों को आपत्तिजनक मानते हुए स्वतः संज्ञान लिया है। दोनों स्तरों की न्यायिक प्रक्रिया को साथ रखकर देखें तो सवाल केवल यह नहीं रह जाता कि किसी घटना में कौन-सी धारा लागू होगी।

सवाल यह भी है कि यौन अपराधों से जुड़े मामलों में कानून की तकनीकी कसौटी और महिला की गरिमा—दोनों के बीच न्यायिक संतुलन कैसे कायम किया जाए।और शायद यही इस 18 साल पुराने मामले की सबसे बड़ी गूंज है—न्यायालय में कानून की भाषा जितनी महत्वपूर्ण है, उतनी ही महत्वपूर्ण उस भाषा की संवेदनशीलता भी।

एनएसके विश्लेषण

2008 की घटना, 2013 की निचली अदालत की सजा, 9 जुलाई 2026 का पटना हाईकोर्ट फैसला और 23 सितंबर 2026 का सुप्रीम कोर्ट का स्वतः संज्ञान—यह पूरा घटनाक्रम बताता है कि एक मामले का कानूनी सफर कितनी लंबी बहस को जन्म दे सकता है।

अभी सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला आना बाकी है। इसलिए इस समय किसी पक्ष को अंतिम रूप से दोषी या निर्दोष ठहराना अथवा हाईकोर्ट के फैसले को अंतिम कानूनी स्थिति मान लेना जल्दबाजी होगी।

लेकिन इतना स्पष्ट है कि सर्वोच्च अदालत ने इस मामले में न्यायिक भाषा और यौन अपराधों के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण का प्रश्न गंभीरता से उठाया है।

अब देश की नजर इस बात पर है कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में आगे क्या कानूनी दिशा तय करता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *