‘ज्ञानेश कुमार ने BJP नेताओं को भी हराया’—अभिजीत दीपके के दावे से नया सवाल; क्या भाजपा भी मानेगी चुनाव में ‘हस्तक्षेप’ का आरोप? दीपके बोले—‘फ्री एंड फेयर चुनाव नहीं तो कोई चुनाव न लड़े’

बी के झा

NSK news Ind

नई दिल्ली, 25 सितंबर

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर राजनीतिक घमासान अब एक ऐसे दावे तक पहुंच गया है, जिसने विवाद को विपक्ष बनाम चुनाव आयोग की बहस से आगे बढ़ाकर भाजपा के भीतर भी सवाल खड़े करने की कोशिश की है। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दीपके ने दावा किया है कि चुनावों में भारतीय जनता पार्टी के कुछ नेता भी हार गए और इसके लिए उन्होंने ज्ञानेश कुमार को जिम्मेदार ठहराया।

हालांकि, दीपके ने अपने दावे के समर्थन में किसी भाजपा नेता का नाम, किसी निर्वाचन क्षेत्र का विवरण या कोई दस्तावेज सार्वजनिक नहीं किया है।यानी दावा बड़ा है, लेकिन उसके साथ फिलहाल सार्वजनिक रूप से उपलब्ध प्रमाण सामने नहीं रखा गया है।

दीपके ने गुरुवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि यदि चुनाव प्रक्रिया निष्पक्ष नहीं है तो किसी भी राजनीतिक दल को चुनाव में हिस्सा लेने पर विचार करना चाहिए। इसी क्रम में उन्होंने भाजपा के उन नेताओं को भी संबोधित किया जो चुनाव हार चुके हैं।

उनका कहना था—“भाजपा के नेता भी जो हारे इलेक्शंस, उनको भी मैं कहना चाहता हूं कि आप जीत सकते थे, लेकिन आपको ज्ञानेश कुमार ने हराया है।”यह बयान अब एक अलग सवाल खड़ा करता है—क्या भाजपा या उसके किसी पराजित उम्मीदवार ने सार्वजनिक रूप से यह दावा किया है कि ज्ञानेश कुमार या निर्वाचन आयोग की किसी कार्रवाई के कारण उनकी चुनावी हार हुई?

फिलहाल दीपके के बयान में ऐसा कोई नाम या विशिष्ट चुनावी उदाहरण सामने नहीं आया है।

दावा सामने आया, तो प्रमाण की कसौटी भी जरूरी

चुनाव में किसी उम्मीदवार की जीत या हार कई कारकों से जुड़ी होती है—मतदान प्रतिशत, उम्मीदवारों का प्रदर्शन, स्थानीय मुद्दे, दलगत समीकरण, मतदाता व्यवहार और निर्वाचन प्रक्रिया से जुड़े फैसले। इसलिए किसी व्यक्ति को सीधे तौर पर किसी उम्मीदवार की हार का कारण बताने के लिए विशिष्ट तथ्य और चुनावी रिकॉर्ड जरूरी होंगे।इसी वजह से दीपके का यह बयान राजनीतिक रूप से तीखा जरूर है, लेकिन इसे अभी आरोप के रूप में ही देखा जाना चाहिए, स्थापित तथ्य के रूप में नहीं।

और यहीं से भाजपा की भूमिका को लेकर भी बड़ा सवाल निकलता है।अगर किसी भाजपा नेता की हार के पीछे चुनाव आयोग की प्रक्रिया को जिम्मेदार बताया जा रहा है, तो क्या संबंधित नेता या पार्टी ने ऐसी कोई शिकायत दर्ज कराई है?

क्या किसी निर्वाचन क्षेत्र में SIR, मतदाता सूची, नाम हटाने या किसी अन्य चुनावी प्रक्रिया को लेकर भाजपा उम्मीदवार ने औपचारिक आपत्ति जताई?

इन सवालों का जवाब ही दीपके के दावे की वास्तविक जांच का आधार बन सकता है।

यूपी चुनाव पर भी सीधा सवाल

CJP से उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर भी सवाल पूछा गया कि क्या समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव उसकी अपील मानकर चुनाव से दूरी बनाएंगे।दीपके ने जवाब दिया कि चुनाव लड़ना या नहीं लड़ना प्रत्येक राजनीतिक दल का लोकतांत्रिक अधिकार है। उन्होंने किसी दल पर अपनी अपील मानने की बाध्यता नहीं जताई।

CJP की अपील हालांकि स्पष्ट है—यदि चुनाव प्रक्रिया को निष्पक्ष नहीं माना जाता तो विपक्षी दलों को चुनाव में भागीदारी पर पुनर्विचार करना चाहिए।दीपके ने इसे क्रिकेट मैच के उदाहरण से समझाते हुए कहा कि यदि किसी को पहले से लगे कि मैच ‘फिक्स’ है तो वह उसमें हिस्सा नहीं लेगा।

हालांकि, चुनाव को ‘फिक्स्ड’ बताना दीपके का राजनीतिक आरोप है, निर्वाचन प्रक्रिया के बारे में स्थापित तथ्य नहीं।

48 घंटे का अल्टीमेटम, फिर देशव्यापी आंदोलन

CJP ने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे के लिए 48 घंटे की समयसीमा तय की है। दीपके ने कहा कि अगर इस्तीफा नहीं हुआ तो संगठन देश के अलग-अलग राज्यों और शहरों में जाकर आंदोलन करेगा और इसके बाद दिल्ली में बड़ा प्रदर्शन किया जाएगा। CJP ने इसे ‘जंतर-मंतर 2.0’ की दिशा में अगला कदम बताया है।CJP ने इसके साथ ‘इलेक्शन ठीक करो’ अभियान की भी घोषणा की है।उसकी मांगों में CEC का इस्तीफा,

SIR की स्वतंत्र जांच,

SIR पर रोक,

पुरानी मतदाता सूची बहाल करना,

संबंधित रिकॉर्ड और फाइलों की स्वतंत्र जांच तथा चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया में बदलाव जैसी बातें शामिल हैं।

SIR विवाद ने बढ़ाई आग

इस पूरे विवाद की पृष्ठभूमि में द इंडियन एक्सप्रेस की 23 सितंबर की जांच रिपोर्ट है। रिपोर्ट के मुताबिक निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार चुनाव आयोग के कुछ फैसलों और प्रक्रियाओं पर आपत्तियां दर्ज की थीं। इनमें मतदाता सूची, Form 6, मतदाता डेटा तक पहुंच और SIR से जुड़े मुद्दे शामिल थे।यही रिपोर्ट सामने आने के बाद विपक्षी दलों ने CEC ज्ञानेश कुमार पर सवाल और तेज कर दिए हैं।लेकिन कहानी का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

निर्वाचन आयोग ने इन रिपोर्टों के बाद कहा कि SIR समेत आयोग के सभी फैसले पूर्ण आयोग की सहमति से लिए गए और संबंधित आयुक्तों की ओर से उठाए गए सवाल प्रक्रिया के ड्राफ्ट स्तर से जुड़े थे। आयोग ने यह भी कहा कि इन मतभेदों को आयोग के अंतिम निर्णयों के खिलाफ असहमति के रूप में पेश करना पूरी तस्वीर नहीं दिखाता।

‘भाजपा नेताओं को भी हराया’—अब भाजपा से जवाब की उम्मीद?

यहीं अभिजीत दीपके के बयान का सबसे बड़ा राजनीतिक पहलू सामने आता है।यदि दीपके का दावा है कि ज्ञानेश कुमार ने भाजपा के कुछ नेताओं को भी चुनाव हराया, तो स्वाभाविक रूप से अगला सवाल भाजपा से पूछा जाएगा—क्या पार्टी इस आरोप को स्वीकार करती है?

क्या भाजपा के किसी पराजित उम्मीदवार ने कभी कहा कि उसकी हार मतदाता सूची या निर्वाचन आयोग की किसी कार्रवाई से हुई?

क्या भाजपा ने किसी निर्वाचन क्षेत्र में इस तरह की शिकायत दर्ज कराई?

या फिर दीपके का बयान राजनीतिक दबाव बढ़ाने के लिए लगाया गया एक नया आरोप है?

इन सवालों का जवाब भाजपा, संबंधित उम्मीदवारों और निर्वाचन आयोग—तीनों से आना बाकी है।

विवाद अब सिर्फ इस्तीफे तक सीमित नहीं

ज्ञानेश कुमार के खिलाफ उठ रहे सवाल अब केवल उनके इस्तीफे की मांग तक सीमित नहीं रह गए हैं। एक तरफ विपक्षी दल SIR और निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रहे हैं, दूसरी तरफ CJP सड़क पर आंदोलन की चेतावनी दे रहा है।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट ने आयोग के भीतर दर्ज आपत्तियों को सार्वजनिक बहस का विषय बनाया है, जबकि चुनाव आयोग ने अंतिम फैसलों को सर्वसम्मत बताया है।ऐसे में अभिजीत दीपके का नया दावा विवाद में एक और परत जोड़ता है।सवाल अब यह नहीं रह गया कि दीपके ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा क्यों मांग रहे हैं। बड़ा सवाल यह है कि जिस ‘चुनावी हस्तक्षेप’ का आरोप लगाया जा रहा है, उसके समर्थन में ठोस चुनाव-दर-चुनाव प्रमाण कब सामने आएंगे?

और उससे भी बड़ा सवाल—अगर आरोप यह है कि ज्ञानेश कुमार ने भाजपा के नेताओं को भी चुनाव हराया, तो क्या भाजपा के वे नेता खुद सामने आकर यही बात कहेंगे?

फिलहाल CJP का आरोप सामने है, चुनाव आयोग का पक्ष भी सामने है, लेकिन भाजपा के उन कथित पराजित नेताओं के नाम और ठोस प्रमाण सार्वजनिक नहीं हुए हैं जिनका हवाला दीपके दे रहे हैं।

यही वह कड़ी है, जो इस पूरे विवाद को राजनीतिक आरोप से तथ्यात्मक जांच की ओर ले जा सकती है।

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