ज्ञानेश कुमार पर चौतरफा घेरा, राहुल गांधी और अभिजीत दीपके के सुर एक जगह; क्या जंतर-मंतर पर फिर दिखेगा साथ?

बी के झा

NSK news Ind

नई दिल्ली, 25 सितंबर

चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर राजनीतिक और सामाजिक दबाव अब एक नए मोड़ पर पहुंचता दिखाई दे रहा है। एक तरफ लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग करते हुए उन्हें कथित चुनावी अनियमितताओं की जांच में ‘सरकारी गवाह’ बनने की सलाह दी है, तो दूसरी तरफ कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दीपके ने 48 घंटे के भीतर उनके इस्तीफे की मांग करते हुए देशव्यापी आंदोलन का अल्टीमेटम दिया है।

यहीं से बड़ा सवाल खड़ा होता है—क्या ज्ञानेश कुमार के खिलाफ उठे इन दो अलग-अलग स्वरों की दिशा आगे चलकर एक मंच पर मिल सकती है?

फिलहाल ऐसा कोई औपचारिक संयुक्त आंदोलन घोषित नहीं हुआ है। लेकिन मुद्दे की समानता ने राजनीतिक गलियारों में इस संभावना को जरूर चर्चा में ला दिया है।

एक मुद्दा, दो रास्ते

CJP ने 24 सितंबर को दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर ‘इलेक्शन कमीशन ठीक करो’ अभियान शुरू करने की घोषणा की। दीपके ने ज्ञानेश कुमार को 48 घंटे का समय देते हुए कहा कि इस्तीफा नहीं हुआ तो देशभर में विरोध प्रदर्शन शुरू किया जाएगा और दिल्ली में ‘जंतर-मंतर 2.0’ जैसा आंदोलन खड़ा किया जा सकता है। CJP ने SIR पर रोक, आगामी चुनावों को फिलहाल रोकने और चुनावी प्रक्रिया से जुड़े रिकॉर्ड की जांच जैसी मांगें भी रखी हैं।

दूसरी ओर राहुल गांधी ने 24 सितंबर को कांग्रेस मुख्यालय में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर सीधे CEC के इस्तीफे की मांग की। उन्होंने चुनावी प्रक्रिया में कथित गड़बड़ियों को ‘वोट चोरी’ से जोड़ते हुए कहा कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की रक्षा के लिए जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय होनी चाहिए।

राहुल ने ज्ञानेश कुमार से इस्तीफा देने और कथित मामलों की जानकारी सामने लाने की अपील भी की।

असली पेंच SIR और चुनाव आयोग की अंदरूनी बहस

मामला केवल राजनीतिक आरोपों तक सीमित नहीं है। इस पूरे विवाद को हवा तब मिली जब द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में निर्वाचन आयोग के भीतर SIR से जुड़े मुद्दों पर निर्वाचन आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की ओर से कई मौकों पर आपत्तियां दर्ज किए जाने की बात सामने आई। रिपोर्ट के अनुसार, दोनों आयुक्तों ने करीब 10 महीने की अवधि में कम से कम 14 बार विभिन्न फैसलों और प्रक्रियाओं पर सवाल उठाए थे।हालांकि, इन रिपोर्टेड मतभेदों की व्याख्या को लेकर भी तस्वीर एकतरफा नहीं है।

चुनाव आयोग की ओर से यह कहा गया है कि आयोग के फैसले अंततः सर्वसम्मति से लिए गए। इसलिए रिपोर्ट में सामने आई आपत्तियों को सीधे तौर पर किसी निर्णय के अवैध या गलत होने का प्रमाण मानना अलग दावा होगा।

जुलाई में अलग-अलग रास्ते, अब मुद्दा एक

दिलचस्प बात यह है कि जुलाई में CJP ने जंतर-मंतर पर NEET से जुड़े कथित अनियमितताओं और शिक्षा व्यवस्था के मुद्दे पर बड़ा आंदोलन किया था। उस समय अभिजीत दीपके के नेतृत्व में प्रदर्शन हुआ और धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग प्रमुख मुद्दा बनी रही। 20 जुलाई को CJP ने ‘चलो संसद’ मार्च का भी आह्वान किया था।उस आंदोलन के दौरान कांग्रेस भी NEET और पेपर लीक के मुद्दे पर अलग राजनीतिक कार्यक्रम कर रही थी। दोनों पक्षों के मुद्दे में समानता थी, लेकिन आंदोलन का मंच अलग रहा।यही पुराना अंतर अब नए सवाल को जन्म दे रहा है—क्या ज्ञानेश कुमार के मुद्दे पर कांग्रेस और CJP अलग-अलग लड़ेंगे या कभी एक ही विरोध-रेखा पर दिखाई देंगे?

फिलहाल उपलब्ध सार्वजनिक बयानों से किसी औपचारिक संयुक्त मंच की पुष्टि नहीं होती।

दीपके के निशाने पर चुनाव आयोग

अभिजीत दीपके ने ज्ञानेश कुमार पर बेहद गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने दावा किया कि SIR के जरिए बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाए जा रहे हैं और चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर सवाल उठाया। CJP की मांगों में SIR से जुड़े फैसलों की जांच और मतदाता सूची से संबंधित रिकॉर्ड की स्वतंत्र जांच भी शामिल है। ये दीपके और CJP के आरोप एवं मांगें हैं; इन्हें स्थापित तथ्य के रूप में नहीं देखा जा सकता।CJP ने अपने अभियान को अब सिर्फ एक व्यक्ति के इस्तीफे तक सीमित नहीं रखा है। उसके निशाने पर चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया में सुधार भी है।

राहुल गांधी ने खोला राजनीतिक मोर्चा

राहुल गांधी का हमला भी केवल ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने चुनाव, मतदाता सूची, कानून और लोकतांत्रिक संस्थाओं के बीच संबंध को लेकर गंभीर सवाल उठाए। कांग्रेस नेता ने आरोप लगाया कि यदि चुनावी प्रक्रिया ही प्रभावित होती है तो उसके आधार पर बनने वाली राजनीतिक सत्ता और संस्थागत फैसलों पर भी सवाल उठते हैं।राहुल ने निर्वाचन आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की उन रिपोर्टेड आपत्तियों का भी उल्लेख किया, जिन्हें लेकर हाल में चुनाव आयोग के भीतर मतभेद की चर्चा सामने आई है।

क्या जंतर-मंतर पर फिर मिलेंगे दोनों?

यही इस पूरी कहानी का सबसे दिलचस्प राजनीतिक प्रश्न है।जुलाई में CJP का आंदोलन अपने स्वतंत्र मंच पर था। कांग्रेस भी उसी समय अपने राजनीतिक अभियान में सक्रिय थी। दोनों के मुद्दे एक-दूसरे से जुड़े हुए थे, लेकिन रणनीति अलग थी। अब ज्ञानेश कुमार और SIR के मुद्दे पर दोनों की मांगों में स्पष्ट समानता दिखाई दे रही है—CEC पर सवाल, SIR को लेकर आपत्ति और चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता की मांग।

लेकिन समान मुद्दा अपने आप संयुक्त आंदोलन में नहीं बदलता।यदि CJP अपने 48 घंटे के अल्टीमेटम के बाद देशव्यापी आंदोलन शुरू करता है और कांग्रेस भी इसी मुद्दे पर अपना आंदोलन तेज करती है, तो दिल्ली का जंतर-मंतर एक बार फिर राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र बन सकता है।

अभी सवाल यह नहीं कि दोनों नेताओं के आरोप समान हैं या नहीं; सवाल यह है कि क्या आंदोलन की जमीन भी साझा होगी?

फिलहाल जवाब खुला है।इतना जरूर है कि ज्ञानेश कुमार पर दबाव का दायरा अब केवल किसी एक राजनीतिक दल या संगठन तक सीमित नहीं दिख रहा। एक ओर देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस इस मुद्दे को संसद और राजनीतिक मंच पर उठा रही है,

दूसरी ओर CJP सड़क के आंदोलन की तैयारी कर रही है।

आने वाले दिनों में इन दोनों धाराओं की दिशा ही तय करेगी कि यह विवाद अलग-अलग आवाजों का सिलसिला रहता है या दिल्ली की सड़कों पर एक बड़ा साझा राजनीतिक दृश्य बनता है।

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