“संसद अब आवारा हो गई है… CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कार्रवाई की तैयारी के बीच कांग्रेस नेता” उदित राज के बयान से गरमाई सियासत, जनता से सड़क पर उतरने की अपील पर उठे बड़े सवाल

बी के झा

NSK news Ind

नई दिल्ली, 26‌ सितंबर

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर चल रहे राजनीतिक और संवैधानिक विवाद ने अब संसद से लेकर सड़क तक की राजनीति को तेज कर दिया है।

कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता और पूर्व सांसद उदित राज ने संसद की कार्यप्रणाली पर बेहद तीखी टिप्पणी करते हुए कहा है कि “संसद अब आवारा हो गई है, नियंत्रण में नहीं है।” उन्होंने कहा कि संसद में कुछ भी करने का असर नहीं हो रहा और अब जनता को सड़क पर उतरना पड़ेगा।

उदित राज की यह टिप्पणी उस समय सामने आई है जब विपक्षी दल मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ एक बार फिर हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया शुरू करने की तैयारी कर रहे हैं।

विपक्ष का आरोप है कि चुनाव आयोग के कामकाज और विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर गंभीर सवाल उठे हैं।

दूसरी ओर भाजपा और निर्वाचन आयोग इन आरोपों को खारिज करते रहे हैं।

उदित राज बोले—संसद से आगे निकल गया मामला

एक समाचार एजेंसी से बातचीत में उदित राज ने कहा कि संसद अब नियंत्रण में नहीं है और संसद के भीतर कोई भी कदम उठाने का प्रभाव दिखाई नहीं दे रहा है। उन्होंने कहा कि संवैधानिक संस्थाओं की रक्षा के लिए संसद को अपने अधिकारों का इस्तेमाल करना चाहिए, लेकिन उनके मुताबिक मामला अब किसी एक पार्टी तक सीमित नहीं रह गया है।उन्होंने जनता से सड़क पर उतरने की अपील करते हुए मध्यावधि चुनाव की मांग भी रखी।उदित राज ने यह भी कहा कि वोट जनता का अधिकार है और उसकी रक्षा के लिए संघर्ष जारी रहेगा। 25 सितंबर को कांग्रेस ने देश के कई हिस्सों में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ प्रदर्शन भी किया।

RSS पर भी उदित राज का हमला

उदित राज ने इसी क्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर भी तीखी टिप्पणी की। उन्होंने RSS को लेकर गंभीर आरोप लगाए और कहा कि संगठन दूसरों से हिसाब मांगता है लेकिन अपना हिसाब नहीं देता। यह टिप्पणी भी उनके राजनीतिक हमले का हिस्सा रही।हालांकि, ऐसे राजनीतिक आरोपों को तथ्य के रूप में स्थापित करने के बजाय उनके बयान के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

SIR विवाद ने बढ़ाई चुनाव आयोग पर बहस

CEC ज्ञानेश कुमार को लेकर मौजूदा विवाद की पृष्ठभूमि में एक मीडिया रिपोर्ट है, जिसमें दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले करीब 10 महीनों में कम से कम 14 बार कुछ फैसलों और प्रक्रियाओं पर आपत्ति दर्ज की। रिपोर्ट में इन आपत्तियों को मतदाता पंजीकरण, नाम जोड़ने-हटाने, Form-6, SIR और चुनावी डेटा से जुड़े मामलों से जोड़ा गया है। विपक्ष ने इस रिपोर्ट को आधार बनाकर चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं।

समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने भी कहा है कि ऐसी स्थिति में ज्ञानेश कुमार की निगरानी में चुनाव कराने को लेकर सवाल खड़े होते हैं।

दूसरी तरफ भाजपा का कहना है कि चुनाव आयोग के फैसले सर्वसम्मति से लिए गए और आयोग के भीतर मतभेद होने के विपक्ष के दावे के पर्याप्त प्रमाण नहीं हैं। भाजपा सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने विपक्ष के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि SIR का अधिकार निर्वाचन आयोग के पास है।

यानी विवाद का मूल प्रश्न यही है—क्या चुनाव आयोग के भीतर सामने आई असहमतियां सामान्य संस्थागत विमर्श हैं या वे आयोग की निर्णय प्रक्रिया को लेकर गंभीर संवैधानिक चिंता पैदा करती हैं?

इसका अंतिम उत्तर राजनीतिक बयानबाजी से नहीं बल्कि दस्तावेजों, कानूनी प्रक्रिया और सक्षम संस्थाओं की जांच से निकलना होगा।

महाभियोग की चर्चा, लेकिन प्रक्रिया आसान नहीं

CEC को हटाने की मांग को राजनीतिक मंचों पर अक्सर “महाभियोग” कहा जा रहा है, लेकिन इसके पीछे एक निर्धारित संवैधानिक प्रक्रिया है।अनुच्छेद 324(5) के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त को उसी तरह और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जिस तरह सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को हटाया जाता है। संबंधित प्रक्रिया में सिद्ध कदाचार या अक्षमता जैसे आधार महत्वपूर्ण हैं।

प्रस्ताव को आगे बढ़ाने के लिए दोनों सदनों में निर्धारित विशेष बहुमत की आवश्यकता होती है। यही वजह है कि केवल राजनीतिक आरोप लग जाना किसी CEC को पद से हटाने के लिए पर्याप्त नहीं है।

आरोपों की संवैधानिक और कानूनी कसौटी पर जांच आवश्यक है।

मार्च 2026 में भी ज्ञानेश कुमार को हटाने का प्रस्ताव लाया गया था, लेकिन लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा सभापति ने उसे स्वीकार नहीं किया था। अब सितंबर में विपक्ष नए सिरे से नोटिस तैयार करने की तैयारी में है।

वरिष्ठ सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारी ने उठाया बड़ा सवाल

इस पूरे घटनाक्रम पर पहचान सार्वजनिक न करने की शर्त पर एक वरिष्ठ सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारी ने कहा कि राजनीतिक असहमति लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा है, लेकिन संवैधानिक संस्थाओं के प्रति भाषा और विरोध का तरीका लोकतांत्रिक मर्यादा के भीतर रहना चाहिए।उन्होंने आरोप लगाया कि राहुल गांधी और विपक्ष के कुछ नेता सरकार तथा संवैधानिक संस्थाओं पर लगातार हमले कर रहे हैं और इससे राजनीतिक टकराव बढ़ रहा है।

उनका कहना था कि यदि किसी संस्था, अधिकारी या चुनाव प्रक्रिया को लेकर गंभीर आरोप हैं तो उनके समाधान के लिए संसद,

न्यायपालिका,

जांच एजेंसियों

और संवैधानिक प्रक्रियाओं का इस्तेमाल होना चाहिए, न कि ऐसी भाषा अपनाई जाए जिससे सामाजिक तनाव बढ़े।

अधिकारी ने हाल के कुछ बयानों का उल्लेख करते हुए कहा कि चुनाव आयोग और उसके अधिकारियों के खिलाफ धमकी या हिंसात्मक भाषा लोकतांत्रिक असहमति की सीमा से बाहर जाती है।

यह संदर्भ इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि VIP प्रमुख मुकेश सहनी ने 24 सितंबर को CEC ज्ञानेश कुमार को लेकर गोली मारने संबंधी बेहद विवादित टिप्पणी की थी, जिसकी व्यापक रिपोर्टिंग हुई।

शिक्षाविद ने कहा—सड़क लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन अराजकता का विकल्प नहीं

एक वरिष्ठ शिक्षाविद ने भी पहचान गोपनीय रखने की शर्त पर कहा कि लोकतंत्र में सड़क पर शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन नागरिक अधिकार है, लेकिन किसी संवैधानिक संस्था को चुनौती देने के नाम पर कानून-व्यवस्था को कमजोर करना लोकतांत्रिक समाधान नहीं हो सकता।उन्होंने कहा कि संसद को “आवारा” कहने वाला बयान अपने आप में संसद की गरिमा पर बहस खड़ी करता है।

उनका सवाल था—यदि संसद लोकतंत्र की सर्वोच्च प्रतिनिधि संस्थाओं में से एक है तो उसकी कमियों का समाधान भी लोकतांत्रिक और संवैधानिक तरीके से ही होना चाहिए।

उन्होंने कहा कि यदि विपक्ष को लगता है कि चुनाव आयोग ने गलत निर्णय लिए हैं तो वह दस्तावेज सामने रखे, न्यायालय जाए, संसदीय प्रक्रिया अपनाए और जनता के सामने तथ्य रखे।

उन्होंने श्रीलंका और बांग्लादेश जैसे देशों का संदर्भ देते हुए राजनीतिक टकराव के अत्यधिक बढ़ने के खतरे की ओर इशारा किया, हालांकि भारत की परिस्थितियों को उन देशों से सीधे समान बताना उचित नहीं होगा।

एक तरफ सड़क, दूसरी तरफ संविधान—सवाल यहीं सबसे बड़ा है

उदित राज के बयान ने एक बुनियादी सवाल खड़ा कर दिया है।क्या संवैधानिक संस्थाओं से असहमति का अंतिम रास्ता सड़क है या संविधान?

राजनीतिक आंदोलन भारतीय लोकतंत्र का पुराना हिस्सा रहे हैं। संसद के बाहर प्रदर्शन, सत्याग्रह और जनआंदोलन लोकतांत्रिक राजनीति में अपनी जगह रखते हैं। लेकिन किसी संवैधानिक संस्था के खिलाफ आरोपों का अंतिम निपटारा सड़क पर नहीं, बल्कि कानून और संस्थागत जांच के जरिए होना चाहिए।

यही वह बिंदु है जहां वर्तमान विवाद केवल कांग्रेस बनाम भाजपा नहीं रह जाता।यह सवाल चुनाव आयोग की विश्वसनीयता,

विपक्ष के संवैधानिक अधिकार,

संसद की भूमिका,

न्यायपालिका की निगरानी और मतदाता के भरोसे से जुड़ जाता है।

विपक्ष का आरोप बनाम भाजपा का जवाब

विपक्ष का कहना है कि SIR और चुनाव आयोग की प्रक्रियाओं को लेकर सामने आई आपत्तियों की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए।

कांग्रेस और उसके सहयोगी दल CEC की जवाबदेही और कार्रवाई की मांग कर रहे हैं।

विपक्षी दलों की ओर से महाभियोग प्रस्ताव की तैयारी इसी राजनीतिक दबाव का हिस्सा है।

दूसरी ओर भाजपा का कहना है कि विपक्ष चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाकर राजनीतिक जमीन तैयार करने की कोशिश कर रहा है।

भाजपा ने चुनाव आयोग के भीतर किसी ऐसे निर्णायक मतभेद के दावे को खारिज किया है जो आयोग की वैधानिक कार्यप्रणाली को अवैध साबित करता हो।

यानी फिलहाल दोनों पक्षों के बीच मूल विवाद आरोप बनाम संस्थागत जवाब का है।

कानूनविदों के लिए भी बड़ा सवाल—क्या हर राजनीतिक आरोप संवैधानिक कदाचार है?

कानूनी दृष्टि से किसी संवैधानिक पदाधिकारी को हटाने की मांग और राजनीतिक आलोचना दो अलग चीजें हैं।यदि किसी अधिकारी के खिलाफ गंभीर आरोप लगाए जाते हैं तो उन आरोपों के समर्थन में दस्तावेज, साक्ष्य और निर्धारित कानूनी प्रक्रिया आवश्यक होगी। केवल यह कहना कि किसी संस्था ने “गलत काम” किया, अपने आप में संवैधानिक पद से हटाने का आधार नहीं बन जाता।

सुप्रीम कोर्ट ने भी चुनाव आयोग की स्वतंत्रता को स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव के लिए महत्वपूर्ण माना है। इसलिए वर्तमान विवाद का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं है कि कौन किसे सड़क पर बुला रहा है, बल्कि यह है कि आरोपों की संवैधानिक जांच किस तरह और किस मंच पर होगी।

सबसे बड़ा दांव जनता के वोट पर

इस पूरे विवाद का केंद्र अंततः न उदित राज हैं, न राहुल गांधी, न भाजपा और न ही कोई एक चुनाव आयुक्त।केंद्र में है—मतदाता।

मतदाता को यह भरोसा होना चाहिए कि उसका नाम मतदाता सूची में सही तरीके से दर्ज है, उसका वोट सुरक्षित है और चुनाव प्रक्रिया राजनीतिक सत्ता से स्वतंत्र होकर संचालित हो रही है।

अगर विपक्ष के आरोप गलत हैं तो दस्तावेजों और पारदर्शी प्रक्रिया से उनका जवाब दिया जाना चाहिए।अगर आरोपों में तथ्य हैं तो उनकी स्वतंत्र जांच होनी चाहिए।

और यदि किसी संवैधानिक पदाधिकारी के खिलाफ वास्तव में “सिद्ध कदाचार” का मामला बनता है, तो संविधान में उसके लिए निर्धारित प्रक्रिया पहले से मौजूद है।

यही लोकतंत्र की असली परीक्षा है—सड़क की ताकत से नहीं, संविधान की ताकत से फैसला हो।

एनएसके विश्लेषण

असली लड़ाई भाषा की नहीं, संस्थाओं पर भरोसे की है

उदित राज का “संसद अब आवारा हो गई है” वाला बयान राजनीतिक रूप से तीखा जरूर है, लेकिन इसके भीतर एक गंभीर प्रश्न छिपा है—क्या संसद संवैधानिक संस्थाओं की जवाबदेही तय करने में सक्षम है?

इस प्रश्न का उत्तर संसद को ही देना होगा।

विपक्ष के पास आंदोलन का अधिकार है।

सरकार के पास अपना पक्ष रखने का अधिकार है।

चुनाव आयोग को अपनी प्रक्रिया स्पष्ट करने का अधिकार है।

न्यायपालिका के पास संवैधानिक समीक्षा का अधिकार है।

लेकिन अंतिम अधिकार जनता का है—वह अधिकार जो मतदान के दिन ईवीएम/मतपत्र के जरिए नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में विश्वास के जरिए व्यक्त होता है।

इसलिए आज जरूरत संसद को “आवारा” कहने या किसी संस्था को “सरकारी विभाग” घोषित करने से ज्यादा दस्तावेज सामने रखने, आरोपों की जांच कराने और संवैधानिक संस्थाओं को जवाबदेह तथा विश्वसनीय बनाए रखने की है।

क्योंकि लोकतंत्र में सत्ता बदल सकती है, सरकार बदल सकती है, चुनाव आयुक्त बदल सकते हैं—लेकिन संविधान की विश्वसनीयता कमजोर हुई तो उसकी कीमत किसी एक दल को नहीं, पूरे देश को चुकानी पड़ती है।

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