बी के झा
NSK news Ind

नई दिल्ली/पटना, 27 सितंबर
संसद में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के सांसदों को महत्वपूर्ण विधेयकों पर चर्चा के दौरान अधिक बोलने का अवसर देने की मांग ने राजनीतिक बहस को एक नए सवाल के सामने खड़ा कर दिया है।
केंद्रीय मंत्री और हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा के संस्थापक जीतन राम मांझी ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखकर इस मुद्दे पर आवश्यक कार्रवाई और संबंधित अधिकारियों को निर्देश देने का अनुरोध किया है।मांझी ने अपने पत्र में स्पष्ट किया है कि यह मुद्दा उन्होंने व्यक्तिगत रूप से नहीं उठाया था। उनके मुताबिक, मध्य प्रदेश के खरगोन से भाजपा सांसद गजेंद्र सिंह पटेल ने 5 अगस्त को उनके दिल्ली स्थित आवास पर हुई ‘NDA सांसद समूह संवाद बैठक’ में SC-ST सांसदों को सदन में अपने समुदायों से जुड़े विषय उठाने के लिए पर्याप्त समय देने की मांग की थी।
मांझी ने इसी अनुरोध को लोकसभा अध्यक्ष तक पहुंचाया।
‘यह मेरी निजी राय नहीं’—मांझी ने क्यों दी सफाई?
गया में पत्रकारों से बातचीत के दौरान जब मांझी से पूछा गया कि क्या वह स्वयं मानते हैं कि SC-ST सांसदों को संसद में पर्याप्त समय नहीं मिल रहा, तो उन्होंने नाराजगी जताते हुए कहा कि मीडिया को उनके मुंह में अपनी बात नहीं डालनी चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि उन्होंने अपनी निजी राय नहीं रखी है।मांझी ने यह भी कहा कि अब उन्हें लगता है कि इस प्रकार का पत्र लोकसभा अध्यक्ष को आदर्श रूप से संसदीय कार्य मंत्री के माध्यम से भेजा जाना चाहिए था।यानी मांझी की चिट्ठी का राजनीतिक अर्थ निकालने से पहले यह समझना जरूरी है कि पत्र में उन्होंने मूलतः गजेंद्र सिंह पटेल द्वारा उठाए गए मुद्दे पर कार्रवाई का अनुरोध किया है।
गजेंद्र पटेल की दलील—दल का समय सांसदों में बंट जाता है
खरगोन के भाजपा सांसद गजेंद्र सिंह पटेल ने भी इस मांग की पुष्टि की है। उनका तर्क है कि किसी राजनीतिक दल को चर्चा के लिए जो समय मिलता है, वह उसी दल के कई सांसदों के बीच विभाजित होता है। ऐसे में SC-ST समुदायों से जुड़े मुद्दों को उठाने वाले सांसदों को अतिरिक्त अवसर मिलना चाहिए।
पटेल ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसा नहीं है कि SC-ST सांसदों को बोलने का अवसर बिल्कुल नहीं मिलता, बल्कि उनका कहना है कि इस अवसर को और बढ़ाया जाना चाहिए, ताकि समुदाय से संबंधित विषय संसद में अधिक मजबूती से उठाए जा सकें।
संसद में बोलने का समय आखिर तय कैसे होता है?
यहां बहस का एक महत्वपूर्ण संवैधानिक और संसदीय पहलू सामने आता है। लोकसभा की आधिकारिक जानकारी के अनुसार सदन में सरकारी विधायी कार्य और अन्य विषयों पर चर्चा के लिए समय आवंटन सामान्यतः कार्य सलाहकार समिति के माध्यम से किया जाता है। विधेयकों और अन्य कार्यों में चर्चा का समय दलों/समूहों को उनकी संख्या के अनुपात में दिया जाता है और संबंधित दल अपने वक्ताओं के नाम भेजते हैं।
इस व्यवस्था में फिलहाल ऐसा कोई सामान्य नियम नहीं दिखता जिसके तहत केवल किसी सांसद की जातीय या जनजातीय पहचान के आधार पर उसे स्वतः अतिरिक्त बोलने का समय मिल जाए। इसलिए मांझी और पटेल की मांग मूलतः मौजूदा संसदीय समय-वितरण व्यवस्था में विशेष अवसर या अतिरिक्त प्रतिनिधित्व की जरूरत को लेकर नई बहस खड़ी करती है।
यहीं से सवाल और बड़ा हो जाता है—क्या संसद में प्रतिनिधित्व का अर्थ केवल सीटों की संख्या है या सदन में अपनी बात रखने के लिए उपलब्ध समय को भी प्रतिनिधित्व का हिस्सा माना जाना चाहिए?
दिल्ली विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त शिक्षाविद ने उठाए कई सवाल
इस पूरे घटनाक्रम पर दिल्ली विश्वविद्यालय के एक वरिष्ठ सेवानिवृत्त शिक्षाविद ने नाम प्रकाशित नहीं करने की शर्त पर एनएसके से बातचीत में राजनीतिक दलों की रणनीति पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि उनके आकलन में अलग-अलग राजनीतिक दल और नेता सामाजिक तथा संवैधानिक मुद्दों को अपने-अपने राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बना रहे हैं।
उन्होंने कहा कि एक तरफ कांग्रेस नेता उदित राज की संसद को लेकर की गई कथित टिप्पणी और उनके आंदोलन संबंधी आह्वान को लेकर विवाद खड़ा हुआ, तो दूसरी तरफ जीतन राम मांझी ने SC-ST सांसदों के लिए संसद में अधिक समय की मांग को लोकसभा अध्यक्ष तक पहुंचाया है।
शिक्षाविद ने कहा कि इसी क्रम में LJP (रामविलास) प्रमुख और केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने भी निर्वाचन आयोग से जुड़े मौजूदा विवाद में आयोग से सार्वजनिक रूप से अपना पक्ष स्पष्ट करने की मांग की है।हालांकि, चिराग पासवान का उपलब्ध हालिया बयान यह है कि निर्वाचन आयोग एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है और यदि चुनावी प्रक्रिया को लेकर लोगों के मन में सवाल उठ रहे हैं तो मुख्य निर्वाचन आयुक्त को आयोग का पक्ष स्पष्ट करना चाहिए।
यह बयान विशेष रूप से SIR और निर्वाचन आयोग के भीतर कथित मतभेदों से जुड़ी हालिया रिपोर्टों के संदर्भ में आया है।
‘फिर बाकी वर्ग कहां जाएं?’—शिक्षाविद का सवाल
सेवानिवृत्त शिक्षाविद ने आगे कहा कि लोकतंत्र में प्रत्येक सामाजिक वर्ग को यह भरोसा होना चाहिए कि संसद उसकी आवाज सुनने का समान अवसर देती है। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि सामाजिक पहचान के आधार पर संसद में बोलने के समय की अलग व्यवस्था की मांग स्वीकार की जाती है, तो भविष्य में दूसरे सामाजिक समूह भी ऐसी ही मांग कर सकते हैं।
उनके शब्दों में, “एक तरफ नौकरी में, पदोन्नति में और शिक्षा में प्रतिनिधित्व तथा आरक्षण को लेकर लगातार बहस चलती रही है और अब संसद में बोलने के लिए भी अलग से समय की मांग सामने आ रही है। ऐसे में सवाल उठता है कि बाकी सामाजिक वर्गों का प्रतिनिधित्व किस तरह सुनिश्चित होगा?
”शिक्षाविद ने इसे व्यापक सामाजिक प्रतिनिधित्व की बहस से जोड़ते हुए कहा कि राजनीतिक दलों को यह भी बताना होगा कि वे सामाजिक न्याय की अवधारणा को किस सीमा तक और किन संस्थागत व्यवस्थाओं के माध्यम से लागू करना चाहते हैं।
लेकिन सवाल का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण
इस बहस का दूसरा पक्ष यह है कि SC-ST समुदायों के सांसद अक्सर अपने समुदायों से जुड़े विशिष्ट सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक और प्रशासनिक मुद्दे सदन में उठाते हैं। यदि दल के भीतर सांसदों की संख्या अधिक हो और चर्चा का समय सीमित हो, तो प्रत्येक सांसद को पर्याप्त अवसर मिलना व्यावहारिक चुनौती हो सकती है।
गजेंद्र सिंह पटेल का तर्क भी इसी समस्या पर केंद्रित है—दल को मिला समय कई सांसदों में बंटता है। इसलिए उनका आग्रह है कि SC-ST सांसदों को अपने समुदायों के मुद्दे उठाने के लिए अतिरिक्त अवसर मिले।
यानी बहस को केवल “आरक्षण बनाम समानता” के पुराने खांचे में देखना पर्याप्त नहीं होगा।
असली सवाल यह है कि संसद में प्रत्येक निर्वाचित सांसद को प्रभावी ढंग से बोलने का अवसर कैसे मिले और साथ ही सदन की कार्यवाही के लिए निर्धारित समय तथा मौजूदा नियमों का संतुलन कैसे बना रहे।
सरकार की ओर से अभी क्या स्पष्ट है?
मांझी की चिट्ठी पर केंद्र सरकार या लोकसभा अध्यक्ष की ओर से सार्वजनिक रूप से कोई ऐसा निर्णय सामने नहीं आया है जिसमें SC-ST सांसदों के लिए अलग या अतिरिक्त बोलने का समय निर्धारित करने की घोषणा की गई हो।इसलिए फिलहाल इसे एक मांग और संसदीय बहस की शुरुआत के रूप में देखना अधिक तथ्यपरक होगा, न कि किसी नई व्यवस्था के लागू होने के रूप में।
विपक्ष का सवाल—क्या सामाजिक प्रतिनिधित्व का मुद्दा संसद के भीतर और व्यापक होगा?
विपक्षी दल लंबे समय से सामाजिक न्याय, जातीय प्रतिनिधित्व और वंचित समुदायों की राजनीतिक भागीदारी जैसे मुद्दों को उठाते रहे हैं। दूसरी ओर सत्ता पक्ष और उसके सहयोगी भी इन विषयों को अलग-अलग संदर्भों में उठा रहे हैं।
मांझी की चिट्ठी ने इस बहस को संसद के भीतर बोलने के अवसर तक पहुंचा दिया है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या अन्य SC-ST सांसद भी इस मांग के समर्थन में सामने आते हैं और क्या विपक्षी दल इसे व्यापक संसदीय सुधार के प्रश्न के रूप में उठाते हैं।
चिराग पासवान का मामला अलग, लेकिन राजनीतिक संदर्भ महत्वपूर्ण
इसी बीच निर्वाचन आयोग को लेकर NDA के भीतर से भी अलग-अलग स्वर सामने आए हैं। 25 सितंबर को चिराग पासवान ने कहा कि यदि चुनावी प्रक्रिया को लेकर जनता के मन में सवाल उठ रहे हैं तो निर्वाचन आयोग, विशेष रूप से CEC, को अपना पक्ष स्पष्ट करना चाहिए।
यह बयान ऐसे समय आया जब एक रिपोर्ट में निर्वाचन आयोग के तीनों सदस्यों के बीच SIR से जुड़े फैसलों को लेकर कथित मतभेदों का उल्लेख किया गया। रिपोर्ट के अनुसार दो निर्वाचन आयुक्तों ने कई मौकों पर आपत्तियां दर्ज की थीं। हालांकि इन रिपोर्टों की व्याख्या को लेकर राजनीतिक दलों के बीच मतभेद हैं और आयोग का आधिकारिक पक्ष भी इस पूरे विवाद में महत्वपूर्ण है।
हाजीपुर EVM विवाद को लेकर तथ्य क्या कहते हैं?
शिक्षाविद की टिप्पणी में 2024 के हाजीपुर लोकसभा चुनाव के दौरान EVM से छेड़छाड़ के आरोपों का भी उल्लेख किया गया है। इस हिस्से में विशेष सावधानी जरूरी है। उपलब्ध आधिकारिक निर्वाचन आयोग की जानकारी के अनुसार मतदान के बाद EVM/VVPAT को स्ट्रांग रूम में दोहरी सुरक्षा, CCTV और उम्मीदवारों/उनके प्रतिनिधियों की मौजूदगी जैसी व्यवस्थाओं के तहत रखा जाता है। आयोग यह भी कहता है कि स्ट्रांग रूम खोलने-बंद करने की प्रक्रिया उम्मीदवारों/प्रतिनिधियों की मौजूदगी और वीडियोग्राफी के साथ होती है।
इसलिए किसी विशिष्ट चुनाव में EVM से छेड़छाड़ का आरोप हो तो उसे आरोप के रूप में ही रिपोर्ट किया जाना चाहिए, जब तक उसके समर्थन में आधिकारिक जांच, न्यायिक निष्कर्ष या अन्य सत्यापित प्रमाण उपलब्ध न हों।
असली बहस अब यह—प्रतिनिधित्व केवल सीटों से या आवाज के समय से भी?
जीतन राम मांझी की चिट्ठी ने एक महत्वपूर्ण प्रश्न जरूर सामने ला दिया है।संसद में सामाजिक प्रतिनिधित्व का मतलब क्या केवल यह है कि SC-ST वर्गों के सांसद पर्याप्त संख्या में निर्वाचित होकर सदन में पहुंचें, या फिर यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि वे अपने समुदायों से जुड़े मुद्दों पर पर्याप्त समय तक बोल सकें?
मांझी और गजेंद्र पटेल का तर्क दूसरे पहलू की ओर इशारा करता है। दूसरी ओर, मौजूदा संसदीय व्यवस्था दलों और समूहों की संख्या के आधार पर चर्चा का समय निर्धारित करती है।
अब गेंद लोकसभा अध्यक्ष और संसदीय व्यवस्था के पाले में है। यदि इस मांग पर कोई संस्थागत पहल होती है तो उसके लिए यह स्पष्ट करना होगा कि अतिरिक्त समय किस आधार पर दिया जाएगा, उसका निर्धारण कौन करेगा और क्या ऐसी व्यवस्था अन्य सामाजिक समूहों पर भी लागू होगी।
एनएसके का सवाल
क्या सामाजिक न्याय का अगला चरण संसद में ‘प्रतिनिधित्व’ से आगे बढ़कर ‘बोलने के समान अवसर’ का होना चाहिए?
या फिर संसद की मौजूदा दल-आधारित समय-वितरण व्यवस्था ही सभी सांसदों के लिए समान अवसर सुनिश्चित करने का बेहतर आधार है?
जीतन राम मांझी की चिट्ठी ने इस सवाल को संसद के दरवाजे तक पहुंचा दिया है।
अब इसका जवाब केवल राजनीतिक बयानबाजी से नहीं, बल्कि संसद की नियमावली, कार्य सलाहकार समिति और लोकसभा अध्यक्ष के स्तर पर होने वाली संस्थागत कार्रवाई से सामने आएगा।
बी. के. झा
एनएसके
