यूपी में कांग्रेस ने 150 सीटों पर रखा ‘हाथ’, क्या ‘साइकिल’ से बनेगी बात? 2024 की लोकसभा वापसी से बढ़ा आत्मविश्वास, लेकिन विधानसभा का पुराना रिकॉर्ड सीट-बंटवारे की राह में सबसे बड़ी कसौटी

बी के झा

NSK news Ind

लखनऊ, 3 अक्टूबर

उत्तर प्रदेश की सियासत में 2027 का विधानसभा चुनाव अभी सामने नहीं आया है, लेकिन विपक्षी खेमे में सीटों का गणित जरूर गर्म हो गया है। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच गठबंधन की संभावनाओं के साथ अब सबसे बड़ा सवाल सीटों की संख्या को लेकर है। कांग्रेस ने 150 सीटों से कम पर चुनाव लड़ने की इच्छा नहीं जताई है। पार्टी के प्रदेश प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने कहा है कि सीट-बंटवारे को अक्टूबर में अंतिम रूप दिए जाने की संभावना है और कांग्रेस के पास सभी 403 विधानसभा सीटों पर उम्मीदवार तैयार हैं।

यानी कांग्रेस का संदेश साफ है—2027 में वह महज गठबंधन की सहयोगी नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश में अपनी राजनीतिक जमीन फिर से फैलाने की कोशिश में है।लेकिन सवाल यह है कि क्या 2024 की लोकसभा सफलता विधानसभा में 150 सीटों की दावेदारी का आधार बन सकती है?

2024 ने कांग्रेस को दी नई राजनीतिक सांस

2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश में INDIA गठबंधन के तहत चुनाव लड़ा था। कांग्रेस ने 17 सीटों पर चुनाव लड़कर छह सीटें जीतीं, जबकि समाजवादी पार्टी ने 37 सीटों पर जीत दर्ज की। कांग्रेस की अमेठी और रायबरेली में वापसी के अलावा सहारनपुर, बाराबंकी, सीतापुर और इलाहाबाद में जीत ने पार्टी संगठन को लंबे अंतराल के बाद बड़ा राजनीतिक उत्साह दिया।इसी प्रदर्शन को कांग्रेस 2027 के लिए अपनी बातचीत का आधार बना रही है।लेकिन लोकसभा और विधानसभा चुनाव का गणित एक जैसा नहीं होता।

लोकसभा में राष्ट्रीय मुद्दे, प्रधानमंत्री पद का प्रभाव, गठबंधन की व्यापक अपील और वोटों का ट्रांसफर महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

विधानसभा में हर सीट का स्थानीय संगठन, उम्मीदवार, जातीय समीकरण, बूथ स्तर की मशीनरी और क्षेत्रीय मुद्दे अलग तस्वीर बनाते हैं।यही अंतर कांग्रेस की 150 सीटों की दावेदारी को महज आंकड़े से आगे ले जाकर जमीनी संगठन की परीक्षा बना देता है।

कांग्रेस का पुराना विधानसभा रिकॉर्ड क्या कहता है?

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का विधानसभा प्रदर्शन पिछले डेढ़ दशक में लगातार चुनौतीपूर्ण रहा है।विधानसभा चुनावों में कांग्रेस का प्रदर्शन

वर्ष- ‌‌ जीती सीटें वोट शेयर

2007- 22- 8.6%

2012- 28|- ‌ 11.6%

2017|- 7- 6.2%

2022- 2- 2.3%

2022 में कांग्रेस महज दो विधानसभा सीटें जीत सकी थी। इसलिए 150 सीटों पर दावा केवल सीटों की संख्या का सवाल नहीं है, बल्कि यह भी सवाल है कि पार्टी ने इन वर्षों में कितनी विधानसभा सीटों पर अपना संगठन दोबारा खड़ा किया है।दूसरी तरफ 2024 के लोकसभा चुनाव ने यह जरूर दिखाया कि कांग्रेस कुछ क्षेत्रों में अपनी राजनीतिक उपस्थिति को फिर से मजबूत कर सकती है।

150 सीटें मांगना और 150 सीटों पर मजबूत होना—दो अलग बातें

यहीं से सपा-कांग्रेस बातचीत का असली पेच शुरू होता है।कांग्रेस का तर्क है कि 2024 में गठबंधन ने बेहतर प्रदर्शन किया और पार्टी को विधानसभा चुनाव में सम्मानजनक हिस्सेदारी मिलनी चाहिए। कांग्रेस ने पहले भी बराबरी और सम्मान के आधार पर सीट बंटवारे की बात कही है।वहीं दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी के लिए 403 सीटों का अपना राजनीतिक विस्तार महत्वपूर्ण है। हालिया रिपोर्टों के अनुसार अखिलेश यादव ने पार्टी को करीब 350 विधानसभा क्षेत्रों में तैयारी तेज करने के संकेत दिए हैं। यहीं पर 150 और 350 का आंकड़ा आमने-सामने खड़ा दिखाई देता है।

हालांकि, इन आंकड़ों को अंतिम सीट-बंटवारा मानना जल्दबाजी होगी। दोनों दलों की औपचारिक बातचीत और शीर्ष नेतृत्व की मंजूरी के बाद ही वास्तविक तस्वीर सामने आएगी।

फिर कांग्रेस किन इलाकों पर नजर रख सकती है?

कांग्रेस के लिए सीटों की संख्या से ज्यादा महत्वपूर्ण उन सीटों का चयन होगा, जहां उसका पुराना संगठन, सामाजिक आधार या हालिया चुनावी प्रदर्शन मौजूद है।

रायबरेली-अमेठी: कांग्रेस का सबसे चर्चित इलाका रायबरेली और अमेठी कांग्रेस की राजनीतिक पहचान से जुड़े क्षेत्र रहे हैं। संभावित दावेदारी में रायबरेली, हरचंदपुर, बछरावां, सरेनी, ऊंचाहार, तिलोई, सलोन, गौरीगंज, जगदीशपुर और अमेठी जैसी सीटों का नाम स्वाभाविक रूप से सामने आता है।

2027 में इन सीटों को लेकर गठबंधन की बातचीत इसलिए भी दिलचस्प होगी क्योंकि कांग्रेस इन्हें अपने पारंपरिक राजनीतिक प्रभाव वाले क्षेत्र के रूप में देख सकती है।प्रतापगढ़-सुलतानपुर बेल्टरामपुर खास, बाबागंज और इसौली जैसी सीटों पर भी कांग्रेस की दावेदारी की चर्चा हो सकती है। खासकर रामपुर खास कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण है, जहां पार्टी का विधानसभा स्तर पर पुराना राजनीतिक आधार रहा है।

पश्चिमी यूपी में सहारनपुर फैक्टर 2024 के लोकसभा चुनाव में सहारनपुर से कांग्रेस की जीत ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पार्टी की चर्चा फिर बढ़ाई। विधानसभा स्तर पर सहारनपुर नगर, सहारनपुर देहात, बेहट, देवबंद, गंगोह और शामली जैसे इलाकों को कांग्रेस की संभावित दावेदारी वाले क्षेत्रों में देखा जा सकता है।यहां कांग्रेस का संगठन, स्थानीय नेतृत्व और सामाजिक समीकरण—तीनों सीट-बंटवारे में भूमिका निभा सकते हैं।

पूर्वांचल में पुराने संपर्कों की तलाश

पूर्वांचल में फरेंदा, नौतनवा, पनियरा, पिंडरा, इलाहाबाद उत्तर, बारा और कोरांव जैसी सीटें कांग्रेस की संभावित रणनीति में जगह बना सकती हैं।हालांकि यहां केवल सीट का नाम पर्याप्त नहीं होगा। कांग्रेस को यह देखना होगा कि संबंधित विधानसभा क्षेत्र में उसका मौजूदा संगठन, संभावित उम्मीदवार और गठबंधन के दूसरे दल की ताकत किस स्थिति में है।

कानपुर में शहरी राजनीति की परीक्षा

कानपुर क्षेत्र में कानपुर कैंट, आर्यनगर, सीसामऊ, गोविंदनगर और किदवई नगर जैसी सीटों पर कांग्रेस की राजनीतिक मौजूदगी का इतिहास रहा है।शहरी सीटों पर कांग्रेस के लिए चुनौती यह होगी कि पुराने संगठन को नए मतदाता समूहों और स्थानीय मुद्दों से कैसे जोड़ा जाए।

बुंदेलखंड में सीमित लेकिन अहम दावेदारी

झांसी नगर, बबीना, महोबा, बांदा और चित्रकूट क्षेत्र की कुछ सीटें भी कांग्रेस की संभावित दावेदारी के दायरे में आ सकती हैं। यहां सीट चयन से ज्यादा महत्वपूर्ण स्थानीय उम्मीदवार और संगठन की वास्तविक ताकत होगी।

असली लड़ाई 150 बनाम 150 नहीं, ‘कौन-सी 150’ की हैसपा-कांग्रेस के बीच बातचीत का सबसे दिलचस्प पहलू शायद सीटों की कुल संख्या नहीं, बल्कि सीटों की गुणवत्ता और भौगोलिक वितरण होगा।

कांग्रेस 150 सीटों का दावा करती है तो उसे उन सीटों की सूची और जमीनी रिपोर्ट के साथ बातचीत की मेज पर जाना होगा। दूसरी तरफ सपा के लिए भी यह तय करना चुनौतीपूर्ण होगा कि वह किन क्षेत्रों में कांग्रेस को जगह दे और किन सीटों पर अपना संगठन व उम्मीदवार मैदान में उतारे।कांग्रेस और सपा दोनों ही 403 सीटों पर अलग-अलग स्तर पर तैयारी कर रहे हैं। ऐसे में गठबंधन की राजनीति में असली परीक्षा यह होगी कि दोनों दल अपने-अपने संगठनात्मक हितों और 2024 के गठबंधन अनुभव के बीच किस तरह संतुलन बनाते हैं।

2024 की सफलता से 2027 का रास्ता कितना लंबा?

यही सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल है।2024 ने कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में एक नई राजनीतिक ऊर्जा जरूर दी। लेकिन 2027 का विधानसभा चुनाव उस ऊर्जा को वोट में, वोट को सीट में और सीट को संगठन की स्थायी ताकत में बदलने की परीक्षा होगा।

कांग्रेस के लिए 150 सीटों की मांग राजनीतिक बातचीत का शुरुआती आंकड़ा है।

सपा के लिए चुनौती गठबंधन को बनाए रखते हुए अपनी चुनावी तैयारी को आगे बढ़ाने की है।अब निगाह अक्टूबर की बातचीत पर है।

क्योंकि उत्तर प्रदेश की 403 सीटों में से कौन-सी सीट किसके खाते में जाएगी, इसका फैसला सिर्फ सीटों का बंटवारा नहीं होगा—यह 2027 के विपक्षी गठबंधन की पूरी चुनावी संरचना का खाका भी तय कर सकता है।

बी. के. झा, एन एस के

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