CJP कार्यकर्ताओं को पुलिस के नोटिस पर दीपके का हमला: ‘आंदोलन में न जाने का दबाव’, 10 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर आर-पार की तैयारी

बी के झा

नई दिल्ली, 6 अक्टूबर

देश में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर जारी राजनीतिक टकराव अब सड़कों से लेकर पुलिस-प्रशासन की भूमिका तक पहुंचता दिखाई दे रहा है। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दीपके ने आरोप लगाया है कि पार्टी के कार्यकर्ताओं को पुलिस की ओर से नोटिस दिए जा रहे हैं और उन्हें प्रस्तावित आंदोलन में शामिल नहीं होने के लिए दबाव का सामना करना पड़ रहा है। दीपके ने यह दावा 10 अक्टूबर को दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रस्तावित प्रदर्शन से पहले किया है।

हालांकि, इन आरोपों पर संबंधित पुलिस अधिकारियों का पक्ष सामने आना भी जरूरी है, ताकि पूरे मामले की तस्वीर स्पष्ट हो सके।दीपके ने पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए पूछा कि जब प्रदर्शन अभी हुआ ही नहीं है, तब उसके हिंसक होने की आशंका पहले से कैसे तय की जा सकती है?

उन्होंने सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर कथित निर्देशों पर भी आपत्ति जताई और कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में असहमति जताने वालों को अपनी बात रखने का अवसर मिलना चाहिए।

CJP का प्रस्तावित प्रदर्शन अब केवल एक राजनीतिक कार्यक्रम नहीं रह गया है। इसके केंद्र में तीन बड़े सवाल खड़े हो रहे हैं—क्या शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार की पर्याप्त सुरक्षा हो रही है, क्या पुलिस की एहतियाती कार्रवाई का आधार स्पष्ट है और क्या मतदाता सूची के पुनरीक्षण से जुड़े आरोपों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए?‘

वन नेशन, वन इलेक्शन’ पर सवाल, दीपके ने उठाया ‘वन नेशन, वन पार्टी’ का मुद्दा

अभिजीत दीपके ने केंद्र सरकार की राजनीतिक दिशा पर निशाना साधते हुए ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ की अवधारणा पर सवाल उठाया। उन्होंने आरोप लगाया कि इसके पीछे की वास्तविक मंशा ‘वन नेशन, वन पार्टी’ की दिशा में बढ़ने की है।यह दीपके का राजनीतिक आरोप है, कोई स्थापित तथ्य नहीं। हालांकि, उनका बयान उस व्यापक बहस को सामने लाता है जिसमें विपक्षी दल और राजनीतिक संगठन चुनावी व्यवस्था, संस्थाओं की स्वतंत्रता तथा लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा को लेकर अपनी-अपनी चिंताएं जाहिर करते रहे हैं।इस विवाद का मूल प्रश्न यही है कि चुनाव सुधारों के नाम पर प्रस्तावित व्यवस्थाओं का मूल्यांकन उनके संवैधानिक आधार, व्यावहारिक प्रभाव और लोकतांत्रिक जवाबदेही के आधार पर होना चाहिए। किसी भी राजनीतिक व्यवस्था में सत्ता पक्ष के तर्कों के साथ विपक्ष की आशंकाओं को भी तथ्यों और संवैधानिक सिद्धांतों की कसौटी पर परखना जरूरी है।

महाराष्ट्र पुलिस की तारीफ, चंद्रपुर की कार्रवाई पर सवाल

दीपके ने कहा कि वह कई बार महाराष्ट्र पुलिस को देश की बेहतरीन पुलिस में शामिल बताते रहे हैं और उनका मानना है कि दिल्ली पुलिस को उससे सीखना चाहिए। लेकिन चंद्रपुर पुलिस की कथित कार्रवाई ने उन्हें सवाल उठाने के लिए मजबूर किया है।उनका कहना है कि यदि कार्यकर्ताओं को पहले ही नोटिस देकर प्रदर्शन में शामिल नहीं होने के लिए कहा जा रहा है, तो पुलिस को इसका स्पष्ट आधार बताना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि सोशल मीडिया पर किस प्रकार की सामग्री को संभावित रूप से हिंसा भड़काने वाला माना जा रहा है और इसके निर्धारण के लिए क्या मानदंड अपनाए जा रहे हैं।

कानूनी दृष्टि से यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना आवश्यक है। पुलिस को कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए परिस्थितियों के अनुसार एहतियाती कदम उठाने का अधिकार है, लेकिन ऐसे कदमों का आधार, उद्देश्य और अनुपात भी महत्वपूर्ण हैं। केवल किसी प्रदर्शन के प्रस्तावित होने से उसके हिंसक होने का निष्कर्ष अपने आप नहीं निकाला जा सकता।

दूसरी ओर, यदि हिंसा भड़काने या सार्वजनिक शांति भंग करने के विश्वसनीय संकेत हों, तो प्रशासन उन्हें नजरअंदाज भी नहीं कर सकता।इसलिए पूरे मामले में निर्णायक सवाल यह होगा कि नोटिस में क्या कारण दर्ज हैं, किन परिस्थितियों में वे जारी किए गए और क्या संबंधित कार्यकर्ताओं को अपनी बात रखने का उचित अवसर मिला।

गांधी और आंबेडकर के नाम पर दीपके का सवाल: असहमति को किस नजर से देखेगा लोकतंत्र?

अभिजीत दीपके ने अपने आंदोलन के संदर्भ में महात्मा गांधी और डॉ. भीमराव आंबेडकर के विचारों का उल्लेख किया। उनका कहना है कि उनकी पार्टी शांतिपूर्ण आंदोलन और लोकतांत्रिक अधिकारों की बात करती है। ऐसे में सवाल यह है कि गांधी और आंबेडकर के विचारों से प्रेरित गतिविधियों को भी क्या संभावित हिंसा के नजरिए से देखा जाएगा?

यह सवाल राजनीतिक बयानबाजी से आगे जाकर लोकतांत्रिक अधिकारों की बुनियादी बहस को छूता है।गांधी का सत्याग्रह अहिंसक प्रतिरोध का प्रतीक रहा है, जबकि आंबेडकर ने संवैधानिक अधिकारों, समानता और संस्थागत न्याय पर जोर दिया। इन दोनों विचारधाराओं का साझा संदेश यह है कि सार्वजनिक जीवन में मतभेदों का समाधान अधिकारों, संवाद और कानून के दायरे में होना चाहिए।हालांकि, किसी आंदोलन का वास्तविक स्वरूप उसके घोषित उद्देश्य के साथ-साथ उसके आचरण से भी तय होता है। इसलिए शांतिपूर्ण प्रदर्शन का दावा करने वाले आयोजकों की जिम्मेदारी है कि वे अनुशासन बनाए रखें, वहीं प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वैध विरोध और वास्तविक सुरक्षा जोखिम के बीच स्पष्ट अंतर करे।

10 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन, ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग

CJP ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर 10 अक्टूबर को दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने की घोषणा की है। पार्टी का आरोप है कि SIR के दौरान मतदाता सूची में कथित अनियमितताएं हुई हैं और इससे प्रभावित लोगों को न्याय मिलना चाहिए।दीपके ने मुंबई के शिवाजी पार्क में आयोजित प्रदर्शन के बाद दिल्ली में आंदोलन का ऐलान किया था। उन्होंने कहा था कि यदि मुख्य चुनाव आयुक्त इस्तीफा नहीं देते हैं, तो देश के विभिन्न हिस्सों से कार्यकर्ता दिल्ली पहुंचेंगे।

उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि यदि प्रदर्शनकारियों को जंतर-मंतर पहुंचने से रोका गया, तो वे उस स्थान पर विरोध दर्ज कराएंगे जहां उन्हें रोका जाएगा।CJP के एक अन्य सह-संयोजक आशुतोष रांका ने भी कथित रूप से प्रभावित मतदाताओं के लिए न्याय की मांग उठाई है।हालांकि, मतदाता सूची में गड़बड़ी के आरोपों और उनसे प्रभावित लोगों की संख्या या स्थिति को लेकर निष्कर्ष निकालने के लिए दस्तावेजी प्रमाण, संबंधित निर्वाचन अधिकारियों का पक्ष और उपलब्ध शिकायतों की जांच जरूरी है।

किसी भी चुनावी विवाद में आरोपों की गंभीरता का आकलन प्रमाणों के आधार पर होना चाहिए।

कानूनविदों के नजरिए से तीन अहम सवाल

प्रस्तावित प्रदर्शन और पुलिस के कथित नोटिस के विवाद में कानूनी बहस के तीन महत्वपूर्ण पहलू हैं।

पहला—शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(क) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अनुच्छेद 19(1)(ख) शांतिपूर्वक तथा बिना हथियार एकत्र होने का अधिकार देता है। ये अधिकार पूर्ण या असीमित नहीं हैं। संविधान के अनुच्छेद 19(2) और 19(3) के तहत निर्धारित आधारों पर कानून के अनुसार उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।

दूसरा—पुलिस की एहतियाती कार्रवाई। प्रशासन सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए कानून के तहत कदम उठा सकता है। लेकिन नोटिस या प्रतिबंध की वैधता का मूल्यांकन उसके कानूनी आधार, उपलब्ध तथ्यों और कार्रवाई की आवश्यकता के संदर्भ में किया जाना चाहिए। नोटिस जारी होने मात्र से यह साबित नहीं होता कि पुलिस की कार्रवाई गलत है; उसी तरह नोटिस जारी कर देना किसी आरोप को स्वतः सही भी नहीं बनाता।

तीसरा—मतदाता सूची की शिकायतों का समाधान। यदि किसी मतदाता का नाम गलत तरीके से हटाए जाने, विवरण में त्रुटि या पुनरीक्षण प्रक्रिया में अनियमितता का आरोप है, तो उसका समाधान संबंधित निर्वाचन अधिकारियों के समक्ष उपलब्ध प्रक्रियाओं और जरूरत पड़ने पर न्यायिक उपायों के जरिए तलाशा जा सकता है।

इन पहलुओं पर अंतिम राय देने से पहले संबंधित नोटिसों, प्रशासनिक आदेशों और शिकायतों का वास्तविक विवरण देखना आवश्यक होगा।

समाजसेवी संस्थाओं और नागरिक संगठनों की भूमिका क्यों महत्वपूर्ण?

मतदाता सूची की शुद्धता और नागरिकों के मतदान के अधिकार का प्रश्न किसी एक राजनीतिक दल तक सीमित नहीं है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में स्वतंत्र नागरिक समूह, सामाजिक संगठन और विधिक सहायता संस्थाएं मतदाताओं को प्रक्रियाओं की जानकारी देने, शिकायत दर्ज कराने में मदद करने और जरूरतमंद लोगों तक कानूनी सहायता पहुंचाने में भूमिका निभा सकते हैं।ऐसे संगठनों के लिए सबसे उपयोगी रास्ता यह होगा कि वे प्रभावित मतदाताओं की शिकायतों का दस्तावेजी रिकॉर्ड तैयार करें, संबंधित निर्वाचन अधिकारियों से जवाब मांगें और जहां आवश्यक हो, वैधानिक प्रक्रियाओं का सहारा लें।

इससे राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से अलग वास्तविक समस्याओं की पहचान हो सकेगी। साथ ही, यह भी सुनिश्चित किया जा सकेगा कि किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची में शामिल होने या उसमें सुधार कराने का अधिकार राजनीतिक विवाद की भेंट न चढ़े।

विपक्ष के लिए मुद्दा, लेकिन जवाबदेही सभी की

CJP के आरोप विपक्षी दलों को चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और प्रदर्शनकारियों के साथ प्रशासन के व्यवहार पर सवाल उठाने का अवसर दे सकते हैं। विपक्ष इस घटनाक्रम को लोकतांत्रिक असहमति और चुनावी पारदर्शिता के व्यापक मुद्दों से जोड़ सकता है।लेकिन किसी विपक्षी दल की औपचारिक प्रतिक्रिया या समर्थन का दावा संबंधित बयान के बिना नहीं किया जा सकता। इसी तरह, सरकार या पुलिस की मंशा के बारे में निष्कर्ष निकालने के लिए भी ठोस प्रमाण आवश्यक हैं।

लोकतंत्र में सत्ता पक्ष की जवाबदेही जितनी जरूरी है, उतना ही जरूरी विपक्ष और आंदोलनकारी संगठनों का तथ्यों के आधार पर अपनी बात रखना है। आरोपों की स्वतंत्र जांच, प्रशासन की पारदर्शिता और प्रभावित लोगों के लिए प्रभावी शिकायत निवारण ही इस विवाद का विश्वसनीय समाधान दे सकते हैं।

10 अक्टूबर की परीक्षा: आंदोलन की ताकत या लोकतांत्रिक व्यवस्था की कसौटी?

मुंबई के शिवाजी पार्क के बाद दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रस्तावित प्रदर्शन CJP के लिए अपने राजनीतिक प्रभाव को राष्ट्रीय स्तर पर सामने रखने का अवसर है। वहीं पुलिस और प्रशासन के सामने चुनौती होगी कि कानून-व्यवस्था बनाए रखते हुए वैध और शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार का सम्मान कैसे किया जाए।यदि प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहता है, तो मतदाता सूची और चुनावी पारदर्शिता से जुड़े सवालों पर सार्वजनिक बहस आगे बढ़ सकती है।

यदि किसी प्रकार का तनाव पैदा होता है, तो उसकी जिम्मेदारी तय करने के लिए घटनाओं, आदेशों और उपलब्ध साक्ष्यों की निष्पक्ष जांच आवश्यक होगी।लोकतंत्र की असली मजबूती इस बात से नहीं मापी जाती कि सरकार के खिलाफ कितनी आवाजें उठती हैं, बल्कि इस बात से मापी जाती है कि उन आवाजों को कानून, संवाद और संवैधानिक मर्यादा के भीतर कितनी जगह मिलती है।

10 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर होने वाला प्रदर्शन इसी कसौटी पर देखा जाएगा।

फिलहाल सबसे अहम मांग यही है कि मतदाता सूची से जुड़े आरोपों की निष्पक्ष जांच हो, पुलिस की कार्रवाई का आधार स्पष्ट किया जाए और सभी पक्ष कानून के दायरे में रहते हुए लोकतांत्रिक प्रक्रिया का सम्मान करें।

बी. के. झा ,

एनएसके राजनीतिक विश्लेषण

NSK news India

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