बी के झा
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नई दिल्ली, 8 अक्टूबर
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्षी INDIA ब्लॉक का आंदोलन गुरुवार को तीसरे दिन भी जारी रहा, लेकिन इस बार राजनीतिक प्रदर्शन के साथ एक दूसरा सवाल भी राष्ट्रीय राजधानी की सड़कों पर खड़ा हो गया—लोकतांत्रिक विरोध का अधिकार और आम नागरिक की रोजमर्रा की जिंदगी के बीच संतुलन आखिर कैसे बने?
कनॉट प्लेस में विपक्षी सांसदों के लंच के बाद राजघाट की ओर बढ़े काफिले और सुरक्षा व्यवस्था के कारण मध्य दिल्ली के कई मार्गों पर यातायात प्रभावित रहा। इसी बीच भारतीय रेलवे के अधिकारियों के हवाले से सामने आई जानकारी के मुताबिक 5000 से अधिक यात्री समय पर नई दिल्ली रेलवे स्टेशन नहीं पहुंच पाए और उनकी ट्रेनें छूट गईं।
प्रभावित यात्रियों में 56 IIT जोधपुर के छात्र भी शामिल बताए गए, जिन्हें डिब्रूगढ़ राजधानी पकड़नी थी।यह आंकड़ा महज एक प्रशासनिक व्यवधान नहीं है। यह उस राजनीतिक टकराव का मानवीय चेहरा है, जिसमें एक तरफ विपक्ष चुनावी व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल उठा रहा है और दूसरी तरफ हजारों आम यात्री अपने टिकट, यात्रा और जरूरी काम के बीच फंस गए।
ट्रेन छूटी तो किसकी जिम्मेदारी?
रेलवे के मुताबिक पांच हजार से अधिक यात्री प्रभावित हुए। लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण सवाल है—क्या इन यात्रियों की परेशानी के लिए केवल प्रदर्शनकारियों को जिम्मेदार माना जाए?
तस्वीर इतनी सीधी नहीं है।
एक लोकतांत्रिक देश में विपक्ष को शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार है। संविधान का अनुच्छेद 19 अभिव्यक्ति और शांतिपूर्ण सभा की स्वतंत्रता देता है, लेकिन ये अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था और अन्य नागरिकों के अधिकारों के अधीन भी हैं।इसी संतुलन को लेकर अब दिल्ली की सड़कों पर असली परीक्षा दिखाई दे रही है।
एक तरफ प्रदर्शनकारी कहते हैं कि अगर चुनावी प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठ रहे हों तो सड़क पर उतरना उनका लोकतांत्रिक अधिकार है।
दूसरी तरफ वह यात्री क्या कहेगा, जिसने महीनों पहले टिकट कराया, स्टेशन पहुंचने के लिए घर से समय पर निकला, लेकिन रास्ता बंद होने के कारण उसकी ट्रेन छूट गई?
लोकतंत्र में विरोध की आवाज जरूरी है, लेकिन उस आवाज के बीच आम नागरिक की आवाज दबनी नहीं चाहिए।
दिल्ली ट्रैफिक पुलिस ने पहले ही दी थी चेतावनी
दिल्ली ट्रैफिक पुलिस ने 8 अक्टूबर को राजघाट-किशन घाट रोड पर दोपहर 1 बजे से 4 बजे तक आवाजाही प्रभावित होने की चेतावनी दी थी और लोगों को वैकल्पिक मार्ग अपनाने तथा सार्वजनिक परिवहन को प्राथमिकता देने की सलाह दी थी। बाद में राजघाट क्षेत्र के आसपास बसों और भारी वाहनों के लिए भी प्रतिबंध लगाए गए।यानी प्रशासन को प्रदर्शन और संभावित ट्रैफिक दबाव का अंदाजा था।इसके बावजूद नई दिल्ली रेलवे स्टेशन तक पहुंचने वाले यात्रियों की बड़ी संख्या प्रभावित हुई।
यहीं से सवाल उठता है—क्या इतने बड़े राजनीतिक प्रदर्शन के लिए विशेष यातायात कॉरिडोर, रेलवे स्टेशन तक वैकल्पिक पहुंच और यात्रियों के लिए वास्तविक समय में सूचना की व्यवस्था पर्याप्त थी?
अगर नहीं थी, तो यह केवल राजनीतिक दलों का नहीं, प्रशासनिक प्रबंधन का भी सवाल है।
56 IIT छात्र भी नहीं पकड़ पाए राजधानी
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे प्रतीकात्मक उदाहरण IIT जोधपुर के 56 छात्रों का है।रिपोर्ट के मुताबिक छात्रों का समूह शाम चार बजे रवाना होने वाली डिब्रूगढ़ राजधानी पकड़ने के लिए नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुंचना चाहता था, लेकिन सड़क पर लगे प्रतिबंध और जाम के कारण वे ट्रेन नहीं पकड़ सके।राजनीतिक संघर्ष के बीच जब देश के अलग-अलग हिस्सों से पढ़ने आए विद्यार्थी राजधानी में अपनी ट्रेन तक नहीं पहुंच पाते, तो यह सवाल स्वाभाविक है कि सार्वजनिक प्रदर्शन की रणनीति में आम यात्रियों की सुविधा को कितना महत्व दिया जा रहा है।यही वह बिंदु है जहां राजनीतिक आंदोलन को अपने तरीके पर भी आत्ममंथन करना पड़ता है।
विपक्ष का आरोप—हमें शांतिपूर्ण प्रदर्शन तक नहीं करने दिया जा रहा
विपक्ष का कहना है कि वह शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखना चाहता है, लेकिन दिल्ली पुलिस लगातार उसके रास्ते में बाधा डाल रही है।राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि विपक्षी सांसदों को लगातार प्रदर्शन करने से रोका जा रहा है। बुधवार को भी जंतर-मंतर की ओर बढ़ने की कोशिश के दौरान राहुल गांधी, प्रियंका गांधी वाड्रा और अन्य नेताओं को पुलिस ने हिरासत में लिया था। इससे पहले 6 अक्टूबर को विपक्षी सांसद चुनाव आयोग की ओर मार्च करने निकले थे और आकाशवाणी भवन के पास लंबा धरना चला था।गुरुवार को विपक्ष ने कनॉट प्लेस में लंच के बाद राजघाट की ओर कूच किया। इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक विपक्षी सांसद वहां शांतिपूर्ण प्रदर्शन और मौन धरने के लिए पहुंचे।कांग्रेस का तर्क है कि अगर चुनावी व्यवस्था से जुड़े सवाल हैं तो विपक्ष को जनता के बीच जाने और सरकार से जवाब मांगने का अधिकार है।
सरकार और बीजेपी का पलटवार—संस्थाओं को निशाना क्यों?
बीजेपी और केंद्र के समर्थक पक्ष का आरोप इसके ठीक उलट है।बीजेपी नेताओं ने कांग्रेस के आंदोलन को राजनीतिक दबाव बनाने की कोशिश बताया है। केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू और शिवराज सिंह चौहान समेत बीजेपी नेताओं ने राहुल गांधी और विपक्ष पर चुनावी नतीजों को स्वीकार करने के बजाय संवैधानिक संस्थाओं पर सवाल उठाने का आरोप लगाया है। बीजेपी ने कांग्रेस के आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर लगाए जा रहे आरोप निराधार हैं।
यानी राजनीतिक लड़ाई अब दो बिल्कुल अलग नैरेटिव में बंट चुकी है।
विपक्ष कह रहा है—यह लोकतंत्र और मताधिकार बचाने की लड़ाई है।
सत्ता पक्ष कह रहा है—विपक्ष चुनावी और राजनीतिक असफलताओं का ठीकरा चुनाव आयोग पर फोड़ रहा है।इन दोनों दावों के बीच तथ्यात्मक सवालों की स्वतंत्र जांच और संस्थागत जवाबदेही का मुद्दा सबसे महत्वपूर्ण हो जाता है।चुनाव आयोग पर आरोप क्या हैं?
INDIA ब्लॉक का आंदोलन विशेष गहन पुनरीक्षण
यानी SIR के दौरान मतदाता सूची में कथित अनियमितताओं के आरोपों को लेकर है। विपक्ष का आरोप है कि मतदाता सूची में बदलाव से वास्तविक मतदाताओं के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं और वह इसी मुद्दे पर CEC ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रहा है।वहीं चुनाव आयोग और बीजेपी इन आरोपों को खारिज करते रहे हैं। आयोग का पक्ष है कि मतदाता सूची को शुद्ध और अद्यतन करना लोकतांत्रिक प्रक्रिया का आवश्यक हिस्सा है।यानी फिलहाल आरोप और प्रत्यारोप दोनों हैं। किसी भी राजनीतिक दावे को अंतिम तथ्य मानने से पहले उसके समर्थन में उपलब्ध दस्तावेज, मतदाता आंकड़े और चुनाव आयोग की प्रक्रिया की स्वतंत्र जांच जरूरी होगी।
कानूनविदों के लिए भी असली सवाल यही—विरोध का अधिकार बनाम सार्वजनिक व्यवस्था
इस विवाद का कानूनी पहलू भी कम महत्वपूर्ण नहीं है।इंडियन यूथ कांग्रेस ने दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है और पुलिस द्वारा जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति नहीं दिए जाने को चुनौती दी है। याचिका में अनुच्छेद 19(1)(a) और 19(1)(b) के तहत अभिव्यक्ति और शांतिपूर्ण सभा के अधिकार का हवाला दिया गया है।याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि पुलिस को प्रदर्शन को नियंत्रित करने का अधिकार है, लेकिन यह अधिकार शांतिपूर्ण सभा पर बिना परिस्थितियों का अनुपातिक आकलन किए पूर्ण प्रतिबंध लगाने में तब्दील नहीं हो सकता। दिल्ली हाईकोर्ट ने इस मामले को सुनने पर सहमति जताई है।
दूसरी ओर दिल्ली पुलिस का कहना है कि प्रतिबंधित क्षेत्रों में जुटान कानून-व्यवस्था और सुरक्षा के लिए समस्या पैदा कर सकता है। राजघाट क्षेत्र में BNSS की धारा 163 लागू की गई थी।इसलिए आने वाले दिनों में अदालत के सामने भी यही बड़ा सवाल रह सकता है—प्रदर्शन के अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच उचित सीमा क्या है?
समाजसेवी और छात्र संगठन भी मैदान में
यह आंदोलन अब केवल राजनीतिक दलों तक सीमित नहीं रह गया है।छात्र और नागरिक समाज के कुछ संगठनों ने भी 10 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन का आह्वान किया है। AISA, AISF, SFI और अन्य संगठनों ने SIR, चुनावी सुधार और चुनाव आयोग की जवाबदेही से जुड़े सवाल उठाए हैं।इससे साफ है कि विवाद का एक हिस्सा अब राजनीतिक दलों से निकलकर छात्र और नागरिक समाज के मंचों तक भी पहुंच रहा है।हालांकि इन संगठनों की ओर से लगाए गए आरोपों को भी आरोप के रूप में ही देखा जाना चाहिए; उन्हें स्थापित तथ्य मानने से पहले स्वतंत्र प्रमाण जरूरी होंगे।
राजनीतिक विश्लेषण का बड़ा सवाल—आंदोलन कितना लंबा चलेगा?
राजनीतिक विश्लेषक असिम अली ने अल जजीरा से बातचीत में कहा कि उन्हें सरकार के पीछे हटने की उम्मीद नहीं है और उनके अनुसार CEC का इस्तीफा सरकार के लिए गंभीर राजनीतिक संकेत माना जा सकता है। वहीं सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के वरिष्ठ फेलो नीलांजन सरकार ने इसे सरकार के लिए व्यापक संस्थागत संकेतों से जोड़कर देखा है।
इन विश्लेषणों से एक बात स्पष्ट होती है—यह विवाद केवल एक अधिकारी के इस्तीफे तक सीमित नहीं रह गया है।यह चुनाव आयोग की संस्थागत विश्वसनीयता, सरकार और विपक्ष के बीच राजनीतिक टकराव तथा आने वाले चुनावी विमर्श—तीनों को प्रभावित कर रहा है।
लेकिन क्या आम आदमी इस राजनीतिक संघर्ष की कीमत चुकाए?
यहीं इस पूरी कहानी का सबसे कठिन प्रश्न खड़ा होता है।
विपक्ष का प्रदर्शन लोकतांत्रिक अधिकार है।
सरकार का कानून-व्यवस्था बनाए रखना प्रशासनिक दायित्व है।
पुलिस का ट्रैफिक नियंत्रित करना आवश्यक है।
लेकिन रेलवे स्टेशन पहुंचना आम यात्री का अधिकार और उसकी व्यावहारिक जरूरत है।जब इन चारों के बीच तालमेल टूटता है तो नुकसान उस नागरिक का होता है, जिसका इस राजनीतिक संघर्ष से प्रत्यक्ष कोई लेना-देना नहीं।
5000 से ज्यादा यात्रियों के ट्रेन छूटने की खबर इसी चिंता को सामने लाती है।
आंदोलन की धार बनाम जनता की परेशानी
राजनीतिक आंदोलन तभी व्यापक जनसमर्थन का विषय बनता है जब आम नागरिक उसमें अपने सवालों की आवाज देखता है।लेकिन अगर वही आंदोलन रोजमर्रा के जीवन को बड़े पैमाने पर बाधित करने लगे, तो राजनीतिक दलों के सामने यह चुनौती भी आती है कि वे विरोध को प्रभावी रखते हुए जनता की परेशानी को न्यूनतम कैसे करें।क्योंकि लोकतंत्र में सड़क केवल प्रदर्शनकारियों की नहीं होती।
वह उस एंबुलेंस की भी होती है जिसे अस्पताल पहुंचना है।
उस छात्र की भी होती है जिसे परीक्षा देने जाना है।
उस कर्मचारी की भी होती है जिसे ड्यूटी पर पहुंचना है।
और उस यात्री की भी होती है जिसने राजधानी एक्सप्रेस का टिकट महीनों पहले बुक कराया है।
अब लड़ाई सड़क से संस्थागत जवाबदेही तक ले जाने की चुनौती
CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष का आंदोलन तीसरे दिन भी जारी रहा। राहुल गांधी और INDIA ब्लॉक के नेता पीछे हटने के संकेत नहीं दे रहे हैं, जबकि बीजेपी और सरकार ने विपक्ष के आरोपों को खारिज किया है। पुलिस की ओर से भी स्पष्ट किया गया है कि प्रतिबंधित क्षेत्रों में प्रदर्शन की अनुमति नहीं है।इस बीच 10 अक्टूबर के लिए छात्र और नागरिक संगठनों की प्रस्तावित लामबंदी इस विवाद को और व्यापक बना सकती है।लेकिन आने वाले दिनों में इस पूरे आंदोलन की असली कसौटी केवल यह नहीं होगी कि कितने सांसद सड़क पर उतरे।
कसौटी यह भी होगी कि—क्या विपक्ष अपने आरोपों को दस्तावेज और ठोस प्रमाणों के साथ संस्थागत बहस में बदल पाता है?
क्या सरकार और चुनाव आयोग गंभीर सवालों का पारदर्शी जवाब देते हैं?
और सबसे बढ़कर—क्या लोकतंत्र की रक्षा के नाम पर होने वाला संघर्ष उस आम नागरिक के अधिकारों की कीमत पर तो नहीं हो रहा, जिसके वोट और सुविधाओं की रक्षा की बात दोनों पक्ष कर रहे हैं?
5000 से ज्यादा यात्रियों की छूटी ट्रेनें इस पूरे विवाद के बीच एक असहज लेकिन जरूरी सवाल छोड़ गई हैं—लोकतंत्र की लड़ाई सड़क पर लड़ी जा सकती है, लेकिन क्या उस सड़क पर चल रहे आम आदमी को पीछे छोड़कर?
बी. के.
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