बी के झा
पटना, 8 अक्टूबर
बिहार की राजनीति में जातीय समीकरण कोई नई बात नहीं है, लेकिन इस बार कहानी कुछ अलग है। बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव ने जिस राजनीतिक संकेत को जन्म दिया है, उसने सत्ता के गलियारों में बैठे रणनीतिकारों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है। सवाल अब सिर्फ यह नहीं है कि कौन-सा वोट बैंक किस पार्टी के साथ है। बड़ा सवाल यह है कि क्या बिहार का मतदाता अब पुराने राजनीतिक खांचों से बाहर निकलकर अपने स्थानीय अनुभव, प्रशासनिक व्यवस्था और सरकार के कामकाज के आधार पर भी फैसला करने लगा है?
बांकीपुर के चुनावी संकेत को इसी संदर्भ में देखा जा रहा है। लंबे समय से बीजेपी के मजबूत सामाजिक आधार का हिस्सा माने जाने वाले सवर्ण और वैश्य मतदाताओं के बीच यदि नाराजगी बढ़ती है, तो इसका सीधा असर NDA के चुनावी गणित पर पड़ सकता है।
दूसरी ओर, यादव और मुस्लिम मतदाताओं को पारंपरिक रूप से RJD का मजबूत आधार माना जाता रहा है। लेकिन जन सुराज के उभार ने इस पुराने राजनीतिक समीकरण में भी सेंध लगाने की संभावना पैदा कर दी है। यानी बिहार की राजनीति में अब चुनौती सिर्फ विपक्ष बनाम सत्ता की नहीं है। चुनौती उस मतदाता को अपने साथ बनाए रखने की है, जो कभी किसी दल का ‘स्थायी वोटर’ समझ लिया जाता था।
बांकीपुर ने दिया चेतावनी का संकेत?
बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव को इसी बदलते मनोविज्ञान के आईने के तौर पर देखा जा रहा है। यह चुनाव परिणाम यदि एक बात का संकेत देता है, तो वह यह है कि सवर्ण मतदाता को अब किसी दल का स्थायी समर्थक मान लेना राजनीतिक भूल हो सकती है।बीजेपी की पारंपरिक ताकत केवल उसके अपने संगठन या समर्थकों की संख्या नहीं रही है। बिहार जैसे राज्य में उसकी वास्तविक चुनावी ताकत उस सामाजिक गठजोड़ से बनी है, जिसमें जंगलराज की वापसी का भय, कानून-व्यवस्था का सवाल और राजनीतिक स्थिरता की उम्मीद ने सवर्ण तथा वैश्य मतदाताओं के एक बड़े हिस्से को बीजेपी-NDA के साथ जोड़े रखा।
लेकिन जब यही मतदाता यह महसूस करने लगे कि सत्ता में आने के बाद भी उसके रोजमर्रा के सवाल—कानून-व्यवस्था, भ्रष्टाचार, सरकारी योजनाओं का लाभ, स्थानीय प्रशासन की जवाबदेही और सम्मानजनक सरकारी व्यवहार—हल नहीं हो रहे हैं, तो फिर राजनीतिक निष्ठा भी सवालों के घेरे में आ सकती है।यही वह बिंदु है जहां बांकीपुर का संदेश महत्वपूर्ण हो जाता है।
आठ MLC सीटों में पांच सवर्ण चेहरे—क्या यह डैमेज कंट्रोल है?
बांकीपुर के बाद NDA के राजनीतिक प्रबंधन को जिस तरह देखा जा रहा है, उसमें विधान परिषद चुनाव का टिकट वितरण भी महत्वपूर्ण संकेत देता है।आठ MLC सीटों पर NDA की ओर से उम्मीदवार उतारे गए और इनमें पांच सवर्ण चेहरों को जगह मिलने को राजनीतिक विश्लेषक डैमेज कंट्रोल की कोशिश के रूप में देख रहे हैं।जनता दल यूनाइटेड ने पटना स्नातक सीट से नीरज कुमार, तिरहुत स्नातक सीट से अभिषेक झा और सारण शिक्षक सीट से आनंद पुष्कर को मैदान में उतारा है। वहीं बीजेपी ने दरभंगा स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से सर्वेश कुमार और तिरहुत शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से नरेंद्र प्रसाद सिंह को उम्मीदवार बनाया है। इसके साथ ही बीजेपी ने यादव समाज को भी प्रतिनिधित्व दिया है। यानी टिकट वितरण में सामाजिक संतुलन साधने की कोशिश साफ दिखाई देती है।
लेकिन राजनीति में टिकट देना और नाराजगी दूर करना दो अलग-अलग बातें हैं। मतदाता अब यह भी पूछ सकता है कि टिकट किसे मिला, उससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि उसके गांव, पंचायत और प्रखंड में सरकारी काम कैसे हो रहा है?‘
सवर्ण’ की छवि और जमीन की हकीकत में कितना अंतर?
बिहार सरकार की जाति आधारित गणना की आर्थिक रिपोर्ट ने एक और महत्वपूर्ण तस्वीर सामने रखी है।सामान्य वर्ग के परिवारों की कुल संख्या 43,28,828 बताई गई है।
रिपोर्ट के अनुसार सामान्य वर्ग के लगभग 25.09 प्रतिशत परिवार आर्थिक रूप से गरीब श्रेणी में आते हैं, यानी उनकी मासिक आय 6,000 रुपये या उससे कम बताई गई है।
जातीय स्तर पर देखें तो भूमिहार समुदाय के 27.58 प्रतिशत परिवार, ब्राह्मण समुदाय के 25.32 प्रतिशत परिवार और राजपूत समुदाय के 24.89 प्रतिशत परिवार आर्थिक रूप से गरीब श्रेणी में बताए गए हैं। कायस्थ समुदाय में यह आंकड़ा 13.83 प्रतिशत है। ये आंकड़े उस स्थापित धारणा को चुनौती देते हैं जिसमें सामान्य वर्ग को एकसमान आर्थिक रूप से संपन्न वर्ग मान लिया जाता है।और तस्वीर केवल आय तक सीमित नहीं है।बिहार सरकार के सर्वेक्षण के अनुसार सामान्य वर्ग के 0.31 प्रतिशत लोग आवासहीन बताए गए हैं।
अनुसूचित जाति में यह आंकड़ा 0.26 प्रतिशत, अनुसूचित जनजाति में 0.28 प्रतिशत और अन्य सामाजिक वर्गों में अलग-अलग स्तर पर दर्ज किया गया।
इसका अर्थ साफ है—सवर्ण समाज के भीतर भी आर्थिक रूप से बेहद कमजोर तबका मौजूद है, जिसकी समस्याओं को केवल उसकी सामाजिक पहचान के आधार पर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
असली नाराजगी जाति से ज्यादा व्यवस्था को लेकर है?
यहीं से बिहार की मौजूदा राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण सवाल सामने आता है।
क्या सवर्ण मतदाता की नाराजगी केवल राजनीतिक प्रतिनिधित्व की वजह से है?
शायद नहीं।
जमीनी स्तर पर सबसे बड़ा सवाल प्रशासनिक व्यवस्था का है। ग्रामीण बिहार में प्रधानमंत्री आवास योजना, शौचालय, किसान सहायता, राशन, सामाजिक सुरक्षा और दूसरी सरकारी योजनाओं का लाभ पाने के लिए पात्र व्यक्ति को कितनी मशक्कत करनी पड़ती है—यह किसी जातीय समीकरण से बड़ा सवाल है।अगर कोई पात्र व्यक्ति सरकारी योजना का लाभ पाने के बावजूद कथित तौर पर स्थानीय स्तर पर पैसे की मांग या भ्रष्टाचार के कारण उससे वंचित रह जाता है, तो उसके लिए सरकार का चेहरा बीजेपी, JDU या किसी दूसरी पार्टी से ज्यादा महत्वपूर्ण वह अधिकारी या जनप्रतिनिधि होता है, जिसके दरवाजे पर उसे बार-बार जाना पड़ता है।
यही कारण है कि भ्रष्टाचार का सवाल अब केवल विपक्ष का राजनीतिक हथियार नहीं रह गया है। यह सत्ता के लिए वास्तविक चुनावी चुनौती बन सकता है।
मधुबनी से सामने आती है एक जमीनी कहानी
मेरे अपने बिहार दौरे के दौरान मधुबनी जिले के अंधराठाढ़ी प्रखंड और आसपास के क्षेत्रों में जो जमीनी तस्वीर सामने आई, उसने इस सवाल को और गंभीर बना दिया।स्थानीय स्तर पर यह शिकायत सुनने को मिली कि सरकारी योजनाओं के वास्तविक पात्र लाभार्थियों को कई बार योजना का लाभ लेने के लिए प्रशासनिक स्तर पर अनावश्यक चक्कर लगाने पड़ते हैं। दूसरी ओर, अपात्र लोगों तक योजनाओं का लाभ पहुंचने के आरोप भी सामने आते हैं।
इन आरोपों की स्वतंत्र जांच आवश्यक है। लेकिन अगर किसी प्रखंड में योजनाओं के क्रियान्वयन की निष्पक्ष जांच कराई जाए और उसमें बड़े पैमाने पर अनियमितता सामने आती है, तो यह केवल किसी एक अधिकारी या कर्मचारी की गलती नहीं होगी। यह पूरे प्रशासनिक तंत्र की जवाबदेही का सवाल बनेगा।और यही वह मोर्चा है जहां सरकार को विपक्ष से ज्यादा खुद अपने सिस्टम से लड़ना होगा।
जब पत्रकार के घर का बिजली पोल उखड़ जाए और छह महीने तक कनेक्शन न हो
जमीनी प्रशासन की कहानी का एक व्यक्तिगत अनुभव भी इस तस्वीर को और गंभीर बनाता है। एक पत्रकार के घर के सामने से बिजली का पोल उखाड़ लिए जाने के बाद विद्युत विभाग और प्रशासन के अधिकारियों को आवेदन दिए गए। अनुमंडल अधिकारी से लेकर झंझारपुर के विद्युत विभाग के कार्यपालक अभियंता तक मामला पहुंचाया गया। इसके बावजूद छह महीने तक बिजली कनेक्शन बहाल नहीं हो सका।
जब इस मामले को लेकर दिल्ली से बार-बार संबंधित अधिकारी से संपर्क किया गया तो जवाब मिला कि बिहार सरकार के पोर्टल पर शिकायत दर्ज कराई जाए, क्योंकि नीचे के अधिकारी उनकी बात नहीं सुन रहे हैं। जिसका काल रिकॉर्ड पत्रकार के पास सुरक्षित है यदि एक पत्रकार को अपनी मूलभूत नागरिक सुविधा के लिए छह महीने तक अधिकारियों के चक्कर लगाने पड़ें और विभाग का वरिष्ठ अधिकारी खुद यह कहे कि नीचे के अधिकारी उसकी बात नहीं सुनते, तो सवाल सिर्फ एक बिजली कनेक्शन का नहीं रह जाता।
सवाल यह है कि आम आदमी की सुनवाई आखिर कहां होगी?
और इससे भी बड़ा सवाल—अगर सरकारी मशीनरी अपने ही वरिष्ठ अधिकारी की बात नहीं सुनती, तो मुख्यमंत्री तक आम आदमी की आवाज कितनी जल्दी पहुंचती होगी?
‘चढ़ावा’ की संस्कृति पर सरकार को देना होगा जवाब
बिहार में सरकारी योजनाओं को लेकर सबसे गंभीर आरोपों में से एक कथित ‘चढ़ावा’ या रिश्वत का है।यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि हर अधिकारी या कर्मचारी भ्रष्ट है, ऐसा कहना न तो उचित है और न ही तथ्यात्मक। लेकिन यदि किसी योजना का लाभ लेने के लिए पात्र व्यक्ति से अवैध भुगतान की मांग की जाती है, तो सरकार को ऐसे मामलों में तत्काल शिकायत, जांच और कार्रवाई की व्यवस्था मजबूत करनी होगी।क्योंकि चुनाव के समय नेता मंच से चाहे जितने बड़े वादे कर लें, मतदाता के मन में सरकार की असली छवि उसके अपने अनुभव से बनती है।
उसका राशन समय पर मिला या नहीं।
आवास मिला या नहीं।
किसान सम्मान निधि पहुंची या नहीं।
बिजली मिली या नहीं।
थाने में उसकी सुनवाई हुई या नहीं।
अंचल कार्यालय में काम हुआ या नहीं।
और सबसे महत्वपूर्ण—काम कराने के लिए पैसे देने पड़े या नहीं। यही असली ‘गवर्नेंस टेस्ट’ है।
कानून-व्यवस्था भी NDA के लिए बड़ा इम्तिहान
बिहार में पिछले कुछ महीनों की घटनाओं ने कानून-व्यवस्था को भी राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है।NDA की राजनीति लंबे समय तक ‘जंगलराज बनाम सुशासन’ की बहस के इर्द-गिर्द मजबूत हुई। लेकिन सत्ता में रहते हुए यदि अपराध, प्रशासनिक लापरवाही और भ्रष्टाचार के आरोप लगातार राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनते हैं, तो विपक्ष को वही पुराना मुद्दा नए तरीके से उठाने का मौका मिल जाता है।
यहां सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह अपने पुराने राजनीतिक नैरेटिव को खुद कमजोर न होने दे।क्योंकि जनता यह नहीं पूछेगी कि 2005 में क्या हुआ था।वह पूछेगी—आज मेरे साथ क्या हो रहा है?
सवर्णों की नाराजगी को सिर्फ टिकट से नहीं दूर किया जा सकता
आठ MLC सीटों में पांच सवर्ण उम्मीदवारों को टिकट देकर NDA ने राजनीतिक संदेश जरूर दिया है।लेकिन क्या इससे नाराजगी दूर हो जाएगी?
इसका जवाब चुनाव ही देगा।
किसी भी समाज को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देना जरूरी है, लेकिन उससे ज्यादा जरूरी उस समाज के सामान्य परिवारों की रोजमर्रा की समस्याओं को हल करना है।यदि गरीब ब्राह्मण को आवास नहीं मिलता, गरीब भूमिहार को सरकारी योजना के लिए पैसे देने पड़ते हैं, गरीब राजपूत प्रशासनिक कार्यालयों के चक्कर काटता है या कोई कायस्थ परिवार रोजगार और आर्थिक संकट से जूझता है, तो केवल यह कहना कि ‘हमने आपके समाज को पांच टिकट दिए हैं’ उसकी समस्या का समाधान नहीं करता।इसी तरह यही सवाल यादव, मुस्लिम, दलित, अति पिछड़ा और दूसरे सामाजिक समूहों पर भी लागू होता है।आज का बिहार शायद जातीय प्रतिनिधित्व के साथ-साथ प्रशासनिक न्याय भी मांग रहा है।
जन सुराज की चुनौती यहीं से पैदा होती है
बिहार की राजनीति में जन सुराज की चुनौती को भी इसी बदलते सामाजिक मनोविज्ञान के संदर्भ में देखना होगा।यदि अलग-अलग जातियों का वह मतदाता, जो परंपरागत रूप से किसी एक दल के साथ जाता रहा है, अब यह मानने लगे कि उसकी प्राथमिकता जातीय पहचान से ज्यादा स्थानीय प्रशासन, भ्रष्टाचार, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और कानून-व्यवस्था है, तो तीसरी राजनीतिक शक्ति के लिए जगह बन सकती है।यही वजह है कि NDA और RJD दोनों के सामने चुनौती है।
एक तरफ बीजेपी-NDA को अपने पारंपरिक सवर्ण और वैश्य आधार को बनाए रखना है, तो दूसरी ओर RJD को यादव-मुस्लिम समीकरण से आगे निकलकर व्यापक सामाजिक समर्थन हासिल करना है।और इसी बीच जन सुराज जैसी ताकतें यह दावा कर रही हैं कि बिहार की राजनीति को जातीय समीकरण से निकालकर शासन और विकास के मुद्दे पर लाया जाना चाहिए।
सम्राट चौधरी के सामने असली परीक्षा
सम्राट चौधरी के नेतृत्व वाली बिहार सरकार के सामने अब सबसे बड़ा सवाल राजनीतिक नहीं, प्रशासनिक है।
क्या सरकार प्रखंड स्तर तक भ्रष्टाचार पर अंकुश लगा पाएगी?
क्या सरकारी योजनाओं में बिचौलियों की भूमिका खत्म होगी?
क्या पात्र व्यक्ति को बिना रिश्वत दिए उसका अधिकार मिलेगा?
क्या बिजली, सड़क, राशन, आवास और किसान योजनाओं के लिए आम आदमी को अधिकारियों के चक्कर लगाने से मुक्ति मिलेगी?
क्या कानून-व्यवस्था को लेकर जनता का भरोसा मजबूत होगा?
और क्या बीजेपी अपने उस सामाजिक आधार को फिर से आश्वस्त कर पाएगी, जिसने वर्षों तक उसे जंगलराज के विकल्प के रूप में देखा?
क्योंकि अब बिहार का मतदाता केवल यह नहीं पूछ रहा कि ‘कौन बेहतर है?’
वह शायद पहली बार ज्यादा जोर से पूछ रहा है—‘मेरे लिए कौन बेहतर काम कर रहा है?
’‘बांकीपुर सिंड्रोम’ का असली मतलब बांकीपुर का संदेश
यदि केवल एक चुनावी परिणाम मान लिया गया, तो शायद सबसे बड़ी राजनीतिक भूल होगी।इसका असली संदेश यह हो सकता है कि बिहार का मतदाता अब किसी दल को अपना स्थायी मालिक मानने को तैयार नहीं है।
सवर्ण बीजेपी के साथ रह सकता है, लेकिन जरूरी नहीं कि हर परिस्थिति में बीजेपी के साथ ही रहे।
यादव RJD का पारंपरिक मतदाता हो सकता है, लेकिन जरूरी नहीं कि हर चुनाव में उसी को वोट दे।
मुस्लिम मतदाता किसी गठबंधन के साथ जा सकता है, लेकिन वह भी अब अपने राजनीतिक विकल्पों पर विचार कर सकता है।
यही लोकतंत्र की खूबसूरती भी है और सत्ता के लिए सबसे बड़ी चुनौती भी। इसलिए पांच सवर्ण टिकट महत्वपूर्ण हैं, लेकिन पर्याप्त नहीं
NDA ने पांच सवर्ण चेहरों को टिकट देकर शायद पहला राजनीतिक संकेत दे दिया है कि संदेश ऊपर तक पहुंच चुका है।
अब दूसरा और ज्यादा कठिन कदम उठाना होगा—सरकार को जमीन तक पहुंचाना।अगर पंचायत से प्रखंड और अनुमंडल से जिला मुख्यालय तक भ्रष्टाचार की शिकायतें बनी रहती हैं, अगर पात्र व्यक्ति सरकारी लाभ के लिए पैसे देने को मजबूर होता है, अगर कानून-व्यवस्था पर सवाल उठते रहते हैं और अगर आम आदमी की शिकायत सुनने वाला कोई नहीं मिलता, तो केवल जातीय प्रतिनिधित्व से राजनीतिक नाराजगी दूर नहीं होगी।
बिहार में सत्ता का अगला संघर्ष शायद जातीय समीकरणों से ज्यादा विश्वास बनाम अविश्वास का संघर्ष होगा।
और अगर NDA ने समय रहते इस बदलते राजनीतिक मिजाज को नहीं समझा, तो बांकीपुर सिर्फ एक सीट का चुनाव परिणाम नहीं रहेगा।
वह आने वाले बिहार की राजनीति का ट्रेलर साबित हो सकता है।
बी. के. झा, NSK
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