यूपी की 10 राज्यसभा सीटों पर BJP का दबदबा, 8 सीटें जीतकर बढ़ाया सियासी वजन; सपा के खाते में दो

बी. के. झा

NSK news Ind

लखनऊ, 9 अक्टूबर

राज्यसभा चुनाव में भाजपा के आठ और समाजवादी पार्टी के दो उम्मीदवार निर्विरोध निर्वाचित; 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा ने साधा सामाजिक समीकरण, अखिलेश यादव ने विधानसभा की 403 सीटों पर फोकस करने के दिए संकेत।उत्तर प्रदेश की राजनीति में राज्यसभा चुनाव के नतीजों ने एक बार फिर भाजपा की संगठनात्मक ताकत और समाजवादी पार्टी की सीमित लेकिन अहम संसदीय मौजूदगी को सामने ला दिया है।

प्रदेश की 10 राज्यसभा सीटों पर शुक्रवार, 9 अक्टूबर को सभी उम्मीदवार निर्विरोध निर्वाचित घोषित कर दिए गए। भाजपा के खाते में आठ सीटें आईं, जबकि समाजवादी पार्टी दो सीटें हासिल करने में सफल रही। इस तरह मतदान की नौबत ही नहीं आई और नामांकन प्रक्रिया पूरी होते ही तस्वीर साफ हो गई।इस चुनाव में भाजपा की जीत केवल सीटों की संख्या तक सीमित नहीं है। इसके पीछे 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले सामाजिक समीकरण साधने, संगठन के पुराने चेहरों को सम्मान देने और अलग-अलग वर्गों तक राजनीतिक संदेश पहुंचाने की रणनीति भी देखी जा रही है।

दूसरी ओर, अखिलेश यादव की अगुवाई वाली सपा ने दो सीटों पर संतोष करते हुए अपनी राजनीतिक ऊर्जा विधानसभा चुनाव की तैयारी पर केंद्रित करने के संकेत दिए हैं।

भाजपा के आठ चेहरे, सामाजिक संतुलन पर जोर

भाजपा की ओर से धर्मपाल सिंह, राधाकांत ओझा, प्रकाश पाल, विद्यासागर सोनकर, गोपी कृष्ण पांडेय, प्रियंका सिंह रावत, राम प्रताप सिंह चौहान और श्रुति गंगवार राज्यसभा के लिए निर्विरोध निर्वाचित हुए हैं। उम्मीदवारों के चयन में पार्टी ने संगठनात्मक अनुभव और सामाजिक प्रतिनिधित्व के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की है।

सूची में पिछड़े वर्ग, दलित, ब्राह्मण और ठाकुर समुदायों से जुड़े नेताओं को जगह मिली है। राजनीतिक जानकारों के विश्लेषण में इसे भाजपा की उस रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है, जिसके तहत पार्टी 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी के PDA—पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक—राजनीतिक विमर्श का मुकाबला करने के लिए अपना सामाजिक आधार मजबूत रखना चाहती है। हालांकि, राज्यसभा की यह सफलता अपने आप में विधानसभा चुनाव के नतीजों की गारंटी नहीं है।

भाजपा ने इस बार अपने कई मौजूदा राज्यसभा सदस्यों को दोबारा उम्मीदवार नहीं बनाया। ऐसे में नए चेहरों को मौका देने का फैसला पार्टी के भीतर नेतृत्व, संगठन और प्रतिनिधित्व के समीकरणों को नए सिरे से व्यवस्थित करने के संकेत भी देता है।

रामगोपाल यादव की वापसी, सपा ने अनुभव पर लगाया दांव

समाजवादी पार्टी ने अपने वरिष्ठ नेता और राष्ट्रीय महासचिव प्रो. रामगोपाल यादव को फिर राज्यसभा भेजा है। पार्टी के रणनीतिक मामलों में उनकी भूमिका लंबे समय से महत्वपूर्ण रही है। सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव के परिवार से जुड़े रामगोपाल यादव, पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव के चाचा भी हैं।उनकी वापसी को सपा के लिए अनुभवी संसदीय नेतृत्व बनाए रखने के प्रयास के रूप में देखा जा सकता है। संसद के उच्च सदन में विधायी बहस, राजनीतिक रणनीति और विपक्ष की भूमिका के लिहाज से पार्टी के लिए उनका अनुभव उपयोगी हो सकता है।

धनराज परिमल नथवानी की एंट्री, सियासी चर्चा के बाद निर्विरोध जीत

सपा के दूसरे निर्वाचित उम्मीदवार धनराज परिमल नथवानी हैं, जिनका नाम कॉरपोरेट जगत से जुड़ा रहा है। वह उद्योग जगत से जुड़े परिमल नथवानी के बेटे हैं और रिलायंस समूह से संबंधित पेशेवर पृष्ठभूमि रखते हैं। उनकी उम्मीदवारी को लेकर राजनीतिक हलकों में चर्चा रही, लेकिन अंततः वह भी निर्विरोध निर्वाचित हो गए। नथवानी की उम्मीदवारी सपा की राजनीतिक पसंद को लेकर भी सवाल खड़े करती है—एक ओर पार्टी अपने अनुभवी संगठनात्मक नेतृत्व को बनाए रख रही है, तो दूसरी ओर ऐसे चेहरे को उच्च सदन भेज रही है जिसकी पहचान उद्योग और कॉरपोरेट क्षेत्र से जुड़ी है।

अब उनके सामने चुनौती होगी कि वे संसद में अपनी भूमिका और जनहित से जुड़े मुद्दों पर सक्रियता के जरिए इस भरोसे को सार्थक करें।

दो निर्दलीय उम्मीदवारों के पर्चे खारिज, इसलिए मतदान नहीं हुआ

इस चुनाव में दो निर्दलीय उम्मीदवारों—कांते स्याना और ओंकार नाथ चौरसिया—के नामांकन पत्र जांच के दौरान आवश्यक शर्तें पूरी नहीं करने के कारण खारिज कर दिए गए। इसके बाद आठ भाजपा और दो सपा उम्मीदवार ही वैध प्रत्याशी बचे। कुल 10 सीटों के मुकाबले 10 ही वैध उम्मीदवार होने के कारण सभी निर्विरोध निर्वाचित घोषित कर दिए गए। यानी इसे मतदान के जरिए मिली जीत कहना तकनीकी रूप से सही नहीं होगा; यह निर्विरोध निर्वाचन था। यही तथ्य चुनाव की राजनीतिक व्याख्या में भी महत्वपूर्ण है।

असली परीक्षा अब 2027 के विधानसभा चुनाव में

राज्यसभा की आठ सीटें भाजपा के लिए निश्चित रूप से राजनीतिक बढ़त का संकेत हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश की सत्ता का फैसला विधानसभा की 403 सीटों पर होना है। सपा के लिए भी दो सीटें हासिल करना उच्च सदन में अपनी आवाज बनाए रखने का अवसर है, मगर इससे विधानसभा की लड़ाई आसान या कठिन होने का अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।

अखिलेश यादव ने भी राज्यसभा के इस परिणाम के बाद अपना ध्यान विधानसभा चुनाव पर केंद्रित करने का संकेत दिया है। ऐसे में भाजपा के लिए चुनौती अपनी संगठनात्मक ताकत को जनसमर्थन में बदलने की होगी, जबकि सपा को अपने PDA संदेश, सामाजिक गठजोड़ और सरकार-विरोधी मुद्दों को मतदाताओं तक प्रभावी ढंग से पहुंचाना होगा।

निष्कर्ष:

राज्यसभा की 10 सीटों का निर्विरोध बंटवारा भाजपा के लिए संख्या और संगठन के लिहाज से मजबूत परिणाम है, जबकि सपा ने अपने हिस्से की दो सीटें सुरक्षित रखीं।

लेकिन उत्तर प्रदेश की राजनीति में अंतिम फैसला राज्यसभा के समीकरण नहीं, बल्कि विधानसभा चुनाव में जनता का मतदान करेगा।

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