बी के झा, एन एस के (NSK Delhi)
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नई दिल्ली, 15 अक्टूबर
दिल्ली में मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन और जंतर-मंतर पर सुरक्षा घेरा तोड़ने के आरोपों के बीच कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) से जुड़े नेताओं की मुश्किलें और बढ़ती नजर आ रही हैं। पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके, आशुतोष रांका और सौरभ दास समेत कई लोगों के खिलाफ अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम यानी SC/ST एक्ट के तहत मामला दर्ज किए जाने की जानकारी सामने आई है। एफआईआर में कुछ स्वतंत्र पत्रकारों के नाम भी शामिल बताए गए हैं।मामले में शिकायत दिल्ली पुलिस के कनॉट प्लेस सब-डिवीजन के एसीपी विवेक भगत की ओर से दर्ज कराए जाने की बात कही गई है।
आरोप है कि एसीपी के संबंध में अपमानजनक और जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल किया गया। एफआईआर में स्वतंत्र पत्रकार रोजी और गजेंद्र सिंह के अलावा अभिजीत दीपके, सौरभ दास, आशुतोष रांका और रत्ना सिंह के नाम शामिल बताए गए हैं।हालांकि, एफआईआर दर्ज होना आरोपों का अंतिम प्रमाण नहीं है। मामले में आरोपियों का पक्ष, शिकायत में दर्ज सटीक शब्द और पुलिस की जांच के निष्कर्ष आगे की कानूनी प्रक्रिया में महत्वपूर्ण होंगे।
फिलहाल, इस नए मुकदमे ने CJP से जुड़े विवाद को एक नया कानूनी और राजनीतिक मोड़ दे दिया है।
एक तरफ जेल, दूसरी तरफ नया मुकदमा
CJP के लिए मुश्किलें ऐसे समय बढ़ी हैं, जब आशुतोष रांका और सौरभ दास को पहले ही पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेजा जा चुका है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, दोनों को जंतर-मंतर पर प्रतिबंधों के बावजूद जबरन प्रवेश करने और सुरक्षा घेरा तोड़ने के आरोपों में गिरफ्तार किया गया था। अदालत ने उन्हें न्यायिक हिरासत में भेजने का आदेश दिया, जिसके बाद उन्हें तिहाड़ जेल ले जाया गया।
अब SC/ST एक्ट के तहत दर्ज नए मामले ने पार्टी के सामने कानूनी चुनौतियों की एक और परत जोड़ दी है। एक ओर उसके दो प्रमुख चेहरे जेल में हैं, तो दूसरी ओर संस्थापक अभिजीत दीपके सार्वजनिक रूप से आंदोलन जारी रखने का संदेश दे रहे हैं।इस पूरे घटनाक्रम में एक महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या लगातार बढ़ती कानूनी कार्रवाई के बीच CJP अपने आंदोलन को उसी गति से आगे बढ़ा पाएगी, या उसे अपनी रणनीति में बदलाव करना पड़ेगा?
इसका जवाब आने वाले दिनों में पार्टी की गतिविधियों और कानूनी कार्यवाही से सामने आएगा।
गिरफ्तारी के विरोध में तिरंगा मार्च का ऐलान
अपने नेताओं की गिरफ्तारी के बाद CJP ने 16 अक्टूबर को दिल्ली के कनॉट प्लेस में तिरंगा मार्च निकालने की घोषणा की है। पार्टी संस्थापक अभिजीत दीपके ने बुधवार को सोशल मीडिया मंच एक्स पर इसकी जानकारी दी।दीपके ने लोगों से शुक्रवार शाम पांच बजे सेंट्रल पार्क में एकत्र होने की अपील की है। उन्होंने कहा कि प्रदर्शनकारी तिरंगा फहराएंगे। साथ ही, दिल्ली नहीं पहुंच पाने वाले समर्थकों से अपने-अपने शहरों में राष्ट्रीय ध्वज फहराने का आह्वान किया है।दीपके ने यह भी संकेत दिया कि आंदोलन के दौरान उनके जेल जाने की संभावना उन्हें पीछे हटने के लिए मजबूर नहीं करेगी।
उनका संदेश स्पष्ट है—गिरफ्तारी के बावजूद विरोध जारी रहेगा।लेकिन इस घोषणा के साथ एक व्यावहारिक सवाल भी जुड़ा है। जिस मामले में पहले ही सुरक्षा व्यवस्था और प्रतिबंधों के उल्लंघन के आरोप सामने आ चुके हैं, उसमें प्रस्तावित मार्च के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव से बचना अहम होगा। शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार और कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी, दोनों के बीच संतुलन इस कार्यक्रम की दिशा तय कर सकता है।
‘अघोषित आपातकाल’ का आरोप, सरकार पर दीपके का हमला
इससे पहले नागपुर में मीडिया से बातचीत के दौरान अभिजीत दीपके ने केंद्र सरकार पर गंभीर राजनीतिक आरोप लगाए थे। उन्होंने दावा किया कि देश में अघोषित आपातकाल जैसी स्थिति बनाई जा रही है। दीपके ने कहा कि यदि सरकार आपातकाल लागू करना चाहती है, तो उसे आधिकारिक तौर पर ऐसा करना चाहिए।ये आरोप दीपके की राजनीतिक प्रतिक्रिया हैं। इन्हें देश में औपचारिक आपातकाल लागू होने के तथ्य के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। फिर भी, उनके बयान से स्पष्ट है कि CJP अपनी कानूनी मुश्किलों को केवल व्यक्तिगत या संगठनात्मक मामला नहीं, बल्कि व्यापक राजनीतिक संघर्ष के संदर्भ में पेश करने की कोशिश कर रही है।
मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ इंडिया गठबंधन के प्रदर्शन पर सवाल पूछे जाने पर दीपके ने कहा कि CJP एक स्वतंत्र समूह है और अपनी स्वतंत्र पहचान बनाए रखेगा। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि स्वतंत्र होने का अर्थ इंडिया गठबंधन का विरोध करना नहीं है। उनके मुताबिक, दोनों के आंदोलनों का उद्देश्य एक ही है।
इस बयान के जरिए दीपके ने दो संदेश देने की कोशिश की है—पहला, CJP किसी बड़े राजनीतिक गठबंधन के अधीन नहीं है; दूसरा, चुनावी प्रक्रिया और लोकतंत्र से जुड़े मुद्दों पर वह अन्य विपक्षी समूहों के साथ समानांतर रूप से आवाज उठा सकती है।
विदेशी फंडिंग के आरोप पर साल्वे से सबूत मांगे
विरोध-प्रदर्शनों को लेकर विदेशी आर्थिक मदद के आरोपों पर भी दीपके ने प्रतिक्रिया दी है। भारत के पूर्व सॉलिसिटर जनरल हरीश साल्वे के उस दावे के संदर्भ में, जिसमें हाल के विरोध-प्रदर्शनों को विदेश से आर्थिक सहायता मिलने की बात कही गई थी, दीपके ने उनसे सबूत केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को सौंपने का आग्रह किया।दीपके ने सवाल उठाया कि यदि विदेशी फंडिंग के आरोपों के समर्थन में प्रमाण मौजूद हैं, तो उन्हें संबंधित अधिकारियों के सामने प्रस्तुत किया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि गृह मंत्रालय इस आरोप को साबित नहीं कर सका है।हालांकि, विदेशी फंडिंग से जुड़े दावों की पुष्टि या खंडन उपलब्ध तथ्यों और आधिकारिक जांच के आधार पर ही किया जा सकता है। किसी राजनीतिक नेता की प्रतिक्रिया अपने आप में आरोप को प्रमाणित नहीं करती।इस मुद्दे ने विरोध-प्रदर्शनों के पीछे कथित आर्थिक सहायता को लेकर एक अलग बहस भी खड़ी कर दी है।
यदि ऐसे आरोप लगाए जाते हैं, तो उनके समर्थन में ठोस प्रमाण सार्वजनिक विमर्श और जांच—दोनों के लिए जरूरी होंगे।
अब आंदोलन, अदालत और पुलिस की कार्रवाई पर टिकी निगाहें
CJP से जुड़े घटनाक्रम अब तीन मोर्चों पर आगे बढ़ते दिखाई दे रहे हैं—आरोपों और एफआईआर का कानूनी पक्ष, गिरफ्तार नेताओं की न्यायिक हिरासत और प्रस्तावित तिरंगा मार्च की राजनीतिक दिशा।
SC/ST एक्ट के तहत दर्ज मामला गंभीर है और इसकी जांच में आरोपों की प्रकृति, उपलब्ध साक्ष्य तथा संबंधित कानूनी प्रावधान निर्णायक होंगे। दूसरी ओर, CJP ने गिरफ्तारी के विरोध में पीछे हटने के बजाय सड़क पर उतरने का संकेत दिया है।
अब असली परीक्षा यह होगी कि CJP अपने विरोध को किस तरह आगे बढ़ाती है, पुलिस प्रस्तावित मार्च को लेकर क्या रुख अपनाती है और नए मुकदमे में जांच किस दिशा में जाती है।
दिल्ली का यह घटनाक्रम केवल एक राजनीतिक संगठन की मुश्किलों तक सीमित नहीं है; यह विरोध-प्रदर्शन, कानून के पालन और लोकतांत्रिक असहमति की सीमाओं पर चल रही बहस को भी सामने लाता है।
