रिजींम चेंज’ पर कांग्रेस के दिग्गजों की दो-टूक , राहुल गांधी के रणनीति पर उठे सवाल; आंनद शर्मा और शशि थरूर ने लोकतांत्रिक सत्ता परिवर्तन और निष्पक्ष चुनाव के बीच खींची लकीर ; शिवराज सिंह चौहान और स्मृति ईरानी ने कांग्रेस को घेरा, SIR के विवाद के बीच राहुल गांधी के वियतनाम दौरे पर भी सियासी संग्राम

बी के झा, एनएसके

NSK news Ind

नई दिल्ली, 20 अक्टूबर

भारतीय राजनीति में इन दिनों दो सवाल एक साथ चर्चा के केंद्र में हैं—क्या विपक्ष की लड़ाई केवल चुनावी निष्पक्षता और मताधिकार की रक्षा तक सीमित है, या उसके कुछ नेताओं की भाषा सरकार बदलने से आगे ‘रिजीम चेंज’ तक पहुंच गई है? और दूसरा सवाल यह कि चुनाव आयोग तथा मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के खिलाफ लगातार मोर्चा खोलने वाले लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के विदेश दौरे को राजनीतिक रूप से किस नजरिए से देखा जाना चाहिए?

इन दोनों मुद्दों ने कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के बीच जुबानी जंग तेज कर दी है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं आनंद शर्मा और शशि थरूर के बयानों को ‘रिजीम चेंज’ की बहस में महत्वपूर्ण हस्तक्षेप के रूप में पेश किया जा रहा है।

दूसरी ओर, भाजपा ने इन बयानों के बहाने राहुल गांधी की राजनीतिक रणनीति पर सवाल उठाए हैं और उनके विदेश दौरे को लेकर भी निशाना साधा है। केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान और भाजपा नेता स्मृति ईरानी ने कांग्रेस नेतृत्व पर तीखे हमले किए हैं। वहीं, कांग्रेस नेता राशिद अल्वी और पूर्व सांसद संदीप दीक्षित तथा समाजवादी पार्टी के सांसद रामशंकर राजभर ने राहुल गांधी के विदेश दौरे का बचाव किया है।

लेकिन इस पूरे विवाद के बीच एक बुनियादी अंतर समझना जरूरी है: लोकतंत्र में सरकार बदलने की मांग करना, चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाना और किसी देश की राजनीतिक व्यवस्था को गैर-संवैधानिक तरीके से बदलने की बात करना तीन अलग-अलग विषय हैं। इन सबको एक ही अर्थ में देखना राजनीतिक बहस को उलझा सकता है।

आनंद शर्मा का बयान: सरकार बदलना और ‘रिजीम चेंज’ एक बात नहीं

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री आनंद शर्मा ने ‘रिजीम चेंज’ शब्द के इस्तेमाल पर सवाल उठाते हुए कहा है कि लोकतंत्र में सरकारें चुनाव के जरिए बदलती हैं। उनके मुताबिक, किसी सरकार को हटाकर दूसरी सरकार चुनना और देश की संवैधानिक व्यवस्था को बदलने की बात करना दो अलग-अलग विषय हैं।आनंद शर्मा ने यह भी कहा कि चुनाव आयोग की विश्वसनीयता बहाल करना जरूरी है और मतदाताओं को यह अधिकार मिलना चाहिए कि वे अपनी पसंद की सरकार चुन सकें या मौजूदा सरकार को सत्ता से बाहर कर सकें।

यानी उन्होंने एक तरफ ‘रिजीम चेंज’ की भाषा पर आपत्ति जताई, तो दूसरी तरफ चुनावी व्यवस्था में विश्वास बहाल करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया। उनके बयान का राजनीतिक महत्व इसलिए भी है, क्योंकि विपक्षी गठबंधन INDIA चुनाव आयोग और मतदाता सूची के पुनरीक्षण को लेकर लगातार आंदोलन कर रहा है।हालांकि, आनंद शर्मा के बयान को राहुल गांधी के खिलाफ सीधा विद्रोह या कांग्रेस नेतृत्व की औपचारिक असहमति मान लेना जल्दबाजी होगी।

उपलब्ध जानकारी में उन्होंने ‘रिजीम चेंज’ शब्दावली पर अपनी आपत्ति जताई है, लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि उन्होंने चुनावी निष्पक्षता को लेकर विपक्ष की सभी मांगों को खारिज कर दिया है।

राजनीतिक विश्लेषण: आनंद शर्मा की टिप्पणी कांग्रेस के सामने एक महत्वपूर्ण चुनौती रखती है। पार्टी को यह स्पष्ट करना होगा कि उसकी लड़ाई किसी संवैधानिक व्यवस्था को उखाड़ने की नहीं, बल्कि चुनावी प्रक्रिया में निष्पक्षता और जवाबदेही सुनिश्चित करने की है। राजनीतिक संदेश जितना स्पष्ट होगा, विपक्ष के लिए अपने आंदोलन का औचित्य जनता के सामने रखना उतना ही आसान होगा।

शशि थरूर ने भी किया समर्थन, बोले—भारत बांग्लादेश नहीं

कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने भी ‘रिजीम चेंज’ के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि भारत की तुलना बांग्लादेश या फ्रांस से करना उचित नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि विपक्ष की मांग स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने तथा मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा करने से संबंधित है।थरूर के मुताबिक, भारत में सरकार बदलने का फैसला मतदाता अपने वोट के जरिए करते हैं। उन्होंने शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों का समर्थन करते हुए हिंसा और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने जैसी गतिविधियों से असहमति जताई। थरूर का यह रुख कांग्रेस के भीतर और विपक्षी गठबंधन के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर को स्पष्ट करता है। सरकार बदलने की लोकतांत्रिक मांग और सत्ता परिवर्तन के लिए गैर-संवैधानिक तरीकों का समर्थन करना एक जैसी बातें नहीं हैं।

लेकिन यहां एक सवाल भी उठता है: जब विपक्ष के कुछ नेता ‘रिजीम चेंज’ जैसी शब्दावली का इस्तेमाल करते हैं, तो क्या उन्हें अपने आशय को स्पष्ट नहीं करना चाहिए?

लोकतांत्रिक राजनीति में शब्द केवल विचार व्यक्त नहीं करते, बल्कि आंदोलन की दिशा और जनता के बीच उसकी छवि भी निर्धारित करते हैं।इसी तरह, सत्तारूढ़ दल की भी जिम्मेदारी है कि वह सरकार की आलोचना और चुनावी अनियमितताओं से जुड़े सवालों को बिना पर्याप्त आधार के असंवैधानिक गतिविधियों के बराबर न रखे।

शिवराज सिंह चौहान का राहुल गांधी पर हमला

आनंद शर्मा और शशि थरूर के बयानों के बाद भाजपा ने कांग्रेस पर निशाना साधा। केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने राहुल गांधी के नेतृत्व और राजनीतिक रणनीति पर कटाक्ष करते हुए कहा कि कांग्रेस ने कई बार उन्हें राजनीतिक रूप से स्थापित करने की कोशिश की, लेकिन जनता ने बार-बार पार्टी को नकार दिया।शिवराज सिंह चौहान ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति जनता के विश्वास का हवाला देते हुए विपक्ष पर राजनीतिक हताशा में बयान देने का आरोप लगाया।भाजपा की इस प्रतिक्रिया का राजनीतिक उद्देश्य स्पष्ट है—कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं की टिप्पणियों को राहुल गांधी के नेतृत्व पर सवाल के रूप में प्रस्तुत करना और विपक्ष के आंदोलन को राजनीतिक रूप से कमजोर दिखाना।

हालांकि, किसी नेता की चुनावी सफलता या विफलता के आधार पर चुनावी प्रक्रिया से जुड़े सवालों को सही अथवा गलत नहीं ठहराया जा सकता। चुनावी निष्पक्षता से संबंधित आरोपों का परीक्षण तथ्यों और संबंधित संस्थाओं के जवाब के आधार पर होना चाहिए।

स्मृति ईरानी ने साधा निशाना, बांग्लादेश के उदाहरण पर उठाए सवाल

भाजपा की राष्ट्रीय महासचिव स्मृति ईरानी ने भी राहुल गांधी और कांग्रेस की राजनीतिक दिशा पर तीखा हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस की राजनीति अब ऐसे विमर्श की ओर बढ़ रही है, जिसमें बांग्लादेश की घटनाओं को सत्ता परिवर्तन के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।स्मृति ईरानी ने बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ हुई हिंसा का उल्लेख करते हुए राहुल गांधी और उनके सहयोगियों की कथित राजनीतिक मंशा पर सवाल उठाए।उनके बयान का सबसे तीखा हिस्सा वह था, जिसमें उन्होंने सवाल किया कि क्या कांग्रेस ‘रिजीम चेंज’ के नाम पर ऐसी परिस्थितियां पैदा करना चाहती है, जिनसे हिंदुओं के खिलाफ हिंसा जैसी घटनाओं का खतरा बढ़े। यह एक गंभीर राजनीतिक आरोप है।

हालांकि, इसे प्रमाणित तथ्य के रूप में प्रस्तुत करने के लिए ठोस साक्ष्य आवश्यक हैं। उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह स्थापित नहीं होता कि राहुल गांधी या कांग्रेस ने भारत में धार्मिक हिंसा कराने की कोई योजना बनाई है।

राजनीतिक आलोचना और किसी व्यक्ति या दल पर हिंसा भड़काने का आरोप लगाने के बीच स्पष्ट अंतर होना चाहिए। ऐसे आरोपों का मूल्यांकन राजनीतिक बयानबाजी से अलग, तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर किया जाना चाहिए।

SIR विवाद के बीच राहुल गांधी का वियतनाम दौरा, भाजपा ने उठाए सवाल

‘रिजीम चेंज’ की बहस के समानांतर राहुल गांधी के विदेश दौरे ने भी राजनीतिक विवाद को हवा दी है।मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, राहुल गांधी 18 अक्टूबर को गोवा में कांग्रेस के राजनीतिक कार्यक्रम में शामिल होने के बाद विदेश रवाना हुए। उनके वियतनाम की राजधानी हनोई जाने की जानकारी सामने आई है। हालांकि, कांग्रेस की ओर से यात्रा के उद्देश्य और कार्यक्रम को लेकर कोई विस्तृत आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई थी। इसलिए इस दौरे को निजी यात्रा बताने वाली खबरों और अटकलों को भी उसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए।

भाजपा ने यात्रा के समय को लेकर सवाल उठाए हैं। पार्टी का कहना है कि राहुल गांधी एक ओर चुनाव आयोग के खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं और मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों का मुद्दा उठा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर विदेश चले गए हैं।भाजपा प्रवक्ता प्रदीप भंडारी ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे राजनीतिक जिम्मेदारियों की तुलना में छुट्टियों को अधिक प्राथमिकता देते हैं।

उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि नवरात्र के दौरान विदेश जाने की वजह क्या है और क्या राहुल गांधी अपने कथित ‘अराजकता फैलाने वाले साथियों’ से मिलने गए हैं। भाजपा के इस हमले के पीछे राजनीतिक संदेश यह है कि जो नेता चुनावी निष्पक्षता के सवाल पर देशव्यापी आंदोलन का नेतृत्व करने का दावा करता है, उससे पार्टी कार्यकर्ता और समर्थक लगातार सक्रिय रहने की अपेक्षा कर सकते हैं।लेकिन किसी नेता के विदेश जाने मात्र से यह साबित नहीं होता कि वह अपने राजनीतिक दायित्वों से बच रहा है।

यात्रा का उद्देश्य, उसकी अवधि और उस दौरान पार्टी की राजनीतिक गतिविधियां क्या रहीं—इन तथ्यों के बिना किसी अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा।

कांग्रेस का पलटवार: विदेश जाना कोई अपराध नहीं

राहुल गांधी के विदेश दौरे पर भाजपा के हमलों के जवाब में कांग्रेस नेता राशिद अल्वी ने कहा कि यदि राहुल गांधी विदेश में हैं, तो भाजपा को इससे परेशान होने के बजाय राहत महसूस करनी चाहिए। कांग्रेस के पूर्व सांसद संदीप दीक्षित ने भी भाजपा की आलोचना का जवाब देते हुए कहा कि विदेश जाना सामान्य बात है और इस मुद्दे पर अनावश्यक विवाद खड़ा नहीं किया जाना चाहिए।संदीप दीक्षित के तर्क का सार यह है कि किसी नेता की विदेश यात्रा अपने आप में राजनीतिक निष्क्रियता या गैर-जिम्मेदारी का प्रमाण नहीं है। भाजपा यदि राहुल गांधी की यात्रा पर सवाल उठा रही है, तो उसे आलोचना को तथ्यों और ठोस राजनीतिक आधार पर रखना चाहिए।

समाजवादी पार्टी के सांसद रामशंकर राजभर ने भी राहुल गांधी के बचाव में कहा कि उनके विदेश दौरे से भाजपा को राहत मिलनी चाहिए, क्योंकि उनकी अनुपस्थिति में विरोध प्रदर्शनों की राजनीतिक सक्रियता प्रभावित हो सकती है।इस प्रकार, जहां भाजपा राहुल गांधी की अनुपस्थिति को उनके राजनीतिक रवैये से जोड़ रही है, वहीं कांग्रेस और समाजवादी पार्टी इसे सामान्य व्यक्तिगत यात्रा बताते हुए भाजपा की आलोचना कर रही हैं।

यह विवाद एक बार फिर उस सवाल को सामने लाता है कि विपक्ष के नेता से जनता और राजनीतिक दल किस तरह की सक्रियता की अपेक्षा करते हैं। हालांकि, किसी नेता की कार्यशैली का मूल्यांकन केवल विदेश यात्राओं की संख्या से नहीं, बल्कि उसके राजनीतिक कामकाज, संसद में भूमिका, जनसंपर्क और उठाए गए मुद्दों के आधार पर किया जाना चाहिए।

22 वर्षों में 54 विदेश यात्राओं का दावा, लेकिन बहस का आधार क्या?

राहुल गांधी के विदेश दौरे को लेकर भाजपा पहले भी सवाल उठाती रही है। उपलब्ध खबरों में भाजपा की ओर से दावा किया गया था कि राहुल गांधी ने 22 वर्षों में 54 विदेश यात्राएं कीं।हालांकि, इस आंकड़े के स्वतंत्र सत्यापन और यात्राओं के उद्देश्य, अवधि तथा आधिकारिक कार्यक्रमों के विवरण के बिना इसे राहुल गांधी की राजनीतिक कार्यशैली का निर्णायक प्रमाण नहीं माना जा सकता।विदेश यात्राएं किसी नेता की व्यक्तिगत, राजनीतिक या आधिकारिक गतिविधियों का हिस्सा हो सकती हैं। इसलिए सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि कोई नेता कितनी बार विदेश गया, बल्कि यह भी होना चाहिए कि उसके सार्वजनिक दायित्वों का निर्वहन किस तरह हुआ।

उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री संजय निषाद ने भी राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए कहा कि चुनाव जीतने के लिए जनता के बीच रहना पड़ता है, बार-बार विदेश जाकर सैर-सपाटा करना नहीं।यह टिप्पणी चुनावी राजनीति के एक व्यावहारिक पहलू की ओर संकेत करती है—जनता से संपर्क और क्षेत्रीय उपस्थिति किसी भी राजनीतिक दल के लिए महत्वपूर्ण हैं। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हर विदेश यात्रा राजनीतिक नुकसान ही पहुंचाती है। अंतिम फैसला जनता चुनाव के समय अपने अनुभव और राजनीतिक विकल्पों के आधार पर करती है।

कानूनविदों और शिक्षाविदों के नजरिए से क्या है असली मुद्दा?

इस पूरे विवाद को समझने के लिए तीन संवैधानिक और राजनीतिक पहलुओं के बीच अंतर करना आवश्यक है।

पहला, सरकार बदलने का अधिकार।

भारत में मतदाता चुनाव के माध्यम से सरकार चुनते हैं। सत्ता परिवर्तन लोकतांत्रिक प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा है। किसी मौजूदा सरकार को हटाकर दूसरी सरकार चुनने की मांग अपने आप में असंवैधानिक नहीं है।

दूसरा, चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाने का अधिकार।

यदि किसी राजनीतिक दल या नागरिक को मतदाता सूची, चुनावी प्रक्रिया या निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली पर संदेह है, तो वह उपलब्ध कानूनी और संवैधानिक उपायों का सहारा ले सकता है। ऐसे सवालों की वैधता संबंधित तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर तय होती है।

तीसरा, गैर-संवैधानिक सत्ता परिवर्तन।

यदि कोई व्यक्ति हिंसा या गैर-कानूनी तरीकों से संवैधानिक व्यवस्था को उखाड़ने की वकालत करता है, तो मामला अलग हो जाता है। लेकिन किसी राजनीतिक बयान में ‘रिजीम चेंज’ शब्द के इस्तेमाल भर से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि संबंधित व्यक्ति तख्तापलट की वकालत कर रहा है। आशय, संदर्भ और वास्तविक गतिविधियों को देखना आवश्यक है।

शिक्षाविदों और राजनीतिक विश्लेषकों के लिए भी यह बहस महत्वपूर्ण है, क्योंकि लोकतंत्र की मजबूती केवल चुनाव कराने से नहीं, बल्कि चुनावी प्रक्रिया में जनता के विश्वास, संस्थाओं की निष्पक्षता और सत्ता के प्रति जवाबदेही से भी जुड़ी होती है।

समाजसेवी संस्थाओं और नागरिक संगठनों के लिए इस विवाद में एक व्यावहारिक भूमिका हो सकती है—मतदाता जागरूकता बढ़ाना, चुनावी प्रक्रियाओं पर तथ्यपरक जानकारी उपलब्ध कराना और राजनीतिक मतभेदों के बीच शांतिपूर्ण संवाद को प्रोत्साहित करना।हालांकि, किसी कानूनविद, शिक्षाविद या समाजसेवी संस्था के नाम से कोई विशेष प्रतिक्रिया उपलब्ध नहीं होने पर उनके नाम पर बयान देना उचित नहीं होगा। इसलिए इस विश्लेषण में किसी काल्पनिक विशेषज्ञ की टिप्पणी शामिल नहीं की गई है।

विपक्ष के सामने चुनौती, भाजपा के सामने भी जवाबदेही का सवाल

इस राजनीतिक संघर्ष में कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने आंदोलन का स्पष्ट उद्देश्य जनता के सामने रखने की है। यदि पार्टी का मकसद मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों की जांच, निर्वाचन आयोग की जवाबदेही और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करना है, तो उसे अपने आरोपों के समर्थन में ठोस प्रमाण और स्पष्ट मांगें सामने रखनी होंगी।साथ ही, ‘रिजीम चेंज’ जैसी शब्दावली को लेकर उठे विवाद पर भी कांग्रेस को स्पष्ट राजनीतिक संदेश देना होगा, ताकि सरकार बदलने की लोकतांत्रिक मांग को लेकर अनावश्यक भ्रम पैदा न हो।

दूसरी ओर, भाजपा की जिम्मेदारी है कि वह चुनावी निष्पक्षता पर उठने वाले सवालों का तथ्यपरक जवाब दे। विपक्ष के आरोपों को राजनीतिक साजिश बताना पर्याप्त नहीं होगा; संबंधित मुद्दों पर पारदर्शिता और आधिकारिक स्पष्टीकरण भी आवश्यक हैं।

राहुल गांधी के विदेश दौरे पर राजनीतिक आलोचना की जा सकती है, लेकिन यात्रा के उद्देश्य और अवधि की पुष्टि के बिना उसे गैर-जिम्मेदाराना आचरण का निर्णायक प्रमाण बताना भी उचित नहीं होगा।

निष्कर्ष:

‘रिजीम चेंज’ की बहस में असली कसौटी संविधान और जनता का विश्वासआनंद शर्मा और शशि थरूर के बयानों ने ‘रिजीम चेंज’ की बहस में एक महत्वपूर्ण अंतर स्पष्ट किया है—लोकतंत्र में सरकार बदलने का अधिकार मतदाताओं के पास है, जबकि संवैधानिक व्यवस्था की रक्षा और चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता सुनिश्चित करना सभी राजनीतिक पक्षों की जिम्मेदारी है।

भाजपा इस विवाद को कांग्रेस के राजनीतिक नेतृत्व और राहुल गांधी की रणनीति पर सवाल उठाने के अवसर के रूप में देख रही है। वहीं, कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों का कहना है कि उनकी लड़ाई मताधिकार तथा निष्पक्ष चुनाव के लिए है।

राहुल गांधी के विदेश दौरे ने इस राजनीतिक संघर्ष में एक और विवाद जोड़ दिया है, लेकिन यात्रा के उद्देश्य और उसके राजनीतिक प्रभाव का निष्पक्ष आकलन तथ्यों के आधार पर ही किया जाना चाहिए।

एनएसके का राजनीतिक विश्लेषण:

राहुल गांधी के लिए चुनौती केवल भाजपा के आरोपों का जवाब देना नहीं, बल्कि अपने आंदोलन की दिशा और उद्देश्य को स्पष्ट रखना भी है।

भाजपा के लिए चुनौती यह है कि वह चुनावी प्रक्रिया पर उठने वाले सवालों का तथ्यपरक उत्तर दे।

अंततः लोकतंत्र में न सत्ता स्थायी होती है, न विपक्ष की भूमिका समाप्त होती है—निर्णायक अधिकार मतदाता के पास रहता है।

लोकतंत्र की असली ताकत सत्ता परिवर्तन में नहीं, बल्कि उस प्रक्रिया की निष्पक्षता में है जिसके जरिए सत्ता बदलती है।

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