हार्वर्ड-MIT समेत दुनिया के बड़े विश्वविद्यालयों से जुड़े 400 से अधिक भारतवंशियों की चेतावनी, ‘भारत को अराजकता से बचाएं’; चुनाव आयोग के खिलाफ प्रदर्शनों पर उठाए सवाल

बी के झा, एनएसके

NSK news Ind

नई दिल्ली, 20 अक्टूबर

भारत में चुनावी प्रक्रिया, निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता और लोकतांत्रिक संस्थाओं की भूमिका को लेकर जारी राजनीतिक टकराव के बीच विदेशों में रहने वाले 400 से अधिक भारतीय मूल के छात्रों, शोधकर्ताओं और पूर्व विद्यार्थियों के एक संयुक्त बयान ने बहस को नया मोड़ दे दिया है।

‘भारत को अराजकता से बचाएं’ शीर्षक से जारी इस बयान में विपक्षी दलों और चुनाव आयोग के खिलाफ हो रहे प्रदर्शनों की आलोचना की गई है। हस्ताक्षरकर्ताओं का तर्क है कि लोकतंत्र की रक्षा के नाम पर ऐसे आंदोलनों को बढ़ावा नहीं दिया जाना चाहिए, जो संवैधानिक संस्थाओं के प्रति जनता के विश्वास को कमजोर कर सकते हैं।

अमेरिका के हार्वर्ड विश्वविद्यालय और मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआईटी) सहित दुनिया के कई प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थानों से जुड़े लोगों के इस बयान ने राजनीतिक और वैचारिक बहस को एक नया आयाम दिया है।

27 देशों में रहने वाले इन भारतवंशियों ने अपने वक्तव्य में डॉ. भीमराव आंबेडकर के विचारों का हवाला देते हुए लोकतांत्रिक असहमतियों को संवैधानिक तरीकों से सुलझाने पर जोर दिया है।

बयान का मूल संदेश स्पष्ट है—लोकतंत्र की रक्षा के लिए संघर्ष करते समय उन संवैधानिक मर्यादाओं को कमजोर नहीं किया जाना चाहिए, जिन पर लोकतांत्रिक व्यवस्था टिकी हुई है। हालांकि, इस दृष्टिकोण के बीच एक महत्वपूर्ण सवाल भी मौजूद है: संवैधानिक संस्थाओं की आलोचना और उनके प्रति अविश्वास जताने वाले आंदोलनों के बीच वास्तविक सीमा कहां निर्धारित की जाए?

चुनाव आयोग के खिलाफ विपक्ष का आंदोलन, विदेशों से उठा विरोध का स्वर

यह बयान ऐसे समय सामने आया है, जब देश में विपक्षी दल चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता को लेकर सवाल उठा रहे हैं। विपक्ष की ओर से चुनावों में कथित गड़बड़ियों और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) जैसे मुद्दों पर आपत्तियां दर्ज कराई गई हैं। इन मुद्दों को लेकर राजनीतिक विरोध, सार्वजनिक प्रदर्शन और न्यायिक हस्तक्षेप की मांग भी सामने आती रही है।

दूसरी ओर, संयुक्त बयान पर हस्ताक्षर करने वाले भारतवंशियों ने इन विरोध प्रदर्शनों के तौर-तरीकों पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि चुनावी प्रक्रिया या संवैधानिक संस्थाओं को लेकर विवाद होने पर समाधान के लिए निर्धारित संवैधानिक और कानूनी रास्तों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

इस राजनीतिक टकराव के बीच कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के संस्थापक अभिजीत दीपके भी चुनाव आयोग के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों को लेकर चर्चा में रहे हैं। बीते दिनों उनकी अगुवाई में कई प्रदर्शन हुए और उन्हें दो बार हिरासत में लिए जाने की जानकारी भी सामने आई।ऐसे माहौल में विदेशों में रहने वाले भारतवंशियों का यह बयान केवल विरोध प्रदर्शनों की आलोचना तक सीमित नहीं है, बल्कि लोकतंत्र में असहमति, आंदोलन और संवैधानिक मर्यादाओं के आपसी संबंधों पर भी बहस खड़ी करता है।

हालांकि, विपक्षी दलों और प्रदर्शनकारियों के आरोपों का मूल्यांकन उनके साक्ष्यों, न्यायिक कार्यवाही और निर्वाचन आयोग के जवाब के आधार पर किया जाना चाहिए। केवल किसी प्रदर्शन के विरोध में जारी बयान से चुनावी अनियमितताओं के आरोप स्वतः गलत साबित नहीं हो जाते।

‘लोकतंत्र बचाने के नाम पर संवैधानिक व्यवस्था को कमजोर न करें’

संयुक्त बयान में हस्ताक्षरकर्ताओं ने लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति अविश्वास पैदा करने के प्रयासों पर चिंता जताई है। उन्होंने आरोप लगाया कि अदालतों में विचाराधीन मामलों को राजनीतिक संघर्ष का औजार बनाया जा रहा है और फिर सड़कों पर विरोध प्रदर्शनों के माध्यम से इस विवाद को और बढ़ाया जा रहा है।बयान में कहा गया है, ”भारतीय लोकतंत्र में संदेह के बीज बोने की एक बेहद अनुचित और कुटिल साजिश रची गई है। इसके लिए अदालत में विचाराधीन मामलों को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है, और फिर अराजकतावादी ताकतों का सहारा लेकर इसे सड़कों पर और हवा दी जा रही है। ये ताकतें ऐतिहासिक और वैचारिक रूप से कभी भी संवैधानिक शासन व्यवस्था में विश्वास नहीं रखतीं। और यह सब लोकतंत्र को बचाने के नाम पर किया जा रहा है।”इस वक्तव्य में इस्तेमाल की गई भाषा राजनीतिक रूप से तीखी है।

हस्ताक्षरकर्ताओं ने विरोध प्रदर्शनों के पीछे मौजूद उद्देश्यों और उनके संभावित प्रभावों पर गंभीर आरोप लगाए हैं। हालांकि, बयान में लगाए गए इन आरोपों को हस्ताक्षरकर्ताओं के दावे के रूप में ही देखा जाना चाहिए; इन्हें स्वतंत्र रूप से स्थापित तथ्य मानने के लिए अलग-अलग साक्ष्यों की आवश्यकता होगी।बयान का केंद्रीय आग्रह यह है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था को लेकर असहमति हो सकती है, लेकिन उस असहमति का समाधान ऐसी प्रक्रिया के जरिए होना चाहिए, जो संविधान और कानून के दायरे में आती हो।

डॉ. आंबेडकर के विचारों का हवाला, संवैधानिक रास्ते पर जोर

संयुक्त बयान में बाबासाहब डॉ. भीमराव आंबेडकर के विचारों का उल्लेख विशेष महत्व रखता है। हस्ताक्षरकर्ताओं ने लोकतंत्र में मतभेदों के समाधान के लिए संवैधानिक तरीकों को प्राथमिकता देने की बात कही है।भारतीय लोकतंत्र में संविधान केवल शासन चलाने का दस्तावेज नहीं, बल्कि नागरिकों के अधिकारों, संस्थाओं की शक्तियों और सत्ता की सीमाओं का आधार भी है। इसी व्यवस्था के तहत नागरिकों को अपनी असहमति व्यक्त करने, सरकार की आलोचना करने और संस्थाओं से जवाब मांगने का अधिकार मिलता है।

वहीं, संयुक्त बयान देने वाले भारतवंशियों का तर्क है कि विरोध की राजनीति को इस हद तक नहीं पहुंचना चाहिए कि लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति जनता का भरोसा ही समाप्त होने लगे।यहां बहस का एक दूसरा पहलू भी महत्वपूर्ण है। लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध, जन आंदोलन और संवैधानिक संस्थाओं की आलोचना भी नागरिक अधिकारों का हिस्सा हैं। इसलिए किसी आंदोलन को अराजक करार देने से पहले उसके स्वरूप, उद्देश्यों और गतिविधियों का वस्तुनिष्ठ आकलन जरूरी है।ऐसे में इस बयान को भारतीय लोकतंत्र में जारी उस व्यापक बहस के संदर्भ में देखा जा सकता है, जिसमें एक पक्ष संवैधानिक संस्थाओं की प्रतिष्ठा और स्थिरता पर जोर देता है, जबकि दूसरा पक्ष उन्हीं संस्थाओं से पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग करता है।

मौजूदा हालात से दुखी हैं भारतवंशी, चुनावी नतीजों पर विवाद को लेकर चिंता

बयान में हस्ताक्षरकर्ताओं ने भारत की मौजूदा राजनीतिक स्थिति को लेकर दुख और हैरानी जताई है। उनका कहना है कि दुनिया के अलग-अलग देशों में रहते हुए भी वे भारत के लोकतांत्रिक भविष्य से गहरा जुड़ाव महसूस करते हैं।वक्तव्य में कहा गया है, ”हम इस पूरी स्थिति के विरोधाभास को देखकर हैरान हैं। लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि देश के भविष्य से सरोकार रखने वाले जागरूक नागरिकों के रूप में और दुनिया भर में ‘भारतीय’ के रूप में अपनी पहचान रखने वाले लोगों के तौर पर हम मौजूदा हालात से बेहद दुखी हैं।

”हस्ताक्षरकर्ताओं ने चुनावी नतीजों को स्वीकार करने को लेकर विवाद, संवैधानिक संस्थाओं पर लगातार सवाल उठाने और संसद के बजाय सड़कों पर संघर्ष को प्राथमिकता देने की प्रवृत्ति पर भी चिंता जताई है।उनका मानना है कि राजनीतिक मतभेदों को संस्थागत प्रक्रियाओं के माध्यम से सुलझाया जाना चाहिए, ताकि लोकतांत्रिक व्यवस्था की विश्वसनीयता बनी रहे।हालांकि, चुनावी नतीजों पर सवाल उठाना और चुनावी प्रक्रिया में सुधार की मांग करना अपने आप में लोकतंत्र विरोधी नहीं है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में ऐसे सवालों की वैधता का निर्धारण तथ्यों, उपलब्ध साक्ष्यों और कानून के आधार पर होता है। असली चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि राजनीतिक संघर्ष के बीच संस्थागत जवाबदेही और लोकतांत्रिक स्थिरता, दोनों सुरक्षित रहें।

हार्वर्ड, एमआईटी, ऑक्सफोर्ड और कैम्ब्रिज से जुड़े हस्ताक्षरकर्ता संयुक्त बयान पर हस्ताक्षर करने वालों में अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी, फ्रांस, जापान और सिंगापुर सहित 27 देशों के विश्वविद्यालयों से जुड़े छात्र, शोधकर्ता और पूर्व विद्यार्थी शामिल बताए गए हैं।इन संस्थानों में प्रमुख रूप से निम्नलिखित नाम शामिल हैं:हार्वर्ड विश्वविद्यालय मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआईटी)ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स (एलएसई)इन प्रतिष्ठित संस्थानों से जुड़े लोगों के हस्ताक्षर होने के कारण बयान को विशेष ध्यान मिला है।

हालांकि, संयुक्त वक्तव्य में यह स्पष्ट किया गया है कि हस्ताक्षरकर्ताओं का इन विश्वविद्यालयों से जुड़ाव संबंधित संस्थानों की आधिकारिक सहमति या समर्थन का प्रमाण नहीं है।अर्थात, यह बयान उन व्यक्तियों का सामूहिक दृष्टिकोण है, जो इन संस्थानों में पढ़ चुके हैं, पढ़ रहे हैं या उनसे किसी अन्य शैक्षणिक रूप में जुड़े रहे हैं। इसे हार्वर्ड, एमआईटी या किसी अन्य विश्वविद्यालय का आधिकारिक बयान मानना सही नहीं होगा।

अभिजीत दीपके के आंदोलन के बीच बयान का राजनीतिक महत्व

चुनाव आयोग के खिलाफ जारी विरोध प्रदर्शनों और सीजेपी की गतिविधियों के बीच इस संयुक्त बयान का सामने आना राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। इससे यह स्पष्ट होता है कि चुनावी प्रक्रिया और संवैधानिक संस्थाओं को लेकर चल रही बहस केवल भारत की घरेलू राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि विदेशों में रहने वाले भारतीय मूल के लोगों के बीच भी इन मुद्दों पर अलग-अलग दृष्टिकोण मौजूद हैं।एक ओर निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर सवाल उठाने वाले राजनीतिक दल और प्रदर्शनकारी हैं, जो निष्पक्षता, पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग कर रहे हैं।

दूसरी ओर, संयुक्त बयान के हस्ताक्षरकर्ता ऐसे विरोधों के स्वरूप और संभावित परिणामों को लेकर चिंता जता रहे हैं।इस टकराव में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोध और संस्थागत विश्वास के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।किसी भी संवैधानिक संस्था को आलोचना से परे नहीं माना जा सकता।

उसी तरह, संस्थाओं के प्रति अविश्वास से जुड़े आरोपों का समाधान भी केवल राजनीतिक नारों से नहीं, बल्कि तथ्यों, पारदर्शिता और कानूनसम्मत प्रक्रिया से होना चाहिए।

निष्कर्ष:

लोकतंत्र की रक्षा पर दो दृष्टिकोण, जवाबदेही और विश्वास दोनों जरूरीहार्वर्ड, एमआईटी और अन्य प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों से जुड़े 400 से अधिक भारतवंशियों का संयुक्त बयान भारतीय लोकतंत्र को लेकर जारी बहस में एक नया दृष्टिकोण सामने रखता है।

हस्ताक्षरकर्ताओं ने संवैधानिक संस्थाओं पर भरोसा बनाए रखने और विरोध के लिए कानूनी रास्तों को प्राथमिकता देने की अपील की है।

लेकिन इस बहस का निष्कर्ष केवल विरोध प्रदर्शनों की आलोचना या संवैधानिक संस्थाओं के समर्थन तक सीमित नहीं होना चाहिए। लोकतंत्र की मजबूती के लिए संस्थाओं की निष्पक्षता, पारदर्शिता और जवाबदेही भी उतनी ही आवश्यक हैं, जितना नागरिकों का उनमें विश्वास।

लोकतंत्र की असली परीक्षा यही है कि वह असहमति को जगह दे, सवालों का जवाब दे और संवैधानिक व्यवस्था के भीतर रहते हुए विवादों का निष्पक्ष समाधान सुनिश्चित करे।

एनएसके विश्लेषण:

लोकतंत्र में न तो हर विरोध को अराजकता कहा जा सकता है और न ही हर संस्थागत सवाल को निराधार मानकर खारिज किया जा सकता है। निर्णायक भूमिका तथ्यों, संविधान और निष्पक्ष जांच की ही होनी चाहिए।

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